रविवार, 10 मई 2009

नीतीश:दूसरों को देता ठीस



देशपाल सिंह पंवार
संख्या की माया ने सबको नचाया। गद्दी की चाह ने सबको दौड़ाया। बिहार में सब उसकी 20-25 सीट मान रहे हैं। नतीजा गठजोड़ की राजनीति में आज सब मुन्ना (घर का नाम) को पटा रहे हैं। बिहार और बिहारियों को कोसने वाले पलकें बिछा रहे हैं। पराए उसे बुला रहे हैं। अपना बता रहे हैं। तारीफ में कसीदे पढ़ रहे हैं। प्रधानमंत्री तक की गद्दी के ख्वाब दिखा रहे हैं। अपने भी उसे निहार रहे हैं। चाल तोल रहे हैं। शक से देख रहे हैं। पर मुन्ना चिरपरिचित अंदाज में मंद-मंद मुस्करा रहे हैं। वो रहस्यमयी मुस्कराहट जो कदापि पता नहीं चलने देती कि वो क्या करेंगे? वो अपनों की भी नींद उड़ाती है और दूसरों को •भी बेवकूफ बनाती है। दूसरे हलकान हुए रहते हैं और वो इसका आनंद लेते रहते हैं। यह आदत उनकी बरसों पुरानी है। वो बोलते कम हैं। पेट के जाले खोलते कम हैं। खासकर राजनीतिक मसलों पर। पर जब मुंह खोलेंगे तो द्विअर्थी ही बोलेंगे। वो राजग के साथ हैं। वो कह रहे हैं-मेरी किसी से कोई बात नहीं हुई। पर दावे के साथ यह नहीं कह रहे कि साथ ही रहेंगे। हां 16 मई का इंतजार करने की बात कहकर सबकी धड़कनें बढ़ा रहे हैं। यूं तो मुन्ना को जब अपने ही नहीं जान पाए तो फिर पराए कैसे जानेंगे? फिर भी थोड़ा बहुत जानने वाले जानते और मानते हैं कि वो दूसरे नेताओं की तरह रोज चाल नहीं बदलते-हां दूसरों की चाल अगर खराब लगती है तो या तो उसकी चाल बदल देते हैं या फिर उसके साथ दो पग नहीं चलते। इस समय गठजोड़ की चाल •भी ठीक है-हाल •भी और ढाल भी तो ऐसे में वो अपने गाल क्यों बजाएं? हां दूसरों को बेहाल देखकर वो खुशी से लाल हैं। मोल बढ़ने से अहं मालामाल हैं। कांग्रेस उन्हें तीन साल से पटा रही है। मन बदलने को खूब धन दे रही है। पर जिस शख्स ने जे पी आंदोलन में हिस्सा लिया हो, राजनीति की एबीसी सत्येंद्र बाबू से सीखी हो, जगन्नाथ मिश्र जैसे नेताओं के दांव-पैंच देखे हों, वीपी और अटल सरीखों से राजकाज के गुर सीखे हों, लालू और पासवान जैसे नेताओं को पानी पिलाया हो, जार्ज जैसे नेताओं से पीछा छुड़ाया हो, शरद जैसों का पार्टी में कद घटाया हो, सुशील मोदी जैसों को दूसरे नंबर का बनाया हो, उस राजनेता पर न तो किसी डोर का कोई फर्क पड़ता और न ही किसी शोर का। जिस विषय की उसने पढ़ाई की है उसी की तर्ज पर धीरे से जोर का झटका देना मुन्ना जानता है। वो यह •भी जानता है कि उसका सब कुछ दिल्ली में नहीं बिहार में है। उस बिहार में जहां पथरीली और बंजर जमीन पर उसने विकास की फसल बोई है। जो उग रही है। जो पकने की ओर है। यह फसल उसकी देन है। यह सारी जनता •भी जानती है और देश का हर राजनेता •भी ऐसा नेता अपना स्टेट छोड़कर वहां क्यों जाएगा जहां हर पल गद्दी खिसकती नजर आती हो? जहां हर समय दल-दल नजर आता हो। अपने राज्य को दलदल से निकालने वाला •भला अपनी बोई फसल दूसरों को क्यों काटने देगा जबकि अगले साल वो फिर घर में आने वाली है। वो जानता है कि एक बार यह ताज उसके हाथ से निकला तो फिर नहीं मिलने वाला। उसे दिल्ली की ओर धकेलने और खींचने वाले अपनों और परायों की मंशा मुन्ना जानता है पर उसे जानने और पहचानने वाले अगर अब तक उसे नहीं पहचान पाए तो फिर इसमें उसका क्या दोष? वो बीजेपी की