रविवार, 5 अप्रैल 2009

पवार की चाल

देशपाल सिंह पंवार
जिस क्षेत्र की नींव ही संभावना पर टिकी हो,सिद्धांत से ज्यादा संख्या का महत्व हो,गद्दी के लिए दल और दिल तोड़ना गौरवशाली परंपरा हो, दूसरों की तबाही पर जश्न होता हो,झूठ बोलना आदत हो, दूसरों के हक पर डाका डालना फितरत हो, गलत नीयत और नीति की रीत हो,गिरगिट की तरह रंग बदलना खूबी हो, घूस खाना जरूरी हो, घपलेबाज, धंधेबाज, बलात्कारी और बेईमान भी मंत्री बनते हों,धोखा देना जायज ठहराया जाता हो, सत्ता छीनना मास्टर स्ट्रोक माना जाता हो, सरकार गिराना सही वार ठहराया जाता हो उस क्षेत्र के दिग्गज जब विश्वास के खून की बात करते हैं तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है,इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? आखिर इन राजनेताओं को ये समझ में क्यों नहीं आता कि ये उनकी कथनी और करनी का ही फल है। वे कुछ भी कहें और करें तो सही-दूसरा वही कहे और करे तो गलत ये कौन सी रीत है? किस धुन पर बजता कौन सा गीत है? उदारवाद लोकतंत्र की जननी इस धरती का गहना रहा है लेकिन जबसे आर्थिक उदारवाद ने इस धरती पर पैर पसारे हैं इसका देश के ढांचे और जनता की सेहत पर चाहे जो असर पड़ा हो लेकिन कम से कम राजनीति में इसका दूसरा ही मतलब निकाल लिया गया। जो चाहे करो-नो प्रोब्लम। जनहित से स्वहित में डूबे नेताओं ने राजनीति की धारा को इतना मैला कर दिया है कि अब राजनीति और राजनेताओं से जनता का भरोसा ही डिग गया है। वो भरोसा जिसका न कोई विकल्प था, न है और न होगा। जिस पर सारी दुनिया, सारे राज्य, सारे समाज, सारे घर, सारे रिश्ते टिके हैं और चल रहे हैं। जहां ये नहीं वहां ठीक वही होता है जो आज राजनीति में हो रहा है। पहले राजनीति का मकसद जनसेवा था आज खुद की मनसेवा, धनसेवा और गनसेवा का जमाना है। किसी को किसी पर भरोसा नहीं। जुबान के मीठे-दिल के काले और करनी के जहरीले तमाम नेताओं के कारनामें रंगीले हैं। वे कल भी माननीय थे, आज भी माननीय कहलाते हैं और कल भी माननीय बनने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं। दूसरे की टांग खींचना, कपड़े उतारना, चरित्र हनन करना,खदेड़ना, पछाड़ना, तबाह करना उनके बाएं हाथ का काम है, एक बोल का काम है। यूं तो राजनीति की अंतिम मंजिल ही प्रधानमंत्री बनना है,ऐसे में हर किसी की यह ख्वाहिश और कोशिश हो तो गलत ही क्या है? हां पहले नतीजों के बाद प्रधानमंत्री चुनने की परंपरा थी पर इस बार पहले ही प्रधानमंत्री बनने वालों की घुड़दौड़ शुरू हो गई है। रेस में संख्या इतनी है कि अगर हर साल दो को भी चांस दिया जाए तब भी पांच साल में यह संख्या नहीं घटेगी। उल्टे बनिया के सूद और बेल की तरह बढ़ती जाएगी। जहां कोई किसी को प्रधानमंत्री मानने या बनवाने को तैयार नहीं तो फिर ऐसे माहौल में शरद पवार का क्या कसूर? आखिर 38 साल की उम्र में जो शख्स महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बन गया हो, 1991 में हाथ में आई प्रधानमंत्री की गद्दी नरसिम्हा राव की ओर छिटक गई हो वो कब तक बाट जोहता रहे और क्यों जोहता रहे? इसके लिए कितने पापड़ पवार ने बेले, कितने गुरु व चेले ठेले यह मेहनत -मशक्कत और जोड़-तोड़ या तो पवार जानते हैं या फिर वे जो उनकी गुगली पर विकेट उखड़वाते रहे। कांग्रेस या कांग्रेसियों को तो यह ज्यादा पता होगा। नहीं पता तो फिर ऐसे राजनेता कांग्रेस में क्यों और पवार का इसमें क्या दोष? वे तो 18 साल से इस ताज के लिए साज बजाते आ रहे हैं। 