सोमवार, 18 मई 2015

मूंछ की कहां पूछ




देशपालसिंह पंवार
नाक के नीचे जो ऑंधी आई थी, उसमें सिर्फ बाल ही बॉंका हुआ था, किसी और के हताहत होने की कोई सूचना नहीं आई। 0-एक वो जमाना था जब मूंछें आन-बान-शान का प्रतीक हुआ करती थीं। मूंछ पर हाथ डालना इज्जत से जोड़ लिया जाता था। मूंछ ही आदमी की शान-ओ-शौकत का एहसास कराती थी। मूंछ ही हार-जीत का फैसला करती थी। लोग लड़ाई में अपनी मूंछों के लिए अपनी जान दे दिया करते थे। अगर किसी राजा ने अपनी मूंछें मुंड़वा ली तो हल्ला मच जाता था। समझ लो हार गया। एक बाल का मतलब होता था जबान, लोग अपनी जबान के बदले मूंछ का एक बाल गिरवी रख दिया करते थे। दी गई जबान पूरी नहीं हुई तो अगले दिन मूंछें साफ। उस जमाने में कहा भी जाता था कि मूंछ रखने का अधिकार केवल घर के उस मुखिया को जो बेहतर ढंग से परिवार चला सकता हो, उस राजा को जो अपनी प्रजा का ख्याल रखता हो, उस महाराजा को, जिसकी छत्रछाया में सारे राज्य तरक्की कर रहे हों। वैसे भी तब राजा के सामने मूंछ लेकर तो कोई जाता नहीं था। ऐंठना तो दूर की कौड़ी। लिहाजा उस दौर में अगर किसी परिवार या राज्य में कुछ भी गलत होता था तो यही कहा जाता था कि इस मुखिया या फिर फलां-फलां राजा को मूंछें रखने का हक नहीं। ऐंठना तो बहुत दूर की बात है। यानी मूंछें ही सर्वोपरि। मूंछों और नाक का उस दौर में सीधा रिश्ता था। मूंछों पर बन आई तो समझो नाक गई। नाक गई तो समझो इज्जत गई। खैर मूंछों का हो या ना हो लेकिन नाक का रूतबा तो आज भी है।
0- तब मूंछें रखने वाले खुद से ज्यादा मूंछों का ख्याल रखते थे। जब नाई से मूंछ सही करानी हो तो नाई के दास्ताने जरूरी। अगर मुखिया या राजा की मूंछें हों तो फिर नाई की क्या मजाल की उसका एक बाल भी वो ले जाए। सब सहेजकर रखी जाती थी। जैसे मूंछें ना हों कोई खजाना हो जिसे छिपाकर रखना बेहद जरूरी। नाई से कुछ गड़बड़ होते ही खैर नहीं। मारपीट से लेकर जुर्माने तक या इससे भी आगे अत्याचार तक नाई को झेलने ही पड़ते थे पर अब?
0-अब तानाशाही का दौर तो है नहीं। लोकतंत्र है। तरक्कीपसंद जमाना है। इसकी भी कोई बाध्यता नहीं कि मूंछ रखना ही रखना है। जिसकी मर्जी हो रखे और जिसकी मर्जी हो ना रखे। अब तो ये फैशन का पार्ट हो गई हैं। या फिर कहा जा सकता है कि जिसके चेहरे पर मूंछ फबती है तो वो रखता है और जिसके चेहरे पर अच्छी ना लगे तो वो नहीं रखता। भारत की युवा पीढ़ी तो खैर वैसे भी मूंछों से दूर है। कौन रोज-रोज का झंझट मोल ले? लिहाजा सफाचट। सुंदर दिखना होता है। मूंछें रखेंगे तो कहीं ना कहीं इस बात से घबराते हैं कि विपरीत लिंग में आकर्षण ना खो जाए। खैर हमारा कहने का ये आश्य तो कतई नहीं कि जो रखता है वो सही और जो नहीं रखता वो गलत। घर की खेती है जो जब चाहे कटा सकता है या जब चाहे उगा सकता है। बताने के पीछे कारण बस इतना सा है कि कम से कम मूंछें अब आन-बान-शान का प्रतीक तो कतई नहीं। वो केवल मूड की खेती बनकर रह गई हैं। उनके कटने या रखने से कम से कम इज्जत का कोई नाता नहीं। मान मर्यादा, सम्मान सब कुछ गंवाने पर भी आज के दौर में कोई ये नहीं कहता कि फलां-फलां की मूंछ कट गई। अब कट गई तो कट गई। इसमें क्या किया जाए? उसे तो अगले दिन फिर उग आना है। वैसे भी मूंछों का महत्व तब तक था जब तक इंसान का रूतबा था। अब पैसे की दुनिया है। मोह माया का जमाना है लिहाजा पैसे के सामने क्या मूंछ और क्या बे मूंछ। जिसके पास धन उसके पास सब कुछ।
0- अब तो खैर मूंछों की कोई औकात ही नहीं। ना कटवाने वाला सहेजकर रखता और ना ही काटने वाला। लिहाजा काटते ही सीधे गंदी नाली में। घमंड में रहने वाली तमाम हस्तियों की मूंछ आए दिन तैरती मिल जाएंगी। फिर बरसात के समय ना जाने कहां- कहां से बहती हुई राजधानी से लेकर सुदूर बस्तर की खाक छानती रहती हैं। अब इनमें चाहे कोई हो या फिर कितनी भी बड़ी हस्ती हो। सबकी मूछों की महत्ता इस दौर में बेहद सस्ती। सफाचट की मस्ती। 0 मूंछ का सवालःपुराना जमाना कोई खराब तो था नहीं। ये भी नहीं कहा जा सकता कि नया जमाना बेकार है लेकिन ये भी तो दावे से नहीं कहा जा सकता है कि यही स्वर्णिम दौर है। नए जमाने की नई फसल में मूछों का भले ही कोई शगल ना हो, नैतिक मूल्य दांव पर हों, चारों तरफ अराजकता का दौर हो, घूस-घपले-घोटालों के किस्सों से सब सराबोर हो, महंगाई जान ले रही हो तो ऐसे में कम से कम ये तो कहा ही जा सकता है कि विश्वास संकट की आंधी में जुबान की आन, मूंछों की शान और इंसान की बान का गान अब इतना बेसुरा हो चुका है कि इस बारे में कुछ कहना ही बेकार है। हां कुछ समय के लिए पुराने जमाने को आधार बनाकर अगर बात की जाए तो कम से कम ये तो कहना ही पड़ेगा कि जिस देश में नेता,अफसर और ठेकेदार अमीर व जनता गरीब हो, 50 फीसदी महागरीब हो, आधी आबादी रोजगार के संकट से जूझ रही हो, फ्री के चावल व दाल पर किसी तरह गुजर-बसर कर रही हो, अपराध चरम पर हों, शिक्षा का बुरा हाल हो, खेत और पेट के लिए पानी ना हो, आधे देश में नक्सलियों की हुकूमत हो और भी ना जाने क्या-क्या ऐसा हो जो तरक्की पसंद कौम के अहंकार पर पाबंद लगाता रहता हो तो पुराने जमाने के हिसाब से कम से कम ये सवाल तो उभरता ही है कि क्या देश व राज्य चलाने वाले ऐसे नेताओं को मूंछें रखने का हक है? क्या मूंछों पर ताव देने का हक है? अगर हम अपना घर और अपना राज्य सही नहीं रख सकते तो फिर मूंछ कैसे रख सकते हैं? हम पहले भी कह चुके हैं कि आज के दौर में मूंछों की बेकदरी सबसे ज्यादा है। उसका मान-सम्मान से ज्यादा नाता सहूलियत से है। पर जो देश अपनी संस्कृति पर इतराता घूमता रहता है तो उस देश में मूंछों की शान की उपेक्षा कैसे की जा सकती है? जिन्होंने रखी वो जानें, जिन्होंने नहीं रखी वो जानें कि क्यों रखी और क्यों नहीं रखी पर पुराने जमाने की बात होगी तो मूंछों की बात भी जरूर होगी। अफसोस केवल इस बात का है कि तब मूंछें तय करती थी कि सब सही है पर अब तो कोई पैमाना या माध्यम ही नहीं रहा जिससे ये आंका जा सके कि हां सब कुछ ठीक है या कुछ गड़बड़ है।