विचारधारा को नहीं मानता। हां अपनी मंशा को मनवाना उसे आता है। उसके दाम बढ़े हुए हैं। इसकी एवज में वो बिहार में घुटनों के बल झुकी हुई बीजेपी को और झुकाएगा। दिल्ली से ज्यादा इसी में उसका फायदा है। वो जानता है। वो रविवार को लुधियाना में राजग के साथ था। जिस नरेंद्र मोदी के साथ उसने न खड़ा होने की कसम खाई थी, उसके साथ मंच पर था। इस पर जिसे जो सोचना है वो सोचे पर यह नेता ना तो किसी की परवाह करता है और ना ही किसी का हुक्म चलने देता है। अगर सरकार केंद्र में राजग नहीं बना पाया तो फिर तीसरे मोरचे की ओर उसकी चाल के आगे राजग ढाल नहीं बन पाएगा यह तय है। वो अगले रविवार को वहीं मिलेगा। राजनीति का ये मुन्ना गांधी के विचारों को मानता है पर इतना मुन्ना नहीं कि उसे आसानी से पटाया जा सके। फिर भी देखते रहिए मुन्ना की मुस्कान पर होता घमासान।

नीतीश कुमार

0-एक मार्च,1951 को बिहार के बख्तियारपुर कस्बे में जन्म। पिता स्वर्गीय कविराज रामलखन सिंह फ्रीडम फाइटर थे। बिहार के गांधी विभूति अनुरागनारायण सिन्हा के बेहद करीबी। जिन्होंने 22 फरवरी, 1973 को आधुनिक बिहार की नींव रखी थी। बिहार में ही शुरूआती पढ़ाई के बाद नीतीश कुमार ने बिहार कालेज (अब एनआईटी पटना) इलेक्ट्रीकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। राजनीति और खेती प्रोफेशन। पेशे से टीचर श्रीमती मंजू कुमारी सिन्हा से शादी। जिनका 14 मई,2007 को निधन हो गया। एक बेटा निशांत। छात्र जीवन में बाबू जयप्रकाश नारायण से प्रेरित। 1974 में आंदोलन में कूदे। 77 में प्रमुख नेता बाबू सत्येंद्र नारायण सिन्हा के बेहद नजदीकी। धीरे-धीरे राजनीति में असरदार। 1985 में बिहार विधानपरिषद में निर्वाचित। 87 में युवा लोकदल के राष्ट्रीय अध्यक्ष। 89 में जनता दल बिहार के महासचिव। इसी साल बाढ़ सीट से सांसंद का चुनाव जीते। 89 में ही केंद्र में वीपी सिंह की सरकार में राज्य कृषि मंत्री बने। 91 व 96 में फिर संसद में। जनतादल के राष्ट्रीय महासचिव। 98-99 में थोड़े समय के लिए अटल सरकार में रेल मंत्री व परिवहन मंत्री। फिर एग्रीकल्चर मिनिस्टर। अगस्त 99 में गैसाल रेल हादसे के बाद इस्तीफा। साल के आखिर में फिर एग्रीकल्चर मिनिस्टर। 2000 में सात दिन के बिहार के मुख्यमंत्री। विधायक बहुमत के लिए नहीं जुट पाए। 01-04 तक अटल सरकार में रेलमंत्री। 04 में दो जगह से चुनाव लड़े। बाढ़ से हारे और नालंदा से जीते। निचले सदन में जद यू के नेता। तमाम संसदीय कमेटियों के सदस्य ।04 में लालू-राबड़ी राज का अंत। राष्ट्रपति शासन। लोजपा टूटी। विधानसभा भंग , 05 में फिर चुनाव। राजग सत्ता में। 24 नवंबर को गांधी मैदान में मुख्यमंत्री की शपथ। विधानपरिषद के सदस्य। राज्य में विकास के कामों पर ध्यान। बेहतर प्रशासन देने का वादा। बिहार में खून-खराबे पर अंकुश। लगातार हर ओर तारीफ। विधायकों के मनमाने कामों पर अंकुश। 06 में कुछ विधायक नाराज। 08 में कैबिनेट विस्तार के बाद और ज्यादा नाराज। इस बार चुनाव में कई ने साथ छोड़ा। 07 में सबसे कुशल मुख्यमंत्री का एवार्ड। 08 में सबसे बेहतर राजनेता का एवार्ड। चारों ओर जय जयकार।

राजग का साज



देशपाल सिंह पंवार