2004 में भी उन्होंने यह राग अलापा था। आखिर इस मराठा शेर (?) से कितने सब्र की आस कांग्रेसी लगाए बैठे है यह समझ से परे है। इस बार आर या पार की लड़ाई लड़ रहे पवार अगर लगातार मनमोहन सिंह और यूपीए पर वार कर रहे हैं तो इसमें हैरत की बात क्या है? अगर अपने से कहीं कम तजुर्बेकार मनमोहन सिंह को वे यूपीए का भावी प्रधानमंत्री मानने को तैयार नहीं तो इसमें हैरत की बात क्या है? हां हैरत की बात यह है कि मंजिल हासिल करने के वास्ते वे एक साथ कई नाव पर बखूबी सवार हैं। राजनीति के पहले और फिलहाल अकेले सवार हैं। एक ही समय में वे यूपीए का हिस्सा हैं। एग्रीकल्चर मिनिस्टर हैं। मनमोहन पर वार कर रहे हैं। कांग्रेस से तकरार कर रहे हैं। उसी कांग्रेस से मिलकर महाराष्ट्र में चुनाव लड़ रहे हैं। बाल ठाकरे से तारीफ करवा रहे हैं। मनमोहन के अनुयायी लालू-मुलायम और पासवान के त्रिगुट को पटाए हुए हैं। वामपंथियों से पींगे बढ़ा रहे हैं। तीसरे मोरचे की रैली को फोन से संबोधित कर रहे हैं। भला मायावती उनसे दूर कैसे रह सकती हैं? वहां भी गोटी फिट कर चुके हैं। अगर और कोई मोरचा चुनाव के बाद उभरा तो उसे भी साधने का प्रयास होगा ही होगा। नदियों या निजी जीवन में भले ही दो नावों की सवारी घातक होती हो लेकिन राजनीति के मैदान में वे नई परिभाषा गढ़ चुके हैं। इतनी मशक्कत और दांवपेंच के बाद वे पीएम की गद्दी पर पहुंचेंगे या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन हां यह जरूर है कि राजनीति में एक नई परिपाटी उन्होंने जरूर डाल दी है। एक-दो जगह हाथ पैर मारने वाले नेताओं को अब इस मराठा शेर से सबक सीख लेना चाहिए। हो सकता है चुनावी नतीजों के बाद या अगले चुनाव तक इस नजीर के फकीर ढेरों वजीर राजनीति की इस धारा के मीर की ठसक में हों। इस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए। शरदचंद्र गोविंदराव पवार राजनीति का एक ऐसा नाम हैं जिनके चरित्र के कई विरोधाभाष रहे। जनता उन पर हमेशा विश्वास करती रही लेकिन राजनीति में वे अविश्वास की रेखा पार नहीं कर पाए। जिसके साथ चले उसकी ही गद्दी के पैर हिले। बारामती की तकदीर बदल दी लेकिन चीनी लाबी का बेताज बादशाह और ताकतवर राजनेता होने के बावजूद पीएम पद तकदीर में नहीं लिखवा पाए। 12 दिसंबर 1940 को बारामती में पैदा इस मराठे की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह महाराष्ट्र के हर गांव, हर कस्बे, हर शहर को अपने पैरों से नाप चुके हैं। शायद ही निचले स्तर का कोई भी ऐसा नेता हो जिसे शरद पवार नाम और शक्ल से न जानते हों। हवा और एसी कमरों में बैठकर राजनीति करने वाले नेताओं के लिए यह एक सबक है। हमेशा जमीन से जुड़ने का ही नतीजा है कि वे 50 साल से राजनीति के शिखर पर हैं। 1967 में ही वे बारामती से विधायक बन गए थे। अपनी जन्मभूमि को उन्होंने नई पहचान दी। खेती-किसानी के सहारे गुजारा करने वाला यह इलाका कल कारखानों से पटा पड़ा है। जहां ज्यादातर महाराष्ट्र हर साल सूखा झेलता है बारामती पवार की पावर से हमेशा पानी से सराबोर रहता है। गरम की बजाय शरद का एहसास देता है। याद करिए -1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी लहर में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता हार गए थे तब पवार भारी मतों से पहली बार लोकसभा चुनाव जीत गए थे। उस समय तक उन्हें महाराष्ट्र की ही राजनीती रास आती थी। संसद में आने पर भी वे वापस महाराष्ट्र लौट गए थे। वह शरद पवार ही थे जिन्होंने एक सब इंस्पेक्टर सुशील शिंदे को 1973 में राजनीति में उतरने की सलाह दी थी। शिंदे कहां तक पहुंचे यह सबको पता है। वे प्रतिभा के खोजी थे। अपनी महारथ और दूरगामी सोच से 1978 में महज 38 साल की उम्र में ही वे मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंच गए थे हां जोड़-तोड़ से। कांग्रेस को उन्होंने तब पहली बार झटका दिया था, वह भी वसंतदादा पाटिल जैसे मंझे हुए मुख्यमंत्री के रहते कांग्रेस को तोड़ा और जनता पार्टी के समर्थन से इस गद्दी तक पहुंचे। इसके बाद 8 साल तक कांग्रेस से बाहर रहे। 1985 में उनकी कांग्रेस एस पार्टी दूसरे नंबर पर रही। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने उनपर भरोसा जताया। 