रविवार, 15 जुलाई 2012

बेटा अपराधी हो तो बाप की ठुकाई करो


देशपाल सिंह पंवार  

पुलिस व प्रशासनिक अफसरों को उठाईगिरों जय-वीरू जैसी दोस्ती की मिसाल देने के बाद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री  ने भरी भीड़ में बेटों के गुनाहों के लिए बाप के खून को जिम्मेदार ठहराया


बेटा अगर गलती करे तो बेटे की नहीं बाप की ठुकाई करो। गलती बाप की है। उसके संस्कारों की है। गुण तो बाप से ही आता है। औलाद दादा और बाप से ही तो सारे गुण लेती है। मैं कहता हूं कि बेटा यदि चोरी करता है, डकैती डालता है, बलात्कार करता है तो उसमें बेटे का क्या दोष? सारा गुनाह बाप का है। हमनें ही औलादों को ऐसा बनाया है। जैसा हमारा खून है, जैसा हमारा डीएनए है, जैसी हमारी सोच है, वैसा ही बेटा बनता है। अपराधी बेटा नहीं बाप होता है। हाल ही में एसपी व कलेक्टर को जय व वीरू से सबक लेने और उनकी राह पर चलने की बात कहने वाले छत्तीसढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने शुक्रवार को ये बातें उस समय कही जब राजधानी रायपुर में देश का 43 वां और छत्तीसगढ़ का पहला साइंस सेंटर खुल रहा था। तमाम नेता,अफसर और वैज्ञानिक तथा जनता वहां मौजूद थी। छत्तीसगढ़ इस साइंस सेंटर से कितना सीखेगा ये तो वक्त बताएगा लेकिन रमन सिंह खुद डाक्टर भी हैं और डीएनए या जीन्स को एक आम आदमी से बेहतर समझते हैं। इसी वजह से उन्होंने सारे बाप को बेटे की करनी के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। पर जो बात उन्होंने कही वो विज्ञान की कम और संस्कार की ज्यादा थीं। यानि करे कोई और भरे बाप-दादा। मुख्यमंत्री के इस अप्रत्यक्ष निर्देश के बाद पुलिस बाप-दादा का क्या करेगी ये तो पहले से ही अंदेश सबको है। पर कम से कम सारी जिंदगी हड्डियां तुड़वाकर किसी तरह घर चलाने वाला बाप तो पहले ही नालायक औलाद का खामियाजा भोगता रहता है। इस तरह के बयानों से तो उसके पास जीने का भी हक नहीं रहा।


