
देशपाल सिंह पंवार
संख्या की माया ने सबको नचाया। गद्दी की चाह ने सबको दौड़ाया। बिहार में सब उसकी 20-25 सीट मान रहे हैं। नतीजा गठजोड़ की राजनीति में आज सब मुन्ना (घर का नाम) को पटा रहे हैं। बिहार और बिहारियों को कोसने वाले पलकें बिछा रहे हैं। पराए उसे बुला रहे हैं। अपना बता रहे हैं। तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री तक की गद्दी के ख्वाब दिखा रहे हैं। अपने भी उसे निहार रहे हैं। चाल तोल रहे हैं। शक से देख रहे हैं। पर मुन्ना चिरपरिचित अंदाज में मंद-मंद मुस्करा रहे हैं। वो रहस्यमयी मुस्कराहट जो कदापि पता नहीं चलने देती कि वो क्या करेंगे? वो अपनों की भी नींद उड़ाती है और दूसरों को •भी बेवकूफ बनाती है। दूसरे हलकान हुए रहते हैं और वो इसका आनंद लेते रहते हैं। यह आदत उनकी बरसों पुरानी है। वो बोलते कम हैं। पेट के जाले खोलते कम हैं। खासकर राजनीतिक मसलों पर। पर जब मुंह खोलेंगे तो द्विअर्थी ही बोलेंगे। वो राजग के साथ हैं। वो कह रहे हैं-मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई। पर दावे के साथ यह नहीं कह रहे कि साथ ही रहेंगे। हां 16 मई का इंतजार करने की बात कहकर सबकी धड़कनें बढ़ा रहे हैं। यूं तो मुन्ना को जब अपने ही नहीं जान पाए तो फिर पराए कैसे जानेंगे? फिर भी थोड़ा बहुत जानने वाले जानते और मानते हैं कि वो दूसरे नेताओं की तरह रोज चाल नहीं बदलते-हां दूसरों की चाल अगर खराब लगती है तो या तो उसकी चाल बदल देते हैं या फिर उसके साथ दो पग नहीं चलते। इस समय गठजोड़ की चाल •भी ठीक है-हाल •भी और ढाल भी तो ऐसे में वो अपने गाल क्यों बजाएं? हां दूसरों को बेहाल देखकर वो खुशी से लाल हैं। मोल बढ़ने से अहं मालामाल हैं। कांग्रेस उन्हें तीन साल से पटा रही है। मन बदलने को खूब धन दे रही है। पर जिस शख्स ने जे पी आंदोलन में हिस्सा लिया हो, राजनीति की एबीसी सत्येंद्र बाबू से सीखी हो, जगन्नाथ मिश्र जैसे नेताओं के दांव-पैंच देखे हों, वीपी और अटल सरीखों से राजकाज के गुर सीखे हों, लालू और पासवान जैसे नेताओं को पानी पिलाया हो, जार्ज जैसे नेताओं से पीछा छुड़ाया हो, शरद जैसों का पार्टी में कद घटाया हो, सुशील मोदी जैसों को दूसरे नंबर का बनाया हो, उस राजनेता पर न तो किसी डोर का कोई फर्क पड़ता और न ही किसी शोर का। जिस विषय की उसने पढ़ाई की है उसी की तर्ज पर धीरे से जोर का झटका देना मुन्ना जानता है। वो यह •भी जानता है कि उसका सब कुछ दिल्ली में नहीं बिहार में है। उस बिहार में जहां पथरीली और बंजर जमीन पर उसने विकास की फसल बोई है। जो उग रही है। जो पकने की ओर है। यह फसल उसकी देन है। यह सारी जनता •भी जानती है और देश का हर राजनेता •भी ऐसा नेता अपना स्टेट छोड़कर वहां क्यों जाएगा जहां हर पल गद्दी खिसकती नजर आती हो? जहां हर समय दल-दल नजर आता हो। अपने राज्य को दलदल से निकालने वाला •भला अपनी बोई फसल दूसरों को क्यों काटने देगा जबकि अगले साल वो फिर घर में आने वाली है। वो जानता है कि एक बार यह ताज उसके हाथ से निकला तो फिर नहीं मिलने वाला। उसे दिल्ली की ओर धकेलने और खींचने वाले अपनों और परायों की मंशा मुन्ना जानता है पर उसे जानने और पहचानने वाले अगर अब तक उसे नहीं पहचान पाए तो