शनिवार, 1 अगस्त 2009

ऐसी आजादी के क्या मायने?

देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तान की आजादी से पहले विंस्टन चर्चिल ने कहा था- आजादी मिलने पर हिंदुस्तान के नेता निकम्मे, घूसखोर और लुटेरे साबित होंगे। जुबान के मीठे और दिल के काले होंगे। जनता को लड़ाएंगे तथा एक दिन ये देश भंवर में फंसकर रह जाएगा। हवा को छोड़ हर चीज पर टैक्स होगा। उस अंग्रेज ने कितनी सही बात कही थी इसके लिए किसी प्रमाण की जरूरत नहीं है। अफसोस सिर्फ इसी बात का है कि जो देश 200 से साल से ज्यादा गुलाम रहा हो, करोड़ों लोगों ने आजादी के लिए कुर्बानी दी हो,उस देश को करप्ट नेताओं ने 62 साल में ही सबसे करप्ट देशों में से एक बना डाला। आए दिन नेताओं और उनके रिश्तेदारों के करप्शन और घूसखोरी के सच्चे किस्सों ने राजनीति और लोकतंत्र के मायने ही बदल दिए हैं। ताजा मामला बूटा सिंह और उनके खानदान का है। इसे दुखद ही कहा जाएगा कि एक आम इंसान केवल शक की बिना पर जेल काटने को मजबूर हो जाता है लेकिन राजनेता और उनके नातेदार रंगे हाथ पकड़े जाने पर भी राजनीति तथा पावर का इस्तेमाल कर छूट जाते हैं। कौन नहीं जानता कि 40 साल से बूटा सिंह के दामन पर क्या-क्या दाग लगे पर राजनीति की माया-ऐसे चेहरे हमेशा सत्ता की आंच पर चाश्नी पकाते रहते हैं। इसमें कोई दो राय नहीं कि आजादी के बाद देश ने कई क्षेत्रों में बेथाह तरक्की की है लेकिन इस कड़वे सच से भी कौन इंकार कर सकता है कि देश की आजादी के बाद नेता मालामाल होते चले और जनता कंगाल। 71 में गरीबी हटाओ का नारा लगा था पर किसकी गरीबी हटी? जनता की या घूसखोर नेताओं और अफसरों की? सबके सामने है। राजनीति जन सेवा की बजाय धंधा बनकर रह गई है। हर बार राज्यों से लेकर संसद तक ना जाने कितने दागी, घूसखोर और हत्यारे अपनी डुगडुगी पीटते नजर आते हैं। जीतने को हर हथकंडा अपनाते हैं। दो हाथों से पैसा लुटाते हैं और फिर हजार हाथों से कमाते हैं। करप्शन एक ऐसा चक्रव्यूह बन गया है जहां आम आदमी भी चकरघिन्नी की तरह चक्कर खा रहा है और ये देश भी, लाख टके का सवाल यही है कि हर बार दागी जनसेवकों की संख्या बढ़ती ही क्यों जा रही है? अगर सब कुछ ठीक-ठाक है तो फिर इस देश में हर साल हजारों लोग भूख से क्यों मरते आ रहे हैं? क्या यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक नहीं है? इन गरीबों और किसानों के लिए फिर लोकतंत्र के क्या मायने? ऐसी आजादी के क्या मायने? अगर सब कुछ ठीक है तो फिर इस बात का जवाब कौन देगा कि 179 देशों में से 84 हमसे ज्यादा ईमानदार क्यों हैं? सिंगापुर पहले नंबर पर क्यों है और फिनलैंड, बोस्तवाना जैसे देश हमसे ईमानदार क्यों हैं? आखिर क्यों इस देश में ज्यादातर काम बिना घूस के नहीं होते? क्यों किसी को दाम बिना घूस के नहीं मिलते? क्यों पब्लिक लूट का यह गोरखधंधा 62 साल से बिना रोक-टोक के जारी है? क्यों हर साल बस 11 सरकारी महकमें 21 हजार करोड़ से ज्यादा की रिश्वतखोरी डकार जाते हैं? क्यों दुनिया के सब देशों से ज्यादा नेताओं-अफसरों और दलालों की कमाई का 70 लाख करोड़ से ज्यादा काला धन स्विस बैंक में जमा है? पता नहीं- कौन-कौन,कहां-कहां, किस-किस तरह हर पल घूस, घोटालों का ताना-बाना बुनता रहता है? आखिर क्यों? कब तक? यह रोग आज का नहीं है। 1937 में ही महात्मा गांधी ने करप्शन के खिलाफ बिगुल बजाया था। उनका मानना था कि यह दीमक की तरह देश को चाट जाता है। सामाजिक क्रांति पर जोर दिया था। लेकिन नेताओं ने आजादी मिलते ही इसे बिसरा दिया। 1948 में जीप घोटाला। लंदन में उच्चायुक्त वीके कृष्णन मेनन इसमें फंसे। 1955 में फाइल बंद। मेनन नेहरू मंत्रिमंडल में आ गए और सेना प्रमुख थिम्मैया नप गए। हमने खामियाजा 1962 में चीन के साथ जंग में झेला। 51 में एडीगोरवाला ने रिपोर्ट सौंपी-नेहरू कैबिनेट के कई मंत्री और ज्यादातर अफसर करप्ट हैं। रिपोर्ट रद्दी में गई। 51 में मुदगल केस, 57-58 में मुंदड़ा डील, 63 में मालवीय-सिराजुद्दीन स्कैंडल, 63 में ही प्रताप सिंह कैरो केस इतने उछले फिर भी किसी मंत्री या मुख्यमंत्री का सरकारी स्तर पर कुछ नहीं बिगड़ा और ना ही किसी प्रधानमंत्री ने इस्तीफा दिया। संथानाम कमेटी ने करप्शन पर ६४ ्में रिपोर्ट सौंपी। उसमें साफ-साफ लिखा था कि 16 साल से देश के कुछ मंत्री खुलेआम जनता का पैसा लूट रहे हैं। घूस खा रहे हैं। कुछ नहीं हुआ। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के राज में जिस तरह ये रोग फैला, वह इंदिरा राज में और फलता-फूलता गया। वे पीएम भी थीं और पार्टी अध्यक्ष भी,नागरवाला को 60 लाख देने के वास्ते स्टेट बैंक में टेलीफोन करने का केस हो या फिर फेयरफैक्स, एचबीजे पाइपलाइन और एचडीडब्लू सबमेरिन डील का मामला हो। राजीव गांधी के समय में बोफोर्स केस को कौन भूल सकता है? नरसिम्हा राव के समय में 90 में 2500 करोड़ की एयरबस खरीद का केस हो या 92 में हर्षद मेहता का शेयर घोटाला। इसके अलावा गोल्ड स्टार स्टील विवाद,सरकार बचाने को झारखंड मुक्ति मोरचा को हवाला से 65 करोड़ देने का केस हो या फिर 96 का यूरिया घोटाला , राजनेताओं-अफसरों और दलालों की तिकड़ी देश को चूना लगाती रही। 95 में एन एन वोहरा की रिपोर्ट आयी- देश में अपराधी गेंग, करप्ट नेताओं और अफसरों, ड्रग माफियाओं, हथियार सौदागरों की मिली-जुली समानातंर सरकार चल रही है। इनके इंटरनेशनल लिंक हैं। पर रिपोर्ट फिर रद्दी में। अगर कुछ ना बिगड़ने का डर हो तो फिर कोई क्यों ना बहती गंगा में हाथ धोए। ना डर था और ना ही शर्म- नतीजा घूसखोर नेताओं की बाढ़ आ गई। चाहे चारा घोटाला हो या फिर तहलका कांड या तमाम स्टिंग आपरेशन में नंगे नजर आने वाले नेता। घूस की धारा और गहरी तथा चौड़ी होती गई। विधानपरिषद हो विधानसभा या फिर संसद हर चुनाव में किस तरह पैसा बहाया जाता है, एक-एक वोट खरीदा जाता है उससे ही ये एहसास लगाया जा सकता है कि चुने जाने पर ये नेता कैसे कमाते होंगे? वीपी सिंह और चंद्रशेखर सरकार के पतन की कहानी और कारण सबको पता हैं। किस तरह नरसिम्हा राव ने 94 में तेलुगू देशम को तोड़कर, शिबु सोरेन,अजित सिंह, शंकर सिंह बाघेला को जोड़कर अपनी सरकार बचाई। कल्याण सिंह ने भी यूपी में यही सीन दोहराया। हरियाणा का किस्सा कौन भूल सकता है? पूरी पार्टी ही बदल गई। इसी बार संसद का माला ले लीजिए-खुलेआम नोट लहराए गए। किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। हाल तक झारखंड के सीएम और उनके तीन मंत्री काली कमाई की जलालत झेल रहे हैं। 2008 में वाशिंगटन पोस्ट ने खबर छापी थी कि हिंदुस्तान के 540 सांसदों में से एक चौथाई से ज्यादा दागी हैं। यूपी की मुख्यमंत्री हों या किसी भी राज्य के नए-पुराने नेता ज्यादातर के दामन पर करप्शन के छींटे हैं। हकीकत यह भी है कि देश की अदालतें नेताओं के मामलों को निपटाने में ही लगी रहती हैं। पहली बात तो कोई मामला जल्दी निपटता नहीं। अगर एक खत्म होता है तो एक दर्जन सामने आ जाते हैं। नेताओं-अफसरों-दलालों और घूसखोर सरकारी कर्मचारियों के किस्सों की लिस्ट इतनी लंबी है कि गुलामी का इतिहास इसके सामने छोटा पड़ जाएगा। सवाल यही पैदा होता है कि आखिर कोई नैतिकता इनमें है भी या नहीं? हैरत इस बात की है कि पाकिस्तान और बंगलादेश जैसे पिद्दी से देश करप्शन के खिलाफ हमसे बेहतर कर रहे हैं। हमारे यहां हर सरकारी महकमे को यह लाइलाज रोग अपनी जद में ले चुका है। कहावत यही पड़ गई है कि जो नहीं ले पाया वही ईमानदार बाकी सब...। 2005 की सीएमएस रिपोर्ट के मुताबिक 11सरकारी महकमों में 21 हजार करोड़ से ज्यादा का एक साल में लेन-देन हुआ। 2007 की रिपोर्ट के मुताबिक देश का कोई ऐसा महकमा नहीं जहां घूसखोरी ना पनप रही हो। चाहे वो बैंक हों या सेना। वाजिब काम भी घूस से। नेताओं, अफसरों से जनता बचती है तो बाबूओं के चंगुल से नहीं निकल पाती। एक जमाने में बिहार में गरीबों का 80 फीसदी राशन चुरा लिया जाता था। पशुओं के चारे तक का धन भी नेता डकार गए। इसी तरह देश के हर राज्य में गांव से शहर तक हर दफ्तर में माफिया राज है। सड़क से शिक्षा तक, पढ़ाई से नौकरी तक, रोटी से कपड़े तक, मकान से दुकान तक हर जगह करप्शन। देश की आधी से ज्यादा आबादी घूस देने का स्वाद चख चुकी है। यह रिपोर्ट का कड़वा सार है। धंधा करने वाले पीछे नहीं हैं। घूस दो-काम कराओ और दौलत कमाओ। इसी तर्ज से वे मिनटों में काम कराते हैं। सही काम के लिए बरसों चक्कर काटते रहो-कोई फायदा नहीं। यही कारण है कि इस देश में उद्योगपतियों की दौलत बढ़ती जा रही है। हैरत इस बात की •भी है कि हम किसी लड़की को पब में जाते,ड्रिंक लेते, डांस करते बर्दाश्त नहीं कर सकते,किसी लड़की के कम कपड़े बर्दाश्त नहीं करते, ट्रेफिक सिग्नल पर लाल बत्ती को नहीं झेल पाते, किसी भी लाइन को नहीं झेल पाते,अपने वेतन और दूसरी सुविधाओं पर समझौता नहीं करते,तमाम चीजों पर संयम नहीं दर्शाते लेकिन जब देश की बारी आती है तो चुप्पी साध जाते हैं। आखिर उस समय हमारा जोश कहां चला जाता है-जब चुनावों में राजनीतिक दल हत्यारों, बलात्कारियों और घूसखोरों को टिकट देते हैं, जब राजनीतिक दल वोट के लिए धार्मिक उन्माद भड़काते हैं, जब घूसखोर और घपलेबाज राजनेताओं के केस अदालतों में बरसों लटके रहते हैं, जब गद्दी के लालची चुनाव के बाद बैमेल गठजोड़ कर सारी जनता को ठगते हैं, जब राजनीतिक दल धन और गन के सहारे जन को वोट देने को विवश करते हैं, जब आवाज उठाने वालों की बोलती बंद कर दी जाती है, जब नेता और उनके कारिंदे इज्जत से खेलते हैं, जब अफसर खुले आम जनता के धन को लूटते हैं, जब सरेआम चौराहों पर बहू-बेटियों को छेड़ा जाता है, जब बिना घूस के ना दाखिला मिलता,ना रोजगार और ना ही कोई व्यापार हो पाता। आखिर ऐसे तमाम अनगिनत मौकों पर जब जन आवाज उठनी चाहिए तब हम कन्नी क्यों काट लेते हैं? हम खामोश क्यों रहते हैं? हम इंडिपेंडेंट हैं पर ऐसी व्यवस्था पर डिपेंडेंट क्यों होना चाहते हैं? आखिर कब चेतेंगे हम? ऐसे में क्या हम करप्ट नहीं हुए? सरकार को चेतना चाहिए पर जनचेतना के बिना कुछ नहीं होने वाला। जब तक इस आवाज का साज नहीं बजेगा तब तक यूं ही करप्ट लोग लोकतंत्र का बेसुरा साज बजाते रहेंगे। इस देश को विकास की नहीं विनाश की राह पर ले जाते रहेंगे। हम फिर वहीं होंगे जहां आजादी के लिए करोड़ों लोगों को कुर्बानी देनी पड़ी थी। सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि आखिर क्यों सारे दल, नेता इस पर मुंह नहीं खोलते तथा इस चुप्पी को जनता नहीं समझती? आखिर क्यों? इस क्यों का जवाब ढूंढना ही होाग। सच्ची आजादी तब मिलेगी जब हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी और हर सिर पर छत होगी। दिल्ली और देश की राजधानियों से चलने वाला विकास का एक रुपया जनता तथा विकास पर खर्च होगा। किसी काम के वास्ते घूस नहीं देनी होगी। वाजिब रास्ते से वाजिब काम। देश हमारा है-पैसा हमारा है-उस पर डाका डालने वालों को सबक सिखाने का वक्त आ गया है।

बूटा और बेटा स्वीटी




वक्त रूठा-बूटा का गुस्सा फुटा

देशपाल सिंह पंवार
बूटा सिंह को कौन नहीं जानता। वे किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। वे केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं। राज्यपाल रह चुके हैं। तमाम पदों पर उन्हें बैठाया जा चुका है। आज भी वे अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हैं। हर पद पर वे हमेशा चर्चा में रहते हैं। आज से नहीं उस समय से जब किसी जमाने में इंदिरा जी का राज हुआ करता था। कभी अपनी वफादारी को लेकर तो कभी अपने बयानों और कर्मों को लेकर। इस बार संसदीय चुनाव में वे कांगे्रस को आंख दिखाने को लेकर चर्चा में थे तो अब अपने बेटे को लेकर। देश की राजधानी में उनका बेटा सरबजोत सिंह एक करोड़ की घूस लेते ठीक घर के पास पकड़ा गया। बूटा सिंह का एक और बेटा भी है बबली। इन दो नाम को चाहे देश के बाकी हिस्सों में कोई ना जानता हो पर बिहार का बच्चा-बच्चा तबसे जानता है जब बूटा सिंह वहां लाट साहिब हुआ करते थे। अब वे क्यों चर्चा में थे? जनता उन्हें क्यों जानती थी? ये बबली और स्वीटी भी जानते हैं, बूटा सिंह •भी जानते हैं। यह बात दीगर है कि जब आप पावर में हों तो सब दब जाता है। अब स्वीटी के पकड़े जाने से भी बड़ी खबर ये है कि इसके बावजूद बूटा सिंह इस्तीफा देने को तैयार नहीं हैं। उन्हें अब भी लगता है कि उनका बेटा निर्दोष है और उसे फंसाया गया है। बाप के खिलाफ साजिश के लिए बेटे को निशाना बनाने का उन्होंने आरोप लगाया है। सवाल यह उठता है कि आखिर उन्हें फंसाने और हटाने की साजिश रचने वाले लोग कौन हैं? जब बूटा सिंह को ऐसा लगता है और वे मानते हैं तो फिर वे उन लोगों के नाम जनता के सामने क्यों नहीं खोलते? जब तक वे तस्वीर साफ नहीं करेंगे तो जनता यह कैसे मानेगी कि बूटा सिंह का बेटा निर्दोष है और बूटा सिंह पाक-साफ? अगर वो नाम नहीं खोलते और अपने आरोपों को साबित नहीं करते तो नैतिकता के नाते क्या उन्हें इस संवैधानिक पद पर बने रहने का हक है? यह मामला स्वीटी का नहीं है। बूटा के बेटे का नहीं है। यह एक जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से सीधे-सीधे जुड़ा है। ऐसे में जिस भी शख्स या उसके रिश्तेदार पर ऐसा मामला बनता है तो पहला कदम पद त्यागना ही होना चाहिए। इसके बाद खुद को बेकसूर साबित करने के वास्ते आप जो चाहे कानूनी प्रक्रिया अपनाएं। पर राजनीति में नैतिकता बची ही कहां है? खुलेआम पकड़े जाने पर भी जिस तरह नेता और ऐसे पदों पर बैठे हुए चेहरे दूसरों पर गन तान देते हैं उस पर अफसोस ही जताया जा सकता है। यही कारण है कि राजनीति लगातार पतन की ओर है। ऐसे ही सच्चे किस्सों और नेताओं की शर्मनाक जिद की वजह से राजनीति से जनता का विश्वास उठता जा रहा है। अगर बूटा सिंह साफ थे तो उन्हें मामला सामने आते ही पद छोड़ देना चाहिए था पर वे कहते हैं-नहीं दूंगा इस्तीफा। ऐसा मामला होने के बाद •भी आखिर केंद्र सरकार खामोश क्यों है? माना कि इस पद से हटाने में संवैधानिक बाधाएं हैं पर केंद्र सरकार के हाथ क्यों बंधे हैं? ऐसे कानून अब बदले भी जाने चाहिए और कड़े •भी होने चाहिएं जिनकी वजह से लोग कानून का मजाक उड़ा रहे हैं। राजनीति का मजाक उड़ा रहे हैं। लोकतंत्र का मजाक उड़ा रहे हैं।

