
देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि जर,जोरू और जमीन ही सब झगड़ों की जड़ हैं। नक्सलवाद भी इनमें से ही एक जमीन की वजह से उपजा। जमीन की लड़ाई की दुहाई देते-देते और कमाई खाते-खाते आज सारी जमीन ही खून से लाल हो गई है। बंजर हो गई है। सोच कंजर हो गई है। चारों ओर खून-खराबे का मंजर हो गई है। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से 42 साल पहले उठा यह जुनून आज देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। कश्मीर से भी बड़ा। इस समय 20 हजार से भी ज्यादा नक्सली विंग देश विरोधी साजिश में लिप्त हैं। देश की 40 फीसदी जमीन को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। 92 हजार किलोमीटर रकबा इस जुनून की आग में जल चुका है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में दहशत फैला रहा है। 30 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। देश की लगभ ग 10 लाख करोड़ संपत्ति को सीधे-सीधे निगल चुका है। फिर •भी इसका पेट खाली है। गेट नहीं गिरा है। वेट नहीं गिरा है। सोचिए अगर नक्सलवाद से ये नुकसान नहीं हुआ होता तो विकास के मामले में देश किस स्थिति में होता? जिस विकास की चाह में इन लोगों ने हथियार उठाए थे वही हथियार आज उन इलाकों के विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं जहां ये अपना शिकंजा जमाए हुए हैं। खुद सरकारी व्यवस्था और संविधान पर विश्वास नहीं और अपने साथ करोड़ों निर्दोष लोगों के जीवन से खेलने की इनकी सोच का ही नतीजा है कि जहां-जहां नक्सलवाद जड़ जमाए हुए है वहां विकास नहीं विनाश की ज्वाला फूट रही है। जो जीवन देश और समाज हित में काम आना चाहिए था वो देश और समाज पर निशाना साधने में बीत रहा है। जंगल की खाक छानने में बीत रहा है। अपनों को मारने में बीत रहा है। देश की संपदा को तबाह करने में बीत रहा है। अपनों को बर्बाद करने में बीत रहा है। देश के विकास को चौपट करने में बीत रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के किसी •भी कोने में हथियारों के बल पर नया जमाना नहीं आया। सरकारी व्यवस्था को ना मानने और हथियारों के बल पर देश में नक्शा पलट की इनकी सोच का आधार क्या है ये तो यही जानें पर इस सोच से देश की चाल में मोच जरूर आ गई है। 25 मई, 1967 में जब नक्सलबाड़ी से चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने आंदोलन शुरू किया था,तब ही हिंसा की नींव पड़ गई थी। जमीन को लेकर आए दिन के हमलों ने जता दिया था कि आने वाला समय कैसा होगा? कोलकाता में कालेज से निकलने वाले छात्र इनके विचारों के झांसे में आते गए। जनता बढ़ती गई। हिंसा बढ़ती गई। एक समया ऐसा भी आया कि सारे स्कूल बंद कर दिए गए। नक्सली छात्रों ने जादवपुर विवि पर कब्जा कर लिया। मशीन दुकानों में पुलिस से टक्कर के लिए पाइपगन बनाने लगे। मुख्यालय कोलकाता के प्रेसिडेंट कालेज को बना डाला। उनके निशाने पर जमीन मालिक तो थे ही। साथ ही अध्यापकों, नेताओं, सरकारी अफसरों और पुलिस अफसरों को भी उन्होंने असली दुश्मन घोषित कर दिया। मजूमदार की लीडरशिप के खिलाफ 71 में बगावत हुई। 72 में अलीपोर जेल में उनकी मौत। इससे नक्सली आंदोलन को गहरा झटका लगा। 80 के दशक तक आते-आते इन नक्सली नेताओं के अलावा 30 से ज्यादा नक्सली गुट बन गए थे। 30 हजार से ज्यादा नक्सली इन गुटों में शामिल थे। ये न्याय दिलाने के नारे लगाते थे और विरोधियों को मौत के घाट उतार देते थे। 90 के दशक में नक्सलवाद और तेजी के साथ फैला। केंद्र सरकार भी यह मानती है कि पाकिस्तान और कश्मीर के आतंकवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक नक्सलवाद है। हर साल तबाह होने वाली संपत्ति बढ़ती जा रही है। नक्सलवाद की वजह से जान गंवाने वाले भी हर साल बढ़ रहे हैं। मां से बेटे छिन रहे हैं। बहन से भाई छिन रहे हैं। औरतों से सुहाग और देश से लाल। अभी पांच साल की संख्या पर अगर निगाह डाली जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस हद तक जमीन की चाह खूनी खेल की राह बन गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2004 में 570,05 में 893, 06 में 749, 07 में 654, 08 में 938 लोगों ने नक्सली हिंसा में जान गंवाई। सब जानते हैं कि सरकारी आंकड़ों से कितने गुणा मरने वालों की असली संख्या होती है। आगे आने वाले बरसों में ये जुनून और कितना खून पिएगा यह समय ही बताएगा। पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके फैलाव पर अंकुश उस तरह नहीं लग पाया जितना अब तक लग जाना चाहिए था। इसका खास कारण यही है कि नक्सलियों ने हर उस इलाके में अपनी पकड़ जमाई जहां विकास ज्यादा नहीं हुआ था। जंगलों का फायदा उठाया। सरकारी व्यवस्था से निराश ग्रामीण जनता को उकसाया और उसके सहयोग से अपना सिक्का जमाया। जिस कौम को इन्हें ठीक करने में सहयोग करना चाहिए था वही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। यही सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है। जंगल के रास्ते सब राज्यों की सीमा जुड़ी होने से भी इन्हें अपना दायरा बढ़ाने में मदद मिली। साथ देश और समाज विरोधी ताकतों से भी रिश्ते जगजाहिर रहे हैं। चाहे वीरप्पन था या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई या अब आतंकवादी संगठन लश्कर। सबने इनकी खुराक बढ़ाई। खूंखार बनाया। आधुनिक हथियारों से लैस कराया। देश के उन क्रीम इलाकों तक इसने अपना शिकंजा जमाया जो देश की तरक्की में अहम रोल प्ले करते हैं। इसके अलावा देश के बाकी तमाम हिस्सों में भी ऐसे-ऐसे अलगाववादी गुट अरसे से जंग लड़ रहे हैं जिनका मकसद कभी पूरा नहीं होगा। मौका पड़ने पर ये सब आपस में हाथ मिला लेते हैं। सरकार इन्हें कुचलने को सीरियस है। जनता इनसे छुटकारा पाने को अधीर है। ये तय है कि एक दिन नक्सलवाद बर्बाद होगा,अमन का दौर आबाद होगा लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि किस कीमत पर? बड़ी कीमत वसूल चुका है। देश और जनता को इसकी और क्या कीमत चुकानी होगी, कितनी कुर्बानी देनी होगी यही सबसे बड़ा सवाल है।