सोमवार, 22 जून 2009

जान के नाम पर घमासान




देशपाल सिंह पंवार
जिस जल,जंगल और जमीन पर हक पाने को कुछ सिरफिरों ने दशकों पहले आंदोलन का रास्ता अपनाया था,गरीबों को उकसाया था,सरकारी व्यवस्था को निशाना बनाया था,हथियारों से नया जमाना लाने का इरादा जताया था,वह आंदोलन और उसे चलाने वाले नक्सली संगठन अब पूरी तरह उसी जल, जंगल और जमीन को मटियामेट करते जा रहे हैं। हैरत इस बात की है कि फिर भी जनता इनके गलत इरादों को नहीं •भांप पा रही है। उसे समझा और सिखा दिया गया है कि अब जान के लिए झगड़ा है। जिंदा रहने का सवाल है। हर रोज बारूदी सुरंगों से जमीन का सीना फटता जा रहा है। खून से उसी जमीन का दामन रंगता जा रहा है। इस पागलपन से जल भी लाल हो गया है और जंगल भी धमाकों से उजड़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं इन जंगलों में बसेरा करने वाले पक्षी कब के डर कर जा चुके हैं और जानवर भी मौत के डर से नया ठिकाना तलाश रहे हैं। हैरत की बात यही है कि रोजाना के धमाकों से अपना ही सब कुछ लूटते जनता देख रही है, फिर भी खामोश है। छत्तीसगढ़ हो या दूसरे राज्यों के नक्सल प्रभा वित क्षेत्र। सब जगह जमीन में नक्सलियों ने बारूद बिछा दिया है। पता नहीं,कब, कहां किसका पैर पड़े और यमराज की गाज आ गिरे। आए दिन तमाम मां के लाल छिन रहे हैं। औरतें विधवा हो रही हैं। जवान शहीद हो रहे हैं। दंतेवाड़ा की सीमा के पास तोंगपाल थाने के कोकावाड़ा में शनिवार की शाम यही कायराना हरकत फिर नक्सलियों ने की। सीआरपीएफ के जवानों से अटे ट्रक को बारूदी विस्फोट से उड़ा दिया। एक दर्जन जवान शहीद हो गए। इतने ही घायल अस्पताल में मुश्किल से सांस ले रहे हैं। आखिर ये कैसा खूनी खेल है? किसके लिए वे खून बहा रहे हैं? जहां मिट्टी की सौंधी गंध बारूद की बदबू में बदल चुकी हो, जहां की हवा में धमाकों का जहर घुल चुका हो, वहां वो कौन सा हवामहल खड़ा करना चाहते हैं? जब कुछ बचेगा ही नहीं तो फिर क्या पाने के वास्ते ये पागलपन की जंग लड़ी जा रही है। ऐसी कायराना हरकतों की देश के हर शख्स को तीव्र निंदा करनी चाहिए। इन इलाकों में रहने वाली जनता को भी अब ऐसे सिरफिरों को सबक सीखाने के लिए मोरचा ले लेना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि वो अब हथियार डालने का इन नक्सली संगठनों को आखिरी मौका दे और तय सीमा निकलने के बाद इनके खात्मे के वास्ते निर्णायक जंग लड़े। बातों से शायद ही इनकी समझ में समाज बड़ा है, राज्य बड़ा है और सबसे ज्यादा देश बड़ा है कि बात समझ में आएगी। सीमा के अंदर गदर कर रही इन ताकतों को एक बार नेस्तानाबूद करना ही होगा। तरक्की के रास्ते में ये सबसे बड़ा रोड़ा हैं। जमीन बरबाद हो रही है। जल गंदा हो रहा है। जंगल जल रहे हैं। लोग मर रहे हैं। हवा प्रदूषित हो रही है। विकास चौपट हो रहा है। अब नक्सली संगठनों को हमेशा के लिए खत्म करने का वक्त आ गया है। ज्यादा देरी से यह देश दंतेवाड़ा जैसी और ना जाने कितनी बारूदी सुरंगें फटते हुए देखेगा। जवानों को शहीद होते देखेगा। अब देखने का नहीं करने का वक्त आ गया है।

