देशपाल सिंह पंवार
बूटा सिंह को कौन नहीं जानता। वे किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। राज्यपाल रह चुके हैं। तमाम पदों पर उन्हें बैठाया जा चुका है। आज भी वे अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं। हर पद पर वे हमेशा चर्चा में रहते हैं। आज से नहीं उस समय से जब किसी जमाने में इंदिरा जी का राज हुआ करता था। कभी अपनी वफादारी को लेकर तो कभी अपने बयानों और कर्मों को लेकर। इस बार संसदीय चुनाव में वे कांगे्रस को आंख दिखाने को लेकर चर्चा में थे तो अब अपने बेटे को लेकर। देश की राजधानी में उनका बेटा सरबजोत सिंह एक करोड़ की घूस लेते ठीक घर के पास पकड़ा गया। बूटा सिंह का एक और बेटा भी है बबली। इन दो नाम को चाहे देश के बाकी हिस्सों में कोई ना जानता हो पर बिहार का बच्चा-बच्चा तबसे जानता है जब बूटा सिंह वहां लाट साहिब हुआ करते थे। अब वे क्यों चर्चा में थे? जनता उन्हें क्यों जानती थी? ये बबली और स्वीटी भी जानते हैं, बूटा सिंह •भी जानते हैं। यह बात दीगर है कि जब आप पावर में हों तो सब दब जाता है। अब स्वीटी के पकड़े जाने से भी बड़ी खबर ये है कि इसके बावजूद बूटा सिंह इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं। उन्हें अब भी लगता है कि उनका बेटा निर्दोष है और उसे फंसाया गया है। बाप के खिलाफ साजिश के लिए बेटे को निशाना बनाने का उन्होंने आरोप लगाया है। सवाल यह उठता है कि आखिर उन्हें फंसाने और हटाने की साजिश रचने वाले लोग कौन हैं? जब बूटा सिंह को ऐसा लगता है और वे मानते हैं तो फिर वे उन लोगों के नाम जनता के सामने क्यों नहीं खोलते? जब तक वे तस्वीर साफ नहीं करेंगे तो जनता यह कैसे मानेगी कि बूटा सिंह का बेटा निर्दोष है और बूटा सिंह पाक-साफ? अगर वो नाम नहीं खोलते और अपने आरोपों को साबित नहीं करते तो नैतिकता के नाते क्या उन्हें इस संवैधानिक पद पर बने रहने का हक है? यह मामला स्वीटी का नहीं है। बूटा के बेटे का नहीं है। यह एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से सीधे-सीधे जुड़ा है। ऐसे में जिस भी शख्स या उसके रिश्तेदार पर ऐसा मामला बनता है तो पहला कदम पद त्यागना ही होना चाहिए। इसके बाद खुद को बेकसूर साबित करने के वास्ते आप जो चाहे कानूनी प्रक्रिया अपनाएं। पर राजनीति में नैतिकता बची ही कहां है? खुलेआम पकड़े जाने पर भी जिस तरह नेता और ऐसे पदों पर बैठे हुए चेहरे दूसरों पर गन तान देते हैं उस पर अफसोस ही जताया जा सकता है। यही कारण है कि राजनीति लगातार पतन की ओर है। ऐसे ही सच्चे किस्सों और नेताओं की शर्मनाक जिद की वजह से राजनीति से जनता का विश्वास उठता जा रहा है। अगर बूटा सिंह साफ थे तो उन्हें मामला सामने आते ही पद छोड़ देना चाहिए था पर वे कहते हैं-नहीं दूंगा इस्तीफा। ऐसा मामला होने के बाद •भी आखिर केंद्र सरकार खामोश क्यों है? माना कि इस पद से हटाने में संवैधानिक बाधाएं हैं पर केंद्र सरकार के हाथ क्यों बंधे हैं? ऐसे कानून अब बदले भी जाने चाहिए और कड़े •भी होने चाहिएं जिनकी वजह से लोग कानून का मजाक उड़ा रहे हैं। राजनीति का मजाक उड़ा रहे हैं। लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं।
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