सुराज को नमन: अनोखा कथन- बेजोड़ चमन- बस बाप का दमन


हिंदुस्तान ऐतिहासिक परंपराओं का देश है। हमारा इतिहास ऐसे किस्सों से भरा पड़ा है जहां पिता और गुरू के आदेश पर बेटे राजपाट तक त्याग देते थे। हां विदेशी धरती से आने वाली राजाओं की फौज यानि मुगल सल्तनत के किस्से भी ऐसे थे कि बेटा ही बाप और भाई को मारकर ताज हथिया लेता था। यानि दोनों ही पहलू से इतिहास अटा पड़ा है। पुरातन कहावत भी है कि जिसकी औलाद गलत निकल जाए तो वो जीते-जी मर जाता है। यानि हर मां-बाप की असली कमाई औलाद है। औलाद सही तो सब सही वरना  मुंह दिखाने लायक नहीं रहते कहीं। रजवाड़ों के दौर में अमूमन ऐसा होता था कि औलाद की गलती तो बाप को भी अंदर कर दो। हां तब भी एक बात तो जरूर कही जाती थी कि जैसी करनी-वैसी भरनी। पर तब भी करे कोई और भरे कोई को गलत माना जाता था और आज भी ये रीत बदली नहीं है। खैर रजवाड़े तो अब रहे नहीं। लोकतंत्र है। अपने कायदे-कानून हैं। कानून कहता है कि जिसने गलती की है सजा उसे ही मिले यानि अगर बेटे ने की है तो केवल बेटे को। कानून ये भी कहता है और मानता है कि भले ही कोई दोषी बच जाए लेकिन किसी निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। कानून तो बहुत सारे हैं लेकिन हर ताकतवर ने कानून की अलग-अलग व्याख्या कर ली है। गरीब कानून को अंधा तक कहने से नहीं चूकते तो अमीर और खासकर राजनेता कानून को अपने हिसाब से चलाने और हांकने की कोशिश तब तक जरूर करते हैं जब तक की समय सही होता है, या कानून की खुलेआम धज्जियां उड़ती सारी दुनिया नहीं देखती। सारे देश में यही हो रहा है तो फिर छत्तीसगढ़ अलहदा कैसे रह सकता है? चाल, चरित्र और चेहरे वाली पार्टी का सुराज है। कानून भले ही बेटे के दोष के लिए बेटे को ही सजा देने की बात करता हो लेकिन सुराज के राजा यानि मुख्यमंत्री रमन सिंह आजकल अपना ही कानून बना रहे हैं और जनता को सिखा भी रहे हैं। अब वो कह रहे हैं कि अगर बेटे का दोष हो तो बाप को ठोको।  वैसे सौम्य चेहरे के स्वामी रमन सिंह हमेशा दायरे में और गैरविवादित बयानों को लेकर जाने जाते रहे हैं परंतु आजकल हाव-भाव काफी आक्रामक और बयान काफी विवादित नजर आ रहे हैं। संघ कहता है कि भारत माता सबसे ऊपर है। वीर सावरकर और सरदार पटेल जैसी हस्तियों का अनुसरण करो। भाजपा भी कहती है कि भगवान राम के आदशोँ पर चलो लेकिन रमन सिंह की थ्योरी अलग ही राह पर जा रही है। आई ए एस व आईपीएस अफसरों को वो कहते हैं कि फिल्म शोले के जय और वीरू की तरह दोस्ती की मिसाल कायम करो। भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती या फिर अटल बिहारी वाजपेयी या एल के आडवाणी या फिर अन्य पार्टी के आदर्श चेहरों की मिसाल वो नहीं देते। उन्हें दोस्ती की मिसाल देने के लिए असली चरित्र नहीं मिलते । मिलते हैं तो केवल नकली और वो भी दो उठाईगिरे। जो जेब काटने से लेकर ऐसा कोई गलत काम नहीं जो फिल्म में ना किया हो। क्या लाजवाब मिसाल थी? संस्कारों की दुहाई देने वालों के क्या यही संस्कार हैं? क्या यही भगवान राम की राह पर चलने वाली पार्टी की नीति है? रमन सिंह की उस नसीहत और हिदायत के बाद अफसरशाही चाहे तो  उन दो लफंगों जय-वीरू की तरह आशिकी भी कर सकती है? अब जय-वीरू अगर सुराज के आदर्श हैं तो बसंती का भी जरूर कहीं ना कहीं कोई अता-पता सुराज को जरूर होगा? शायद अफसरशाही को बता भी दिया गया होगा। क्या ताजा बयान इस बात का संकेत नहीं कि सुराज में अब सारे पिताओं की खैर नहीं? अरसे से छत्तीसगढ़ पुलिस को बेकार में मानवाधिकार वादी कोसते आ रहे थे कि वो गलती कोई करता है और सजा सारे घरवालों को दे देती है। ये तो अब पता चला कि जहां मुख्यमंत्री इस तरह के कानून को मानते हों तो फिर वहां की पुलिस को रोकने-टोकने व बोलने वाला कौन है? इसमें कोई दो राय नहीं कि परिवार के संस्कार और बाप-दादा के जीन्स बच्चों में आते हैं। लेकिन इस बात की कोई गारंटी दे सकता है कि जैसा बाप होगा-दादा होगा, वैसा ही बेटा और पोता होगा?क्या गरीब का बेटा आईएएस नहीं बन सकता? अमीर का बेटा कातिल नहीं हो सकता? डाक्टर का बेटा मुख्यमंत्री नहीं बन सकता? गांव में भैंस चराने वाला लालू मुख्यमंत्री नहीं बन सकता और फिर घोटाले नहीं कर सकता? उपलब्धियां मेहनत से आती है और संस्कार से तहजीब। पर तहजीब के लिए केवल घर के संस्कार ही काफी नहीं होते। आज के दौर में जिस तरह आर्थिक उदारवाद के नाम पर चकाचौंध फैली है। समाज में खुलापन आया है। टीवी व मोबाइल अपसंस्कृति फैली है। बच्चे मनमर्जी करने लगे हैं। समाज, वक्त और माहौल भी इसके लिए उतना ही दोषी है। बंदिशें लगाओ तो बाप कसाई और तालिबानी। ना लगाओ तो आफत। अगर हमारे बेटी-बेटे प्रेम विवाह कर लेते हैं तो क्या इसे भी गलत ठहराया जाए और मां-बाप को दोषी माना जाएगा? लाख टके का सवाल ये भी है कि जहां सरकारें अपनी कौम को खाना देने से ज्यादा शराबी बनाने पर तुली हैं वहां केवल मां-बाप को ही तहजीब सिखाने या बच्चों को डकैत, बलात्कारी और चोर बनाने के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता? हां मां-बाप की जिम्मेदारी बेहतरीन शिक्षा व परवरिश देना होता है लेकिन मुख्यमंत्री तो पूरे प्रदेश के माई-बाप होते हैं। तो हर गलती के लिए आखिर में कौन जिम्मेदार हुआ? चलो मान लिया कि मुख्यमंत्री सही कह रहे हैं तो फिर इसका जवाब भी उन्हें ही देना चाहिए कि कोई भी सरकार, मंत्री या अफसर गलती करता है, जनता को शराबी बनाता है, गरीब रखता है, किसानों का हक छीनता है,कारोबारियों के लिए जल, जंगल, जमीन सब लुटा देता है तो इस तरह की हजारों गलतियों और अपराधों के लिए किसे और कौनसी सजा कब दी जाएगी? अगर कोई बिरादरी अपने समाज की बेहतरी के लिए लड़कियों और महिलाओं तथा बच्चों पर अंकुश लगाती है तो उसे तालिबानी समाज कहा जाता है लेकिन अगर मुख्यमंत्री ये कहें कि बेटा बलात्कारी हो तो बाप को ठोको, ये कहां तक जायज है? क्या लोकतंत्र में किसी मुख्यमंत्री का ये बयान तालिबानी नहीं? क्या इसे जायज माना जा सकता है? क्या अदालतों की अब जरूरत नहीं रह गई?  