गुरुवार, 30 जुलाई 2009

नकटे काट रहे हैं नाक



देशपाल सिंह पंवार
घटिया नेता और घटिया नेतागिरी की वजह से घाटी की जननीति भी घाटी में पहुंच गई है। अरसे से कश्मीर को कब्जाने की पाकिस्तान साजिश रचता आ रहा है। उसकी धरती से पैदा होकर आतंकवादी लगातार खून बहाते आ रहे हैं। दो लाख से ज्यादा लोग अब तक जान गंवा चुके हैं। धरती का यह स्वर्ग नरक में बदल चुका है। जनता की ना जान सुरक्षित है और ना ही ईमान। किसी तरह सांसें चल रही हैं। खटती-मरती और सिसकती जिंदगानियों को बचाने की बजाय यहां के राजनेता आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक राह पर चल पड़े हैं। आतंकवादी सीने में गोली दागते हैं, नेता बेल्ट से नीचे वार कर जनता की आखिरी आस को निराशा में बदल रहे हैं। विरोधियों को नंगा करने की मुहिम चलाने वालों में उल्लास है। दूसरों के दामन को नंगा करने का अट्टाहास है-सारा तमाशा देखकर जनता उदास है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि वो कहां जाए? जिन्हें उसने चुना था वे इज्जत इस तरह उछालने में जुटे हैं जैसे फिल्मों में बदनाम गलियों के सीन दोहराये जाते हैं। पीडीपी की नेता महबूबा के इशारे पर जिस तरह मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सैक्स रैकेट में शामिल होने का आरोप सदन में लगाया, वो घटिया नेतागिरी का ही परिचायक है। यह चाहे राजनीति के पैमाने पर सही उतरता हो पर नैतिकता के नाते इसे सही कैसे ठहराया जा सकता है? इस तरह की बातें नेताओं ने की और ऐसे सीन दोहराने की कोशिश की जिसमें लाज-शर्म को तो बेच ही खाया साथ ही जनता को भी लज्जाया। ऐसे में टीवी चैनलों के अश्लील कार्यक्रमों को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? जब हमारे माननीय और आदरणीय ऐसी बाजारू बोली के रूप में गोली दागेंगे तो फिर हमारे संस्कारों की तो होली ही जलेगी। पीडीपी को ये कैसे मालूम कि सैक्स कांड में उमर अब्दुल्ला शामिल थे? क्या सीबीआई की ओर से ऐसे कागजात उसे मिले थे? जिस समय ये कांड हुआ था उस समय पीडीपी की सरकार थी, क्या उसने उमर का नाम इस सूची में जुड़वाया था? यह हो सकता है कि राजनीतिक रंजिश के चलते उसने उमर को इसमें घसीटने की साजिश की हो? गद्दी छिनने के बाद पीडीपी की बौखलाहट चरम पर है। हर हाल में वो उमर को हिलाना चाहती है। इसके लिए चाहे बेल्ट से नीचे जाना पड़े। सड़कों पर नंगई दिखानी पड़े। बहू-बेटियों की इज्जत उछालनी पड़े। मरती कौम को दांव पर लगाना पड़े। अगर इस पार्टी की नेता को लिहाज-शर्म होती तो अपने किसी साथी को उस काम के लिए नहीं उकसाती जो हमारे समाज में नैतिकता और मर्यादा की हद के पार होता है। आदमियों के लिए भी और औरत के लिए उससे भी ज्यादा। सीबीआई के इंकार के बाद भी अगर शक की कोई गुंजाइश थी तो देश का कानून है, उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। पर पीडीपी जिस राह पर है उससे नहीं लगता कि वो हिंदुस्तान के संविधान और कानून की इज्जत करती है। ऐसे नेताओं और पार्टियों को आखिर कब तक झेला जाएगा? क्या ये नेता आतंकवादियों से कम खतरनाक हैं? हद तो ये है कि नेशनल कांफ्रेस भी पीछे नहीं रही। उसने भी मुजफ्फर बेग पर चरित्र पतन के ऐसे गोले दागे हैं कि शर्मो हया संग सदन से सड़क तक बलात्कार होता दिखाई दे रहा है। वहां हर कमीज को दागदार बनाने की होड़ लगी है। यानि सब नकटे मिलकर नाक काटने पर तुले हैं। उनके रंग-ढंग देखकर यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि उनमें कोई नाक वाला बचा भी है या नहीं? ये कैसे राजनेता हैं? ये कैसी राजनीति कर रहे हैं? घाटी की राजनीति घाटी में दफन क्यों नजर आ रही है? क्या जनता को इन राजनेताओं को सबक नहीं सिखाना चाहिए? सवाल यह भी पैदा होता है कि वो कैसे सिखाए? उसे सिखाने लायक इन लोगों ने छोड़ा ही कहां है। दुश्मनों के इशारों पर नाचते ये कश्मीरी नेता घटिया राजनीति में मस्त हैं। कश्मीर त्रस्त है। जनता पस्त है। लाख टके का सवाल यही है कि वहां जो हो रहा है क्या वो सिर्फ और सिर्फ कश्मीर का मसला है? क्या इससे हिंदुस्तान का कोई ताल्लुक नहीं? क्या अक्ल के अंधे, जुबान के कड़वे और दिल के काले इन राजनेताओं पर लगाम नहीं कसी जानी चाहिए? क्या इन्हें ये एहसास नहीं कराना चाहिए कि वे पाकिस्तान में नहीं हिंदुस्तान में हैं। हिंदुस्तानी हैं। जहां तहजीब की परंपरा है। जहां मर्यादा सर्वोपरि है। अब समय आ गया है कि ऐसी घटिया सोच के राजनेताओं को इस बात का एहसास कराया जाए कि उनकी मनमानी अब नहीं चलने वाली। लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ की उनकी तलवार नहीं चलने वाली। उन्हें हिंदुस्तान के संविधान की रीत से प्रीत करनी ही होगी। उनके ये बेसुरे गीत अब बंद हो जाने चाहिएं जिनसे डरकर कश्मीर की वादियों के पक्षी भी दूसरे ठिकाने तलाश चुके हैं। सवाल यही पैदा होता है कि क्या मनमोहन सरकार ऐसा कर पाएगी? क्या उसमें इतनी हिम्मत है कि वो इन सबको बुलाकर दो टूक कह सके? क्या हमारे यहां ऐसा कोई कानून है जो उन्हें हद बता सके? आसार कम है। वोट की राजनीति की चोट के खोट से राजनीति की धारा में ये गंदी बोट यूं ही कब तक चलेगी? क्या राजनीति करने वालों के लिए अब भी कायदे-कानून नहीं बनाए जाने चाहिएं? उमर 25 की-राजनीति करने का ये कौन पैमाना हुआ? अनपढ़, जाहिल, काहिल कब तक जनता को हांकेंगे? गुंडे-बदमाश, हत्यारे, लुटेरे,बलात्कारी कब तक लोकतंत्र का चीरहरण करेंगे? अगर इन पर कोई रोक नहीं लगी तो इससे भी ज्यादा होगा। लोकतंत्र यूं ही तार-तार होगा।

मंगलवार, 28 जुलाई 2009

धंधा है पर गंदा है ये



देशपाल सिंह पंवार
सत्य ही शिव है। शिव ही सुंदर है। सुंदर क्या है? वो जो आंखों को अच्छा लगे। दिल को अच्छा लगे। यदा-कदा कुछ पलों को अगर छोड़ दें तो नैतिक-अनैतिक अंतहीन सिलसिले के चलते रोजमर्रा की जरूरतें जिस तरह हमारी दिनचर्या का गला घोंट रही हैं,उसमें ना तो कुछ सुंदर होता दिख रहा है, ना ही दिल महसूस कर पा रहा है। आंखें देखने को तरस रही हैं। हैरत की बात यही है कि इसके बावजूद ऐसा माहौल बनाने और दिखाने की कोशिशें भी नहीं हो रही हैं। समाज में आए दिन होने वाली हत्याएं, लूटमार,छीनाछपटी,चोरी-डकैती, घूसखोरी, सीनाजोरी, बलात्कार, अनैतिक व्यापार सुन-सुन और देख-देखकर पहले ही आंखें और दिल बोझिल हो चुके थे, ना उम्मीद हो चुके थे, रही-सही कसर टीवी चैनलों ने पूरी कर दी है। समाज में जो होता आया है या हो रहा है या होगा, उस कड़वे सच से चंद चेहरे रूबरू होते हैं। चंद आंखें उसे देखती हैं, चंद दिल उससे डरते हैं और चंद लोग ही उसका खामियाजा झेलते हैं पर जिस तरह टीवी चैनल झूठ के रास्तों पर सच के घटिया,खोखले तथा अश्लील नारे लगा रहे हैं उसका खामियाजा हमारी संस्कृति भी भोग रही है। हमारे बच्चे भी भोग रहे हैं। हमारी बहू-बेटियां भी भोग रही हैं। ये सारा देश भोग रहा है। कड़वा सच यही है कि ऐसा होना व दिखना तो बहुत दूर की बात जिसे कोई अकेले में भोग देखना नहीं चाहता था,वो हर घर में जबरन थोपा जा रहा है। सड़क-बाजार में खुलेआम दिखाया जा रहा है। लोग देखने को मजबूर हैं। सारी लाज-शर्म ताक पर है। परदे के लिहाज की सारी संस्कृति व परंपरा के साथ रोजाना हर समय हमारी आंखों के सामने बलात्कार हो रहा है। हम झेलते आ रहे हैं। हम देख रहे हैं। शायद हम देखते भी रहेंगे। सच के नाम पर बिस्तर की बातें, रिश्तों के नाम पर दस-दस पतियों की करामातें, दौलत के नाम पर रिश्तों के खून के बातें, समाज के नाम पर बाल विवाह का महिमा मंडन, प्यार के नाम पर सैक्स की सनसनी, नैतिकता के नाम पर सब कुछ अनैतिक,हक के नाम पर सारी हद पार करने का खेल-खेल में जो खेल खेला जा रहा है,उससे आज यह देश उस चौराहे पर खड़ा है जहां यह सोचने को मजबूर होना पड़ रहा है कि क्या यही असली लोकतंत्र है? क्या यही बुध की धरती है? क्या यही सत्यवादी हरिशचंद्र की धरती है? क्या यही स्वामी विवेकानंद की धरती है? महात्मा गांधी ने क्या इसी दुनिया की कल्पना की थी? कहां खो गई है उनके तीन बंदरों की थीम? सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस सनातन सिलसिले की व्यवस्था कैसे बदले? कौन बनेगा युग परिवर्तक? कोई तो आगे आए। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में प्रेस आजाद है। सरकार की ओर से ज्यादा बंदिशें नहीं हैं। लोकतंत्र में मिली इसी छूट का सबने फायदा उठाया। किसी ने कम तो किसी ने ज्यादा। जाहिर सी बात है कि जब अति होती है तो आवाज उठती है। बीच-बीच में आवाजें उठी पर प्रेस की आजादी के नाम पर सब इसी तरह एक हो गए जिस तरह वेतन और सुविधाएं बढ़ाने के नाम पर हमेशा सांसद व विद्यायक दलों की हदों को पार कर एक साथ सुर मिलाते हैं। जनता की पीड़ा और सरकार के पेट की ऐंठ का दर्द यह आवाज हमेशा दबाती चली गई। सरकार ने उन्हें हक भी दिया था कि वे खुद ही तय करें कि सारे सामाजिक और कानूनी दायरों का लिहाज करते हुए वे किस तरह और क्या-क्या दिखाना चाहते हैं? प्रसारकों का स्व नियामक बना पर वो कहीं वजूद में है भी -इसका एहसास ना तो उसने कराया और ना ही किसी देशवासी को हो रहा है। सब चैनल बेलगाम नजर आते हैं। बेशर्मी की हद को पार कर अश्लीलता को परोसे जा रहे हैं। ये सारा काम वो चैनल भी कर रहे हैं जिन्हें न्यूज चैनल का दर्जा मिला है। जो राष्ट्रीय कहलाते हैं। कोई इनसे पूछना वाला हो कि आखिर उन्हें खबर दिखाने का लाइसेंस मिला है या फिर बैडरूम की जिंदगी परोसने का। कत्ल पर इस तरह सनसनी फैलाते हैं कि जैसे वो कातिल के संग-संग सब कुछ देख रहे थे। महाभारत में संजय की तीसरी आंख की तरह। हिंदुस्तान जैसे देश में एक चैनल नंगई से एक-एक औरत की दर्जन शादी दिखा देता है। कोई बाल विवाह के महिमा मंडन में जुटा है। एक चैनल सच का सामना दिखा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि इसे ऐसे समय दिखाया जा रहा है ताकि बच्चे ना देख पाएं। सवाल यही पैदा होता है कि ऐसा क्यों? यानि इसमें ऐसा कुछ है जिसका बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा। अगर ऐसा है तो फिर इसे दिखाया ही क्यों जा रहा है? हकीकत यही है कि यह दौलत का खेल है। वही दिखता है-जो बिकता है की राह पर हैं। चैनलों को हर कीमत पर दौलत चाहिए। जो सच बोलने का ढोंग कर रहे हैं वे कितने पाक हैं सब पहले से ही जानते हैं। उनमें कौन सा ऐसा है जिसे हमारे समाज के लिए आदर्श माना जाए। ना वो शो से पहले थे, दिखने के बाद तो और भी नंगे नजर आते हैं। शक्ल से भी -अक्ल से भी और विचारों से भी । अगर यथार्थ और सच का अंतर इन्हें तथा चैनल वालों को नहीं मालूम तो फिर इनका ऊपर वाला ही मालिक है? अगर इस चैनल को सच ही दिखाने का शौक है तो क्या वो इन नचनियों और गंवैयों की सुहागरात के सीन दिखाएगा? क्या वो इनमें से किसी को बाथरूम में नंगा दिखाएगा? नीचता की सोच है और इसी का गंदा धंधा है ये। मर्यादा लांघने की घटिया कोशिश। चैनलों पर अश्लीलता की सारी हदें पार होने से जनता नाराज है। नंगई दिखाओ-टीआरपी बढ़ाओ-दौलत कमाओ से संसद गरम है। जिस तरह तमाम सांसदों ने सदन में इसके खिलाफ आवाज उठायी है उसकी तारीफ करनी होगी। वो बात दीगर है कि राजनीति में झूठ की फसल खूब लहलहा रही है। हर पार्टी ने इस पर एतराज जताया है। सरकार पर दबाव डाला है कि वो कुछ करे। सरकार अभी तक इसलिए डरती आई है कि कहीं विपक्षी दल इसे आजादी पर हमला ना समझ लें। पर अब जिस तरह सब एक हैं और सरकार शिकंजा कसने को नियामक बनाने जा रही है उसके बाद इन चैनलों को एहसास हो जाना चाहिए कि उन्होंने टीआरपी के लिए, दौलत के लिए, शोहरत के लिए हिंदुस्तानी मीडिया से क्या छीन लिया है? 1980 में जब देश में चैनल की शुरूआत हुई तो सिर्फ राष्ट्रीय चैनल था। रामायण और महाभारत जैसे सीरियल के वक्त सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। अब घर में टीवी खोलते वक्त बाप डरा रहता है। इस समय 480 से ज्यादा चैनल हैं। 200 से ज्यादा न्यूज चैनल हैं। 11 करोड़ से ज्यादा घरों में टीवी हैं। आधी से ज्यादा आबादी टीवी देखती है। एक सशक्त माध्यम हैं पर सारे समाज को अशक्त करता जा रहा है। नैतिकता पर गन तनी है। समाज पर गन तनी है। मीडिया पर गन तनी है पर अफसोस इस बात का है कि वे अब भी अपना सपना मनी-मनी खेलते जा रहे हैं। लोकतंत्र में आजादी के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या किया जा सकता है? सरकार चेत रही है पर अब समय आ गया है कि जनता भी इस पर आवाज बुलंद करे। ताकि ये समाज बचे। ये युवा कौम बचे। देश का फ्यूचर बचे। मर्यादा पुरूष पुरषोत्तम राम के देश में मर्यादा बचे। हे राम।

सब परेशान

देशपाल सिंह पंवार
दिल्ली आजकल गरम है वो भी सावन में। ऊपर से बारिश नहीं हो रही है-जनता परेशान है। अपनों और परायों के तीरों की जमकर बारिश हो रही है-सत्ता परेशान है। मिस्र में अचानक जिस तरह प्रधानमंत्री ने पाक से बातचीत के लिए आतंकवाद की शर्त हटाई गई और साझा बयान में बलूचिस्तान को शामिल किया गया उससे सोनिया समेत सारी कांग्रेस हैरान और परेशान है। जाहिर सी बात है कि चौतरफा फजीहत से प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा परेशान हैं। संसद से सड़क तक वारे के बाद इसका इलाज खोजना कांग्रेस और प्रधानमंत्री दोनों की ही मजबूरी थी तो शायद खोज भी लिया गया है। कहीं से कोई विवाद ना हो इसकी हिदायत दे दी गई है और बंदोबस्त कर लिए गए हैं। सोनिया की ओर से भी अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जा रहा है कि कहीं कोई दूरी नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने भी साफ किया है कि सब मीडिया की उपज है। कहीं कोई दूरी नहीं हैं। पर यह सवाल तो पैदा होता है कि जो दूरी दुश्मन देश के साथ बातचीत के दौरान दिखना चाहिए था वह यहां क्यों दिख रहा है? ऐसी नौबत ही क्यों आई? सांप के निकलने के बाद लकीर पीटने की जरूरत क्यों पड़ रही है? वैसे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मिस्र में जो कुछ हुआ इसके जवाब उनके पास हैं। संसद में 29 जुलाई को सरकार माकूल जवाब देगी। ऐसा कहते वक्त मनमोहन सिंह विश्वास से सराबोर नजर आ रहे थे लेकिन 29 को संसद में यह विश्वास नैया पार लगाएगा इसका विश्वास कम से कम फिलहाल कांगे्रसियों के चेहरों से तो नजर नहीं आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गलती छिपाने के लिए जब अदने से इंसान के पास तर्क हो सकते हैं तो फिर ये तो सरकार है। उसे तर्क खोजने में इतनी माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी जितनी अपनों को इन तर्को को समझाने में। अगर अपनों के हलक के नीचे ये तर्क नहीं उतरेंगे तो फिर विपक्ष तो इसी की कमाई खाता है। अब जिस मोड़ पर सरकार खड़ी है वहां कांग्रेसियों को इन्हें हलक के नीचे तो ले जाना भी होंगा और मुस्कराना भी होगा। चाहे मन तैयार ना हो, तन तैयार ना हो, पेट अपच हो जाए। अब चाहे जो जवाब संसद में दिए जाएं, समझाने की कोशिशें की जाएं पर इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि सरकार ने इस मसले पर देश व यहां की जनता की किरकिरी तो करा ही दी है। झुकना पाकिस्तान को चाहिए था, झुके हुए हम नजर आ रहे हैं। जिस विश्वास के साथ पाकिस्तान हम पर बलूचिस्तान को लेकर वार कर रहा है, यह तो दर्शाता ही है कि हमनें कहीं न कहीं चूक कर दी है। अमेरिका हमें दुश्मन के सामने झुकाने में सफल तो हो ही गया है। बार-बार धोखा खाने के बावजूद आखिर मनमोहन सरकार कब ये समझेगी कि अमेरिका की इज्जत पाकिस्तान में दांव पर लगी है ऐसे में वो कैसे हमारे लिए पाक को घाव दे सकता है। उसे पाक का ख्याल रखना ही है। अब सारे देश को 29 जुलाई का इंतजार है। पता तो है पर देखना भी है कि मिस्र में हम कितना खोकर आए हैं?