ताज का असली साज तो 16 मई को बजेगा पर ठीक एक हफ्ते पहले जिस तरह लुधियाना में राजग के नौ दलों का कुनबा जुटा और उसमें सबने हाथ में हाथ लेकर साथ रहने का झंडा फहराया, हाथ को गरियाया,उसने सरकार बनाने की कांग्रेसी राह पर और कांटे भी बिछा दिए हैं और तीसरे मोरचे की सत्ता की चाह पर भी गाज गिरा दी है। जोड़-तोड़ की रोड़ पर सत्ता की होड़ में यह रैली राजग के लिए निर्णायक मोड़ साबित होगी इसमें कोई दो राय नहीं। इस रैली में किसने क्या कहा यह महत्वपूर्ण नहीं था। रैली का पंजाब में होना और इसमें कौन-कौन चेहरे शामिल हुए यह ज्यादा महत्वपूर्ण था। इस रैली को पंजाब में कराने के पीछे जो निहितार्थ छिपे हुए थे वो ज्यादा मायने रखते थे। इसमें बीजेपी पूरी तरह कामयाब रही है। पंजाब में चुनाव सिर पर हैं। दिल्ली दंगों का जिन्न बोतल से बाहर है। ऐसे में सरदार प्रकाश सिंह बादल के घर में राजग के कुनबे के जुटने से ना केवल बीजेपी और अकाली दल और ज्यादा बेहतर प्रदर्र्शन की अब आस कर सकते हैं बल्कि पंजाब के इस सरदार को लेकर तीसरे मोर्चे की घुड़दौड़ भी खत्म हो जाएगी। राजग की फसल और ज्यादा हरियाली नजर आएगी। इस मंच ने उन दलों व नेताओं की और भी कई गलतफहमियों, कई उम्मीदों को धूल में मिला दिया है जो कुछ चेहरों को लेकर आस लगाए बैठे थे। जो यह कहते घूम रहे थे कि वे उनके साथ हैं। मंच पर बीजेपी नीत सब राज्यों के मुख्यमंत्री तो थे ही पर नरेंद्र मोदी के साथ एक ही मंच पर नीतीश कुमार का बैठना सबसे बड़ी खासियत रहा। उनके आने पर ही सबकी निगाहें टिकी थी। नीतीश हमेशा बीजेपी के साथ रहे पर गुजरात दंगों के बाद मोदी के साथ कदापि किसी राजनीतिक मंच पर नहीं बैठे। बिहार में चुनाव के दौरान भी वे साफ बीजेपी को अल्टीमेटम दे देते थे कि बिहार में मोदी की कोई रैली नहीं होनी चाहिए। ऐसे में जब हर दल नीतीश को अपने साथ चाहता है उनका मोदी के साथ बैठना इस बात का संकेत ही नहीं साफ-साफ संदेश है कि कोई उन्हें लेकर गलतफहमी में ना रहे। उन्होंने राजग के लिए वोट •भी मांगे। रैली की दूसरा सबसे बड़ा पहलू रहा-तेलंगाना राष्ट्रसमिति के नेता चंद्रशेखर राव का आना। उन्हें कल तक तीसरे मोर्चे का समर्थक माना जाता था पर अब वे राजग के साथ हैं। इसके अलावा कुछ और ऐसे नेता भी मंच पर साथ-साथ रहे जो कल तक एक दूजे के साथ बैठना पसंद नहीं करते थे। रैली में मनमोहन सिंह और राहुल गांधी पर जुबान के वार चले पर रैली का असली वार जहां बीजेपी को करना था वहां वो कर चुकी है। पांचवे दौर के सेमीफाइनल और आखिरी दौर के फाइनल से ठीक पहले के इस प्रदर्शन ने राजग की सत्ता की चाह और बढ़ा दी है। खुले दरवाजों की राह की ओर कई और दलों के कदम इस रैली के बाद तेजी से बढ़ जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी।

जोड-तोड-की रोड़ पर सत्ता की होड़



देशपाल सिंह पंवार
चार दौर का पोल हो चुका है पर केंद्र में किसकी बनेगी सरकार और कौन बनेगा बड़ा सरकार इस पर अटकलें तेज हैं। सब प्रधानमंत्री बनने और सरकार बनाने की लाइन में लगे हैं पर किसी भी दल या बड़े नेताओं के दावों में विश्वास कम और चमत्कार की आस ज्यादा झलक रही है। पिटारा 16 मई को खुलेगा। शनि महाराज किसी का हित करते नजर नहीं आ रहे हैं। विखंडित जनादेश की आशंका या कड़वे सच के डर से सारे दल बेचैन अंधी गलियों में चक्कर काटते नजर आ रहे हैं। चुनाव पूर्व के गठबंधन बेमायने नजर आ रहे हैं। दोस्तों के दुश्मनों को अपना बनाने में मरे जा रहे हैं। कौन किस तरफ जाएगा यह कहना मुश्किल है। कौन प्रधानमंत्री बनेगा यह कहना और भी मुश्किल है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास की सबसे विकट स्थिति है। 