
देशपाल सिंह पंवार
कोई चीज सामने हो उसका डर हो तो समझ में आता है। लेकिन जिस चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं हो, फिर •भी उसका नाम फिजां में गूंजता रहे - है ना अनोखी बात। इससे भी अनोखी बात यह है कि चंद लोगों की हमकदमी, सोच और जुबान से पैदा एक नाम की तख्ती को इस तरह मीडिया तथा जनता के सामने पेश कर दिया जाता है जैसे वही राज के लिए बना है, दिल्ली के ताज के लिए बना है। उसके रहते और किसी का नंबर नहीं आने वाला। नाम भी ऐसा जो पांच साल बाद केवल उतने ही वक्त दिखाई देता है और जिंदा रहता है जब तक सीटों की डील नहीं होती, वोटों की डील नहीं होती और दिल्ली की गद्दी में शेयर की डील नहीं होती। जोश में शुरू होता है और होश के साथ सत्ता की चासनी में डूबते ही नाम मदहोश हो जाता है। खुमारी फिर चुनाव के वक्त ही टूटती है। जब वास्तव में कुछ करने या दिखाने का नंबर आता है या कहा जाए खिताबी जंग की बारी आती है तो सारी लोच-सोच में इस तरह मोच आ जाती है कि दूर-दूर तक दर्शन नहीं होते। तीसरे मोरचे का हाल बिल्कुल ऐसा ही है। वीपी, देवेगौड़ा, गुजराल के समय में मोरचा नाम की सरकार क्या बनी कि बस यही नाम नैय्या पार लगाने के लिए नजर आता है।पिछले साल परमाणु करार पर जब मनमोहन सरकार को गिराने की कोशिशें विफल हो गई तो हार से खिसियाए और दिल्ली में अनफिट चंद नेता फिर धूल झाड़कर तीसरे मोरचे की तख्ती को हाथ में लेकर खड़े हो गए। दिल्ली में ही सरकारी बंगलों में रहते हैं इसलिए मिलने में •भी दिक्कत नहीं हुई। दावत-पानी के दौर में ऐलान हो गया-इस बार तीसरा मोर्चा सत्ता हथियाएगा। गैर कांग्रेसी-गैर बीजेपी सरकार बनाएगा। कागज पर कुछ तय हुआ नही- वास्तविकता का अमली जामा पहनाया नहीं गया, एक झंडे के नीचे चुनाव लड़ा नहीं गया, पर मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में लाल किले की प्राचीर नजर आने लगी। मतदान तक यह भोंपू खूब बजा। जैसे ही सिर पर जनादेश मंडराया। कथित मोरचे के सहयोगी खिसकने लगे। टीआरएस ने राजग का पाला पकड़ लिया। तीसरे मोरचे के जनक देवगौड़ा के बेटे मुंह छिपाकर सोनिया गांधी से मिलने चले गए। कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे कि रट लगाने वाले वामदल सापं्रदायिक ताकतों के खिलाफ जंग के लिए हाथ का साथ देने की बात करने लगे। ममता, नायडू, जयललिता ऊंट को घूरने लगे कि वो किस करवट बैठेगा? यानि पानी का बुलबुला फूट चुका है। हकीकत यही है कि सत्ता की रेस के दो घोड़ों के लिए सबसे आसान चारा यही कथित तीसरा मोरचा है। सवाल यही है कि जिस गठजोड़ का न तो कागजों पर वजूद है और न ही चुनाव आयोग के दफ्तर में तो फिर वो मोरचा किस आधार पर देश की गद्दी के ख्वाब देख रहा था? सवाल यह भी है कि क्या इसे तीसरा मोरचा कहना सही है? अगर इसका वजूद नहीं तो फिर लालू-मुलायम और पासवान की तिकड़ी का मोरचा चौथा क्यों कहा जाता है? कड़वा सच यही है कि जनादेश के बाद 2-2,4-4 सीट जीतने वालों का जहां मोल होगा वहां उनका ढोल पिटेगा। वामदलों को या तीसरे मोरचे को ये बात समझ में क्यों नहीं आती कि बिना कांग्रेस के समर्थन के उसकी सरकार बन नहीं सकती और राजग के साथ वे जा नहीं सकते। फिर परमाणु करार का ढोल पीटने से क्या फायदा?