शनिवार, 25 जुलाई 2009

प्यार का बेसुरा साज-लोकलाज पर गाज

देशपाल सिंह पंवार
दिन में ही जुगनुओं को पकड़ने की जिद करें,बच्चे हमारे दौर के बहुत चालाक हो गए।

देश में लोकराज है। अधिकारों का साज है। सबको नाज है। होना भी चाहिए। पर ये कौन सा काज है? क्यों लोकलाज नासाज है? क्यों संस्कारों पर गाज है? क्यों कल को मिटाता आज है? क्यों यमराज का राज है? लोकतंत्र में आजादी के ये कौन से मायने निकाले जा रहे हैं? सावन की फुहार के बजाय क्यों गरम बयार को पंखे झुलाए जा रहे हैं? समाज के तपने में हाथ तापने की गलत सोच पर भी क्यों सीने फुलाए जा रहे हैं? आखिर ये कौन सा संसार और कैसा प्यार? सारी हदें पार। शर्मो हया तार-तार। संस्कारों की हार। रिश्तों पर वार। अपने बेजार। मानवता शर्मसार। ये कहां आ गए हैं हम? हक के नाम पर, मनमर्जी के नाम पर ना गौत्र में प्यार व शादी की जिद करने वाले बालक की आंखों में शर्म दिख रही है। ना पालक धर्म की राह पर जाते नजर आ रहे हैं। ना ही मीडिया असली कर्म की कमाई खा रहा है। नेता रूपी चालक से ना पहले कोई आस थी। ना आज है। वे कल भी भ्रम में थे-आज ज्यादा हैं। कल क्या होगा-अंदाजा लगाया जा सकता है-बापू को नमन और चमन का पतन। ऐसे में सामाजिक ताने-बाने के संकरे होते रास्ते कितनी देर और कितनी दूर साथ लेकर चल पाएंगे,अब यह सवाल हर समय मथ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको तमाम हक हैं। प्यार पर भी बंदिशें नहीं हैं। तय उम्र के बाद शादी पर भी रोक नहीं है लेकिन इस हक का मतलब हद पार करना नहीं है। असली दिक्कत यही है कि हक की किताब तो बांच ली गई पर हद को ना तो जानने की कोशिश की गई, ना समझने की। मानना तो दूर की बात है। जहां-जहां हद पर हक का पलड़ा झुका वहां यही हुआ जो आज हरियाणा में हो रहा है। सारे देश में हो रहा है। लाख टके का सवाल यही है कि कंधे पर लैपटाप, कान पर मोबाईल, आंख पर चश्मा लगाकर चलने वाली ये कौम क्या प्यार की कहानी का सारा फिल्माकंन दिल व घर की चाहरदीवारी से बाहर सड़क पर करना चाहती है? संविधान की किस धारा में ये अधिकार मिला है कि लिहाफ सड़क पर बिछाया जाएगा? मां-बाप की इज्जत को सरेआम उछाला जाएगा? बहन (गांव की लड़की) को बीवी बनाया जाएगा? समाज और संविधान की किस धारा में लिखा है और कहां से ये हक मिला है कि बालक पल में अपने पालक को ही नालायक का दर्जा दे डालें? आजादी के ये मायने तो नहीं थे। सवाल यह भी है कि संविधान की किस धारा में किसी भी शख्स, किसी भी गौत्र, किसी भी खाप को खून बहाने की आजादी मिली है, चाहे वो अपनों का ही क्यों ना हो? मूंछ के सवाल पर समाज और कानून को हलाल नहीं किया जा सकता। वैसे ये एक सामाजिक समस्या है, इसे ना तो कोई गौत्र,ना कोई खाप, ना कोई राजनीतिक दल, ना कानून की कोई धारा इस हांके से हांक सकती जो आज हरियाणा के हर गांव-गली और कूंचों में लगाया जा रहा है। यह एक संवेदनशील मामला है। नेतागिरी जितना दूर रहेगी-उतना ही अच्छा। मानवाधिकारों का डंका पीटने वालों को भी तह में जाना होगा। हल्ले से ये ठीक नहीं होगा। सख्ती से इसे दबाया नहीं जा सकता। किसी सजा से भी इसका समाधान नहीं निकलने वाला। घर-गांव, गौत्र और खाप वालों को भी निष्कासन से आगे की हद नहीं लांघनी चाहिए। गांव से निकालने के फैसले के पीछे समाज को बचाने का तर्क दिया जा सकता है लेकिन कानून को हाथ में लेने और किसी को मारने का अधिकार ना किसी शख्स को है, ना किसी समाज को है, ना किसी गौत्र को है, ना किसी खाप और सर्वखाप को है। सबको ये समझने की भी जरूरत है कि ऐसे मामले क्यों होते हैं? कोई एक-दो गौत्र हों तो ऐसी दिक्कतें शायद ही पैदा हों लेकिन हरियाणा, राजस्थान, यूपी और देश के हिस्सों में जाटों के चार वंश और 2700 से ज्यादा गौत्र हैं। दिन-रात का साथ है। ऐसे में गांव स्तर पर संस्कार विहीन बच्चों से गलती हो जाती हैं, यहां शादी कानून की नजर में चाहे जायज ठहराई जा सकती हो लेकिन समाज और नैतिकता की कसौटी पर इसे सही नहीं माना जा सकता। स्कूल-कालेज में पढ़ते समय गौत्र जैसी बातें युवा पीढ़ी को बेमायने नजर आने लगती हैं। प्रेमिका की कसौटी पर खरा उतरने के वास्ते सारे संस्कार बौने लगने लगते हैं। क्या ये जायज है? यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू और सामाजिक बहस का संवेदनशील मुद्दा है जिसे चंद शब्दों से ना तो बताया जा सकता और ना ही कोई रास्ता निकाला जा सकता है। जहां तक गौत्र का सवाल है तो यह एक संस्कृत टर्म है। वैदिक राह पर चलने वालों ने इसे पहचान तथा सामाजिक मान-सम्मान कायम रखने के वास्ते शुरू किया था। महर्षि पाणिणी ने लिखा था-उपत्यं प्रौत्रं प्रभर्ती गौत्रम। पहले किसी खास इंसान, जगह,भाषा और ऐतिहासिक घटनाओं के आधार पर गौत्र बनते गए। जब जहां कोई महान शख्स हुआ उसके नाम पर गौत्र बन गया। रजवाड़ों के जाने के बाद वंश व गौत्र बढ़ने का ये सिलसिला थमा है। हां यह जरूर है कि जैसे जाति और वंश नहीं बदल सकते उसी तरह गौत्र भी नाहीं बदल सकते। एक वंश में एक से ज्यादा गौत्र हो सकते हैं लेकिन एक गौत्र में एक से ज्यादा वंश नहीं हो सकते। जैसे चौहान वंश में 116 गौत्र हैं। जिस समय ये परंपरा शुरू हुई थी तो उसी समय ये बंदिशें लागू हो गई थीं कि समान गौत्र में शादी नहीं हो सकती। इसके पीछे सामाजिक और वैज्ञानिक कारण थे। वंश की सेहत और नैतिक मूल्यों की रक्षा के तर्क थे। मानव धर्मशास्त्र के चैप्टर-3 और श्लोक 5 में भी कहा गया है-अस पिण्डा च या मातुर गौत्रा च या पितु:, सा प्रशस्ता द्विजातीनां दार,कर्माणि मैथुने। यानि बाप के गौत्र और मां की छह पीढ़ियों के गौत्र में लड़की की शादी जायज नहीं। हिंदुओं में शादी का जो परंपरागत प्रावधान है वो भी यही कहता है कि चार गौत्र का खास ख्याल रखो- यानि मां, पिता, पिता की मां और मां की मां (नानी) के गौत्र में शादी वर्जित है। हरियाणा में जिस पर हल्ला हो रहा है वह इसी हद के उल्लंघन का नतीजा है। सब जानते हैं कि भरत गाँवों में बसता है। गांवों का सारा ताना-बाना आज इसी वजह से मजबूत है क्योंकि वहां हर लड़की बहन और हर लड़का भाई समाझा और माना जाता है, चाहे वो किसी भी जात का क्यों ना हो? दिन-रात ताऊ और चाचा कहने वालों की बेटियों को क्या बहू बनाया जा सकता है? ऐसा होना सामाजिक और नैतिक मूल्यों का पतन नही है? जब-जब इस हद को लांघा जाएगा तो जाहिर सी बात है कि समाज में उथल-पुथल होगी और अमूमन कड़वे नतीजे ही सामने आएंगे। जिस प्यार व शादी से अगर रिश्ते टूटते हों, समाज बिखरता हो, परिवार बेइज्जत होता हो, खून बहता हो तो उसे प्यार कैसे माना जा सकता है? प्यार तो बलिदान मांगता है। यहां तो वो खून बहा रहा है। जाटों में अमूमन जर, जोरू और जमीन के ही विवाद होते हैं। प्यार व शादी के विवाद कई बार गौत्र में नहीं सुलझ पाते। गांव पंचायतों में नहीं निपट पाते। न्याय के वास्ते इससे ऊपर खाप हैं और फिर आखिरी सर्व खाप। यानि हरियाणा की सर्व खाप। ऐसे मामलों में ज्यादातर हुक्का-पानी बंद और गांव से निष्कासन के ही फैसले आते हैं। खाप का इतिहास बेहद पुराना है। 500 बीसीई से ही इसका जिक्र है। आन-बान-शान के लिए मर मिटने का। अतीत से अब तक इसे सामाजिक प्रशासन का दर्जा मिला हुआ है। कुछ गांवों को मिलकर खाप बनती हैं। जैसे 84 गांव की खाप। एक गौत्र एक ही खाप में रह सकता है। पंचायतें जब मामले नहीं निपटा पातीं तो वे खाप में जाते हैं और जब दो खाप में पैंच फंस जाते हैं तो फिर हरियाणा की सर्व खाप तय करती है। इसके सारे फैसले माने जाते हैं। कई बार उन्हें कानून की अदालतों में चुनौती दे दी जाती है। लेकिन इससे इंकार नहीं किया जा सकता और इतिहास गवाह है कि इस व्यवस्था से हमलावरों के खिलाफ तमाम जंग लड़ी और जीती गई तथा सामाजिक झगड़े सर्वखाप स्तर पर निपटते रहे। चाहे वो 507 एडी में मुल्तान में हंस के खिलाफ जंग हो, मोहम्मद गौरी के खिलाफ तारोरी की जंग हो या अलाउद्दीन खिलजी के खिलाफ हिंडन और काली नदी की जंग हो या फिर 1398 में तैमुर के खिलाफ जंग हो सबमें खाप व सर्वखाप ने निर्णायक रोल अदा किया। इतिहास बेहद लंबा चौड़ा है। चंद शब्दों में समेटना आसान नहीं पर सच यही है कि सर्वखाप के सामने तब दुश्मन होते थे अब अपने हैं। चाहे जितना समय बदल गया हो खाप और सर्व खाप की महत्ता इस समाज में आज भी उतनी ही है। इससे छेड़छाड़ के नतीजे ज्यादा खराब हो सकते हैं। इस व्यवस्था को बनाने का श्रेय आर्यसमाज को ही जाता है। जिसकी संस्कारों की मजबूत नींव पर यह बुलंद इमारत खड़ी हुई थी। जिसे हिलाने की कोशिशें होती रहती हैं। युवा पीढ़ी को यह तय करना ही होगा कि क्या भाई -बहन और मां-बाप से बढ़कर भी प्यार है? यह भी तय हो जाना चाहिए कि क्या प्यार कौम, समाज और राज्य से भी बढ़कर है? इस युवा पीढ़ी को गौरवशाली इतिहास का एहसास कराना भी जरूरी है ताकि वो उस पर नाज करे। गाज गिराने वाला साज ना बजाए। प्यार करो पर हद में। हद से बाहर भद्द ही पिटेगी। एक और बात यह कोई लैला-मजनूं का किस्सा भी नहीं है कि मीडिया इसे फिल्मी कहानी की तरज पर पेश करे। खासकर टीवी चैनल। इतिहास को पढ़े बिना,सामाजिक ढांचे को समझे बिना, गहराई में जाए बिना तालिबानी संसार-प्यार पर वार के ढोल बजाना जायज नहीं। सामाजिक बीमारी को लव स्टोरी बनाने की सोच सही नहीं। लोकतंत्र में मिले हक और देश के 21 वीं सदी में होने के पाठ मीडिया में बैठे लोगों को फिर पढ़ लेने चाहिए ताकि आग में घी के काम से वे और बदनाम ना हों। उनमें यह समझ जरूर होनी चाहिए कि हर धोतीधारी गंवार नहीं होता। हर जींस पहनने वाला देश व समाज की तरक्की का असली चेहरा और ठेकेदार नहीं होता। जिस देश की कल्चर और इतिहास की सारी दुनिया कायल हो,अपनाना चाहती हो, क्या उस देश में 500-700 रुपए की जींस से नैतिक मूल्यों का मूल्यांकन होगा? क्या इसी संस्कृति से देश की वर्तमान तस्वीर और कौम की सुनहरी तकदीर लिखी जाएगी? क्या टीवी चैनल पर बैठे मीडिया के साथी तालिबानी कल्चर को नहीं जानते? उस कल्चर में बिस्तर पर बहन के अलावा सब जायज है, यहां ठीक उल्टा है। फिर ये तालिबानी चेहरे कैसे हुए? जिस तरह पूरे देश में प्यार पर वार होते हैं तो फिर इस सारे देश को क्या तालिबानी कहा जाना वाजिब होगा? अगर ये साथी इतिहास पढ़े होते तो अफगानिस्तान और तालिबान से राजस्थान, हरियाणा तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रिश्तों को जरूर समझ जाते। समझा पाते। पर जिस कौम को अपना इतिहास मालूम ना हो, उनके कथन से समाज में फैलते जहर का एहसास ना हो वो जो मरजी हो बोल भी सकते हैं, दिखा भी सकते हैं। किसी गांव वाले से बार-बार लगातार ये पूछना कि वो बालिग है तो उसने गौत्र में लव मैरिज क्यों नहीं की? गौत्र से बड़ा कानून है। कानून से हक मिला है। यानि गौत्र जाए चूल्हें में लव मैरिज हो। अगर आज गौत्र की सीमा टूटी है, कल गांव की टूटेगी, परसों घर की। मीडिया ये कौन सा पाठ पढ़ा और सिखा रहा है? ये हक का दुरुपयोग नहीं तो और क्या है? यह हद का अतिक्रमण ही तो है। सवाल यह भी उठता है कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर में तरक्की के क्या मापदंड हैं? सड़कों पर समलैंगिक जोड़ों की भरमार बहन को छोड़ किसी भी लड़की से प्यार,सारी शर्मो हया तार-तार को अगर हम समाज व देश की तरक्की का परिचायक मान बैठे हैं तो फिर इस सवाल पर अब मंथन का समय आ गया है कि देश किस राह पर चलेगा, क्या ऐसी ही तरक्की हमें चाहिए , जहां लाज ना हो? कड़वा सच यही है कि टीवी अपनी अप संस्कृति को देश के हर इंसान में तलाशने और फैलाने में जुटा है। जहां ये नजर नहीं आती, उसे जो चाहे नाम दे दो। मीडिया को इस बात के जवाब तलाशने ही होंगे कि आखिर लव मैरिज ज्यादा विफल क्यों होती हैं? पुरातन शादी की व्यवस्था की सफलता अगर 90 फीसदी से ऊपर है तो लव मैरिज 50 फीसदी से नीचे क्यों है? इस क्यों की तह में जाओ-सबको समझाओ-फिर प्यार के बिगुल बजाओ। हमेशा की तरह हरियाणा के मसले पर भी मीडिया ने नासमझी का ही परिचय दिया है। टीआरपी के लिए फिल्मी परदे के हीरो दिखाने की बजाय अगर मीडिया असली हीरो ढंूढे, पैदा करे तो इस समाज की भी टीआरपी बढ़ेगी, उसकी भी साख बढ़ेगी, आदर्श चेहरों से खाली इस साधु-संतों की धरती पर फिर बहार की फसल उगेगी। हक और हद की दोस्ती मजबूत होगी। ना प्यार पर वार होंगे, ना हम शर्मसार होंगे। मीडिया ये कर सकता है। अगर नहीं तो फिर आग में घी के रोल का फटा ढोल उसकी पोल खोल रहा है। आवाज अगर नहीं सुनाई दे रही है तो यह उनकी बदकिस्मती।