20 साल पुराने इस मर्ज का इलाज बेहद मुश्किल दिखाई पड़ रहा है। पर राजनीति उम्मीद का मेल है। संख्या बल का खेल है। चला-चली की रेल है। कोई ना कोई सूरत जरूर निकलेगी। हां खंडित जनादेश की स्थिति में गठजोड़ की राजनीति जितना अहम रोल अदा करेगी उससे ज्यादा अहम भुमिका होगी राष्ट्रपति की-वे किसे सरकार बनाने का न्यौता देती हैं? क्या सबसे बड़े दल को? या चुनाव पूर्व बने गठजोड़ को (सबसे ज्यादा सीटें पाने पर) या फिर चुनाव बाद जोड़े गए कुनबे को? या फिर उनकी नजर में सबसे टिकाऊ गठजोड़ को। या फिर कोई नया इतिहास लिखा जाएगा। ऐसे हालात में राजनेताओं से ज्यादा मुश्किल हालात राष्ट्रपति के सामने हैं। प्रतिभा पाटिल क्या फैसला करेंगी ? इसके कयास तेज हो गए हैं। पांचवा दौर बाकी है पर राष्ट्रपति पहले से ही रास्ता ढंूढने को संविधान विशेषज्ञों से सलाह मश्विरे में जुट गई हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि वे क्या करेंगी? क्या वे आर वैंकटरमन की राह पर जाएंगी या फिर शंकरदयाल शर्मा की। के आर नारायणन की, या एपीजे कलाम की? इस पर सबकी नजर रहेगी। वोट देने वाली जनता की भी, वोट पाने वाले नेताओं की •भी, सारी दुनिया की •भी, क्या होगा? 1989 से पहले तक देश के जो •भी राष्ट्रपति रहे उन्हें ऐसे मुश्किल हालात का सामना नहीं करना पड़ा। कुछ अन्य अवसरों को छोड़कर जो चुनाव से कम जुड़े थे और सरकार गिरने व बनने से उनका ताल्लुक ज्यादा था। पर पहली बार 89 के चुनाव में जब किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला तो तत्कालीन राष्ट्रपति आर वैंकटरमन को पहली बार ऐसी स्थिति झेलनी पड़ी थी। संविधान खंगालना पड़ा था। कोशिश यही थी कि संविधान के अनुसार ही सरकार बने। राजीव गांधी की कप्तानी में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी थी पर बहुमत से काफी दूर थी। चुनाव पूर्व बना संयुक्त मोरचा सबसे ज्यादा सीटें हासिल किए हुए था। वैंकटरमन दुविधा में थे और उन्हें संविधान •भी दुविधा से नहीं निकाल पा रहा था। उनकी मुश्किलें आसान की थी राजीव गांधी ने। उन्होंने सरकार बनाने का दावा पेश करने से इनकार कर दिया। नतीजा राष्ट्रपति ने मोरचा नेता वीपी सिंह को सरकार बनाने का न्यौता दिया। संकट उस समय तो टल गया लेकिन विखंडित जनादेश व हंग प्राइममिनिस्टर की सरकार न तो चलनी थी और न चली। दो साल में फिर चुनाव हुए। 1996 में फिर यही स्थिति आई। बीजेपी सबसे बड़े दल के रूप में आगे थी। कांग्रेस गठजोड़ आस लगाए बैठा था साथ ही संयुक्त मोरचा भी,पर शंकरदयाल शर्मा ने अटलबिहारी वाजपेयी को आमंत्रित कर सबको आश्चर्य में डाल दिया था। यह एक ऐतिहासिक फैसला था। हां सरकार फ्लोर को फेस नहीं कर पाई। 13 दिन में ही गिर गई। पर इस फैसले को सबने सराहा। 