शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जीते तो इतिहास लिखोगे-हारे तो इतिहास बनोगे



देशपाल सिंह पंवार

कम से कम आप तो नहीं भूले होंगे। ना तो ज्यादा अरसा हुआ है और ना ही भूलने वाली बात है। आप ही को आगे करके बीजेपी ने हिंदुत्व की राह पकड़ी थी। आप ही के रथ के पीछे बाकी सबने राजनीति की नई धारा का अलख जगाया था। मूलत हाथ और हंसिया के इस देश की राजनीति के कीचड़ में कमल खिलाया था। मुगलों के जमाने से आकर्षण का केंद्र रहा दिल्ली का ताज कब्जाया था। एक बार नहीं, बार-बार, तीन बार। 13 दिन,13 माह और पांच साल। हर बार आप पावर में मजबूत तो होते गए पर उस ताज तक नहीं पहुंच पाए जिसके आप हकदार थे। यह आप भी मानते होंगे और आपकी फौज भी,आप सरकार में नंबर दो तक तो पहुंचे पर ताज की रेस में एक से दस नंबर तक की पायदान पर आपके रथ के इकलौते सारथी विद्यमान थे। बार-बार सरकार के लिए दूसरों की दरकार थी। उनके बिना सत्ता दुश्वार थी। चाहे आपकी उनसे कोई नहीं तकरार थी पर वह फौज आपके पीछे खड़े होने को नहीं तैयार थी। फिर आपके संस्कार भी आड़े आ रहे थे। बड़े भाई के रहते आप गद्दी पर कैसे बैठ सकते थे? जाहिर सी बात है कि समझौता सिर्फ और सिर्फ आपको करना पड़ा। ऐसे में गठजोड़ की राजनीति और संस्कार की बंदिशों का मर्म आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? ताज जब एक कदम दूर रहता था तो आप दो कदम दूर खड़े दिखते थे। क्या इस बार यह कहानी फिर दोहरायी जाएगी? शायद यही है किस्मत का खेल और राजनीति की विडंबना। आप बीजेपी और एनडीए के राहुल द्रविड़ तो रहे, दीवार का रोल तो अदा करते रहे पर वो श्रेय और ताज आपके हिस्से में नहीं आया जो बहुत पहले आपकी झोली और आपके सिर पर होना चाहिए था। क्रिकेट में राहुल के समय सचिन बाजी मार ले जाते थे और राजनीति में आपके अग्रज अटल बिहारी वाजपेयी। पर इसमें आपका क्या दोष? आपने कर्म किया। फल देना किस्मत और जनता के हाथ में था और है। वैसे भी ये राजे-रजवाड़ों का दौर तो है नहीं। जहां राजा के बेटे के सिर पर ताज की परंपरा दोहराई जानी हो। अब लोकतंत्र का वो दौर भी नहीं रहा जहां एक ही परिवार के नाम सत्ता का पट्टा लिखा जाता रहा हो। आप फिर ऐसी जंग के मैदान में हैं, समय का चक्र और बहता वक्त जिसके सारे कायदे-कानून बदल चुका है। अब वो मैदान नहीं है जहां आप योद्धा की तरह लड़ते थे और जीतते थे। इस बार आप घोषित सेनापति हैं। समय अनुकूल नहीं है। कुनबा बिखर चुका है। घर में बर्तन खड़कते रहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी का सिर्फ नाम आपके साथ है। पहले की तरह अब न हिंदुत्व का मुद्दा रहा। न राम के नाम की जनता में वो गूंज रही। दुनिया की खस्ता हालत मंहगाई के मुद्दे को लील गई है। आतंकवाद की बेल को पाकिस्तान की करनी चट कर गई है। हां एक मुद्दा जरूर है जो उसी से जुड़ा है जो इस बार चुनाव में निर्णायक रोल अदा करेगा यानि रोजगार यानि अंधेरी गलियों में सिसकती युवा जिंदगानियां। जिस पर यह वर्ग विश्वास करेगा उसे पास करेगा। ऐसे माहौल में आप अकेले नहीं हैं। देश में हर कोई प्रधानमंत्री बनने के सपने पाले हुए है। पर इतना जरूर है कि इस रणक्षेत्र में हर कदम पर आपकी अग्निपरीक्षा होगी। कारण आपका यह आखिरी वार है। जीते तो इतिहास लिखेंगे, हारे तो इतिहास बनेंगे।

लालचंद किशनचंद आडवाणी

0- 8 नवंबर,1927 को कराची में जन्म। हैदराबाद (सिंध) में स्कूली पढ़ाई। मुंबई के गवर्नमेंट ला कालेज से डिग्री। 0-1942 में संघ में शामिल। पांच साल बाद कराची संघ के प्रमुख। देश विभजन के बाद दंगों के दौरान राजस्थान के मेवात में संघ की ओर से दायित्व।0-जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में 24 मार्च 1977 को सूचना मंत्री। दो साल तक रहे। बाद में वी सी शुक्ल इस पद पर आए।0-जनसंघ के प्रमुख नेता ।1980 में चौधरी चरण सिंह सरकार के पतन के बाद बीजेपी का निर्माण। पार्टी के बड़े नेताओं में से एक। उच्च सदन के सदस्य। 0-1986 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हिंदुत्व की ओर रूझान। कई राज्यों में दल की सरकारें। बोफोर्स में राजीव फंसे। वीपी सरकार को बीजेपी का समर्थन। 0-1990 में आडवाणी की कप्तानी में रामजन्म भूमि का मुद्दा उठाया गया। रथ यात्रा निकाली। विवादित ढांचा गिराया गया। पार्टी की लोकप्रियता चरम पर। 0-1992-96 पीवी नरसिम्हा राव के काल में विपक्ष के नेता। 96 में बीजेपी सबसे बड़ा दल। वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। होममिनिस्टर बने। 13 दिन में पतन। 0-98 में फिर राजग सरकार। वाजपेयी प्रधानमंत्री। 13 माह तक सरकार चली। आडवाणी होम मिनिस्टर। 0-देवगौडा और गुजराल आए और गए। चुनाव के बाद फिर वाजपेयी सरकार आई। आडवाणी उप प्रधानमंत्री बनाए गए। कंधार कांड, जैन हवाला कांड में घिरे।0-2004 में शाईनिंग इंडिया का नारा फ्लाप। विपक्षी नेता के रूप में बैठे। उमा भरती और मदनलाल खुराना जैसे नजदीकी पार्टी से चले गए।0-2005 में पाकिस्तान में जिन्ना संबंधी बयान से बवाल। संघ ने आड़े हाथों लिया। पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा। राजनाथ सिंह की ताजपोशी। 0-तीस साल लगातार अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी के सबसे बड़े नेता। अब घोषित भावी प्रधानमंत्री। हिंदुत्व समर्थक होने का आरोप। 0-2008 में अपनी जीवनी लिखी-माई कंट्री-माई लाइफ। गांधीनगर चुनाव क्षेत्र।