बुधवार, 22 जुलाई 2009

शर्मनाक-मनमोहन सरकार ने कटवाई नाक



देशपाल सिंह पंवार
यूं तो कुछ भी तर्क दिए जा सकते हैं पर जो गलती अनजाने में हो वो भूल कहलाती है। जो अति आत्मविश्वास की वजह से हो वो लापरवाही कहलाती है। जो जानबूझकर की जाए वो दादागिरी कहलाती है। भूल को माफ किया जा सकता है। लापरवाही को सुधारा जा सकता है लेकिन दादागिरी को ना तो नजरअंदाज किया जा सकता, ना माफ किया जा सकता और ना ही उसे सुधारा जा सकता। ऐसी सोच का बस एक ही इलाज होता है-औकात का एहसास कराना। सबक सिखाना। जड़ से मिटाना ताकि फिर ऐसी नौबत ना आए। विदेशों में तो अमूमन हर साल हमारी इज्जत पर हाथ डाला जाता है पर अपनी ही धरती, देश की राजधानी के एयरपोर्ट पर जिस तरह अमरीकी एयरलाइंस ने हमारी इज्जत को उछाला वह दादागिरी से भी कहीं ज्यादा बड़ा दुस्साहस है। हमारी आन-बान और शान पर इससे ज्यादा गहरी चोट क्या हो सकती है कि ना केवल हिंदुस्तान बल्कि सारी दुनिया में सबसे सम्मानीय शख्स में से एक एपीजे कलाम को एक अदनी से एयरलाइंस के कर्मचारी हमारी ही धरती पर लाइन में खड़ा कर देते हैं। कपड़ों से लेकर पर्स तक की तलाशी ले डालते हैं। जूते तक उतरवा लेते हैं। इससे ज्यादा और शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि मौके पर कोई चूं तक नहीं करता? कोई मुंह नहीं खोलता? इससे ज्यादा दुस्साहस और क्या हो सकता है कि वह एयरलाइंस ना तो मनमोहन सरकार के नोटिस का जवाब देने की जहमत उठाती और ना ही एक अरब से ज्यादा की आबादी की भावनाओं की परवाह करती। लाख टके का सवाल यही है कि क्या यह पूरे देश का अपमान नहीं था? अगर है और मनमोहन सरकार को इस शर्मनाक हरकत के बारे में पता था तो उसने एक्शन क्यों नहीं लिया? अगर सरकार के नोटिस का जवाब सात दिन में एयरलाइंस ने नहीं दिया था तो सरकार ने अगला कदम क्यों नहीं उठाया ? आखिर तीन महीने तक सरकार खामोश क्यों बैठी रही? अपमान के कड़वे घूंट पीने और हिंदुस्तानी जनता को पिलाने वाली सरकार की चुप्पी का राज क्या था? हंगामें के बाद ही उसकी आंख क्यों खुली? क्या ऐसे में यह नहीं माना जाना चाहिए कि हम अमरीका जैसे गोरे देशों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं? जिस देश को तहजीब और आदर सत्कार का देश कहा जाता है अगर उस देश के सबसे ज्यादा इज्जतदार शख्स की इज्जत इस तरह से सरकार करती और कराती है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या वास्तव में हम सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं? क्या हमें ये घमंड करने का हक है कि सारी दुनिया को राह दिखाने की विरासत में मिली जमा पूंजी हमारे पास आज भी सुरक्षित है? सवाल यह भी है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी के साथ ऐसे ही व्यवहार के बाद मनमोहन सरकार क्या करती? इसी तरह तीन महीने खामोश रहती या फिर तीन मिनट में सही फैसला कर डालती? पूर्व राष्ट्रपति की शांत नेचर को सब जानते हैं। आज जब देश में हर क्षेत्र में आदर्श चेहरों का संकट है तो कलाम साहब से ही आशा की आस बंधती है। देश की धरती पर शायद ही कोई ऐसा हो जो उन्हें सम्मान ना देता हो। एयरपोर्ट पर जो कुछ हुआ पहली बात उसका मलाल उन्हें हुआ नहीं होगा, हुआ होगा तो उनके चेहरे से झलका नहीं होगा। ऐसी घटनाओं पर उनका मुंह खोलना और कुछ बोलना तो नामुमकिन है। हां जिस तरह उनके अपमान की यह बात बाहर आयी, मीडिया में उछली,संसद में गूंजी उससे हिंदुस्तानियों का समय और एनर्जी बर्बाद होने का रंज उन्हें जरूर होगा। उन्होंने उसी समय दिल से निकाल दिया होगा। तब भी माफ कर दिया होगा, अब भी माफ कर देंगे और आगे भी अगर इसी तरह का कोई वाक्या होता है तो भी माफ कर देंगे। कारण ये गांधी का देश है और वे गांधी के अनुयाई है। देश के राजनेताओं और उनकी औलादों को इस महान शख्सियत से यह जरूर सीखना चाहिए कि व्यक्तित्व और व्यवहार कैसा होना चाहिए? खासकर उनको जो जरा-जरा सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। अफसरशाही को औकात दिखाने में जुट जाते हैं। खैर यह संस्कारों की बात है। हर कोई कलाम साहब नहीं हो सकता। कम से कम इस मामले में सरकार को भी ऐसा नहीं होना चाहिए। वैसे जिस समय जार्ज फर्नांडीज के साथ अमरीका में, सोमनाथ चटर्जी के साथ आस्ट्रेलिया में, प्रणव मुखर्जी के साथ मास्को में इस तरह की कोशिश हुई थी अगर उसी समय दिल्ली सरकार ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाती तो शायद ये नौबत नहीं आती। पर अब पानी सिर से ऊपर चला गया है। सांसदों की नाखुशी और सरकार के एक्शन के ऐलान के बावजूद जिस तरह एयरलाइंस ने जले पर नमक छिड़का और साफ कहा कि वे किसी को भी छूट नहीं देंगे उसके बाद कोई गुंजाइश नहीं बचती। हंगामें और रिपोर्ट दर्ज होने के बाद चाहे एयरलाइंस ने माफी मांग ली हो पर सरकार को इस एयरलाइंस की उड़ान तत्काल प्रभावः से रोक देनी चाहिए ताकि सब हिंदुस्तान की खामोशी को ताकत मानें कमजोरी नहीं। सबको यह एहसास कराना भी जरूरी है कि हिंदुस्तान में धंधा करना है तो दिल्ली के कायदे-कानून ही मानने होंगे अमरीका या बाकी गोरे देशों के नहीं। अगर सरकार ऐसा करती है तो यहां की जनता की आहत फीलिंग पर भी मरहम लगेगा। पर सबसे बड़ा सवाल फिर यही उभरता है कि क्या सरकार ऐसा चाहती है? क्या सरकार कर पाएगी? आसार कम हैं। उम्मीद कम है। कारण सामने एयरलाइंस उस देश की है जिसके सामने हम नतमस्तक नजर आते हैं।ताजा उदाहरण ले लीजिए-अमरीका के दबाव में हम पाकिस्तान के साथ बातचीत से आतंकवाद के मसले को हटाने पर राजी हो जाते हैं। बलूचिस्तान पर बात करने को तैयार हो जाते हैं। हिलेरी क्लिंटन आती हैं। हम पलक पांवड़े बिछा देते हैं। मुंबई कांड के मुख्य आरोपी अजमल कसाब गुनाह कबूल लेते हैं। हम अमरीका से हथियारों का ऐसा समझौता करते हैं जिसमें चित्त भी उसकी और पट भी उसकी। हम हथियार खरीदेंगे, धन भी देंगे पर वो यह देखने आएगा कि हम उन्हें कहां इस्तेमाल करेंगे? अगर कोई सरकार इस तरह किसी देश के सामने बिछी नजर आती हो तो फिर उसके लिए कलाम साहब या देश की तौहीन के मसले कितने मायने रखते हैं यह सोचनीय सवाल है? ऐसे में अब तो परमाणु करार पर भी सवाल उठने लगे हैं। जो वाजिब भी लगने लगे हैं। हथियारों के समझौते पर मानसून में संसद गरम है पर कलाम साहब की तौहीन पर अब एयरलाइंस भी नरम है और सरकार भी, माफी मांगने पर मामला खत्म। हम कटी नाक के हैं-दो चार दिन में जनता भी बिसरा जाएगी और सरकार भी, ऐसा तो होता रहता है कि हमारी सोच से आन-बान-शान की चाल में आई मोच देखने का समय ही किसके पास है? मेरा देश महान।

सोमवार, 20 जुलाई 2009

नाटक के खुले फाटक-कसाब ने कबूला गुनाह

देशपाल सिंह पंवार
निर्दोष जनता का खून बहाते जिसे सारी दुनिया ने देखा हो,जो मौके से पकड़ा गया हो वह आतंकवादी 8 माह तक झूठ दर झूठ बोलता गया। अपना हाथ होने से इंकार करता चला गया। उसके आका भी उसे अपना मानने से इंकार करते चले गए। पड़ौस ने साजिश पर परदा डालने की हर कोशिश कर डाली पर कहावत है कि सच को दबाया नहीं जा सकता। वैसे इसे अमरीकी दबाव का नतीजा कहिए या गुनाह के बोझ का असर-अब जाकर उस आतंकवादी अजमल कसाब ने अपना मुंह भी खोला, कड़वा सच भी उगला, रची गई साजिश की एक-एक कड़ी को भी खोला और यह भी माना कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में वो भी शामिल था। उसने मुंबई में स्पेशल कोर्ट के सामने सोमवार को साफ कहा कि वह कराची से 26 नवंबर की रात को मुंबई वोट से अपने नौ साथियों के साथ पहुंचा था। कराची में विदाई देने के वास्ते लश्कर के कई आतंकी पहुंचे थे। उसने साफ किया कि जकीउर्रहमान लखवी ने पूरी साजिश रची। उसने यह भी माना कि कामा अस्पताल और छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उसने फायरिंग की लेकिन वह यह झूठ बोलने से बाज नहीं आया कि उसकी गोली से कोई नहीं मरा। उसने अदालत से सजा मांगी और गुहार लगाई कि जो फैसला करना है वो हो तथा ये मुकदमा बंद हो। कसाब ने जिस तरह अचानक अपना गुनाह कबूला उसे लेकर कोर्ट में वकील भी हैरत में थे। लेकिन इसमें हैरत की कोई बात नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि उसका आका देश पाकिस्तान मान चुका है कि कसाब वहां का नागरिक है। रही-सही आस तब टूट गई जब फेडरल जांच एजेंसी ने अपनी दूसरी चार्जशीट भी दायर कर दी जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि सारी साजिश लश्कर के मुखिया लखवी ने रची। इससे कसाब के बचने की सारी गुंजाइश ही खत्म हो गई थी। लेकिन असल कहानी कुछ और ही है। रविवार को दिल्ली में जिस तरह अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने साफ किया कि मुंबई पर हमला करने वालों को सजा जरूर मिलेगी उससे भी कसाब और उसके आकाओं के लिए सारे रास्ते बंद हो गए थे। सब जानते हैं कि पाकिस्तान अपना एक भी कदम अमरीका से पूछे बिना नहीं उठाता। आतंकवादियों और कट्टर तालिबानियों के मामले में जिस तरह अमरीका पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मुंह की खा रहा है उससे किसी भी पाकिस्तानी को यह आस नहीं रह गई थी कि तमाम चालबाजियों के लिए विख्यात अमरीका इस मसले पर पाकिस्तान को शह देगा। इसे हैरत की बात कहिए या अमरीका प्लान का हिस्सा की सारा खुलासा तब हुआ है जब हिलेरी हिंदुस्तान का दौरा कर रही हैं। ऐन इसी वक्त सारा तयशुदा नाटक खेला गया। अब विपक्ष के इस आरोप में भी दम नजर आने लगा है कि मिस्र में पाक के प्रधानमंत्री से मनमोहन सिंह की मुलाकात में जिस तरह आतंकवाद का मसला दूर रहा उसके पीछे पूरी तरह अमरीका का ही दबाव था। वहां मनमोहन सिंह की खामोशी और यहां कसाब का कबूलना एक ही कड़ी का हिस्सा नजर आ रहा है। इसे हिंदुस्तान बड़ी कामयाबी मान सकता है लेकिन एक आतंकी से 8 माह तक गुनाह कबूल वाने में विफलता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हकीकत में यह अमरीका की कामयाबी है। हिलेरी की कामयाबी है। अब इस खुलासे के बाद देखना यही है कि पाकिस्तान लखवी जैसे आतंकवादियों को क्या सजा देता है? कसाब जैसों का क्या होता है? हो सकता है फिर अमरीका कोई दांव खेले और हिंदुस्तान की उसमें मौन सहमति हो।

फोकट में लालू हुए बदनाम



देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि बद से बदनाम बुरा। लालू-राबड़ी के राज से यह आम धारणा हर दिलो दिमाग पर छा गई थी कि बिहार में रहना भी मुश्किल है,जीना भी मुशकिल है तथा चलना तो और भी मुश्किल। खासकर रेल यात्रा के मामले में यह राज्य बेहद बदनाम हो चुका था। वह समय गुजरे ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब यहां से गुजरने वाली रेलों में चलने वाले यात्रियों के चेहरों पर खौफ की लकीरें साफ दिखाई दिया करती थी। सही सलामत बिहार निकलने पर हर यात्री चैन की सांस लिया करता था। पर अब जब आंकड़ों के रूप में पांच साल की हकीकत सामने आई है तो साफ दिखता है कि इस राज्य से गुजरना असुरक्षित तो था पर उतना नहीं जितना इसे मीडिया ने बदनाम कर दिया था। इस राज्य से कहीं ज्यादा रेल में वारदातें महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुईं । सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मीडिया आंखें बंद करके चलता है? अगर हां तो उसे रोकना जरूरी है या नहीं? अगर नहीं तो फिर सुनी-सुनाई बातों को फैलाने वालों को क्या सजा मिले? चलती रेल में हत्या, डकैती, चोरी,जहरखुरानी और अन्य अपराधों के मामलों में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा। महाराष्ट्र में 2004 में जहां चलती रेल में 1314 अपराध हुए वहीं पिछले साल यह बढ़कर 1795 तक पहुंच गए। मध्यप्रदेश में स्थिति लगातार सुधरती गई। 2004 में जो संख्या थी वह लगातर घटती चली गई। जहां तक बिहार का सवाल है तो वहां इन पांच साल में डकैती की घटनाएं यकीनन सबसे ज्यादा रहीं पर अब वहां से गुजरना ज्यादा असुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए। 2004 में यहां रेल में कुल 1184 अपराध हुए जो साल दर साल घटते जा रहे हैं और पिछले साल यह संख्या घटकर 880 रह गई। हैरत की बात यही है कि नक्सलप्रभावित राज्यों उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में स्थिति थोड़ी बेहतर है। शायद यहां की जनता का शांतिप्रिय होना ही इसका प्रमुख कारण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकारी आंकड़े पूरी तरह सच का आईना नहीं होते। अनगिनत मामले ऐसे होते हैं जो दर्ज ही नहीं होते। या तो रेल पुलिस उन्हें दर्ज नहीं करती या लुटा-पिटा यात्री और लुटने तथा फजीहत के डर से ज्यादा हल्ला नहीं करता या रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता। फिर भी आंकडों के रूप में जो तस्वीर सामने आई है वह खुश होने की नहीं है। अपराध चाहे बिहार में हों या महाराष्ट्र में रेल में सुरक्षित सफर करना हमेशा किला जीतना रहा है। यह चाहे कोई भी रूट क्यों ना हो? हर रेल मंत्री के लिए यह बड़ी चुनौती रहा है। ममता को भी इसका एहसास है। इसी वजह से उन्होंने रेल बजट में यात्रियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हर रोज इधर से उधर करोड़ों यात्रियों को ले जाने वाली रेलों में वे किस तरह अपराध पर अंकुश लगा पाएंगी? सब जानते हैं कि रेलों में ज्यादातर अपराध के लिए रेल पुलिस ही जिम्मेदार होती है। क्या उसके सहारे यात्रियों की सुरक्षा की जा सकती है? रही सही कमी दागी और करप्ट रेलकर्मी पूरी करते रहते हैं। आरक्षण के नाम पर रोजाना लाखों यात्रियों की जेब रेलों में खुलेआम काटी जाती है क्या यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता? डकैती और लूटपाट या हत्या जैसे मामलों के लिए राज्यों का सहयोग रेल मंत्रालय को लेना ही होगा। लालू के कारण अब तक यही होता आया है कि हर राज्य सारा दोष रेल पुलिस पर डालता आ रहा था, अब लालू तो हैं नहीं फिर ऐसे में रेल सफर को ममतामयी और यादगार बनाने के वास्ते ममता को ढेरों पापड़ बेलने ही होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लालू समर्थकों की संख्या को बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