1998 में यही स्थिति फिर आई। ज्यादा मुश्किल हालात के साथ। राष्ट्रपति थे के आर नारायणन। किसी को बहुमत नहीं मिला। बीजेपी फिर सबसे बड़े दल और चुनाव बाद बीजेपी गठजोड़ सीटों में कांग्रेस गठजोड़ से काफी आगे रहा। इसके बावजूद कांग्रेस •भी सरकार बनाने को आतुर थी। हां दावा पेश नहीं करना चाहती थी। वह चाहती थी कि राष्ट्रपति आमंत्रित करें। मुश्किल में राष्ट्रपति थे। पर उन्होंने ऐतिहासिक फैसला किया। वाजपेयी को बुलाया और कहा कि क्या वे सरकार बनाने, स्थिर सरकार देने और बहुमत साबित करने की स्थिति में हैं? राजग के सांसदों की सूची तलब हुई। 272 के जादुई आंकड़े से 8 दूर रहने के बावजूद उन्होंने वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दिया। तत्कालीन राष्ट्रपति को आश्वासन मिला था कि टीडीपी के 12 सांसद न्यूट्रल रहेंगे। राष्ट्रपति ने फिर सोनिया गांधी से गुप्तगू की। सोनिया ने साफ कर दिया था कि वे सरकार बनाने का दावा नहीं करेंगी हां उन्हें सरकार बनाने के लिए न्यौता दिया जाना चाहिए, क्योंकि उनके चुनाव पूर्व गठजोड़ ने ज्यादा सीटें जीती हैं। तब राष्ट्रपति के सामने दो ही रास्ते थे-सबसे बड़े दल के रूप में वाजपेयी को बुलाया जाए या चुनाव पूर्व बने गठजोड़ को मिली ज्यादा सीटों को आधार बनाया जाए। उन्होंने सबसे बड़े दल तथा चुनाव बाद सबसे बड़े गठजोड़ को न्यौता दिया। वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। सरकार कैसे 13 माह में गई- सब जानते हैं। पर इस फैसले को सबने सराहा। 2004 में एपीजे कलाम ने •भी विखंडित जनादेश को झेला। हां हालात 89 व 98 जैसे नहीं थे। यूपीए की सरकार बनने से पहले तक उन्होंने •भी काफी माथापच्ची की। कलाम ने चुनाव बाद बने गठजोड़ को तवज्जो दी। लाख टके का सवाल यही है कि इस बार क्या होगा? प्रतिभा पाटिल किस परंपरा का निर्वाह करेंगी? किस नजीर से देश का वजीर ऐ आजम चुनेंगी? देश में जिस तरह का माहौल था चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान ही यह साफ हो गया था कि ना तो यूपीए को बहुमत मिलने जा रहा है और ना ही एनडीए को। तीसरा मोर्चा •भी चाहे गैर कांग्रेसी और गैर बीजेपी सरकार बनाने का बिगुल बजाए पर उसका राग बेसुरा ही होगा। उसके इस राग के पीछे एक मजबूत तर्क सिर्फ इतना है कि जब-जब खंडित जनादेश आया है तो देश में खिचड़ी सरकार पकी है। इस बार भी वह इसी आस में उछलकूद रहा है। चौथा मोर्चा बस अपनी स्थिति को मजबूत करने में जुटा था। यानि अलग-अलग सबके हाथ खाली। 16 मई को पिटारे से कोई जिन्न निकल आए तो यह चमत्कार ही होगा। अगर नहीं निकला और किसी तरह कोई सरकार खड़ी हो गई तो यह •भी कम चमत्कार नहीं होगा। कैसे होगा यही देखना है? दलों को पांचवे दौर से ज्यादा छठे दौर की चिंता सता रही है। परायों को अपना बनाने की चाल चली जा रही है। सियासी बिसात पर गोटियां चली जा रही हैं। बीजेपी व कांग्रेस को सबसे ज्यादा चिंता इस बात की सता रही है कि कहीं वे सबसे बड़े दल की रेस ना हार जाएं? इस रेस से सत्ता की रेस के तार सबसे मजबूती से जुड़े हैं। शंकरदयाल शर्मा व नारायणन की नजीर ने इसकी महत्ता बढ़ा दी है। यह माना जा रहा है कि चुनाव पूर्व गठजोड़ पर चुनाव बाद का कुनबा ज्यादा •भरी पड़ेगा और उस पर •भारी पड़ेगा सबसे बड़े दल का तमगा। जिसे राष्ट्रपति टास के लिए बुलाएंगी उसका सरकार बनाना और बहुमत साबित करना आसान हो जाएगा। जनता पारी खेल चुकी है। प्रतिभा पाटिल की बारी है। देखना है जोड़-तोड़ की रोड़ पर कौन होड़ में बाजी मारता है?