मुद्दा बेहद गंभीर और संवेदनशील है। इस पर मकसद किसी की आलोचना करना नहीं बल्कि बहस करना है ताकि परिवार बेहतर हो। परिवार बेहतर तो समाज बेहतर, प्रदेश बेहतर और हमारा देश बेहतर। हम सब गर्व से कह सकें कि मेरा भारत महान। (EDITOR JANDAKHAL HINDI DAILY)
तो शादी में जीन्स का मिलान होगा
अगर रमन सिंह की चली तो यकीनन आने वाले समय में भारत में शादी-विवाह के लिए कुंडलियां नहीं मिलाई जाएंगी बल्कि लोग पहले जीन्स का टेस्ट कराएंगे और अगर मिले तो ठीक वरना राम-राम। भारत में शादी-विवाह कैसे होते हैं सब जानते हैं। यहां चाहे कोई आस्तिक हो या नास्तिक लेकिन कम से कम बच्चों की शादी के वक्त वो कुंडली जरूर उठाए घूमता है कम से कम हिंदू समाज में। लेकिन मानना पड़ेगा कि मुख्यमंत्री की सोच पूरी वैज्ञानिक है। क्योंकि अमूमन वैज्ञानिक ही इस बात को कहते हैं कि आनुवंशिकी दोष बढ़ते जा रहे हैं लिहाजा युवाओं को इस राह पर जाना चाहिए कि वो पहले आनुवंशिक कोड़ को जाने और जीवन साथी का भी पहचाने तब जाकर हाथ में हाथ लें वरना तबाही तय है। इसके पीछे वैज्ञानिक यही मानते हैं कि पति-पत्नी के बच्चे निरोगी रहेंगे। रमन सिंह भी डाक्टर हैं लिहाजा वो भी यही कहते हैं कि हर घर में ऐशवर्या राय और अभिषेक पैदा हो सकते हैं। अब लाख टके का सवाल ये भी पैदा होता है कि जिस घर में दौलत के भंडार हों वहां तो कोई भी बच्चा स्वस्थ रह सकता है लेकिन जिस राज्य की आधी आबादी महागरीब हो वहां कैसे इस मामले में सोचा जाए? हो सकता है कि सुराज की सरकार अगली बार कारोबारियों की तरह इस स्टेट के हर वाशिंदे को भी इस लायक बना दे कि वो जीन्स टेस्ट के बाद ही बच्चों को जन्म दे। फिलहाल तो सुराज में इस आबादी को दो वक्त की रोटी और दो गोली दवा तक के लाले हैं। जो जैसा पैदा हो जाए सब भगवान की मर्जी।


लोकलाज पर गाज-बेढंगा साज



पश्चिम उत्तर प्रदेश का बागपत जिला और उसका मुस्लिम बहुल गांव असारा आजकल बेहद चर्चा में है। गांव की महिलाओं और लड़कियों से आए दिन की छेड़छाड़ के बाद बिरादरी ने फैसला किया कि 40 साल से कम की कोई महिला और लड़की ना तो बाजार जाएगी और ना ही मोबाइल पर बात करेगी। सिर पर कपड़ा होगा. इतना ही नहीं गांव में प्रेम विवाह पर भी रोक लगा दी गई है। साथ ही दहेज पर पूरी तरह पाबंदी। इधर पंचायत ने ये फैसला किया और उधर मीडिया ने इसे फिर वैसी ही हवा दे दी जैसी वो इस सारे इलाके और हरियाणा के बारे में फैलाता आ रहा है। यानि पूरा इलाका हिटलर और यहां की कल्चर तालिबानी। फिर खाप को लेकर टी वी चैनलों पर हमेशा की तरह बिना सोचे-समझे वही पुराना रिकाडऱ् बज रहा है। वही घिसे-पिटे चेहरे, लोकतंत्र के नाम पर वही घिसी-पिटी बातें गूंज रही हैं। मानवाधिकारों का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। आजकल केंद्र भी मीडिया की ही आंख से चलता है। लिहाजा बिना तहकीकात किए पी चिदबंरम भी आग में कूद पड़े हैं। उनकी नजर में लोकतंत्र में खाप पंचायतों के ऐेसे फरमानों की कोई जगह नहीं है। ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की वो अखिलेश सरकार से उम्मीद कर रहे हैं। हैरानी की बात है कि एक तरफ केंद्र पंचायती राज की दुहाई देता है और दूसरी ओर पंचायत की ही बात मानने को तैयार नहीं। उल्टे उकसाया जा रहा है। यूपी के कैबिनेट मंत्री आजम खान पी सी को टका सा जवाब दे रहे हैं कि इसमें गलत क्या है? सबको अपनी बात कहने का हक है। ये फरमान नहीं अपने समाज की बेहतरी के लिए बड़ों की राय है। रहा सवाल मोबाइल पर बैन का तो इस पर भी आजम खान ने टका सा जवाब दिया है कि वो किसी मोबाइल कंपनी के एजेंट नहीं हैं। पंचायत ने सोच समझकर ही फैसला लिया होगा। मौलाना भी कह रहे हैं कि इसका इस्लाम से कोई वास्ता नहीं। केवल समाज सुधार की बातें हैं। यानि टकराव गांव में भले ही ना हो, बिरादरी में भले ही ना हो लेकिन चैनलों के स्टूडियों और सरकारों के बीच जरूर है। लाख टके का सवाल यही है कि आखिर सरकारें जमीनी हकीकत को क्यों नहीं समझती? गांवों को दिल्ली बनाने पर क्यों तुली हैं? सवाल ये भी है कि क्या दिल्ली आदर्श है?  मानवाधिकारवाद की दुहाई के सहारे आर्थिक उदारवाद और सामाजिक सुधारवाद की चकाचौंध से पतन के कगार पर खड़े समाज को बचाने की जरूरत है या उसे नेस्तानाबूद करने की? क्या मीडिया को इसका आंकलन या पोस्टमार्टम नहीं करना चाहिए कि आखिर ये सब क्यों हो रहा है? कड़वा सच ये भी है कि मीडिया ऐसा जज बन गया है जो बिना तह तक जाए केवल सुनी-सुनाई बातों पर फैसला सुना देता है। फैसला एक ही होता है-तालिबानी संसार: प्यार पर वार।