मंगलवार, 7 जुलाई 2009

पानी में डूबना और पानी को तरसना ही नियति

देशपाल सिंह पंवार
कन्याकुमारी से कश्मीर तक हमारे देश की बनावट ऐसी है कि साल दर साल अमूमन कुदरत की मार झेलता ही रहता है। ज्यादातर हिस्सा खेती के सहारे चलता है इस वजह से गरमी हो सर्दी या फिर बारिश किसान की हालत पतली ही रहती है। खासकर गरमी और बारिश से। तमाम विख्यात महानगर भी इससे बचे नहीं हैं। यूं तो सारा देश ही इस बार की गरमी में पेयजल को तरसता नजर आया लेकिन सपनों की नगरी मुंबई की हालत दूसरी ही है। वहां की जनता पानी में डूबती भी है और दो बूंद पानी को तरसती भी रहती है। चाहे पानी के अथाह सागर के किनारे ये शहर बसा हो, चारों ओर पानी हो, यहां की बरसात का भी कोई विश्वास ना हो लेकिन पानी के साथ रहने वाला हर शख्स जानता है कि यहां पानी की क्या कीमत है? दो दिन पहले बारिश से औद्योगिक नगरी जाम थी अब पानी को लेकर त्राहिमाम है। जिन झीलों से पानी की आपूर्ति होती थी वो बारिश की कमी से फुल हो नहीं पा रही हैं। सूखी ही रह जा रही हैं। स्थिति का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां पानी राशनिंग में भी कटौती हो गई है। मंगलवार से आपूर्ति 30 फीसदी तक घटा दी गई है। अगर पानी पर्याप्त मात्रा में रहता है तो रोजाना 3400 मिलियन लीटर पानी की आपूर्ति बीएमसी करता है लेकिन अब यह आंकड़ा तीन हजार मिलियन के नीचे पहुंच गया है। होटलों को स्विमिंग पूल के लिए पानी का खुद बंदोबस्त करने को कहा गया है। साथ ही चेतावनी दी गई है कि वे पानी को बर्बाद ना करें। मुंबई वासियों को तयशुदा घंटों में पानी मिल रहा है और वो भी इस हिदायत के साथ की वो किफायत बरतेंगे। महाराष्ट्र सरकार भी चिंतित है और पानी देना वाला महकमा भी, मानसून की रफ्तार ने सरकार की चाल और जनता के हाल बिगाड़ दिए हैं। पानी का धंधा करने वालों की पौबारह है लेकिन जिनकी जेब में पैसा नहीं है वे ऊपर वाले के सहारे जी रहे हैं। केंद्र सरकार ने मुंबई के ड्रेनेज सिस्टम को ठीक करने के वास्ते तो 300 करोड़ ज्यादा देने का प्रावधान आम बजट में कर दिया लेकिन पानी की किल्लत कैसे दूर होगी इसका इलाज अभी तक ना तो महाराष्ट्र सरकार ने तलाशा है और ना ही केंद्र सरकार ने। बीएमसी हो महाराष्ट्र सरकार दोनों ही बादलों को ताकते रहते हैं। शायद वहीं से इस आफत से राहत मिले। मिलेगी भी वहीं से लेकिन कब इसका पता किसी को नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कब तक यूं ही सारी जनता को आकाश ताकने के लिए मजबूर किया जाएगा? साल दर साल यह दिक्कत और बढ़ेगी ऐसे में कोई स्थाई हल क्यों नहीं निकाला जाता? आदमी बिना सड़क रह सकता है,चल सकता है लेकिन क्या हवा और पानी के बिना गुजारा है? प्यासी जनता के सब्र का ज्यादा इम्तिहान घातक हो सकता है। केंद्र सरकार को भी इस बार पेयजल संकट से सबक जरूर लेना चाहिए था पर ये हो ना सका।

रविवार, 5 जुलाई 2009

लेने या देने का दादा का इरादा


देशपाल सिंह पंवार

वेसे तो सौ दिन के एजेंडे और रेल बजट से सरकार की चाल के संकेत मिल रहे हैं पर आज जब प्रणब मुखर्जी का ब्रीफकेस खुलेगा तो ही पता चलेगा कि मनमोहन सरकार की नीतियां और प्राथमिकताएं आखिर क्या हैं? अटकलों के दौर जारी हैं। क्या है दादा का इरादा? क्या ये आम आदमी का बजट होगा? मंदी की मार झेल रही अर्थव्यवस्था को सुधारेगा या आम आदमी की सेहत और बिगाड़ेगा? रोजगार के दरवाजे फिर खुलेंगे? नौकरीपेशा की टेंशन कम होगी? बाजार में फिर रौनक लौटेगी? गरमी में ये ठंडक लेकर आएगा? गरीब-किसान-मजदूर का बेड़ा पार होगा? ऐसे तमाम सवाल हैं जो जनता के दिमाग में उठ रहे होंगे। ये सारे मसले बजट तैयार करते समय दादा के सामने भी रहे होंगे। समय कम मिला है फिर भी देश के इस सबसे ज्यादा अनुभ वी वित्त मंत्री के लिए यह जानना मुश्किल नहीं रहा होगा कि जनता क्या चाहती है? देश क्या चाहता है? जो हालात सामने हैं यही लगता है कि यह पापुलर नहीं पीपुलिस्ट बजट होगा। गांव और गरीबों पर ज्यादा ध्यान होगा। शहरी मध्यम वर्ग को झटका लगेगा। कुछ लोक हित के फैसले हो सकते हैं पर ज्यादा आस पालने की जरूरत नहीं है। मौके की नजाकत •भी यही है। देश की अर्थव्यवस्था को ताक पर रखकर शायद ही कोई फैसला हो। इसकी आस दादा से तो नहीं लगायी जा सकती। शायद इसी वजह से आम आदमी, शेयर बाजार और कारपोरेट सेक्टर इस बजट पर ज्यादा उत्सुक नजर नहीं आ रहा है। हो सकता है कोई जादू की छड़ी दादा घुमाने में कामयाब हो जाएं। वैसे देता वही है जिसके पास होता है। प्रणब दा के पास क्या है-पहले यह देखना होगा। जनता की परेशानी बढ़ती महंगाई है। युवाओं की परेशानी बढ़ती बेरोजगारी है। नौकरीपेशा की टेंशन घटती आय है। बाजार की परेशानी ग्राहक की जेब में पैसा नहीं है। वे सब आस में हैं। उधर बढ़ता राजस्व व वित्तीय घाटा और घटती विकास दर सरकार की सबसे बड़ी परेशानी बन गई है। विकास दर सात फीसदी तक लाने की जद्दोजहद चल रही है। केंद्र और राज्यों का घाटा मिलकर 10 फीसदी के पार चला गया है। सरकार की कमाई घट गई है। वैसे भी जब आमदनी के मुकाबले खर्चा एक सीमा को पार कर जाए तो या तो खर्चा घटाना होता है या जनता पर बोझ पड़ता है। सरकार के खर्चे घटाने के कोई संकेत या संदेश मिल नहीं रहे हैं। सीन वही है। ऐसे में हो सकता है कि बजट उतना अच्छा ना हो जितना बाजार समझता है। सरकार को पैसा चाहिए-कहां से आएगा-जाहिर सी बात जनता की जेब से। पूरे आसार हैं कि सेवा कर फिर 12 फीसदी हो जाएगा। 96 फीसदी देश में उत्पादित चीजों पर सेंट्रल वैट की दर 8 से 10 फीसदी होने के आसार हैं। यह भी डर है कि टैक्स पर नया सेस ( एजुकेशन के अलावा) लगा दिया जाएगा। इसे सोशल सेक्टर को मजबूती देने का तर्क कहा जाएगा। तय है बजट का जोर इसी सोशल सेक्टर और ढांचागत विकास पर होगा। गांव और गरीब के लिए योजनाओं का ऐलान होगा। मौजूदा योजनाओं का बजट बढ़ेगा। यूपीए ने अपने घोषणापत्र में ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में मजदूरी बढ़ाकर सौ रुपए करने का वादा किया था। लोगों को खाद्य सुरक्षा मुहैय्या कराने की बात की थी। रमन सरकार की तर्ज पर 3 रूपए किलो चावल देने की बात की थी। इसे पूरा करना ही होगा। इस पर 30 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च होगा। कहां से आएगा-सोचना होगा। बस देखना यही है कि यह पूरे देश में एक साथ होता है या धीरे-धीरे। सीधे दिया जाएगा या टिकट के जरिए। साथ ही साथ शिक्षा, सड़क, बिजली,पानी और सेहत को सुधारने की बात की जाएगी। आयकर समेत अन्य डायरेक्ट करों पर वित्त मंत्रालय उदार नजरिया दखाने के मूड में लग रहा है। दादा की झोली से अगर सबसे ज्यादा कुछ मिल सकता है तो वह है हाऊसिंग लोन पर मिलने वाली टैक्स छूट। वह बढ़ सकती है। इसे डेढ़ लाख से बढ़ाकर ढाई लाख करने के आसार हैं। ज्यादा मेहरबान रहे तो मुख्य धन पर 80 सीसी की लिमिट बढ़ा सकते हैं। इससे बचत और निवेश दोनों बढ़ेंगे। अगर ऐसा हुआ तो नौकरीपेशा तबके की वाहवाही जरूर दादा लूट लेंगे। अगर नहीं हुआ तो फिर वही पुराना कोसने का दौर चलेगा। इसी तरह फ्रिंज बेनिफिट और अप्रत्यक्ष करों की भी समीक्षा जरूर की गयी होगी। सरकार की मंशा चमड़ा, रत्न, कपड़ा और उन सभी सेक्टरों को तवज्जों देने की भी लग रही है जो मंदी से ज्यादा चौपट हुए हैं। रोजगार खत्म हुए हैं। सरकार के सामने इस समय चुनौती मंदी से निपटने, महंगाई पर नियत्रंण पाने,रोजगार के अवसर पैदा करने, बाजार को उबारने, आम आदमी की आमदनी बढ़ाने और विकास का पैसा सही स्थान पर ज्यादा लगाने की हैं। जहां तक महंगाई का सवाल है तो बजट से ऐन पहले जिस तरह तेल के दाम बढ़ाए हैं उससे तो नहीं लगता कि सरकार की राह सही है? मुद्रा स्फीति की दर एक के नीचे पहुंच गई है। हर चीज के दाम पहले ही आसमान पर हैं। अब बजट के बाद रही-सही कसर और पूरी हो जाएगी। आम आदमी की थाली और पेट खाली रहना तय है? वैट बढ़ाने से महंगाई दर और बढ़ेगी। लाख टके का सवाल यही है कि ऐसे में मनमोहन सरकार किस मुंह से आम आदमी की सरकार का दावा करती है? यह भी अजीब विडंबना है कि सरकार महंगाई को थोक सूचकांक से नापती है और जनता फुटकर से लेती है। दोनों में जमीन आसमान का अंतर । इसी वजह से सरकार को नहीं पता चलता कि जनता किस हाल में है? इसे बदलने की जरूरत है। प्रणब दा शेयर बाजार सूचकांक के बल पर सोचते और बोलते आ रहे है कि मंदी का भरत पर ज्यादा असर नहीं है। वो मजबूत है। लेकिन सवाल यही पैदा होता है कि शेयर बाजार से कितनी फीसदी जनता का सीधा वास्ता है? क्या वो सही तस्वीर दिखा सकता है? बजट से पता चलेगा कि वे मन रखने के लिए कह रहे थे या हकीकत में स्थिति ज्यादा खराब है। अगर वो कड़वे फैसले लेते हैं तो साफ है कि उनके पहले के कथन सच नहीं थे। यही उनकी अग्निपरीक्षा है कि वे देश को ग्रोथ की दिशा में लेकर जाएं। रोजगार के अवसर पैदा करें। जनता को खजाना फुल करने की मशीन की तरह ना इस्तेमाल किया जाए। इसमें कोई दो राय नहीं कि दादा चिदंबरम की तरह कर छूट देकर दूसरे रास्ते से वसूलने की कला में माहिर नहीं हैं पर उनके पास बाजार से धन उगाहने का विनिवेश मंत्र है। इसे इस्तेमाल करने से वे शायद ही चूकें। इससे बाजार को थोड़ी आस तो बंधती ही है। सब दादा से 82 जैसे बजट की आस लगाकर चल रहे हैं जब उन्होंने सारी दुनिया की वाहवाही लूटी थी। उस वक्त उन्हें तजुर्बा भी नहीं था। अब तो वो दादा हैं। सबका हित जरूर करेंगे।

शनिवार, 4 जुलाई 2009

ममता एक्सप्रेस-सुहाना सफर




देशपाल सिंह पंवार
राजनीति का दायरा बढ़ा है। देश नेताओं से अटा पड़ा है पर मानना पड़ेगा कि ममता की बात ही अलग है। तमाम कट्टर विरोधी भी मानते हैं कि वो दूसरों से अलग है। जो नहीं मानते वो इस रेल बजट के बाद मानने लगेंगे। जैसा नाम-वैसा काम। गरीब जनता का ख्याल दिल में है। जिद केरेक्टर में कूट-कूटकर है। शायद यही एक कारण है कि वो जो चाहती हैं, कर गुजरती हैं। अगर नहीं कर पाती तो सब कुछ छोड़कर जनहित की अपनी पुरानी राह पर फिर अकेली निकल पड़ती हैं। उनका इतिहास ऐसा ही है। उनका नाम ऐसा ही है। वो अपने नाम और जनता के काम के हिसाब से ही चलती हैं। किसी को पसंद आए तो ठीक-ना पसंद आए तो उनकी सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। वो जनता को बरगलाने के वादे नहीं करतीं। जन्मजात उनकी नेचर ही ऐसी है जिससे वादे नहीं करने के इरादे झलकते हैं। चाहे ममता ने तीसरी बार रेल बजट पेश किया हो, सबसे कम 15 दिन का समय मिला हो इसके बावजूद इस रेल बजट पर ममता की छाप है। लालू आंकड़ों की बाजीगरी से सुपरहिट खजाना शो दिखाते थे। जनता को बरगलाते थे। चालाकी से जेब काटते थे। फिर उस पर इतराते थे। ताली बजवाते थे। उनके लिए खजाना और रेलवे का मुनाफा नंबर एक पर था। ममता के लिए जनता पहले है और रेल बाद में। समय की कमी के बावजूद उनकी घोषणाएं बताती हैं कि वे जनता की चाह को भी जानती हैं और रेलवे की थाह को भी, यात्रियों से उन्होंने लिया कुछ नहीं। हां दिया बहुत कुछ है। वो भी जो लालू ने छीना था, वो भी जो जनता चाह रही थी। साथ ही ये एहसास भी कराया है कि रेलवे आपकी है। आपके साथ है। चर्चा चाहे लालू माडल की हो रही हो पर बजट साफ-साफ दर्शा रहा है कि ममता के रहते रेल लालू (धन) की लाइन पर नहीं दौड़ सकती उसे जनता एक्सप्रेस बनना ही होगा। ऐलान के मुताबिक इसे सीधा सादा जनता का रेल बजट भी कह सकते हैं और ड्रीम भी, इस पर लालू प्रसाद को ऐतराज हो सकता है। मनमोहन सरकार में बैठे तमाम दिग्गजों को जलन हो सकती है। पर इसमें कोई दो राय नहीं कि युवाओं, महिलाओं और मजदूरों का दिल ममता ने और जीत लिया है। इसके दबाव में अब प्रणव दा भी जरूर रहेंगे और प्रधानमंत्री भी, वैसे अजीब स्थिति है एक तरफ मनमोहन सरकार के खजाना और तेल मंत्री जन पर घन चला रहे हैं। दूसरी ओर रेल मंत्री जन के मन को अपना बना रहीं हैं। यानि कोई लुटता है, ममता लुटाती हैं। यानि सरकार एक और एजेंडे अलग-अलग। सरकार के दो चेहरे। दूसरे मंत्रियों की तरह ममता का कोई सौ दिन का एजेंडा नहीं है। वे ना किसी दबाव में हैं। घोषणाओं से साफ झलकता है। वे जानती हैं जनता को क्या चाहिए? सबको क्या चाहिए?-रेल किराया नहीं बढ़ाया। तत्काल के झंझट और सीटों के संकट को निपटा डाला। चार्ज अब 100 और मियाद बस दो दिन। डाकघरों से आसानी से टिकट मिलेंगे। मोबाइल वैन भी इसके लिए दौडेंगी। रेल स्टेशनों पर लाइनें नहीं लगेंगी। गरीबों के लिए इज्जत स्कीम के तहत मात्र 25 रुपए के पास पर सौ किमी की यात्रा की सुविधा। छात्रों और पत्रकारों को भी विशेष छूट। युवा ट्रेन चलाने का फैसला। स्टेशनों पर जनता खाना। 57 नई ट्रेनें चलेंगी। महिलाओं के लिए भी ट्रेन चलेगी। 12 ट्रेन ऐसी होंगी जो कहीं नहीं रूकेंगी। 50 स्टेशन विश्वस्तरीय बनेंगे। 375 को माडल स्टेशन बनाया जाएगा। रेलवे की जमीन पर नर्सिंग कालेज और बाजार खुलेंगे। इंटरसिटी रेलों में भी एसी कोच होंगे। लंबी दूरी की रेलों में डाक्टर भी होंगे और मनोरंजन तथा दूरसंचार के साधन भी, साथ ही रेलों में सुरक्षा के लिए भी तमाम फैसले किए गए हैं। कमांडो बटालियन होगी। महिलाओं की सुरक्षा के लिए महिला सुरक्षाकर्मी तैनात होंगे। रेलवे की विवादास्पद रोजगार पालिसी की समीक्षा ताकि पिछड़ों का ज्यादा रोजगार दिया जा सके। धंधा करने वालों का भी ध्यान रखा गया है। कोई माल किराया नहीं बढ़ाया गया है। बल्कि मालगाड़ियां और बढ़ाई जाएंगी ताकि आसानी से और जल्दी माल इधर से उधर पहुंच सके। बंगाल में डिब्बों की एक और फैक्ट्री खुलेगी। स्टेशनों पर एटीएम खुलेंगे। स्टेशनों की कायापलट के लिए निजी क्षेत्र को साझीदार बनाया जाएगा। रेल कर्मचारियों के लिए 6650 मकान बनेंगे। सारे देश में रेल का जाल बिछाया जाएगा। उम्दा बनाया जाएगा। ट्रेनों को समय पर चलाया जाएगा। इसके अलावा भी तमाम ऐसी घोषणाएं हैं जो साफ बताती हैं कि ममता की जनता एक्सप्रेस सही राह पर दौड़ेगी। हाईटैक बनेगी। कमाएगी भी और सबका ध्यान भी रखेगी। रेलवे भले ही लालू फोबिया के तले चलती रही हो पर ममता ने इसकी परवाह नहीं की। एक भी उन्होंने लालू को तरजीह नहीं दी। हां आदत के मुताबिक लालू की टोका टाकी जारी रही। नोंकझोंक भी हुई। यह आगे भी चलेगी। लालू चुप बैठने वाले नहीं और ममता झुकने वाली नहीं। इस बजट ने यह भी साफ कर दिया है कि आंकड़ों में लालू ने कहीं न कहीं बाजीगरी तो की है। लालू जो मुनाफा दिखाते रहे हैं ममता के आंकड़े कुछ और ही कह रहे हैं। रेलवे के पास अब 12 हजार करोड़ से ज्यादा का ही धन है। जनता को दूध का दूध और पानी का पानी नजर आए इसके लिए ममता पांच साल के कार्यकाल पर श्वेत पत्र जारी करेंगी। तस्वीर सामने होगी। लालू का सिरदर्द और बढ़ने वाला है। शायद उनकी झल्लाहट का यह भी कारण हो। यूं तो अब तक जितने रेल मंत्री हुए हैं अमूमन सबने अपने राज्यों की लाटरी निकाली है। दिया बंगाल को ममता ने भी है पर आंख बंद करके नहीं। किसी को इस पर ऐतराज नहीं होगा। हां इस बात में कहीं न कहीं ममता भी चूक गई हैं कि वो सब राज्यों के साथ न्याय नहीं कर पाईं। चाहे छत्तीसगढ़ हो या हरियाणा। चाहे महाराष्ट्र हो या कर्नाटक। ऐसे तमाम राज्य कम से कम ममता से ज्यादा आस कर रहे थे। जहां तक बिहार का सवाल है तो पिछले 15 साल में ज्यादातर बिहार से ही कोई ना कोई रेलमंत्री बनता था इसी वजह से वहां के लिए सारी सुविधाओं के दरवाजे खुले रहते थे। वो वीआईपी राज्य रहा है पर इस बार मनमोहन सरकार में एक भी मंत्री नहीं है। लालू इसे मुद्दा बनाने की कोशिश जरूर करेंगे। इससे ममता को निपटना ही होगा। वैसे प्रधानमंत्री समेत सारे सत्ता पक्ष ने इसे शानदार बजट कहा है। उनकी तरफ से इसकी ही उम्मीद थी। हां विपक्षी दल बीजेपी के अध्यक्ष राजनाथ सिंह की टिप्पणी काबिले गौर है। वे कहते हैं कि बजट में जो वादे किए गए हैं वे पूरे हों तभी इसे अच्छा कहा जाएगा। यानि वादें अच्छे हैं ये वो भी मानते हैं। असल में ममता की यही अग्निपरीक्षा भी होगी। घोषणाएं सुनने में अच्छी लग रही हैं। जनता उन्हें देखना भी चाहती है। तभी माटी मानुष की थीम की बीम पड़ेगी।