सीताराम-दूसरे की नींद हराम



देशपाल सिंह पंवार
देश की राजनीति में ऐसे बिरले ही होंगे जो हर विषय पर पकड़ रखते हों। वो घंटों धारा प्रवाह बोल सकता है। तर्क कर सकता है। सामने वाले को मजबूर कर सकता है। उसने जिंदगी से, कालेज से, किताबों से, आंदोलन से, घूमने से, पार्टी से, नेतागिरी से जो ज्ञान अर्जित किया उसके सहारे, बिना तैयारी के वो हर मसले पर बोल सकता है। हां सामने वाला पूरी तैयारी के बाद ही उससे टक्कर ले सकता है। पर उसे तर्को से डिगाना आसान नहीं। उसे उसकी सोच से हटाना आसान नहीं। उसे अर्थशास्त्र से लगाव था पर राजनीति से जुड़ाव है। उसने जब तक किताबी पढ़ाई की हर क्लास में टापर रहा। पर पार्टी में वह टापर तो नहीं हां टाप फाइव में जरूर है। उसने 22 साल की उम्र में लाल झंडा उठा लिया था। तब से आज तक इसके सहारे सारी दुनिया घूम चुका है। वो फिदेल कास्त्रों का फैन है। जब •भी मौका मिलता है नहीं चूकता। वैसे चूकने की उसे आदत भी नहीं है। उसे मौके भी मिलते हैं और वो मौके तलाश भी लेता है। दनादन वार करना उसकी आदत में शामिल है। पावर के साथ रहकर पावर पर ही वार का अनोखा खेल वही खेल सकता है। देख लीजिए 21 वीं सदी में मीडिया में उससे ज्यादा स्थान शायद देश के प्रधानमंत्री को भी नहीं मिला होगा। जबकि वो सिर्फ एक सांसद है। वो भी उच्चसदन में। वह किताबी ज्ञान के दौर में चाहे चुनाव लड़ा हो पर उसके बाद कभी नहीं। बिना चुनाव लड़े •भी देश की राजनीति और मीडिया पर छाया जा सकता है कोई इस नेता से सीखे। कारण-वो लाल झंडाबरदार है, अच्छा लेखक है,अच्छा विचारक है, अच्छा वक्ता है और उससे •भी बढ़कर आसानी से उपलब्ध रहने वाला वो नेता है जिसके बोल का मोल है। फिर मीडिया से उसके गहरे रिश्ते हैं। वो खुद पार्टी के मुखपत्र का संपादक है साथ ही प्रसिद्ध पत्रकार का पति। क्या बात खबर बनेगी, हल्ला मचायेगी यह उसको अच्छी तरह पता है। दिल्ली में जब भी शांति से सरकार चल रही हो वो चाहे नजर ना आए पर राजनीति का पारा जैसे ही गरम होगा वहां हाथ तापने वाले चेहरों में सबसे आगे वही दिखाई देगा। अपनी तरफ से पहल करेगा। आग में घी डालने का काम करेगा । पहले खराब करो-फिर ठीक करो तथा क्रेडिट लो इस नीति पर वो अमूमन कामयाब रहता है। 2004 में जिस तरह यूपीए सरकार बनाने, चलाने, कमाई खाने और हटाने में उसने रोल अदा किया था इस बार उससे बड़ा रोल वो अदा करेगा यह तय है। खंडित जनादेश सिर पर है। ऐसी स्थिति में ऐसे ही चेहरे कामयाब होते हैं जो गठजोड़ में उस्ताद हों। वो जानता है कब, कहां और कैसे किस पर हाथ रखना है, मनाना है,अपना असर बढ़ाना है। सब जीत की चिंता में डूबे हैं और वो कांग्रेस व बीजेपी का खेल खराब करने की मुहिम में जुटा है। राजनीति की यही माया है -एक गिरता है तो दूसरा मजबूत होता है। एक रोता है तो दूसरा हंसता है। उसके पास खोने को कुछ नहीं। लिहाजा वो हंसने वालों की जमात में से है। जो हंसिया लेकर काटता है और समय पर हथौड़ा चलाता है। इसे लोकतंत्र विडंबना ही कहा जाएगा कि 30-40 सीट पाने वाले सरकार या तो बनवाते हैं या सरकार गिरवाते हैं। फिर वो तो इस विधा का मास्टर है। अगर वो नेपाल में माओवादियों की सरकार बनवा सकता है तो फिर दिल्ली में लाल झंडा कैसे नीचा रह सकता है? वो भी उसके रहते। वो भी सत्ता सुख का खून मुंह लगने के बाद, ऐसा कैसे हो सकता है? तो तैयार रहिए और देखिए सत्ता की लड़ाई-गठजोड़ की कमाई-लोकतंत्र की दुहाई। फिल्म अच्छी लगे तो जरूर बोलिए-जय सीताराम।