देशपाल सिंह पंवार

दिन में ही जुगनूओं को पकडऩे की जिद करें,बच्चे हमारे दौर के बहुत चालाक हो गए।

देश में लोकराज है। अधिकारों का साज है। सबको नाज है। होना भी चाहिए। पर ये कौन सा काज है? क्यों लोकलाज नासाज है? क्यों संस्कारों पर गाज है? क्यों कल को मिटाता आज है? क्यों यमराज का राज है? लोकतंत्र में आजादी के ये कौन से मायने निकाले जा रहे हैं? सावन की फुहार के बजाय क्यों गरम बयार को पंखे झुलाए जा रहे हैं? समाज की तपिश में हाथ तापने की गलत सोच पर भी क्यों सीने फु लाए जा रहे हैं? आखिर ये कौन सा संसार और कैसा प्यार? सारी हदें पार। शर्मो हया तार-तार। संस्कारों की हार। रिश्तों पर वार। अपने बेजार। मानवता शर्मसार। ये कहां आ गए हैं हम? हक के नाम पर बड़ों की मनमर्जी। गांव में प्यार व शादी की जिद करने वाले युवाओं की खुदगर्जी। ना पालक धर्म की राह पर जाते नजर आ रहे हैं। ना ही मीडिया असली कर्म की कमाई खा रहा है। नेता रूपी चालक से ना पहले कोई आस थी। ना आज है। वे कल भी भ्रम में थे-आज ज्यादा हैं। कल क्या होगा-अंदाजा लगाया जा सकता है। बापू को नमन और चमन का पतन-यही आज के समाज का कथन है। ऐसे में सामाजिक ताने-बाने के संकरे होते रास्ते कितनी देर और कितनी दूर साथ लेकर चल पाएंगे,अब यह सवाल हर समय मथ रहा है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको तमाम हक हैं। प्यार पर भी बंदिशें नहीं हैं। तय उम्र के बाद शादी पर भी रोक नहीं है लेकिन इस हक का मतलब हद पार करना नहीं है। असली दिक्कत यही है कि हक की किताब तो बांच ली गई पर हद को ना तो जानने की कोशिश की गई, ना समझने की। मानना तो दूर की बात है। जहां-जहां हद पर हक का पलड़ा झुका वहां यही हुआ जो आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस गांव असारा में हो रहा है। हरियाणा में हो रहा है। असम में हो रहा है। सारे देश में हो रहा है। लाख टके का सवाल यही है कि कंधे पर लैपटाप, कान पर मोबाईल, आंख पर चश्मा लगाकर चलने वाली ये कौम क्या प्यार की कहानी का सारा फि ल्माकंन दिल व घर की चाहरदीवारी से बाहर सड़क पर करना चाहती है? संविधान की किस धारा में ये अधिकार मिला है कि लिहाफ  सड़क पर बिछाया जाएगा? मां-बाप की इज्जत को सरेआम उछाला जाएगा? ये देश गांवों में बसता है। वहां हर लड़की को बहन माना जाता है तो क्या बहन को बीवी बनाया जाएगा? समाज और संविधान की किस धारा में लिखा है और कहां से ये हक मिला है कि बालक पल में अपने पालक को ही नालायक का दर्जा दे डालें? आजादी के ये मायने तो नहीं थे। सवाल यह भी है कि संविधान की किस धारा में किसी भी शख्स, किसी भी गौत्र, किसी भी गांव या किसी भी खाप को खून बहाने  व तुगलकी फरमान सुनाने की आजादी मिली है? मूंछ के सवाल पर समाज और कानून को हलाल नहीं किया जा सकता।       
  वैसे ये एक सामाजिक समस्या है, इसे ना तो कोई गौत्र,ना कोई खाप, ना कोई राजनीतिक दल, ना कानून की कोई धारा इस हांके से हांक सकती जो आज पश्चिमी उत्तर प्रदेश व हरियाणा के हर गांव-गली और कूंचों में लगाया जा रहा है। यह एक संवेदनशील मामला है। नेतागिरी जितना दूर रहेगी-उतना ही अच्छा। मानवाधिकारों का डंका पीटने वालों को भी तह में जाना होगा। टी वी चैनलों पर हल्ले से ये ठीक नहीं होगा। सख्ती से इसे दबाया नहीं जा सकता। किसी सजा से भी इसका समाधान नहीं निकलने वाला। घर-गांव, गौत्र और खाप वालों को भी निष्कासन से आगे की हद नहीं लांघनी चाहिए। असारा में मुस्लिम बिरादरी ने जो फैसले किए गए उनके पीछे समाज को बचाने का तर्क दिया जा सकता है लेकिन कानून को हाथ में लेने और किसी को मारने-पीटने का अधिकार ना किसी शख्स को है, ना किसी समाज को है, ना किसी गौत्र को है, ना किसी खाप और सर्वखाप को है। सबको ये समझने की भी जरूरत है कि ऐसे मामले क्यों होते हैं? जिस असारा गांव का ये मामला है। इस गांव को मैं नजदीक से जानता हूं क्योंकि इसी गंाव के मुस्लिम इंटर कालेज से मैंने हाईस्कूल की शिक्षा ग्रहण की थी। ज्यादातर आबादी मुस्लिम जाटों की है। वैसे हर जात का यहां बंदा है। यहां  कोई खून-खराबा या दंगा फसाद कभी हुआ भी नहीं। पर बरसों से बाजार जाने वाली लड़कियों और महिलाओं पर छींटाकसी और मोबाइल कल्चर ने जिस तरह आए दिन झगड़ों व खून-खराबे की स्थिति पैदा की उसी वजह से शायद बिरादरी ने ये फैसला किया। महिलाओं का बाहर निकलना बैन नहीं केवल बाजार जाना। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये थोड़ा सख्त फैसला है। इसकी सब आलोचना कर रहे हैं लेकिन कोई ये क्यों नहीं देखता और इस बात की तारीफ क्यों नहीं करता कि वहां दहेज पर पूरी तरह रोक लगाई गई है। क्या बेटियों का दुकानों पर जाना सही है? क्या गांवों में प्रेम विवाह जायज हैं? क्या सिर पर कपड़ा रखकर चलना तालिबानी फरमान है? क्या ये तहजीब नहीं है? हर मसले पर बहस होनी चाहिए लेकिन तब जब आप दिल्ली और असारा का फर्क समझते हों इसके बाद चैनलों को जजी करनी चाहिए।
ऐसा नहीं है कि ये मसला केवल मुस्लिम गांव का है। मीडिया की नजरों में सबसे ज्यादा तालिबानी तो जाट समुदाय है।  अगर बात केवल जाटों की ही की जाए तो कोई एक-दो गौत्र हों तो ऐसी दिक्कतें शायद ही पैदा हों लेकिन हरियाणा, राजस्थान, यूपी और देश के हिस्सों में जाटों के चार वंश और 2700 से ज्यादा गौत्र हैं। दिन-रात का साथ है। ऐसे में गांव स्तर पर संस्कार विहीन बच्चों से गलती हो जाती हैं, कानून की नजर में गांव में प्रेम विवाह चाहे जायज ठहराए जा सकते हों लेकिन समाज और नैतिकता की कसौटी पर इसे सही कैसे ठहराया जा सकता है?  स्कूल-कालेज में पढ़ते समय गौत्र जैसी बातें युवा पीढ़ी को बेमायने नजर आने लगती हैं। प्रेमिका की कसौटी पर खरा उतरने के वास्ते सारे संस्कार बौने लगने लगते हैं। क्या ये जायज है? ये एक मनोवैज्ञानिक पहलू और सामाजिक बहस का संवेदनशील मुद्दा है जिसे चंद शब्दों से ना तो बताया जा सकता और ना ही कोई रास्ता निकाला जा सकता है।
जहां तक गौत्र का सवाल है तो यह एक संस्कृत टर्म है। वैदिक राह पर चलने वालों ने इसे पहचान तथा सामाजिक मान-सम्मान कायम रखने के वास्ते शुरू किया था। महर्षि पाणिणी ने लिखा था-उपत्यं प्रौत्रं प्रभर्ती गौत्रम। पहले किसी खास इंसान, जगह,भाषा और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर गौत्र बनते गए। जब जहां कोई महान शख्स हुआ उसके नाम पर गौत्र बन गया। रजवाड़ों के जाने के बाद वंश व गौत्र बढऩे का ये सिलसिला थमा है। हां यह जरूर है कि जैसे जाति और वंश नहीं बदल सकते उसी तरह गौत्र भी नहीं बदल सकते। एक वंश में एक से ज्यादा गौत्र हो सकते हैं लेकिन एक गौत्र में एक से ज्यादा वंश नहीं हो सकते। जैसे चौहान वंश में 116 गौत्र हैं। जिस समय ये परंपरा शुरू हुई थी तो उसी समय ये बंदिशें लागू हो गई थीं कि समान गौत्र में शादी नहीं हो सकती। इसके पीछे सामाजिक और वैज्ञानिक कारण थे। वंश की सेहत और नैतिक मूल्यों की रक्षा के तर्क थे। मानव धर्मशास्त्र के चैप्टर-3 और श्लोक 5 में भी कहा गया है-अस पिण्डा च या मातुर गौत्रा च या पितु:, सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार,कर्माणि मैथुने। यानि बाप के गौत्र और मां की छह पीढिय़ों के गौत्र में लड़की की शादी जायज नहीं। हिंदुओं में शादी का जो परंपरागत प्रावधान है वो भी यही कहता है कि चार गौत्र का खास ख्याल रखो- यानि मां, पिता, पिता की मां और मां की मां (नानी) के गौत्र में शादी वर्जित है। अब ये घटकर केवल मां और पिता के गौत्र तक सीमित रह गया है। पिछले दिनों हरियाणा में जिस मामले पर हल्ला हुआ था वह इसी हद के उल्लंघन का नतीजा था।
 सब जानते हैं कि भारत गांवों में बसता है। सरकार भी एक तरफ पंचायतों को मजबूत करना चाहती है लेकिन हैरत की बात यही है कि वो हर पंचायत को दिल्ली के चश्मे से देखने की कोशिश करती है। आखिर वो ये क्यों नहीं समझती कि गांवों का सारा ताना-बाना आज इसी वजह से मजबूत है क्योंकि वहां हर लड़की बहन और हर लड़का भाई समझा और माना जाता है, चाहे वो किसी भी जात का क्यों ना हो? असारा मुस्लिम बहुल गांव है। मुस्लिम समुदाय में शादी-विवाह में फिर भी काफी छूट हैं। अगर ऐसे फैसले किए गए हैं तो जाहिर सी बात है कि पानी सिर के पार हो गया है। अब इस पर इतना हल्ला क्यों? वहां किसी को मारा नहीं गया-पीटा नहीं गया। हां छेडख़ानी वालों को भी सजा मिलनी चाहिए थी। हां अगर बाप ने बेटों-बेटियों को मोबाइल से मना कर दिया तो क्या पी सी अब सरकारी खजाने से देंगे? वो भाई-बहन की शादी कराएंगे? जब तक मसला कानून का नहीं होता तब तक टांग अड़ाने की जरूरत क्या है? स्थिति तो ऐसी ही बनती जा रही है।
