गुरुवार, 7 मई 2009

शेर अब बूढ़ा हो गया



देशपाल सिंह पंवार

लोहिया का शिष्य, मधु लिमये का दोस्त, अटल का दाहिना हाथ, राजग का संकट मोचक, विदेशी कंपनियों और चीन का दुश्मन, पोखरण में परमाणु विस्फोट करने वाला, कारगिल में पाक को पछाड़ने वाला,मजदूरों को हक दिलाने वाला,फौजियों का सच्चा साथी और भी न जाने क्या-क्या इतिहास रचने और जनता से घिरा रहने वाला यह नेता आजकल एक अदद साथी की संगत को तरस रहा है। अपने और पराए सब साथ छोड़कर निकल चुके हैं। जिन्हें उसने बनाया वो सब नाता तोड़कर खिसक चुके हैं। उसे बिसरा चुके हैं। अब उसकी वो पार्टी •भी नहीं रही जिसे उसने अपने नाम, काम और दाम से खड़ा किया था। उसे अपनों ने दिल से भी निकाल दिया, अध्यक्ष पद से भी हटा दिया, पार्टी से •भी डिगा दिया और संसद सीट पर भी ठैंगा दिखा दिया। उसके पास ना बीवी रही और ना ही टीवी को लगातार देख पाने वाली आंखें। उसकी वो याददाश्त भी नहीं रही जिसका हर कोई लोहा मानता था। समता पार्टी का जन्मदाता, नीतीश को सीएम बनाने वाला, अटल का हर मुसीबत में साथ देने वाला यह नेता आजकल अकेला है। वह सबके संकट हरता रहा पर जब वो अपने जीवन के सबसे बड़े संकट में फंसा तो कोई उसका साथ देने को तैयार नहीं। जो हैं वो इस स्थिति में नहीं कि उसका बेड़ा पार कर सकें। उम्र 80 साल हो चुकी है। न शरीर में ताकत बची है और ना ही पार्टी और जनता की वो ताकत साथ है जो आम से खास तक को अपनी ओर खींचती है। जमघट बढ़ाती है। कद बढ़ाती है। काम कराती है। जब तक ये ताकत उसके साथ थी तब तक किसी मामले की ना तो उसने परवाह की और ना ही किसी की पूछने,टोकने या बोलने की हिम्मत हुई। जैसे ही वो पावर गुल हुई-टेंशन फुल हो गई। यही है किस्मत का खेल। जब वो अपने जीवन में सबसे कमजोर हालत में हैं तब उन्हें जीवन की सबसे कठिन लड़ाई लड़नी पड़ रही है। तहलका का डर पीछा छोड़ने का नाम नहीं लेता। बराक मिसाइल खरीद केस में सीबीआई का डर सोने नहीं देता। अपनों द्वारा दी गई पीड़ा का दर्द चैन से जीने नहीं देता। ऐसे में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अगर हार गए जिसके आसार बहुत ज्यादा हैं तो कैसे वो बर्दाश्त होगी ये एक यक्ष प्रश्न उनके सामने खड़ा है। उनकी जीत की कामना करने वाले चाहे कम हों लेकिन हराने वालों की एक लंबी-चौड़ी फौज है। ऐसे में अगर वो जीत गए जिसकी उन्हें बहुत दरकार है तो यकीन मानिए तमाम इतिहास इस उपलब्धि के सामने गौण पड़ जाएंगे। जिस शेर ने हमेशा अपना शिकार खुद किया हो वो जीवन के इस मोड़ पर दूसरों के रहमोकरम या दया पर जिंदा नहीं रह सकता। ये जीत उसे नहीं बल्कि उसके मूल्यों को जिंदा करेगी। उसकी कमी किसी को चाहे ना खल रही हो पर बीजेपी को जरूर खटक रही होगी। अटल बिहारी वाजपेयी किस्मत वाले थे जो उनके साथ ये चेहरा था जो ममता को •भी मना लेता था। जयललिता को भी समझा लेता था। बीजेपी के साथ रहते धुर विरोधियों से सरकार का फेवर करा लेता था। आज आडवाणी के पास ऐसा कोई कहां? अगर राजग सत्ता से दूर रहा तो यकीनन ऐसे राजनेता का संग ना होना भी एक बड़ा कारण होगा। जीवन में पहली बार इतना खराब उसका जन्मदिन मनेगा- देखिए क्या होता है?
जार्ज फर्नांडीस