सीताराम येचुरी

0- हैदराबाद के पास कलपक्कम में 12 अगस्त,1952 को जन्म। काकीनाड से परिवार यहां शिफ्ट हुआ था। हैदराबाद के सेंट हाईस्कूल से शुरूआती शिक्षा। 70 में हायर सेकेंडरी परीक्षा में देश में सर्वोच्च स्थान। तेलंगाना आंदोलन के कारण राज्य में अशांति। आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली में। 73 में सेंट स्टीफन्स से प्रथम श्रेणी में अर्थशास्त्र में बीए आनर्स। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से फिर प्रथम श्रेणी में अर्थशास्त्र में एमए। 74 में स्टूÞडेंट फेडरेशन आफ इंडिया के सदस्य। एक साल बाद माकपा ज्वाइन। आपातकाल में धरपकड़। कुछ समय अंडरग्राउंड रहने के बाद गिरफ्तार। पीएचडी पूरी नहीं कर सके। आपातकाल के बाद जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष। जेएनयू में लाल झंडा फहराने वाला और हास्टल पर वाम विचार धारा का कब्जा कराने वाला पहला शख्स। 77-78 में एक साल में तीन बार इस यूनियन के अध्यक्ष रहे। एक रिकार्ड़। 78 में एसएफआई के संयुक्त सचिव। फिर अध्यक्ष। 86 में इस्तीफा। माकपा की केंद्रीय समिति में। 85 में फिर निर्वाचित। 88 में केंद्रीय सचिवालय समिति में निर्वाचित। 92 से अब तक पोलित ब्यूरो के सदस्य। 2005 में उच्च सदन के लिए निर्वाचित। वाम विचारधारा का देश में बड़े लेखकों में से एक। तमाम विषयों का जानकार। तमाम अखबारों में नियमित कालम। कई किताबें लिखी। विवादित ढांचा गिरने के बाद लिखी गई किताब सैफरन ब्रिगेड सर्वाधिक चर्चित। हर समय घूमने की रिकार्डÞ। फिदेल कास्त्रो से कई दफा मुलाकात करने वाले कुछ वामनेताओं में से एक। पार्टी की ओर से तमाम इंटरनेशनल समारोह में शामिल। नेपाल में माओवादियों को लोकतंत्र की ओर लाने तथा सरकार बनाने में महत्वपूर्ण रोल। परमाणु करार पर सरकार के खिलाफ झंडा बुलंद करने वालों में से एक। पत्रकार सीमा चिश्ती से दूसरी शादी। पहली पत्नी से एक बेटा और एक बेटी। इस समय पार्टी के इंटरनेशनल विंग के अध्यक्ष और मुखपत्र के संपादक। इस बार सरकार बनाने में फिर महत्वपूर्ण रोल अदा करेंगे।

वरुण को राहत-माया पर आफत



देशपाल सिंह पंवार
वरुण गांधी से रासुका हटा लिया गया है। मायावती द्वारा थोपा गया फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट की ओर से गठित सलाहकार बोर्ड ने गलत ठहरा दिया है। फिर जेल जाने से ठीक पहले इस फैसले से वरुण गांधी भी राहत की सांस ले रहे होंगे और उनके समर्थक भी , साथ ही बीजेपी भी, आखिरी दौर में जिन 86 सीटों पर मतदान होना है उनमें से एक पीलीभीत भी है जहां से वरुण चुनाव लड़ रहे हैं। अब यहां पार्टी के चांस ज्यादा हो सकते हैं। यह वरुण के लिए राहत की बात हो सकती है। इसके अलावा उसे जेल में नहीं रहना होगा और दामन पर इसका दाग नहीं झेलना होगा। यह और ज्यादा राहत की बात है। जहां तक बीजेपी का सवाल है अगर बाकी