अन्य समुदायों के बाकी गांवों में भी दिन-रात ताऊ और चाचा कहने वालों की बेटियों को क्या बहू बनाया जा सकता है? ऐसा होना सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पतन नही है? पर ऐसा हो रहा है। जब-जब इस हद को लांघा जाएगा तो जाहिर सी बात है कि समाज में उथल-पुथल होगी और अमूमन कड़वे नतीजे ही सामने आएंगे। जिस प्यार व शादी से अगर रिश्ते टूटते हों, समाज बिखरता हो, परिवार बेइज्जत होता हो, खून बहता हो तो उसे प्यार कैसे माना जा सकता है? प्यार तो बलिदान मांगता है। यहां तो वो खून मांगता है। जाटों में अमूमन जर, जोरू और जमीन के ही विवाद होते हैं। प्यार व शादी के विवाद कई बार गौत्र में नहीं सुलझ पाते। गांव पंचायतों में नहीं निपट पाते। न्याय के वास्ते इससे ऊपर खाप हैं और फिर आखिरी सर्व खाप। यानि हरियाणा की सर्व खाप। ऐसे मामलों में ज्यादातर हुक्का-पानी बंद और गांव से निष्कासन के ही फैसले ही आते हैं। खाप का भी इतिहास बेहद पुराना है। 500 बीसीई से ही इसका जिक्र है। आन-बान-शान के लिए मर मिटने का। अतीत से अब तक इसे सामाजिक प्रशासन का दर्जा मिला हुआ है। कुछ गांवों को मिलकर खाप बनती हैं। जैसे 84 गांव की खाप। एक गौत्र एक ही खाप में रह सकता है। पंचायतें जब मामले नहीं निपटा पातीं तो वे खाप में जाते हैं और जब दो खाप में पैंच फं स जाते हैं तो फिर हरियाणा की सर्व खाप तय करती है। इसके सारे फैसले माने जाते हैं। कई बार उन्हें कानून की अदालतों में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता और इतिहास गवाह है कि इस व्यवस्था से हमलावरों के खिलाफ  तमाम जंग लड़ी और जीती गई तथा सामाजिक झगड़े सर्वखाप स्तर पर निपटते रहे। चाहे वो 507 एडी में मुल्तान में हंस के खिलाफ  जंग हो, मोहम्मद गौरी के खिलाफ  तारोरी की जंग हो या अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ  हिंडन और काली नदी की जंग हो या फिर 1398 में तैमुर के खिलाफ जंग हो सबमें खाप व सर्वखाप ने निर्णायक रोल अदा किया। इतिहास बेहद लंबा चौड़ा है। चंद शब्दों में समेटना आसान नहीं पर सच यही है कि सर्वखाप के सामने तब दुश्मन होते थे अब अपने हैं। चाहे जितना समय बदल गया हो खाप और सर्व खाप की महत्ता इस समाज में आज भी उतनी ही है। जब तक हर गांव दिल्ली या मुंबई नहीं बन जाता इनसे छेड़छाड़ का नतीजा घातक ही होगा।
 इस व्यवस्था को बनाने का श्रेय आर्यसमाज को ही जाता है। जिसकी संस्कारों की मजबूत नींव पर यह बुलंद इमारत खड़ी हुई थी। जिसे हिलाने की कोशिशें होती रहती हैं। युवा पीढ़ी को यह तय करना ही होगा कि क्या भाई -बहन और मां-बाप से बढ़कर भी प्यार है? यह भी तय हो जाना चाहिए कि क्या प्यार कौम, समाज और राज्य से भी बढ़कर है? इस युवा पीढ़ी को गौरवशाली इतिहास का एहसास कराना भी जरूरी है ताकि वो उस पर नाज करे। गाज गिराने वाला साज ना बजाए। प्यार करो पर हद में। हद से बाहर भद्द ही पिटेगी। एक और बात यह कोई लैला-मजनूं का किस्सा भी नहीं है कि मीडिया इसे फि ल्मी कहानी की तरज पर पेश करे। खासकर टीवी चैनल। इतिहास को पढ़े बिना,सामाजिक ढांचे को समझे बिना, गहराई में जाए बिना तालिबानी संसार-प्यार पर वार के ढोल बजाना जायज नहीं। सामाजिक बीमारी को लव स्टोरी बनाने की सोच सही नहीं। लोकतंत्र में मिले हक और देश के 21 वीं सदी में होने के पाठ मीडिया में बैठे लोगों को फि र पढ़ लेने चाहिए ताकि आग में घी के काम से वे और बदनाम ना हों। उनमें यह समझ जरूर होनी चाहिए कि हर धोतीधारी गंवार नहीं होता। हर जींस पहनने वाला देश व समाज की तरक्की का असली चेहरा और ठेकेदार नहीं होता। जिस देश की कल्चर और इतिहास की सारी दुनिया कायल हो,अपनाना चाहती हो, क्या उस देश में 500-700 रुपए की जींस से नैतिक मूल्यों का मूल्यांकन होगा? क्या इसी संस्कृति से देश की वर्तमान तस्वीर और कौम की सुनहरी तकदीर लिखी जाएगी? क्या टीवी चैनल पर बैठे मीडिया के साथी तालिबानी कल्चर को नहीं जानते? उस कल्चर में बिस्तर पर बहन के अलावा सब जायज है, यहां ठीक उल्टा है। फिर ये तालिबानी चेहरे कैसे हुए? जिस तरह पूरे देश में प्यार पर वार होते हैं तो फि र इस सारे देश को क्या तालिबानी कहा जाना वाजिब होगा? अगर ये साथी इतिहास पढ़े होते तो अफ गानिस्तान और तालिबान के साथ-साथ राजस्थान, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रिश्तों को जरूर समझ जाते। समझा पाते। हां गुवाहटी में एक लड़की के साथ 20 लड़कों का नंगा नाच तालिबानी है। पर जिस मीडिया की अधिकांश कौम को अपना इतिहास मालूम ना हो, उनके कथन से समाज में फैलते जहर का एहसास ना हो वो जो मरजी हों बोल भी सकते हैं, दिखा भी सकते हैं। सब जायज। इधर खबर आती है और वो जज की तरह फरमान सुनाना शुरु कर देते हैं। क्या ये तालिबानी रवैया नहीं है? देख लीजिए-अमूमन हर मामले में किसी गांव वाले से बार-बार लगातार ये पूछना कि वो बालिग है तो उसने गौत्र में लव मैरिज क्यों नहीं की? गौत्र से बड़ा कानून है। कानून से हक मिला है। यानि गौत्र जाए चूल्हें में पर लव मैरिज हो। अगर अब गौत्र की सीमा टूटी है, कल गांव की टूटेगी, परसों घर की। मीडिया ये कौन सा पाठ पढ़ा और सिखाता जा रहा है? ये हक का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है? अगर ये सब गलत है तो फिर इस देश में अब ना तो कोई धर्म रहना चाहिए और ना कोई जात। पर खुद जो मीडिया एक जात के चारों तरफ घूमता हो वो कैसे इसके खिलाफ आवाज उठा सकता है?
 सवाल यह भी उठता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर में तरक्की के क्या मापदंड हैं? सड़कों पर समलैंगिक जोड़ों की भरमार, बहन को छोड़ किसी भी लड़की से प्यार,सारी शर्मो हया तार-तार, गुवाहाटी की सड़कों और बिहार के मंदिर में दलित महिला पर वार को अगर हम समाज व देश की तरक्की का परिचायक मान बैठे हैं तो फि र इस सवाल पर अब मंथन का समय आ गया है कि देश किस राह पर चलेगा? क्या ऐसी ही तरक्की हमें चाहिए ,जहां लाज ना हो? कड़वा सच यही है कि टीवी अपनी अप संस्कृति को देश के हर इंसान में तलाशने और फैलाने में जुटा है। जहां ये नजर नहीं आती, उसे जो चाहे नाम दे दो। लगे हाथ मीडिया को इस बात के जवाब तलाशने ही होंगे कि आखिर लव मैरिज ज्यादा विफ ल क्यों होती हैं? प्यार का ये बुखार टिकता क्यों नहीं है? पुरातन शादी की व्यवस्था की सफ लता अगर 90 फ ीसदी से ऊपर है तो लव मैरिज 50 फीसदी से नीचे क्यों है? इस क्यों की तह में जाओ-सबको समझाओ-फिर प्यार के बिगुल बजाओ। हमेशा की तरह हरियाणा व उत्तर प्रदेश के इस गांव असारा के मसले पर भी मीडिया ने नासमझी का ही परिचय दिया है। टीआरपी के लिए फि ल्मी परदे के हीरो दिखाने की बजाय अगर मीडिया असली हीरो ढंूढे, पैदा करे तो इस समाज की भी टीआरपी बढ़ेगी, उसकी भी साख बढ़ेगी। आदर्श चेहरों से खाली इस साधु-संतों की धरती पर फि र बहार की फ सल उगेगी। हक और हद की दोस्ती मजबूत होगी। ना प्यार पर वार होंगे, ना हम शर्मसार होंगे। मीडिया ये कर सकता है। अगर नहीं तो फिर आग में घी के रोल का फ टा ढोल उसकी पोल ही खोल रहा है। आवाज अगर नहीं सुनाई दे रही है तो यह उसकी बदकिस्मती। प्यार किया नहीं जाता हो जाता है पर यहां तो मीडिया और केंद्र दोनों कह रहे हैं कि करो। यानि सिर्फ प्यार से पेट भरो-बाकी किसी रिश्ते-नाते की जरूरत ही क्या है? किसी समाज की जरूरत ही क्या है? फिर केंद्र सारे देश को दिल्ली क्यों नहीं बना देता? खाप के तालिबानी फरमान का झंझट हमेशा के लिए ही खत्म हो जाए। वैसे कोई माने या ना माने ये तभी संभव है जब इस देश में केवल एक धर्म होगा और वो सिर्फ मानवता का होगा। ये होने वाला नहीं तो फिर जैसा चल रहा है उसे चलने दो जब तक की कोई कानून व्यवस्था का मसला खड़ा ना हो। केंद्र को ये भी नहीं भूलना चाहिए कि असारा मुस्लिम बाहुल्य गांव है। फिलहाल इसे इस्लामिक मसला नहीं माना जा रहा है लेकिन कल किसी तकरीर को झेलना आसान नहीं होगा। (लेखक जनदखल के संपादक हैं)