फिर इसमें उसका क्या दोष? वो बीजेपी की विचारधारा को नहीं मानता। हां अपनी मंशा को मनवाना उसे आता है। उसके दाम बढ़े हुए हैं। इसकी एवज में वो बिहार में घुटनों के बल झुकी हुई बीजेपी को और झुकाएगा। दिल्ली से ज्यादा इसी में उसका फायदा है। वो जानता है। वो रविवार को लुधियाना में राजग के साथ था। जिस नरेंद्र मोदी के साथ उसने न खड़ा होने की कसम खाई थी, उसके साथ मंच पर था। इस पर जिसे जो सोचना है वो सोचे पर यह नेता ना तो किसी की परवाह करता है और ना ही किसी का हुक्म चलने देता है। अगर सरकार केंद्र में राजग नहीं बना पाया तो फिर तीसरे मोरचे की ओर उसकी चाल के आगे राजग ढाल नहीं बन पाएगा यह तय है। वो अगले रविवार को वहीं मिलेगा। राजनीति का ये मुन्ना गांधी के विचारों को मानता है पर इतना मुन्ना नहीं कि उसे आसानी से पटाया जा सके। फिर भी देखते रहिए मुन्ना की मुस्कान पर होता घमासान।
नीतीश कुमार
0-एक मार्च,1951 को बिहार के बख्तियारपुर कस्बे में जन्म। पिता स्वर्गीय कविराज रामलखन सिंह फ्रीडम फाइटर थे। बिहार के गांधी विभूति अनुरागनारायण सिन्हा के बेहद करीबी। जिन्होंने 22 फरवरी, 1973 को आधुनिक बिहार की नींव रखी थी। बिहार में ही शुरूआती पढ़ाई के बाद नीतीश कुमार ने बिहार कालेज (अब एनआईटी पटना) इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। राजनीति और खेती प्रोफेशन। पेशे से टीचर श्रीमती मंजू कुमारी सिन्हा से शादी। जिनका 14 मई,2007 को निधन हो गया। एक बेटा निशांत। छात्र जीवन में बाबू जयप्रकाश नारायण से प्रेरित। 1974 में आंदोलन में कूदे। 77 में प्रमुख नेता बाबू सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेहद नजदीकी। धीरे-धीरे राजनीति में असरदार। 1985 में बिहार विधानपरिषद में निर्वाचित। 87 में युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष। 89 में जनता दल बिहार के महासचिव। इसी साल बाढ़ सीट से सांसंद का चुनाव जीते। 89 में ही केंद्र में वीपी सिंह की सरकार में राज्य कृषि मंत्री बने। 91 व 96 में फिर संसद में। जनतादल के राष्ट्रीय महासचिव। 98-99 में थोड़े समय के लिए अटल सरकार में रेल मंत्री व परिवहन मंत्री। फिर एग्रीकल्चर मिनिस्टर। अगस्त 99 में गैसाल रेल हादसे के बाद इस्तीफा। साल के आखिर में फिर एग्रीकल्चर मिनिस्टर। 2000 में सात दिन के बिहार के मुख्यमंत्री। विधायक बहुमत के लिए नहीं जुट पाए। 01-04 तक अटल सरकार में रेलमंत्री। 04 में दो जगह से चुनाव लड़े। बाढ़ से हारे और नालंदा से जीते। निचले सदन में जद यू के नेता। तमाम संसदीय कमेटियों के सदस्य ।04 में लालू-राबड़ी राज का अंत। राष्ट्रपति शासन। लोजपा टूटी। विधानसभा भंग , 05 में फिर चुनाव। राजग सत्ता में। 24 नवंबर को गांधी मैदान में मुख्यमंत्री की शपथ। विधानपरिषद के सदस्य। राज्य में विकास के कामों पर ध्यान। बेहतर प्रशासन देने का वादा। बिहार में खून-खराबे पर अंकुश। लगातार हर ओर तारीफ। विधायकों के मनमाने कामों पर अंकुश। 06 में कुछ विधायक नाराज। 08 में कैबिनेट विस्तार के बाद और ज्यादा नाराज। इस बार चुनाव में कई ने साथ छोड़ा। 07 में सबसे कुशल मुख्यमंत्री का एवार्ड। 08 में सबसे बेहतर राजनेता का एवार्ड। चारों ओर जय जयकार।