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

तेल का खेल-जनतंत्र फेल




देशपाल सिंह पंवार
या तो सरकार चलाने वालों का कदापि खेती से कोई वास्ता नहीं रहा,या फिर उनकी नजर में खेती, किसान और मजदूर का कोई वजूद नहीं। हो सकता है सत्ता में आने के बाद वो ये •भी भूल गई हो कि इस देश की 80 फीसदी आबादी खेती पर जिंदा है। हो सकता है उसे ये भी मालूम नहीं हो कि पेट्रोल और डीजल अगर महंगा होता है तो गरीब का निवाला घटता है। अगर उसका वास्ता होता,उसे पता होता तो तेल के दाम कम से कम इस समय तो नहीं बढ़ाती। इतने तो नहीं बढ़ाती। जिस देश के किसान को पहले ही मानसून की देरी ने तोड़ डाला हो। खेत सूखे पड़े हों। पिछला कर्जा चुका ना पा रहा हो।अगली फसल बो नहीं पा रहा हो। रोज आकाश को ताकते-ताकते थक गया हो। उसकी पुकार को क्या मिली-मार? जिस देश की जनता मंदी की मार झेल रही हो, मजदूर दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में पिस रहा हो उसे इस तरह के तोहफे(?) इस अंदाज में देने वाली सरकार को क्या जन हितैषी सरकार कहा जा सकता है? क्या यही जनता का राज है? सत्ता का ये चरित्र और चेहरा तो ऐसा ना मानने के लिए विवश कर रहा है। महीने भर से कहानी बनाई जा रही थी। कहा जा रहा था कि इंटरनेशनल मार्केट में तेल के दाम बढ़ रहे हैं। कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है। उन्हें ही दाम तय करने की छूट मिलेगी- यानि तेल महंगा होगा। महंगा तो जून के पहले हफ्ते में ही हो जाता शुक्र मनाइए मानसून दगा दे गया। उसकी देरी और हल्ले के डर से 15-20 दिन निकल गए। जैसे ही दो बूंद पड़ी, सरकार महीनों से सोची राह पर चल पड़ी। ये भी नहीं सोचा और देखा कि अब तक देश के आधे से ज्यादा हिस्से में दो बूंद भी नहीं पड़ी। पर उसे क्या? वो जहां बैठकर जिनके फायदे के फैसले करती है वहां बारिश पिकनिक का एहसास कराती है। अजीब विडंबना है जिसके सहारे राजनेता गद्दी पर जाते हैं सबसे पहले उसे ही औकात दिखाते हैं। मनमोहन सरकार भी इसी राह पर है। उसे तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे की बैलेंस शीट नजर आ रही है लेकिन सूखे खेत,जनता के प्यासे होंठ, सूखे पेट,करोड़ों बेरोजगारों की लाइन दिखाई नहीं देती। रसोई गैस और मिट्टी के तेल पर सरकार ने रहमोकरम दिखाया और दाम ना बढ़ाने की बात को गर्व से बताया। क्या सरकार ने ये जानने की कोशिश की है कि कितने गरीबों को मिट्टी का तेल बिना ब्लैक नसीब हो पाता है? रसोई गैस का सबसे ज्यादा उपयोग करने वाली कौम कौन सी है? सरकार ने दाम बढ़ाने का ये समय जानबूझकर चुना है। वो जानती थी कि संसद में हंगामा होगा। हंगामे के बाद थोड़ा बहुत दाम घटा दिया जाएगा। इस बार भी ऐसा ही होगा। तेल कंपनियां भी खुश-सरकार भी खुश-विपक्ष भी खुश। बाकी जनता....। वो पेट नहीं खजाना पाटने के लिए है। पिसने के लिए है। लोकतंत्र में यही है धनतंत्र की चाल।

नहीं बदला सत्ता का चेहरा और चरित्र



देशपाल सिंह पंवार
धूमिल ने लिखा था-एक आदमी रोटी बेलता है। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है जो ना रोटी बेलता है,ना रोटी खाता है वो सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं वो तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। ये सिर्फ शब्द नहीं हैं। सत्ता के उस चेहरे का आईना थे और हैं जो बाहर से सुंदर और अंदर से बदसूरत नजर आता था और आज भी आता है। एक बार झांकने के बाद ना तो किसी में देखने की इच्छा बचेगी ना ही हिम्मत। अभी ज्यादा अरसा नहीं बीता है जब राहुल गांधी हर गली,हर शहर और हर जगह यही कह रहे थे कि मैं तस्वीर बदलना चाहता हूं, मेरा साथ दो। जनता ने विश्वास भी किया। हाथ का साथ भी दिया पर अफसोस तस्वीर बदलने के आसार नहीं दिख रहे हैं। माना की जमीन पर बदलाव में वक्त लगता है,सरकार को मिलना भी चाहिए लेकिन यहां तो सवाल इंसान के आचार और विचार की खराबी का है। वादे के मुताबिक उसे बदलने में वक्त क्यों लगे और क्यों सरकार को चाहिए? क्या ऐसे मामलों में भी चुप्पी सही है? सत्ता के नशे में चूर एक केंद्रीय मंत्री जज को धमकाता है। एक कांग्रेसी सांसद बैंक मैनेजर को मारता है। एक पुलिस अफसर महिला की इज्जत उतारता है। एक बाबू हर सही काम के लिए गरीब से रिश्वत खाता है। ये तो वो मामले हैं जो सामने हैं इसके अलावा ना जाने कितने ऐसे और इससे भी घटिया कुकर्म कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर घड़ी हो रहे होंगे। उनमें डरे-दबे-कुचले लोग हर घड़ी असहाय होने का रोग झेल रहे होंगे। आखिर ऐसा क्यों होता है? कौन हैं इनके लिए जिम्मेदार? कौन देगा इनका जवाब? कौन करेगा इसे ठीक? आखिर सत्ता का चेहरा और चरित्र क्यों नहीं बदलता? सरकार की आखिर यह कौन सी मजबूरी है कि वह ऐसे किसी मामले में सरकारी मुलाजिम पर तो निलंबन की गाज गिरा देती है लेकिन जैसे ही माननीय जनप्रतिनिधियों की बारी आती है उसकी आंखें बंद नजर आती हैं और मुंह से बोल नहीं निकलता। खासकर तब जब कोई अपना सामने हो तो फिर सारे मामलों में विरोधियों का खेल नजर आने लगता है। अगर देश में एक समान कानून है और जनप्रतिनिधियों के लिए अलग से आचार संहिता है तो उसका पालन क्यों नहीं होता? सरकार उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करती? राहुल गांधी जैसे युवा और प्रगतिशील विचारों के शख्स के हाथों में अगर अघोषित रूप से कांग्रेस की बागडोर है तो फिर हर कांग्रेसी को आखिरी हद का एहसास क्यों नहीं कराया जाता? कड़ी कार्रवाई का संदेश क्यों नहीं जाता? मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री के रहते किसी दागी चेहरे के बचाव में नहीं उसके खिलाफ कार्रवाई का सरकार का चेहरा जनता के सामने दिखना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह हुकूमत भी हाथी के दांत की तरह कहलाएगी। अरसे बाद जनता में जो विश्वास जगा है वो अगर इस बार डिगा या टूटा तो यह कांग्रेस के लिए भी खतरनाक होगा, राजनीति के लिए भी और इस देश के लिए भी.

मंगलवार, 30 जून 2009

लालगढ़ का असली मर्ज


देशपाल सिंह पंवार

सुरक्षाबलों ने लालगढ़ खाली करा लिया है। सरकार ने ऐलान कर दिया है कि मिशन लालगढ़ पूरा हो गया है। माओवादियों की किलेबंदी ढह गई है। सब खुश हैं सरकार की ओर से ये जताया जा रहा है। दिखाया जा रहा है। सवाल यही उठता है कि क्या वास्तव में आपरेशन लालगढ़ पूरा हो गया है? किसी इलाके को खाली कराने मात्र से आपरेशन को पूरा मान लिया जाए? यह इलाका अब शांत रहेगा इसकी क्या गारंटी है? अगर गारंटी दी जा सकती है तो सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या वास्तव में यहां माओवादियों का राज था? कहीं यह सारा आपरेशन उद्योगपतियों को जमीन दिलाने के वास्ते निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ तो नहीं था। जिस तरह बिना किसी खून खराबे के सुरक्षा बल हर रोज आगे बढ़ते रहे और माओवादियों के खिसकने की खबरें आती रहीं उससे तो यही लगता है कि परदे के पीछे की कहानी कुछ ऐसी ही है। हो सकता है ऐसा ना हो हां अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर लोकतंत्र और जनतंत्र के लिए इससे ज्यादा दुखदायी और शर्मनाक अध्याय कोई दूसरा नहीं हो सकता। ऐसे में सारे देश को अंधेरे में रखने के गुनाह से बंगाल सरकार नहीं बच सकती। केंद्र सरकार को इसकी गहराई से जांच करानी चाहिए। सुरक्षा बलों को लीड कर रहे अफसरों और जवानों से बेहतर इस बारे में कोई नहीं बता सकता कि आखिर कड़वा सच क्या है? सिंगूर प्रकरण की हार से तिलमिलाई बंगाल सरकार ने अगर आसानी से जमीन दिलाने के वास्ते ये सारा खेल खेला तो फिर सिंगुर जनआंदोलन को सही और लालगढ़ आंदोलन को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी होगा। आपरेशन पूरा होने के बाद अगर यहां शांति की गारंटी नहीं दी जा सकती तो फिर कैसे मान लिया जाए कि आपरेशन पूरा हो गया है? हकीकत यही है कि इलाका खाली हुआ है। शांत नहीं। शांति तब होगी जब सरकार उस तह तक पहुंच जाएगी जिसकी वजह से ऐसे देश विरोधी हालात बने। उन समस्याओं का निदान भी होगा, विकास भी करना होगा,साथ ही यह अहसास भी कराना होगा कि सरकार आपकी है। आपके साथ है। देश आपका है। आपके हाथ ही उसे मजबूत करेंगे। जल,जंगल और जमीन को खोने वाली कौम के सामने जब जान के लाले पड़ जाते हैं तो वहीं से अविश्वास का पेड़ उग आता है। ये हालात बन आते हैं। जिस दिन सरकार इन लोगों के साथ खड़ी नजर आएगी तो ये माओवादियों की बजाय जनता नजर आएगी। जनता को भी चाहिए कि वो लोकतंत्र में मिले अधिकारों के प्रति जागरूक हो, ना कि बरगलाने और खून खराबा कराने वाली देश और विकास विरोधी ताकतों के पीछे खड़ी नजर आए। किसी भी समस्या का समाधान कभी हथियारों से नहीं हुआ। लालगढ़ या ऐसे ही किसी दूसरे गढ़ में भी नहीं हो सकता। केंद्र सरकार का आपरेशन तभी पूरा होगा जब वो मर्ज को जड़ से खत्म करेगी। वरना ऐसे तमाम लालगढ़ या तो पैदा हो गए हैं या तैयारी कर रहे हैं। प्रतिबंध जैसे कदमों से कुछ नहीं होता क्योंकि पाबंदी का असर उन पर होता है जो सरकार के अधीन हों। सरकार को उन कारकों को रोकना होगा जो लालगढ़ बना रहे हैं।

सोमवार, 29 जून 2009

समलैंगिकता-घनघोर अनैतिकता



देशपाल सिंह पंवार
दूसरी पारी में मनमोहन सरकार कुछ ज्यादा ही जल्दी में है। देश का हर मर्ज सौ दिन में खत्म करना चाहती है। ऐसा कर पाएगी इसके आसार तो बिल्कुल नहीं हैं हां हड़बड़ी में की जा रही घोषणाओं से नई गड़बड़ियां और मर्ज अलग से पैदा होने लगे हैं। यानि गए थे हरिभजन को और ओटन लगे कपास। शिक्षा के मुद्दे पर देश पहले से ही गरम था रही-सही कसर समलैंगिकता को कानूनी अमली जामा पहनाने की मंशा ने पूरी कर दी है। मनमोहन सरकार उस धारा 377 को खत्म करना चाहती है जिसे चंद साल पहले तक कोई नहीं जानता था। वकील तक नहीं। कोई जानता था तो इस पर बात करना नहीं चाहता था। कारण-इस पर सोचना और बोलना गंदा माना जाता था। यह भी हकीकत है कि ऐसे रिश्तों की वकालत करने वाले चाहे परदे के पीछे से कितना भी बोलते रहे हों और जायज ठहराने की कोशिश में लगे रहे हों लेकिन वे भी अपनी पहचान छिपाने पर ज्यादा जोर देते थे। अचानक सरकार को पता नहीं क्या सूझी कि वो इस धारा को खत्म करने की सोचने भी लगी और बोलने भी लगी। नतीजा घर तक में पहचान छिपाने वालों ने रविवार को दिल्ली की सड़कों को पाट दिया। ऐतिहासिक कल्चर के इस देश में ऐसा नंगा नाच ना तो कदापि किसी ने सुना और ना ही देखा। ना जाने इस कलयुग में और क्या -क्या देखना बाकी है? इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको आजादी है, पर इस आजादी का यह मतलब नहीं कि जिसकी जो मनमर्जी हो वो करने लगे। सेक्स से जुड़ीं हर बातें परदे के पीछे ही बेहतर रहती हैं लेकिन समलैंगिकता को परदे के पीछे तक जायज नहीं ठहराया जा सकता। लाख टके का सवाल यही है कि जिस देश में मंदी, गरीबी, बेरोजगारी, करप्शन, आतंकवाद, नक्सलवाद, अशिक्षा और दो वक्त की रोटी के जुगाड़ जैसे हजारों मुद्दे जनता तथा देश को निगलते जा रहे हों वहां की सरकार को क्या करना चाहिए? इन मुद्दों के खिलाफ जंग लड़नी चाहिए या नैतिक मूल्यों के पतन की राह खोलनी चाहिए? जिस सर्वशक्तिमान ने इस संसार की रचना की है, उसने आदमी और औरत को इन रिश्तों के लिए बनाया है,क्या उसकी बनाई रीत को बिगाड़ने का ठेका अब सरकार ने ले लिया है? आदमी का आदमी से रिश्ता और औरत का औरत से रिश्ता आखिर इससे घटिया सोच और क्या हो सकती है? वैसे भी इतिहास इस बात का गवाह है कि प्रकृति समेत उसकी जिस भी धारा को मोड़ने की इंसान ने कोशिश की उसका खामियाजा उठाना पड़ा। वह चाहे पानी का मसला हो या पर्यावरण का। सारे संकट और थपेड़े झेलने के बाद भी क्या हमारी आंख नहीं खुली? जिस पश्चिमी कल्चर की राह पर ये पीढ़ी जाना चाहती है क्या उन देशों के हश्र दिखाई नहीं देते? खैर वे देश जहां जाना चाहें जाएँ पर कम से कम हिंदुस्तान जैसे देश में इस तरह के रिश्तों के लिए ना तो कोई जगह थी, ना है और ना ही होनी चाहिए। हमारा देश आज तक सारी दुनिया को संस्कार-परिवार तथा प्यार का पहाड़ा पढ़ाता आया है क्या अब हमें उससे सीखने को यही एक घिनौना रास्ता मिला था। एक अरब से ज्यादा की आबादी में अगर उंगलियों पर गिने जाने लायक चेहरे इस गलत पर राह पर चले गए हैं तो उनके स्व हितों के लिए पूरे देश के सामाजिक ढांचे को कुर्बान नहीं किया जा सकता। इस तबके की अगर मति मारी गई थी तो सरकार को तो कम से कम दिमाग से काम लेना चाहिए था। आखिर वो क्यों इस तबके की सोच की तरह व्यवहार कर रही है? यह बात किसी के गले नहीं उतरने वाली। किसी भी धर्म के-किसी भी समाज के और किसी भी स्वस्थ मानसिकता के व्यक्ति के। सरकार की इस सोच पर अगर इतना विवाद खड़ा हो गया है तो सोचिए फैसला करने के बाद क्या होगा? फिलहाल हर धर्म के विद्वान भी खफा हैं और साथ ही हर धर्म को मानने वाली ज्यादातर आबादी भी, इन सिरफिरी अतृप्त, कुंठित मानसिकताओं वालों को छोड़कर। यह संवेदनशील मसले से ज्यादा पतनशील रास्ता है, अगर यह वैधानिक हुआ तो फिर घर, परिवार, समाज, राज्य और देश का क्या होगा ये फैसला लेने वालों को सोचना ही होगा। इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा कि ऐसी सोच को खत्म करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए पर सरकार इसे बढ़ावा देने पर तुली है। लोकतंत्र में विचारों की आजादी का ये मतलब तो नहीं था कि इश्मत चुगाई की कहानी लिहाफ के अंदर से सड़कों पर खुले आम पढ़ी-देखी और बोली जाने लगे? उस समय अंग्रेज हुकूमत ने अगर इस पर मुकदमा ठोंक दिया था तो फिर मनमोहन सरकार साथ में खड़ी क्यों नजर आती है? क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि अंग्रेजों को इंडियन समाज की ज्यादा चिंता थी? हो सकता है कि ऐसे बिगड़ी मानसिकता के चेहरे कदापि ना सुधरें पर कम से कम मनमोहन सरकार तो अपनी सोच सुधार सकती है। उसकी जिम्मेदारी देश को बेहतर चलाने की है। उसे देश को ऐसे रास्ते पर नहीं ले जाना चाहिए जो सिर्फ बर्बादी का है। ऐसा हुआ तो क्या इसे छक्कों की सरकार पुकारना गलत होगा?