कोई चीज सामने हो उसका डर हो तो समझ में आता है। लेकिन जिस चीज का कोई अस्तित्व ही नहीं हो, फिर •भी उसका नाम फिजां में गूंजता रहे - है ना अनोखी बात। इससे भी अनोखी बात यह है कि चंद लोगों की हमकदमी, सोच और जुबान से पैदा एक नाम की तख्ती को इस तरह मीडिया तथा जनता के सामने पेश कर दिया जाता है जैसे वही राज के लिए बना है, दिल्ली के ताज के लिए बना है। उसके रहते और किसी का नंबर नहीं आने वाला। नाम भी ऐसा जो पांच साल बाद केवल उतने ही वक्त दिखाई देता है और जिंदा रहता है जब तक सीटों की डील नहीं होती, वोटों की डील नहीं होती और दिल्ली की गद्दी में शेयर की डील नहीं होती। जोश में शुरू होता है और होश के साथ सत्ता की चासनी में डूबते ही नाम मदहोश हो जाता है। खुमारी फिर चुनाव के वक्त ही टूटती है। जब वास्तव में कुछ करने या दिखाने का नंबर आता है या कहा जाए खिताबी जंग की बारी आती है तो सारी लोच-सोच में इस तरह मोच आ जाती है कि दूर-दूर तक दर्शन नहीं होते। तीसरे मोरचे का हाल बिल्कुल ऐसा ही है। वीपी, देवेगौड़ा, गुजराल के समय में मोरचा नाम की सरकार क्या बनी कि बस यही नाम नैय्या पार लगाने के लिए नजर आता है।पिछले साल परमाणु करार पर जब मनमोहन सरकार को गिराने की कोशिशें विफल हो गई तो हार से खिसियाए और दिल्ली में अनफिट चंद नेता फिर धूल झाड़कर तीसरे मोरचे की तख्ती को हाथ में लेकर खड़े हो गए। दिल्ली में ही सरकारी बंगलों में रहते हैं इसलिए मिलने में •भी दिक्कत नहीं हुई। दावत-पानी के दौर में ऐलान हो गया-इस बार तीसरा मोर्चा सत्ता हथियाएगा। गैर कांग्रेसी-गैर बीजेपी सरकार बनाएगा। कागज पर कुछ तय हुआ नही- वास्तविकता का अमली जामा पहनाया नहीं गया, एक झंडे के नीचे चुनाव लड़ा नहीं गया, पर मुंगेरी लाल के हसीन सपनों में लाल किले की प्राचीर नजर आने लगी। मतदान तक यह भोंपू खूब बजा। जैसे ही सिर पर जनादेश मंडराया। कथित मोरचे के सहयोगी खिसकने लगे। टीआरएस ने राजग का पाला पकड़ लिया। तीसरे मोरचे के जनक देवगौड़ा के बेटे मुंह छिपाकर सोनिया गांधी से मिलने चले गए। कांग्रेस के साथ नहीं जाएंगे कि रट लगाने वाले वामदल सापं्रदायिक ताकतों के खिलाफ जंग के लिए हाथ का साथ देने की बात करने लगे। ममता, नायडू, जयललिता ऊंट को घूरने लगे कि वो किस करवट बैठेगा? यानि पानी का बुलबुला फूट चुका है। हकीकत यही है कि सत्ता की रेस के दो घोड़ों के लिए सबसे आसान चारा यही कथित तीसरा मोरचा है। सवाल यही है कि जिस गठजोड़ का न तो कागजों पर वजूद है और न ही चुनाव आयोग के दफ्तर में तो फिर वो मोरचा किस आधार पर देश की गद्दी के ख्वाब देख रहा था? सवाल यह भी है कि क्या इसे तीसरा मोरचा कहना सही है? अगर इसका वजूद नहीं तो फिर लालू-मुलायम और पासवान की तिकड़ी का मोरचा चौथा क्यों कहा जाता है? कड़वा सच यही है कि जनादेश के बाद 2-2,4-4 सीट जीतने वालों का जहां मोल होगा वहां उनका ढोल पिटेगा। वामदलों को या तीसरे मोरचे को ये बात समझ में क्यों नहीं आती कि बिना कांग्रेस के समर्थन के उसकी सरकार बन नहीं सकती और राजग के साथ वे जा नहीं सकते। फिर परमाणु करार का ढोल पीटने से क्या फायदा?