1987 में वापस कांग्रेसी बने। इसका इनाम भी मिला। शंकरराव चव्हाण की जगह मुख्यमंत्री बनाए गए। शिवसेना को काबू में लाने का एजेंडा लेकर महाराष्ट्र पहुंचे थे। बाल ठाकरे की तूती बोलती थी। छग्गन भुज्बाल दाएं हाथ थे। शिवसेना से पवार उन्हें इतना दूर ले गए कि ठाक रे का नूर भी हल्का पड़ता दिखाई देने लगा। 1990 में पवार के सहारे कांग्रेस फिर महाराष्ट्र में राज में आई। आम चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई। कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई। पीएम तलाशा जाने लगा। दावेदार थे-पीवी नरसिम्हा राव,अर्जुन सिंह और शरद पवार। लाटरी नरसिम्हा राव की खुली। पवार रक्षा मंत्री बने। केंद्र की राजनीति रास आने लगी तो राव को खतरा महसूस होने लगा। ऐसी स्थिति बनी कि उन्हें केंद्र से फिर महाराष्ट्र धकेल दिया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे खराब दौर था। सुधाकर नाइक की जगह 6 मार्च 1993 को वे चौथी बार महाराष्ट्र के सीएम बने लेकिन ठीक 6 दिन बाद मुंबई धमाकों से पवार की नींद भी गई और असली पावर भी,रही-सही कसर बेशुमार घपले और घोटालों के आरोपों ने पूरी कर दी। नतीजा पार्टी 1995 में हार गई। पवार सत्ता से बाहर हुए। किसी तरह दिन कटते रहे। चीनी लाबी को वे संगठित करते गए। धीरे-धीरे केंद्र की राजनीति में रमते गए। 1999 में जब उन्हें लगा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई और पीएम बनने का उनका पत्ता फिर कटेगा तो उन्होंने नया दांव खेला। विदेशी को पीएम की सीट का हकदार बनाने के खिलाफ पार्टी में सोनिया गांधी के खिलाफ बिगुल बजा दिया। बात बिगड़ती गई। नतीजा तारिक अनवर और पीए संगमा जैसे साथियों के साथ मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना डाली। न पवार को पावर मिली और न सोनिया को। अटल बिहारी की खिचड़ी सरकार पांच साल निकाल गई। 2004 आया। यूपीए बना। पर शरद पवार के अड़ियल रुख के कारण सोनिया गांधी पीएम बनते-बनते रह गयीं। हां बलिदान की एक मिसाल जरूर कायम कर गईं। पवार फिर हाथ मलते रह गए। प्रधानमंत्री बन गए मनमोहन सिंह। यूपीए सरकार में वे एग्रीकल्चर मिनिस्टर बने। 2005 में कांग्रेस के ही सहयोग से क्रिकेट बोर्ड की गद्दी हथियाई । बेटी सुप्रिया को संसद तक भिजवाया ,लगातार गद्दी के लिए जोड़-तोड़ करने और कांग्रेस को कई बार झटके देने के बावजूद अगर आज कांग्रेसी यह कह रहे हैं कि शरद पवार ने धोखा दिया है तो इसमें पवार का क्या कसूर? जिस शख्स को कभी राजनीति में भरोसेमंद न माना गया हो उस पर कांग्रेस अगर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाती है तो हैरत कांग्रेसियों की नासमझी पर होनी चाहिए। यूपीए को झटका लगे या कांग्रेस को पटका-कम से कम अब पीएम की गद्दी आसानी से पवार हाथ से नहीं जाने देंगे यह तय है। भले ही तीसरा मोर्चा सत्ता में न आए लेकिन इतना जरूर है कि यूपीए की वापसी पर ताज मनमोहन के सिर पर पवार नहीं रखने देंगे। यह बात कांग्रेसियों की समझ में जितनी जल्दी आ जाए उतना ही यूपीए की सेहत के लिए बेहतर। अगर इसके बावजूद वे अपना राग अलाप रहे हैं तो खुद को तश्तरी में रखकर पवार पेश करने वालों में से नहीं। अब जो हालात हैं उनमें यही कुछ रास्ते बचे हैं- या तो यूपीए पवार को प्रधानमंत्री बनाएगा तो वे साथ देंगे। अगर नहीं तो फिर वे तीसरे मोरचे के साथ भी इसी शर्त पर खड़े होंगे बशर्ते बिना बीजेपी और कांग्रेस के वो सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंच पाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यकीन मानिए इस बार पवार बीजेपी से हाथ मिलाने से नहीं चूकेंगे। माध्यम बनेंगे बाल ठाकरे। सारी तस्वीर इसके उलट इसी सूरत में हो सकती है कि वे संसद की सीट हारें और उनकी पार्टी जीरो पर आउट हो-ये हो नहीं सकता कम से कम पवार के साथ फिलहाल तो नहीं।