शनिवार, 27 जून 2009

युवराज का राज



देशपाल सिंह पंवार
टीम इंडिया फिर क्रिकेट के मैदान में है। वेस्टइंडीज के खिलाफ उसी धरती पर चार वन डे मैच खेलेगी। युवराज और नेहरा की वजह से पहला वनडे जीत चुकी है। कोई दौरा हो और क्रिकेट प्रेमी उसके लिए उत्साहित ना हों ऐसा अमूमन कभी इंडियन क्रिकेट में हुआ नहीं है। लेकिन इस बार ऐसा ही है। लुटी-पिटी धोनी की टीम में चाहे नकली जोश हो, लेकिन क्रिकेट प्रेमियों में ना इस दौरे की कोई चर्चा है और ना ही टीम से बहुत ज्यादा उम्मीदें। युवराज छक्के जड़ें या धोनी शतक लगाएं या फिर सरदार विकेट की झड़ी लगाएं, क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में वाह-वाह की फीलिंग हिलौरे नहीं लेने वाली। इसमें हैरत की भी कोई बात नहीं है। टी-20 में सेमीफाइनल से पहले ही जिस तरह टीम इंडिया ने घुटने टेके उस वजह से क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में नाउम्मीदी या निराशा इस कदर ला दी है कि वे अब इस टीम से बहुत ज्यादा आस नहीं कर रहे हैं। ये सारे खिलाड़ी अब कागजी शेर ही नजर आते हैं। वेस्टइंडीज दौरे पर टीम इंडिया की जीत भी उस निराशा को दूर नहीं कर सकती। हां हार इस निराशा को और बढ़ा जरूर सकती है। इंडियन क्रिकेट और कंपनियों के लिए यह निराशा आने वाले समय में घातक साबित हो सकती है। अगर टीम इंडिया टी-20 में फिर खिताब जीत जाती या फाइट करने के बाद हारती तो इस दौरे का महत्व काफी ज्यादा होता। साथ ही इस दौरे के प्रति इसलिए भी दर्शकों में ज्यादा जोश नहीं है क्योंकि सचिन, सहवाग और जहीर जैसे खिलाड़ी इस टूर पर नहीं हैं। सचिन की उम्र भले ही ढल गई हो लेकिन आज भी सब उसे खेलते देखना चाहते हैं। ऐसे में खुद सचिन और इंडियन बोर्ड को चाहिए कि वे क्रिकेट की सभी फोरम में फिट रहने पर सचिन को जरूर टीम में रखें और सचिन उनमें फिर पुरानी रंगत दिखाएं। इस स्टार की गैरमौजूदगी नकारात्मक असर छोड़ती है इस बात को क्रिकेट चलाने वालों को मान लेना चाहिए। वैसे भी वेस्टइंडीज दौरे के मैच देर रात खत्म होते हैं तब भी दर्शक टी वी से चिपके रहते पर इस बार इसके आसार ना के बराबर हैं। कम से कम इस समय इन क्रिकेटरों का खेल (?) देखने के लिए कोई अपनी नींद खराब नहीं करना चाहता। सीरिज प्रायोजित करने वाली कंपनियों को इसका डर सता भी रहा है। इस सीरिज का महत्व बस इतना सा ही माना जा रहा है कि धोनी इलेविन लगे दाग को थोड़ा साफ करने में कामयाब हो। सवाल यही उठता है कि क्या होगा? धोनी के अलावा युवराज, सरदार जैसे खिलाड़ी ही वेस्टइंडीज के विकटों पर खेले हैं बाकी ज्यादातर क्रिकेटर वहां की पिचों से वाकिफ नहीं हैं। वेस्टइंडीज के कप्तान गेल अगर ये मानते हैं कि इंडिया को हराना कदापि आसान नहीं होता तो यह भी कटु सत्य है कि वेस्टइंडीज की टीम कितनी भी कमजोर हो, घरेलू मैदानों पर उन्हें मात देना हर टीम के लिए मुश्किल होता है। आफ स्पिनर का रोल महत्वपूर्ण होगा, ऐसे में सरदार पर करिश्मे का सबसे बड़ा दारोमदार होगा। धोनी को रन बनाने ही होंगे वरना हर कोई यह मान चुका है कि वो बल्ला चलाना भूल चुका है। अगर चारों मैच इंडिया जीतता है तो शायद इस फार्मेट में कुछ इज्जत बची रहे। ऐसा आसान नहीं। यह तय है। हां युवराज ऐसी फार्म में हैं कि इस समय किसी गेंदबाज को धो सकते हैं। वही प्रेमियों को इस निराशा से उबार सकते हैं।

होमवर्क में सिब्बल कमजोर




देशपाल सिंह पंवार
आजकल देश में ना तो नौकरी का दौर है। ना ही बजट पर जोर है। ना ही घटा घनघोर है। अगर किसी बात का शोर है तो वो है बस पढ़ाई। जिसकी चर्चा पुरजोर है। कपिल सिब्बल एंड पार्टी उत्साह में सराबोर है। विरोधी फैसले से बोर हैं। हों भी क्यों नहीं। सोनिया और मनमोहन का सौ दिन का एजेंडा है। मंत्रियों पर नतीजों के दबाव का डंडा है। ऐसे में हर मंत्री का अपना-अपना फंडा है। हर किसी के हाथ में झंडा है। बिना सोचे समझे ऐलान किए जा रहे हैं जाहिर सी बात है घमासान तो होंगे ही। मानव संसाधन मंत्री ने सबको पीछे छोड़ दिया है। आजादी के बाद 62 साल में जो काम नहीं हो पाया वो 62 दिन में करना चाहते हैं। काम भी ऐसा जो ना केवल मुश्किल है पर नामुमकिन भी दिखता है। कपिल सिब्बल चाहते हैं कि दसवीं का बोर्ड ही ना रहे यानि दसवीं की परीक्षा बोर्ड की ना हो। उनकी मंशा देश में एक ही बोर्ड, एक ही तरह की शिक्षा और कोर्स रखने की है। वो स्कूली पढ़ाई-लिखाई में कायापलट करना चाहते हैं। विदेशी पूंजी निवेश के लिए इसके दरवाजे खोलना चाहते हैं। 50 करोड़ से ज्यादा की युवा पीढ़ी को स्तरीय शिक्षा देने की उनकी मंशा है। प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने का उनका 34 सूत्री फार्मूला है। वे मानते हैं कि इसे एक-एक कर वो लागू जरूर करेंगे। सारे नीतिगत और प्रशासनिक कदम उठाएंगे। चाहे जो हो जाए वे इसे लागू करके रहेंगे। इसके पीछे उनके अपने तर्क भी हैं। उनकी नजर में 10 वीं बोर्ड परीक्षा की वजह से छात्र भी तनाव में रहते हैं और उनके मां-बाप भी,जब 12 वीं परीक्षा बोर्ड की है ही तो फिर 10 वीं की क्या जरूरत? इस तरह छात्रों और मां-बाप को दोहरा तनाव देने की क्या जरूरत? उनकी चाह की ये राह ना तो अपनों को भा रही है और ना ही विरोधी पार्टी बीजेपी को और ना ही शिक्षा विदों को। इस तेज गरमी में सबकी आंखें लाल हैं। लाख टके का सवाल यही है कि ऐसे में फिर किस तरह, किस रास्ते से वे शिक्षा की दीक्षा के उन सुनहरी सपनों में रंग डालेंगे जो वो युवा पीढ़ी को दिखा गए हैं? इससे बड़ा सवाल ये भी है कि जिस देश की थीम अनेकता में एकता हो, ढांचा कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हो,हर 40 किमी पर रहन-सहन, बोलीऔर कल्चर अलहदा नजर आती हो वहां एक बोर्ड,एक शिक्षा और एक कोर्स पर फोर्स इस देश में क्रांति लेकर आएगी या फिर अशांति फैलाएगी? हर कोई मान रहा है कि यशपाल कमेटी की रिपोर्ट लागू करने से स्तर सुधरेगा लेकिन विदेशी विश्वविद्यालय पर ज्यादातर असहमत हैं। खुद कांग्रेसी इस पर खफा हैं। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश तो खुलेआम कहते हैं कि यह घोषणाएं अव्यवहारिक हैं। जिस देश में विश्वविद्यालयों की हालत अच्छी ना हो, शिक्षकों को समय पर वेतन ना मिलता हो, शिक्षकों और इमारतों का संकट हो, बुनियादी सुविधाओं की कमी हो, वहां विदेशी विश्वविद्यालय खोलना कहां तक जायज है? वे चाहते हैं कि देशी विवि का स्तर विदेशी के बराबर अगर कपिल सिब्बल करें तो यह बड़ी बात होगी। स्कूली शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन की बात भी आसानी से किसी के गले नहीं उतर रही है। बीजेपी ने बिगुल बजा दिया है। शिक्षाविद और इसी महकमे के पूर्व मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने दमदार तर्क दिए हैं, जिन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता । वे इस सोच को विनाशकारी कहते हैं। उनकी नजर में सरकार हड़बड़ी में सबसे बड़ी गड़बड़ी करने जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर सिब्बल इतनी हड़बड़ी में क्यों है? वे 100 दिन के एजेंडे को ब्रह्मा की लकीर क्यों मान रहे हैं? आखिर शिक्षा का व्यापारी करण करने पर क्यों तुले हैं? वे कानून के ज्ञाता हैं फिर क्यों सबसे सलाह मश्विरा नहीं किया गया? क्यों युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलना चाहते हैं? यह क्यों केवल बीजेपी का नहीं है, यह केवल एक शब्द नहीं है, यह तय है कि इस सोच को लागू करने से पहले इस क्यों का जवाब मनमोहन सरकार और कानूनविद कपिल सिब्बल को खोजना होगा। यह भी तय है कि जिस तरह बीजेपी ने तेवर दिखाए हैं, मनमोहन सरकार बीजेपी राज्यों में जबरन एक बोर्ड,एक शिक्षा और एक कोर्स का फार्मूला 100 दिन में तो छोड़िए अगले हजार दिनों में लागू नहीं कर पाएगी। कब लागू होगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इस सोच ने बजट सत्र में सरकार को घेरने का एक हथियार जरूर बीजेपी तथा विपक्ष को दे दिया है। यह तय है कि बजट से ज्यादा हंगामा पढ़ाई-लिखाई पर होगा। अर्जुन सिंह के समय से भी ज्यादा। वो तो निकल गए पर सिब्बल साहब फंस गए। यह भी मुमकिन है कि अपनों और परायों के दबाव के आगे मनमोहन सिंह को ही मोरचा ना झेलना पड़ जाए। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि सिब्बल की इस सोच में आखिर कितना दम है? साथ ही राज्यों से सलाह मश्विरा के बिना जल्दबाजी में ऐसा ऐलान करना और कदम उठाना कहां तक जायज है? इसमें कोई दो राय नहीं कि कोई भी देश तब और मजबूत नजर आता है जब उसकी अपनी एक बोली हो, शिक्षा हो, झंडा हो, लेकिन जिस देश में लाख प्रयास के बावजूद हिंदी अब तक सर्वमान्य राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई, सब जगह अपनी अलख नहीं जगा पाई, सबको नहीं रूझा पाई उस देश में क्या पढ़ाई का एक कोर्स हो सकता है? हर राज्य में अपनी-अपनी बोली में पढ़ाई होती है। उसी की दुहाई होती है। दक्षिणी राज्यों में क्या उस कोर्स को थोपा जा सकता है जो उत्तरी राज्यों में चलता है? महाराष्ट्र में क्या भोजपुरी भाषा की पढ़ाई हो सकती है? हिंदी भाषी राज्यों में क्या तमिल कोर्स का हिस्सा बन सकती है? कहा जा सकता है कि पढ़ाई में भाषा नहीं कंटेंट महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कंटेंट को पढ़ाने के लिए भी तो किसी ना किसी भाषा का उपयोग करना ही होगा। इसके लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि कंटेंट हर प्रदेश की भाषा में पढ़ाए जाएँगे यानि देश के हर राज्यों में परीक्षा के लिए अलग-अलग भाषा का प्रयोग या फिर पूरे देश में हिंदी की बजाय हर विषय की अंग्रेजी में परीक्षा। यानि पढ़ने वाले देशी और भाषा विदेशी। ऐलान के वक्त सिब्बल एंड टीम को ऐसे तमाम सवालों के जवाब जनता के सामने रखने चाहिएं थे। उनकी सोच गलत नहीं पर उसमें कमजोर होमवर्क साफ झलकता है। उन्हें पहले यह सोचना होगा कि किस तरह शिक्षा को रोजगार के साथ जोड़ा जाए? यानि जैसी क्लास-जैसे नंबर-सीधे वैसी ही नौकरी। बिना किसी अन्य आयोग या बोर्ड के। अगर यह सोच भी इसके साथ लागू हो तो फिर इस देश में निश्चित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। मौजूदा अंग्रेजी ढांचे को बदलने की जरूरत तो है पर ऐसा ना हो कि जल्दबाजी में जो है उससे भी हाथ धो बैठें। 10 वीं बोर्ड खत्म करने से सब पास होकर आगे बढ़ेंगे-कालेज हमारे पास हैं नहीं, रोजगार हमारे पास हैं नहीं तो ऐसे में एडमिशन और नौकरी के लिए सड़क पर जो सीन होंगे,जो टेंशन होगी वो 10वीं की टेंशन से हजार गुणा ज्यादा होगी। शिक्षा वैसे भी लगन, निष्ठा और धैर्य से मिलती है। मनमोहन सरकार को धैर्य की राह नहीं छोड़नी चाहिए। युवा पीढ़ी का सवाल है। देश के फ्यूचर का सवाल है।