शुक्रवार, 17 जून 2011

नेहरू राज से ही करप्शन का साज-जनता पर गाज,नेताओं को नाज




देशपाल सिंह पंवार
यूं भूखा होना कोई बुरी बात नहीं है, दुनिया में सब भूखे होते हैं,
कोई अधिकार और लिप्सा का,कोई प्रतिष्ठा का,कोई आदर्शों का,
और कोई धन का भूखा होता है,ऐसे लोग अहिंसक कहलाते हैं,
  मांस  नहीं खाते, मुद्रा खाते हैं-दुष्यंत कुमार

  चौतरफा घपलों-घोटालों का दौर है। तमाम चोर के  विदेश में जमा काले धन का शोर है। कोई सियासतदां करता नहीं गौर है। जनता बोर है। छिन रहा कोर है। दिखता नहीं कोई छोर है। कहीं नहीं कोई ठौर है। अब बसंत की नहीं भोर है। मस्ती में नाचता नहीं मोर है। हिंदुस्तान पर घटा घनघोर है। लोकतंत्र का दुखता हर पोर है।  पता नहीं, कौन-कौन, किस जगह, किस तरह, लूट की वजह से  सराबोर है .हर पल सुनहरा कल इस गंदे जल की दलदल में फंसता जा रहा है। धंसता जा रहा है। पूरा देश ही इसमें बसता जा रहा है। आम जन मरता जा रहा है। जमाखोर-घूसखोर-सूदखोर-धनखोर हंसता जा रहा है। लोकतंत्र डरता जा रहा है। 
 हर नींव के नीचे घपला-घोटाला दफ्न है। जहां हाथ लगाओ-वहां करप्शन। जहां काली कमाई-वहां जश्न-सब मग्न। जो झेलता है वो कफ्न तक तरस जाता है। संत्री से मंत्री तक, बाबू से अफसर तक जिसका जहां दांव बैठ रहा है वो करप्शन की नाव में जनता लोकतंत्र को घाव ही देता जा रहा है। गांव की छांव तक करप्शन की कांव-कांव गूंज रही है। अब तो कहा जाने लगा है,माना जाने लगा है कि बस वही सही है जिसकी कोई हैसियत नहीं है। सबकी ऐसी कैफियत है सौ फीसदी ऐसा मानने को फिलहाल दिल नहीं करता। तमाम ऐसे जरूर हैं जो इस राह पर नहीं है। इसी कारण ये देश चल रहा है। माना तमाम क्षेत्रों में हमने बेथाह तरक्की की पर इस कड़वे सच से कौन इंकार कर सकता है कि इस देश में जनता कंगाल-नेता अफसर मालामाल हैं। 1971 में गरीबी हटाओ का नारा लगाया गया-किसकी गरीबी हटी-जनता की, घूसखोर नेताओं करप्ट अफसरों की या धंधेबाजों की? सब सामने है। तमाम के वास्ते राजनीति जनसेवा की जगह मेवा कमाने का जरिया बन गई है। हर बार राज्यों से लेकर संसद तक ना जाने कितने दागी, घूसखोर हत्यारे डुगडुगी पीटते नजर आते हैं। जीतने को हर हथकंडा अपनाते हैं। दो पैसा लुटाते हैं और फिर हजारों कमाते हैं। अब तौ आए दिन करप्शन के किस्सों ने राजनीति लोकतंत्र के मायने ही बदल दिए हैं।  
           वैसे ये रोग आज का नहीं है। जब आबादी को आजादी मिली थी, तोहफे में बरबादी भी मिली थी। वह भी तब जब  राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1937 में ही करप्शन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। उनका मानना था कि करप्शन की दीमक एक दिन सारे देश को चाट जाएगी। इसी कारण वे चाहते थे कि जब देश आजाद हो तो सामाजिक क्रांति के सहारे हर घर आबाद हो। बापू अच्छी तरह जानते थे कि जिन हाथों में सत्ता जाएगी, उनमें से ढेरों ऐसे हैं जो  इस राह पर जाएंगे। इसी कारण वे हमेशा करप्शन पर सब कांग्रेसी नेताओं को आगाह करते रहते थे। पर बापू के जाते ही तमाम कांग्रेसी उनके अनमोल वचन का गबन कर गए। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय में करप्शन की जो घुन लगी-सरदार मनमोहन सिंह के समय में उसकी धुन पर अब  देश के सारे चुन-मुन तक थिरकते नजर रहे हैं। आजादी के एक साल के अंदर यानि 1948 में पहला घोटाला सामने आया-जीप घोटाला। सेना के वास्ते जीपें खरीदी गई थीं। खास शख्स ने रोल अदा किया था। मोल-तोल हुआ था। पर कुछ दिन बाद ही पोल-खोल के बोल के ढोल पिटने लगे थे। आवाज आई-खरीद में झोल है। करप्शन के इस घोल में जीपें आईं पर घटिया और ज्यादा दाम पर। हल्ला हुआ। लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त वी के के मेनन इसमें फंसे। पर सियासत को खेल-खेल में खेल करने की ट्रेनिंग मिल चुकी थी। जिस पर आरोप लगे वो लंदन से हटाए गए पर नेहरू मंत्रिमंडल में जगह पा गए। सेना प्रमुख थिम्मैया को नाप दिया गया। 1955 में नेहरू जी ने घोटाले की फाइल बंद कर दी। फाइल तो बंद हो गई पर इस जीप खरीद घोटाले का खेला हमने चीन के साथ 1962 की जंग में झेला जब इन जीप की जरा सी मिट्टी-गिट्टी में सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। उस वार में हार बार-बार आज तक कचोटती रही है। हिंदुस्तान की जमीन पर आज तक चीन की बीन बज रही है। 1951 में एक और घपला सामने आया। मुदगल कांड।  फेस बचाने को नेहरू जी ने जांच के लिए एडीगोरवाला को केस सौंपा। एडीगोरवाला ने रिपोर्ट दी- नेहरू कैबिनेट के कई मंत्री और ज्यादातर अफसर करप्ट हैं। जनहित देश हित से ज्यादा वे सारे स्वहित में लीन हैं। ऐसे मंत्रियों अफसरों को हटाने की सिफारिश सरकार यानि नेहरू जी से की गई। पंडित जी हिम्मत नहीं जुटा पाए। रिपोर्ट रद्दी में गई। पर यह जरूर बता गई कि देश किस राह पर है। शायद उस वक्त  जवाहर लाल नेहरू की कोई मजबूरी रही होगी। लौहपुरुष सरदार पटेल की बेटी मणिबेन की डायरी में इसका खुलासा किया गया है। इस डायरी का फिर से प्रकाश्न एक किताब के रूप में होने जा रहा है। 16 साल तक कांग्रेस के हर कदम की साक्षी रहीं मणिबेन की किताब में लिखा गया है कि सरदार पटेल ने करप्शन के चलते रफी अहमद किदवई को हटाने की पंडित जी से गुजारिश की थी। जिसे ठुकरा दिया गया था। किदवई ने खुलेआम कहा था कि अगर उन्हें हटा दिया गया तो वे सरकार के साथ-साथ पंडित नेहरू के राज तक खोल डालेंगे। काश उस वक्त पंडित   जी सख्त हो जाते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती। करप्ट नेताओं अफसरों पर लगाम नहीं लग पाई। नतीजा सब बेलगाम हो गए। इसके बाद की याद बेहद कड़वी है। एक के बाद एक घपला-घोटाला। इसके अलावा हत्या समेत दूसरे तरह के तमाम आरोपों से नेता दागदार और लोकतंत्र शर्मसार होता गया। 1957-58 में मुंदड़ा डील लोकतंत्र की खाल को छील गई। मामला ढंग से बंद तक नहीं हुआ था कि 1963 में मालवीय-सिराजुद्दीन स्कैंडल ने कांग्रेस के दामन पर एक और दाग लगा दिया। 1963 में प्रताप सिंह कैरो केस बम की तरह फटा। पर किसी मंत्री या मुख्यमंत्री का कुछ नहीं बिगड़ा। ना ही किसी ने इस्तीफा दिया। सरदार पटेल सरीखे नेता चुपचाप देखते रहे। झेलते रहे। हमेशा की तरफ हर कांड के बाद कमेटी बना दी जाती थी। बिल्कुल आजकल भी ऐसा ही होता है.