0-3 जून, 1930 को मंगलोर (कर्नाटक) में जन्म। यहीं पर पढ़ाई। रोमन कैथोलिक। पत्नी लैला कबीर, एक बेटा। मजदूर यूनियन लीडर,एग्रीकल्चरिस्ट, पत्रकार और राजनीति की यात्रा। पिता ने संत बनने को बेंगलुरू रवाना किया। रहा नहीं - वहां विद्रोह किया। मुंबई चले गए। कठिन जीवन। मजदूरों के हक की लड़ाई में लीन। कुर्ता-पायजामा तब से एकमात्र पहनावा। 67 के आम चुनाव लड़ने का फैसला। सयुंक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर सदाशिव पाटिल को हराया। पहली बार नाम चमका। 75 में आपातकाल में देशद्रोह का मामला। अंडरग्राउंड। भाई को उठाकर प्रताड़ित किया। 76 में घातक विस्फोटक की तस्करी के विख्यात बड़ौदा केस में गिरफ्तार। आपातकाल हटा। चुनाव में इंदिरा गांधी की हार। जनता पार्टी सत्ता में। जार्ज मुजफ्फरपुर से संसद में। उद्योग मंत्री बने। विदेशी कंपनियों आई बीएम और कोका कोला को देश से निकाला। जगजीवन राम और जनसंघ नेताओं अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी से ठनी। मोरारजी को हटना पड़ा। राजनारायण ने जनता पार्टी एस बनाई। जार्ज को पीएम बनने का न्यौता पर इंकार। चौधरी चरण सिंह प्रधानमंत्री बने। सरकार गिरी। जार्ज मुजफ्फरपुर से ही एमपी। विपक्ष में 80-84 तक बैठे। 84 में बेंगलुरू से जाफर से हारे। उसके बाद सिर्फ बिहार पर ध्यान केंद्रित। वीपी सिंह सरकार में रेलमंत्री। कोंकण रेलवे परियोजना को आगे बढ़ाया। 94 में समता पार्टी बनाई। संघ परिवार का विरोध। 96 में अटल के साथ ही अल्पमत सरकार बनाई। इसके बाद लगातार साथ। 98 में फिर सत्ता में। संकटमोचक बने। राजग के संयोजक।जयललिता को मनाया। फिर 99 में राजग सत्ता में। जार्ज का प्रमुख रोल। दोनों बार रक्षा मंत्री। कारगिल जंग। बोफोर्स तोपों की खरीद। पहली बार सियाचिन में फौज के बीच रक्षा मंत्री। पोखरण में परमाणु विस्फोट। जनता दल यू में समता पार्टी का विलय। 2002 में वाशिंगटन व 03 में ब्राजील एयरपोर्ट पर तलाशी। चीन से सख्त नफरत। लिट्टे और तिब्बतियों का समर्थक। करीबी जया जेटली तहलका स्टिंग आपरेशन में फंसी। नाम बदनाम। 06 में बराक मिसाइल डील स्कैंडल में फंसे। सीबीआई का घेरा। 08 में राजग संयोजक पद और जदयू अध्यक्ष पद पर शरद यादव काबिज। जार्ज को इस बार टिकट तक नहीं दिया। चुनाव लड़ा। पार्टी से छुट्टी। कुछ किताबें भी लिखीं। अब याददाश्त कमजोर।

एक सही-दूसरा गलत: आखिर क्यों?



देशपाल सिंह पंवार
इस देश पर पहला हक मुसलमानों का है-यह तकरीर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने हर चुनावी बोल में बोलते आ रहे हैं। दूसरी ओर दिल्ली में बीजेपी के प्रत्याशी बीएल शर्मा ने कहा कि यह देश हिंदुओं का है और इस पर पहला और आखिरी हक सिर्फ उन्हीं का है। बाकी को रहना है तो राम-राम जपना होगा। पहले को कोई नहीं रोकता,कोई नहीं टोकता और दूसरे पक्ष के नेता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो जाती है। होनी भी चाहिए समाज में वैमनस्यता फैलाने की कोशिश पर रोक लगनी भी चाहिए। पर लाख टके का सवाल यही है कि मनमोहन सिंह जो कहें वो सही है? बीजेपी नेता जो कहें वो गलत है? क्या इन दोनों वाक्यों में समानता नहीं है? क्या एक ही तरह की ध्वनि इन दोनों वाक्यों से समाज में नहीं जाती है? क्या मनमोहन सिंह के वाक्य से समाज मजबूत होने का कहीं से भी संकेत मिलता है? अगर नहीं तो फिर इस देश के प्रधानमंत्री को बोलने से रोका क्यों नहीं जाता?उनके खिलाफ अपराध दर्ज क्यों नहीं किया जाता? इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी नेता का बयान गलत है, इस लोकतांत्रिक देश में सबको अपने धर्मो, अपने संस्कारों के साथ रहने की आजादी है और ऐसी संवैधानिक व्यवस्था तथा भाई चारे kइ अटूट मिसाल पर किसी भी चोट को हर हिंदुस्तानी गलत ही ठहराएगा। पर साथ ही साथ प्रधानमंत्री के भी बयान को कोई सही नहीं ठहरा सकता। उनके बयान से भी एक बड़े तबके को कष्ट पहुंचता है। एक कहे सही और दूसरा वही बात करे तो गलत की इस घिनौनी सोच से ही इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे की चाल में मोच आ गई है। वैसे यह शर्म की बात है कि आजादी के 62 साल बाद तक हम इस बात का रोना रो रहे हैं कि यह देश हिंदुओं का है। यह देश मुसलमानों का है। यह देश फलां का है। आखिर यह कहने और ऐसा दिखने में हमारी जबान और सोच जबाव क्यों दे जाती है कि यह देश हम सबका है? वोट की चाह में देश को चोट देने का यह ढर्रा तुरंत बंद हो जाना चाहिए वरना 62 साल पुरानी दर्दनाक कहानी फिर दोहराई जाएगी। खासकर प्रधानमंत्री को अपने पद की गरिमा का ख्याल रखना ही चाहिए। पर इस चुनाव ने सारी गरिमाओं का खून कर दिया है। इधर ये बोल रहे हैं उधर मायावती जहर उगल रही हैं। अमर सिंह हो या संजय दत्त अगर वे कुछ कहते हैं तो उन पर मुकदमें ठोक दिए जाते हैं लेकिन जिस तरह मायावती ने मनमोहन,अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे नेताओं को लल्लू-पंजू और भी ना जाने किन-किन शब्दों से नंगा करने की कोशिश की क्या वो सही है? क्या उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं होनी चाहिए? क्या आयोग को उन्हें काबू में नहीं करना चाहिए? क्या उनके लिए अलग से कानून बना है? अगर ये नेता काबू में नहीं है तो फिर जनता ही कुछ करे यही सही समय है।