किंग-आउट आफ रिंग



देशपाल सिंह पंवार
चाहे आपको नाच पसंद है या नहीं। चाहे आप उसे पसंद करते थे या नहीं लेकिन 26 जून की सुबह जिसकी जब आंख खुली और जैसे ही मौत की खबर कानों में गई। मुंह से पहला शब्द यही निकला होगा-अरे। अगर उसे पसंद ना करने वालों को ऐसा झटका लग सकता है तो फिर उसके चहेते युवा वर्ग की हालत कैसी होगी,अंदाजा लगाया जा सकता है। माइकल जैक्सन उर्फ मिकाइल-मशहूर डांसर और सिंगर इस दुनिया में नहीं रहे। 35 साल से तमाम अपवाद की मिसाल व विवाद के बवाल खड़ा करने वाले इस शख्स का वही दिल धोखा दे गया जिसने इसे विवादित बनाया और बहुत सारा दुख •भी पहुंचाया। नियति यही थी। पैर पर उसका नियंत्रण था। पैरों से उसने सारी दुनिया को हिलाया। नचाया। गंवाया। अपना बनाया। दिल पर काबू नहीं था। वो •भी जानता था। सब जानते थे। वही दिल उसे अपने साथ ले गया। पैर कुछ नहीं कर पाए। दिल के सामने हार गए। डाक्टर भी हार गए। मौत के सामने जिंदगी ने घुटने टेक दिए। इस दिल के सामने उसके फैन भी मजबूर हैं। गमगीन हैं। वो जब तक जिंदा रहा। हमेशा चर्चा में रहा। अपने डांस और गीत के कारण। बच्चों के साथ यौन संबंध के कारण। दिवालिया घोषित करने के कारण। दो बार शादी करने के कारण। घोषित रूप से आधा दर्जन से ज्यादा महिलाओं से रिश्ते बनाने के कारण। वाल, थ्रिलर,बैड और डेंजरस जैसी एल्बम के कारण। 75 करोड़ से अधिक प्रतियों के बिकने के कारण।13 ग्रैमी अवार्ड के कारण। इस्लाम धर्म कबूलने के कारण। आए दिन की हरकतों के कारण। जिंदा रहने के कारण। इस तरह मरने के कारण। जिंदगी ने भले ही साथ छोड़ दिया हो लेकिन चर्चा ने साथ नहीं छोड़ा। चर्चा हो रही है कि यह सामान्य मौत नहीं है। कोई ना कोई तो रहस्य है। आखिर इस सुपर स्टार को जब दिल का दौरा पड़ा तो कोई उसके पास क्यों नहीं था? चर्चा यह भी है कि अमरीका जैसे देश में डाक्टर अस्पताल तक जैक्सन को सकुशल क्यों नहीं ले जा पाए? उसके प्रशंसकों को जैसे ही दिल के दौरे की खबर मिली तो रीगन अस्पताल के बाहर लोग बेकाबू रही। बाहर तो सुरक्षा के सारे बंदोबस्त हो गए लेकिन अंदर डाक्टर फेल हो गए। खोई हुई सांस को वो नहीं लौटा पाए। यमराज के आगे वो हार गए। मौत ही सबसे बड़ा सत्य है। इसे जैक्सन के प्रशंसकों को स्वीकारना ही होगा। जैक्सन की मौत हुई है लेकिन जो वो दे गए, वो हमेशा उसके चहेतों के दिलों पर राज करती रहेगा। उसकी मौत के साथ ही वे सारे विवाद भी दफन हो जाएंगे जो जिंदगी के संग-संग चल रहे थे। ईश्वर ने उसे सब कुछ दिया लेकिन एक इच्छा अधूरी लिए ही वो चला गया। लंदन में अगले माह फिर शो करने की। 50 शो के जरिए सारी दुनिया को ये दिखाने की-जैक्सन अभी मरा नहीं, बेताज बादशाह था, है और रहेगा। पर होनी के आगे किसकी चलती है। महज 50 साल की उम्र में आखिरी इच्छा साथ लिए वो परलोक चला गया। रह गई हैं तो सिर्फ यादें जो कभी नहीं मिट सकती। मर सकती।

सोमवार, 22 जून 2009

जान के नाम पर घमासान




देशपाल सिंह पंवार
जिस जल,जंगल और जमीन पर हक पाने को कुछ सिरफिरों ने दशकों पहले आंदोलन का रास्ता अपनाया था,गरीबों को उकसाया था,सरकारी व्यवस्था को निशाना बनाया था,हथियारों से नया जमाना लाने का इरादा जताया था,वह आंदोलन और उसे चलाने वाले नक्सली संगठन अब पूरी तरह उसी जल, जंगल और जमीन को मटियामेट करते जा रहे हैं। हैरत इस बात की है कि फिर भी जनता इनके गलत इरादों को नहीं •भांप पा रही है। उसे समझा और सिखा दिया गया है कि अब जान के लिए झगड़ा है। जिंदा रहने का सवाल है। हर रोज बारूदी सुरंगों से जमीन का सीना फटता जा रहा है। खून से उसी जमीन का दामन रंगता जा रहा है। इस पागलपन से जल भी लाल हो गया है और जंगल भी धमाकों से उजड़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं इन जंगलों में बसेरा करने वाले पक्षी कब के डर कर जा चुके हैं और जानवर भी मौत के डर से नया ठिकाना तलाश रहे हैं। हैरत की बात यही है कि रोजाना के धमाकों से अपना ही सब कुछ लूटते जनता देख रही है, फिर भी खामोश है। छत्तीसगढ़ हो या दूसरे राज्यों के नक्सल प्रभा वित क्षेत्र। सब जगह जमीन में नक्सलियों ने बारूद बिछा दिया है। पता नहीं,कब, कहां किसका पैर पड़े और यमराज की गाज आ गिरे। आए दिन तमाम मां के लाल छिन रहे हैं। औरतें विधवा हो रही हैं। जवान शहीद हो रहे हैं। दंतेवाड़ा की सीमा के पास तोंगपाल थाने के कोकावाड़ा में शनिवार की शाम यही कायराना हरकत फिर नक्सलियों ने की। सीआरपीएफ के जवानों से अटे ट्रक को बारूदी विस्फोट से उड़ा दिया। एक दर्जन जवान शहीद हो गए। इतने ही घायल अस्पताल में मुश्किल से सांस ले रहे हैं। आखिर ये कैसा खूनी खेल है? किसके लिए वे खून बहा रहे हैं? जहां मिट्टी की सौंधी गंध बारूद की बदबू में बदल चुकी हो, जहां की हवा में धमाकों का जहर घुल चुका हो, वहां वो कौन सा हवामहल खड़ा करना चाहते हैं? जब कुछ बचेगा ही नहीं तो फिर क्या पाने के वास्ते ये पागलपन की जंग लड़ी जा रही है। ऐसी कायराना हरकतों की देश के हर शख्स को तीव्र निंदा करनी चाहिए। इन इलाकों में रहने वाली जनता को भी अब ऐसे सिरफिरों को सबक सीखाने के लिए मोरचा ले लेना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि वो अब हथियार डालने का इन नक्सली संगठनों को आखिरी मौका दे और तय सीमा निकलने के बाद इनके खात्मे के वास्ते निर्णायक जंग लड़े। बातों से शायद ही इनकी समझ में समाज बड़ा है, राज्य बड़ा है और सबसे ज्यादा देश बड़ा है कि बात समझ में आएगी। सीमा के अंदर गदर कर रही इन ताकतों को एक बार नेस्तानाबूद करना ही होगा। तरक्की के रास्ते में ये सबसे बड़ा रोड़ा हैं। जमीन बरबाद हो रही है। जल गंदा हो रहा है। जंगल जल रहे हैं। लोग मर रहे हैं। हवा प्रदूषित हो रही है। विकास चौपट हो रहा है। अब नक्सली संगठनों को हमेशा के लिए खत्म करने का वक्त आ गया है। ज्यादा देरी से यह देश दंतेवाड़ा जैसी और ना जाने कितनी बारूदी सुरंगें फटते हुए देखेगा। जवानों को शहीद होते देखेगा। अब देखने का नहीं करने का वक्त आ गया है।

साइना नेहवाल-कर दिखाया कमाल



देशपाल सिंह पंवार
जय हो साइना नेहवाल की, हिसार की, हरियाणा की, हिंदुस्तान की। 19 साल की साइना ने 49 मिनट में इतिहास रच डाला है। इंडोनेशिया ओपन खिताब अब नेहवाल के नाम है। सुपर सीरिज टूर्नामेंट जीतने वाली वो पहली इंडियन हैं। साइना की जीत कई मायनों में बेमिसाल है। उसने सिंगापुर ओपन में मिली हार का बदला •भी चुकाया । साथ ही बैडमिंटन कोर्ट पर न केवल चीनी और इंडोनेशियन साम्राज्य को ध्वस्त किया बल्कि यह भी जता दिया कि रैंकिंग मायने नहीं रखती। अगर देश की आन-बान-शान का जज्बा दिल में हो तो हर नतीजा पाया जा सकता है। देश की नंबर एक और दुनिया की नंबर 6 साइना ने अपने से कहीं ज्यादा मजबूत चीन की वांग लिन को कोर्ट पर ऐसा नचाया कि हर कोई हैरत में था। पहला गेम जब साइना हार गई तो ऐसा लग रहा था कि नतीजा विपरीत ही होगा। पर इसके बाद वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी पर साइना को यकीन था। उसका यकीन इसी बात से झलकता है कि आखिरी गेम में चीनी खिलाड़ी किसी तरह नौ ही अंक जुटा पाई। इस जीत को प्रकाश पादुकोन तथा पी गोपीचंद की उपलब्धि के समकक्ष माना जा रहा है। यह जीत ऐसे समय में मिली है जब 20-20 में धोनी एंड कंपनी की हार से इंडियन खेल पे्रमी उदास थे। महिला क्रिकेट टीम की हार से निराश थे पर अब साइना की जीत से पूरे देश में उल्लास है। सबको उस पर गर्व है। पिता डा हरवीर सिंह को गर्व है। इन पलों का ही उन्हें अरसे से इंतजार था। हिसार की धरती पर साइना ने जन्म लिया और हैदराबाद में 8 साल की उम्र में रैकेट थामा। उसका जज्बा देख वैज्ञानिक पिता ने तब से अपनी आधी आमदनी और सारा पीएफ का पैसा उसके सपने पूरे करने में लगा दिया। उसे स्टेडियम ले जाने के लिए वो रोज 50 किमी स्कूटर दौड़ाते थे। 99-04 तक उसे कोई प्रायोजक भी नहीं मिला था। किसी तरह वो आगे बढ़ती गई। लगन की पक्की थी। ना फिल्म देखने का शौक था और ना ही सहेलियों संग पार्टी का। खेल की वजह से पढ़ाई पर भी असर पड़ा। लेकिन कहावत है कि मेहनत कभी जाया नहीं जाती। 2007 में जिस तरह साइना खेली और 2008 में जब उसे विश्व बैडमिंटन संस्था ने सबसे बेजोड़ खिलाड़ी घोषित किया तो साफ लग गया था कि एक ना एक दिन साइना धमाका जरूर करेगी। वो दिन आखिरकार आ ही गया और सचमुच यह साइना की मेहनत और एक पिता के प्यार और मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि ये सुनहरी पल हमारे हैं। ठीक फादर्स डे के मौके पर एक पिता को एक बेटी की ओर से इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता है? ऐसे तोहफे पर सारी दौलत और मेहनत कुर्बान। देखना यही है कि जिस तरह क्रिकेट पर पैसा बहता है क्या इस लड़की की हौसलाआफजाई के लिए भी लोग आगे आएंगे? फिलहाल साइना की जीत पर मंगल गीत गाने का दिन है। ढेर सारी मंगलकामनाएं। साइना इसी तरह और खुशियों के पल लेकर आए।जीत का सफर * 2003 में चेकोस्लोवाकिया में जूनियर ओपन टूर्नामेंट जीता।* 2004 में बेडिगो (आॅस्ट्रेलिया) में आयोजित दूसरे कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक पर कब्जा।* कनाडा में 2004 में हुए जूनियर विश्व कप में प्री-क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई।* एशियन सेटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट का खिताब अपनी झोली में डाला। * विश्व जूनियर बैडमिंटन चैंपियन्स में फाइनल तक पहुँचने में कामयाब।*कॉमवेल्थ खेलों में मिश्रित समूह स्पर्धा के सेमीफाइनल में उच्च वरियता प्राप्त ट्रेसी हालम को हराया।* मलेशिया की जूलिया झिएन पी वाँग और कई अन्य उच्च वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों को हराकर फिलिपींस ओपन स्पर्धा जीती। * इंडियन इंटरनेशनल सेटेलाइट बैडमिंटन चैंपियनशिप की विजेता।*जनवरी 2007 में पटना में आयोजित राष्टÑीय बैडमिंटन (अंडर-19) चैंपियनशिप जीती। इसी साल मार्च में गुवाहाटी में हुई स्पर्धा में स्वर्ण पदक प्राप्त 33वीं राषट्रीय खिलाड़ी बनीं।

रविवार, 21 जून 2009

नक्सलवाद: देश बरबाद



देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि जर,जोरू और जमीन ही सब झगड़ों की जड़ हैं। नक्सलवाद भी इनमें से ही एक जमीन की वजह से उपजा। जमीन की लड़ाई की दुहाई देते-देते और कमाई खाते-खाते आज सारी जमीन ही खून से लाल हो गई है। बंजर हो गई है। सोच कंजर हो गई है। चारों ओर खून-खराबे का मंजर हो गई है। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से 42 साल पहले उठा यह जुनून आज देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। कश्मीर से भी बड़ा। इस समय 20 हजार से भी ज्यादा नक्सली विंग देश विरोधी साजिश में लिप्त हैं। देश की 40 फीसदी जमीन को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। 92 हजार किलोमीटर रकबा इस जुनून की आग में जल चुका है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में दहशत फैला रहा है। 30 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। देश की लगभ ग 10 लाख करोड़ संपत्ति को सीधे-सीधे निगल चुका है। फिर •भी इसका पेट खाली है। गेट नहीं गिरा है। वेट नहीं गिरा है। सोचिए अगर नक्सलवाद से ये नुकसान नहीं हुआ होता तो विकास के मामले में देश किस स्थिति में होता? जिस विकास की चाह में इन लोगों ने हथियार उठाए थे वही हथियार आज उन इलाकों के विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं जहां ये अपना शिकंजा जमाए हुए हैं। खुद सरकारी व्यवस्था और संविधान पर विश्वास नहीं और अपने साथ करोड़ों निर्दोष लोगों के जीवन से खेलने की इनकी सोच का ही नतीजा है कि जहां-जहां नक्सलवाद जड़ जमाए हुए है वहां विकास नहीं विनाश की ज्वाला फूट रही है। जो जीवन देश और समाज हित में काम आना चाहिए था वो देश और समाज पर निशाना साधने में बीत रहा है। जंगल की खाक छानने में बीत रहा है। अपनों को मारने में बीत रहा है। देश की संपदा को तबाह करने में बीत रहा है। अपनों को बर्बाद करने में बीत रहा है। देश के विकास को चौपट करने में बीत रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के किसी •भी कोने में हथियारों के बल पर नया जमाना नहीं आया। सरकारी व्यवस्था को ना मानने और हथियारों के बल पर देश में नक्शा पलट की इनकी सोच का आधार क्या है ये तो यही जानें पर इस सोच से देश की चाल में मोच जरूर आ गई है। 25 मई, 1967 में जब नक्सलबाड़ी से चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने आंदोलन शुरू किया था,तब ही हिंसा की नींव पड़ गई थी। जमीन को लेकर आए दिन के हमलों ने जता दिया था कि आने वाला समय कैसा होगा? कोलकाता में कालेज से निकलने वाले छात्र इनके विचारों के झांसे में आते गए। जनता बढ़ती गई। हिंसा बढ़ती गई। एक समया ऐसा भी आया कि सारे स्कूल बंद कर दिए गए। नक्सली छात्रों ने जादवपुर विवि पर कब्जा कर लिया। मशीन दुकानों में पुलिस से टक्कर के लिए पाइपगन बनाने लगे। मुख्यालय कोलकाता के प्रेसिडेंट कालेज को बना डाला। उनके निशाने पर जमीन मालिक तो थे ही। साथ ही अध्यापकों, नेताओं, सरकारी अफसरों और पुलिस अफसरों को भी उन्होंने असली दुश्मन घोषित कर दिया। मजूमदार की लीडरशिप के खिलाफ 71 में बगावत हुई। 72 में अलीपोर जेल में उनकी मौत। इससे नक्सली आंदोलन को गहरा झटका लगा। 80 के दशक तक आते-आते इन नक्सली नेताओं के अलावा 30 से ज्यादा नक्सली गुट बन गए थे। 30 हजार से ज्यादा नक्सली इन गुटों में शामिल थे। ये न्याय दिलाने के नारे लगाते थे और विरोधियों को मौत के घाट उतार देते थे। 90 के दशक में नक्सलवाद और तेजी के साथ फैला। केंद्र सरकार भी यह मानती है कि पाकिस्तान और कश्मीर के आतंकवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक नक्सलवाद है। हर साल तबाह होने वाली संपत्ति बढ़ती जा रही है। नक्सलवाद की वजह से जान गंवाने वाले भी हर साल बढ़ रहे हैं। मां से बेटे छिन रहे हैं। बहन से भाई छिन रहे हैं। औरतों से सुहाग और देश से लाल। अभी पांच साल की संख्या पर अगर निगाह डाली जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस हद तक जमीन की चाह खूनी खेल की राह बन गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2004 में 570,05 में 893, 06 में 749, 07 में 654, 08 में 938 लोगों ने नक्सली हिंसा में जान गंवाई। सब जानते हैं कि सरकारी आंकड़ों से कितने गुणा मरने वालों की असली संख्या होती है। आगे आने वाले बरसों में ये जुनून और कितना खून पिएगा यह समय ही बताएगा। पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके फैलाव पर अंकुश उस तरह नहीं लग पाया जितना अब तक लग जाना चाहिए था। इसका खास कारण यही है कि नक्सलियों ने हर उस इलाके में अपनी पकड़ जमाई जहां विकास ज्यादा नहीं हुआ था। जंगलों का फायदा उठाया। सरकारी व्यवस्था से निराश ग्रामीण जनता को उकसाया और उसके सहयोग से अपना सिक्का जमाया। जिस कौम को इन्हें ठीक करने में सहयोग करना चाहिए था वही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। यही सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है। जंगल के रास्ते सब राज्यों की सीमा जुड़ी होने से भी इन्हें अपना दायरा बढ़ाने में मदद मिली। साथ देश और समाज विरोधी ताकतों से भी रिश्ते जगजाहिर रहे हैं। चाहे वीरप्पन था या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई या अब आतंकवादी संगठन लश्कर। सबने इनकी खुराक बढ़ाई। खूंखार बनाया। आधुनिक हथियारों से लैस कराया। देश के उन क्रीम इलाकों तक इसने अपना शिकंजा जमाया जो देश की तरक्की में अहम रोल प्ले करते हैं। इसके अलावा देश के बाकी तमाम हिस्सों में भी ऐसे-ऐसे अलगाववादी गुट अरसे से जंग लड़ रहे हैं जिनका मकसद कभी पूरा नहीं होगा। मौका पड़ने पर ये सब आपस में हाथ मिला लेते हैं। सरकार इन्हें कुचलने को सीरियस है। जनता इनसे छुटकारा पाने को अधीर है। ये तय है कि एक दिन नक्सलवाद बर्बाद होगा,अमन का दौर आबाद होगा लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि किस कीमत पर? बड़ी कीमत वसूल चुका है। देश और जनता को इसकी और क्या कीमत चुकानी होगी, कितनी कुर्बानी देनी होगी यही सबसे बड़ा सवाल है।