संथानाम कमेटी ने 1964 में रिपोर्ट दी। साफ-साफ लिखा था कि 16 साल से देश के कुछ मंत्री खुलेआम जनता का पैसा लूट रहे हैं। घूस खा रहे हैं। पर रिपोर्ट पर  कुछ नहीं हुआ। सत्ता के रिमोट ने रिपोर्ट को कोर्ट तक नहीं जाने दिया। लाल फोर्ट पर झंडा फहराया जाता रहा। करप्शन का डंडा लहराता रहा। सत्ता का पत्ता जनता को बहकाता रहा। नेहरू राज में जो रोग फैला-इंदिरा राज में ये मैला बढ़ता ही चला गया। वे पार्टी अध्यक्ष के साथ-साथ प्रधानमंत्री भी  थीं। नागरवाला को 60 लाख देने के वास्ते चाहे स्टेट बैंक में टेलीफोन करने का मसला हो या फिर फेयरफैक्स कांड।  पाइपलाइन एचडीडब्लयू सबमेरिन डील का मामला हो। घोटाले होते रहे। दबते रहे। किसी को सजा हुई हो ऐसी ना तो किसी की रजा थी और ना कजा। हम छोटे-मोटे मामलों की बात नहीं कर रहे, ऐसे तो लाखों-करोड़ों या अरबों मामले इस देश में हो चुके हैं। जिनका अता-पता ही नहीं चल पाता।  फिर मोरारजी सरकार में देश पर ऐसे ही वार हुए। राजीव गांधी आए बोफोर्स लाए। अब तक दर्द देती रही बोफोर्स डील की कील को कौन नहीं जानता? मौनी बाबा नरसिम्हा राव ने ढंग से राजपाट शुरू नहीं किया था कि 1990 में 2500 करोड़ की एयरबस खरीद में दलाली की लाली का रंग चढ़ गया। 1992 में हर्षद मेहता इस देश को शेयर बाजार में मार गए। इसके अलावा नेहरू राज की तरह राव के राज में घोटालों का साज बजा।  गोल्ड स्टार स्टील विवाद,सरकार बचाने को झारखंड मुक्ति मोरचा को हवाला से 65 करोड़ देने का केस हो या फिर 96 का यूरिया घोटाला , राजनेताओं-अफसरों और दलालों की तिकड़ी देश को चूना लगाती रही। करप्शन के गीत गाती रही। 1995 में एन एन वोहरा की रिपोर्ट आयी- देश में अपराधी गेंग, करप्ट नेताओं और अफसरों, ड्रग माफियाओं, हथियार सौदागरों के गठजोड़ की  समानातंर सरकार चल रही है। इनके इंटरनेशनल लिक हैं। लाखों रूपए खर्च होने पर जो रिपोर्ट आई वो सर्च हमेशा की तरह काम आने के बजाय फिर रद्दी की टोकरी में गया ताकि गद्दी सलामत रहे। अगर कुछ ना बिगड़ने का डर हो तो फिर कोई क्यों ना बहती गंगा में हाथ धोए। ना डर था और ना ही शर्म- नतीजा घूसखोर नेताओं की बाढ़ गई। चाहे चारा घोटाला हो या फिर तहलका कांड या तमाम स्टिंग आपरेशन में नंगे नजर आने वाले नेता। घूस की धारा और गहरी तथा चौड़ी होती गई। विधानपरिषद हो विधानसभा  या फिर संसद हर चुनाव में किस तरह पैसा बहाया जाता है, एक-एक वोट खरीदा जाता है उससे ही ये एहसास लगाया जा सकता है कि चुने जाने पर ये नेता कैसे कमाते होंगे? वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार के पतन की कहानी और कारण सबको पता हैं। किस तरह नरसिम्हा राव ने 94 में तेलुगू देशम को तोड़कर, शिबु सोरेन,अजित सिंह, शंकर सिंह बाघेला को जोड़कर अपनी सरकार बचाई। कल्याण सिंह ने भी  यूपी में यही सीन दोहराया था । हरियाणा का किस्सा कौन   भूल सकता है? पूरी पार्टी ही बदल गई थी । पिछली बार मनमोहन सिंह सरकार को बचाने का वक्त याद करिए। संसद में सारी हद पार हो गई। पद के मद में कद को नेता छोटा कर बैठे। खुलेआम नोट लहराए गए। किसी का कुछ बिगड़ा? झारखंड के मधु कोड़ा को कैसे याद ना किया जाए? उसके साथ के कई मंत्री जेल में हैं। बूटा खानदान ने  भी लूटा। वो इस चौखट पर फोकट की कमाई में फंस चुका है। कोई एक हो तो कहा जाए अब तो हर रोज ये खबर मिलती है कि आज जल घोटाला, कल घोटाला, मल घोटाला,फल घोटाला, दल घोटाला, पता नहीं कैसा-कैसा घोटाला? 2010 को तो हमेशा ही घोटालों का साल कहा जाएगा? आदर्श सोसायटी, 2 जी स्पैक्ट्रम, राष्ट्रमंडल खेल समेत दर्जनों मामलों में दौलत खाने का खेल खेला गया। सब जानते हैं। कल फिर कोई घोटाला सामने आएगा। जी को जलाएगा। तैयार रहिए।
2008 में वाशिंगटन पोस्ट ने खबर छापी थी कि हिंदुस्तान के 540 सांसदों में से एक चौथाई से ज्यादा दागी हैं। करप्ट हैं। उनके फर्ज से मुंह मोड़ने के कारण ही ये देश कर्ज के मर्ज में फंस चुका है। (पर जनता के गर्ज की अर्ज कहां दर्ज कराई जाए?)किसी राज्य का मुख्यमंत्री हो या किसी भी  राज्य के नए-पुराने नेता ज्यादातर के दामन पर करप्शन के छींटे हैं। 2005 की सीएमएस रिपोर्ट के मुताबिक 11सरकारी महकमों में 21 हजार करोड़ से ज्यादा का एक साल में लेन-देन हुआ। 2007 की रिपोर्ट के मुताबिक देश का कोई ऐसा महकमा नहीं जहां घूसखोरी ना पनप रही हो। चाहे वो बैंक हों या सेना। वाजिब काम तक घूस से। नेताओं, अफसरों से जनता बचती है तो बाबुओं के चंगुल से   नहीं निकल पाती। एक जमाने में बिहार में गरीबों का 80 फीसदी राशन चुरा लिया जाता था। पशुओं के चारे का धन तक  नेता डकार गए। इसी तरह देश के हर राज्य में गांव से शहर तक हर दफ्तर में माफिया राज नजर आता है। सड़क से शिक्षा तक, पढ़ाई से नौकरी तक, रोटी से कपड़े तक, मकान से दुकान तक हर जगह करप्शन। देश की आधी से ज्यादा आबादी घूस देने का स्वाद चख चुकी है। यह रिपोर्ट का कड़वा सार है। धंधा करने वाले पीछे नहीं हैं। घूस दो-काम कराओ और दौलत कमाओ। इसी तर्ज से वे मिनटों में काम कराते हैं। उद्योगपतियों की दौलत बढ़ने का यही मेन कारण है। पर हाँ करप्ट नेताओं की लिस्ट के वास्ते कागज कम पड़ते जा रहे हैं। ये ग्रंथ मोटा होता जा रहा है। उसके सामने आजादी का इतिहास छोटा पड़ता जा रहा है।  आम जन को जरा सी गलती पर सजा सुना दी जाती है पर देश की अदालतें नेताओं के मामलों को निपटाने में ही लगी रहती हैं। पहली बात तो कोई मामला जल्दी निपटता नहीं। अगर एक खत्म होता है तो एक दर्जन सामने जाते हैं। व्यवस्था में जंग लग चुकी है। इसे दुरूस्त करने को पहले कोई आवाज नहीं उठती थी सब ठीक था। जब उठने लगीं तो सियासत को आफत नजर आने लगी। पता नहीं कब सियासतदां ये समझेंगे कि देश पहले है, जनता पहले है, नैतिकता पहले है? वो नहीं जिसकी वजह से आज ये देश आज इस मुहाने पर खड़ा है। अब तो जागो मोहन प्यारे। कर दो देश के वारे-न्यारे। धो डालो पाप सारे। यही पुकार रहे हैं हारे-मारे-बेचारे।
 जिंदगी दिखाई देती है,कब्रों में या दरगाहों में, मंदिर में या शमशानों में,
मिट्टी में दबी हुई या मिट्टी में मिली हुई,
पूजा की बेलों पर कांपती या घुटनों के बल झुकी हुई।