सीटों पर अगले दो दिन में मायावती के इस फैसले के खिलाफ माहौल वो बना सकती है तो थोड़ा फायदा ले सकती है लेकिन समय कम है और पार्टी इसके लिए कितनी तैयार है और कितने वार कर पाएगी यह देखने वाली बात होगी। लेकिन उत्तर प्रदेश समेत बाकी मुस्लिम बहुल सीटों पर जितना नुकसान बीजेपी को होना था वो हो चुका और जितना फायदा मायावती को उठाना था वो उठा चुकी हैं। चार दौर समाप्त हो चुके हैं, ज्यादातर चुनाव पार हो चुका है। ऐसे में वरुण गांधी से रासुका हटने का फैसला जनता में जो संदेश देगा उसकी चोट मायावती को कम ही झेलनी होगी। उसकी जो चाल थी उसमें वो कामयाब है। वरुण गांधी के नाम को उछालकर मायावती ने एक तीर से दो शिकार तो कर ही लिए हैं। एक सपा के मुस्लिम वोट बैंक में सैंध और दूसरा बीजेपी को दबाव में लाना। मायावती का बीजेपी से ज्यादा सपा को कमजोर करने का मकसद था। वो जानती थी कि अगर मुस्लिम वोट बैंक सपा की ओर से बसपा का रुख कर लें तो वो बाजी पलट सकती हैं। फिर इस प्रकरण का फायदा बीजेपी को भी था। दोनों में सांठगांठ है इसके आरोप मुलायम सिंह यादव लगाते आ रहे हैं। अगर दोनों ने चुनाव बाद हाथ मिला लिए तो यह साबित हो जाएगा। अगर ऐसा होता है तो यह बड़ा राजनीतिक दांव कहलाएगा। जिसके झांसे में पूरा देश फंसा रहा। फिलहाल महत्वपूर्ण सवाल यही है कि वरुण प्रकरण से बीजेपी ने पाया है या खोया है? क्या हिंदु वोटर इस मसले पर उसके साथ जुड़ा है? अगर नहीं तो मायावती का फायदा और भी ज्यादा है। वैसे इस फैसले से कई ऐसे सवाल भी खड़े हो गए हैं जिनके जबाव जितनी जल्दी तलाश लिए जाएं उतने ही बेहतर। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश और समाज के अहित में कोई भी वाणी किसी को नहीं बोलनी चाहिए लेकिन कोर्ट की नजर में वरुण पर रासुका लगाना अगर गलत था तो फिर इस गलती को करने वालों के लिए कोई सजा क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या सत्ता में बैठे राजनेताओं को अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल करने पर बंदिश नहीं होनी चाहिए? क्या वे यूं ही विरोधियों की जुबान पर कानून के मनमाने ताले लटकाते रहेंगे? बड़ा सवाल यह •भी है कि इस कानून के सहारे जितना फायदा मायावती ने अब तक उठाया है क्या वो जायज ठहराया जा सकता है? केवल फैसलों को गलत या सही बताने की बजाय अब समय यह •भी आ गया है कि माननीय अदालतें ऐसे फैसले करने वालों के लिए •भी सजा का प्रावधान करें ताकि फिर कोई कानून का बेजा इस्तेमाल अपने राजनीतिक हित के लिए न कर पाए? चित्त भी मेरी और पट्ट भी मेरी की थ्योरी पर चलने वाले ऐसे सत्ताधारी नेताओं के लिए यह फैसला सबक है। चुनाव आयोग ने जिस तरह तेजी दिखाई और वरुण गांधी को चुनाव मैदान में ना उतारने की बात कही क्या आयोग इससे कोई सबक लेगा? लेकिन जिन्हें सिर्फ अपना कहा और किया सही नजर आता हो और दूसरों का गलत वो इस फैसले पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं यह देखने वाली बात होगी। मायावती वैसे सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कह रही हैं लेकिन इसमें भी संशय है। चुनावी नतीजों तक वह ऐसा नहीं करने जा रही है यह तय है।