साइना नेहवाल-कर दिखाया कमाल



देशपाल सिंह पंवार
जय हो साइना नेहवाल की, हिसार की, हरियाणा की, हिंदुस्तान की। 19 साल की साइना ने 49 मिनट में इतिहास रच डाला है। इंडोनेशिया ओपन खिताब अब नेहवाल के नाम है। सुपर सीरिज टूर्नामेंट जीतने वाली वो पहली इंडियन हैं। साइना की जीत कई मायनों में बेमिसाल है। उसने सिंगापुर ओपन में मिली हार का बदला •भी चुकाया । साथ ही बैडमिंटन कोर्ट पर न केवल चीनी और इंडोनेशियन साम्राज्य को ध्वस्त किया बल्कि यह भी जता दिया कि रैंकिंग मायने नहीं रखती। अगर देश की आन-बान-शान का जज्बा दिल में हो तो हर नतीजा पाया जा सकता है। देश की नंबर एक और दुनिया की नंबर 6 साइना ने अपने से कहीं ज्यादा मजबूत चीन की वांग लिन को कोर्ट पर ऐसा नचाया कि हर कोई हैरत में था। पहला गेम जब साइना हार गई तो ऐसा लग रहा था कि नतीजा विपरीत ही होगा। पर इसके बाद वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी पर साइना को यकीन था। उसका यकीन इसी बात से झलकता है कि आखिरी गेम में चीनी खिलाड़ी किसी तरह नौ ही अंक जुटा पाई। इस जीत को प्रकाश पादुकोन तथा पी गोपीचंद की उपलब्धि के समकक्ष माना जा रहा है। यह जीत ऐसे समय में मिली है जब 20-20 में धोनी एंड कंपनी की हार से इंडियन खेल पे्रमी उदास थे। महिला क्रिकेट टीम की हार से निराश थे पर अब साइना की जीत से पूरे देश में उल्लास है। सबको उस पर गर्व है। पिता डा हरवीर सिंह को गर्व है। इन पलों का ही उन्हें अरसे से इंतजार था। हिसार की धरती पर साइना ने जन्म लिया और हैदराबाद में 8 साल की उम्र में रैकेट थामा। उसका जज्बा देख वैज्ञानिक पिता ने तब से अपनी आधी आमदनी और सारा पीएफ का पैसा उसके सपने पूरे करने में लगा दिया। उसे स्टेडियम ले जाने के लिए वो रोज 50 किमी स्कूटर दौड़ाते थे। 99-04 तक उसे कोई प्रायोजक भी नहीं मिला था। किसी तरह वो आगे बढ़ती गई। लगन की पक्की थी। ना फिल्म देखने का शौक था और ना ही सहेलियों संग पार्टी का। खेल की वजह से पढ़ाई पर भी असर पड़ा। लेकिन कहावत है कि मेहनत कभी जाया नहीं जाती। 2007 में जिस तरह साइना खेली और 2008 में जब उसे विश्व बैडमिंटन संस्था ने सबसे बेजोड़ खिलाड़ी घोषित किया तो साफ लग गया था कि एक ना एक दिन साइना धमाका जरूर करेगी। वो दिन आखिरकार आ ही गया और सचमुच यह साइना की मेहनत और एक पिता के प्यार और मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि ये सुनहरी पल हमारे हैं। ठीक फादर्स डे के मौके पर एक पिता को एक बेटी की ओर से इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता है? ऐसे तोहफे पर सारी दौलत और मेहनत कुर्बान। देखना यही है कि जिस तरह क्रिकेट पर पैसा बहता है क्या इस लड़की की हौसलाआफजाई के लिए भी लोग आगे आएंगे? फिलहाल साइना की जीत पर मंगल गीत गाने का दिन है। ढेर सारी मंगलकामनाएं। साइना इसी तरह और खुशियों के पल लेकर आए।जीत का सफर * 2003 में चेकोस्लोवाकिया में जूनियर ओपन टूर्नामेंट जीता।* 2004 में बेडिगो (आॅस्ट्रेलिया) में आयोजित दूसरे कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक पर कब्जा।* कनाडा में 2004 में हुए जूनियर विश्व कप में प्री-क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई।* एशियन सेटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट का खिताब अपनी झोली में डाला। * विश्व जूनियर बैडमिंटन चैंपियन्स में फाइनल तक पहुँचने में कामयाब।*कॉमवेल्थ खेलों में मिश्रित समूह स्पर्धा के सेमीफाइनल में उच्च वरियता प्राप्त ट्रेसी हालम को हराया।* मलेशिया की जूलिया झिएन पी वाँग और कई अन्य उच्च वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों को हराकर फिलिपींस ओपन स्पर्धा जीती। * इंडियन इंटरनेशनल सेटेलाइट बैडमिंटन चैंपियनशिप की विजेता।*जनवरी 2007 में पटना में आयोजित राष्टÑीय बैडमिंटन (अंडर-19) चैंपियनशिप जीती। इसी साल मार्च में गुवाहाटी में हुई स्पर्धा में स्वर्ण पदक प्राप्त 33वीं राषट्रीय खिलाड़ी बनीं।