मंगलवार, 28 जुलाई 2009

धंधा है पर गंदा है ये



देशपाल सिंह पंवार
सत्य ही शिव है। शिव ही सुंदर है। सुंदर क्या है? वो जो आंखों को अच्छा लगे। दिल को अच्छा लगे। यदा-कदा कुछ पलों को अगर छोड़ दें तो नैतिक-अनैतिक अंतहीन सिलसिले के चलते रोजमर्रा की जरूरतें जिस तरह हमारी दिनचर्या का गला घोंट रही हैं,उसमें ना तो कुछ सुंदर होता दिख रहा है, ना ही दिल महसूस कर पा रहा है। आंखें देखने को तरस रही हैं। हैरत की बात यही है कि इसके बावजूद ऐसा माहौल बनाने और दिखाने की कोशिशें भी नहीं हो रही हैं। समाज में आए दिन होने वाली हत्याएं, लूटमार,छीनाछपटी,चोरी-डकैती, घूसखोरी, सीनाजोरी, बलात्कार, अनैतिक व्यापार सुन-सुन और देख-देखकर पहले ही आंखें और दिल बोझिल हो चुके थे, ना उम्मीद हो चुके थे, रही-सही कसर टीवी चैनलों ने पूरी कर दी है। समाज में जो होता आया है या हो रहा है या होगा, उस कड़वे सच से चंद चेहरे रूबरू होते हैं। चंद आंखें उसे देखती हैं, चंद दिल उससे डरते हैं और चंद लोग ही उसका खामियाजा झेलते हैं पर जिस तरह टीवी चैनल झूठ के रास्तों पर सच के घटिया,खोखले तथा अश्लील नारे लगा रहे हैं उसका खामियाजा हमारी संस्कृति भी भोग रही है। हमारे बच्चे भी भोग रहे हैं। हमारी बहू-बेटियां भी भोग रही हैं। ये सारा देश भोग रहा है। कड़वा सच यही है कि ऐसा होना व दिखना तो बहुत दूर की बात जिसे कोई अकेले में भोग देखना नहीं चाहता था,वो हर घर में जबरन थोपा जा रहा है। सड़क-बाजार में खुलेआम दिखाया जा रहा है। लोग देखने को मजबूर हैं। सारी लाज-शर्म ताक पर है। परदे के लिहाज की सारी संस्कृति व परंपरा के साथ रोजाना हर समय हमारी आंखों के सामने बलात्कार हो रहा है। हम झेलते आ रहे हैं। हम देख रहे हैं। शायद हम देखते भी रहेंगे। सच के नाम पर बिस्तर की बातें, रिश्तों के नाम पर दस-दस पतियों की करामातें, दौलत के नाम पर रिश्तों के खून के बातें, समाज के नाम पर बाल विवाह का महिमा मंडन, प्यार के नाम पर सैक्स की सनसनी, नैतिकता के नाम पर सब कुछ अनैतिक,हक के नाम पर सारी हद पार करने का खेल-खेल में जो खेल खेला जा रहा है,उससे आज यह देश उस चौराहे पर खड़ा है जहां यह सोचने को मजबूर होना पड़ रहा है कि क्या यही असली लोकतंत्र है? क्या यही बुध की धरती है? क्या यही सत्यवादी हरिशचंद्र की धरती है? क्या यही स्वामी विवेकानंद की धरती है? महात्मा गांधी ने क्या इसी दुनिया की कल्पना की थी? कहां खो गई है उनके तीन बंदरों की थीम? सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस सनातन सिलसिले की व्यवस्था कैसे बदले? कौन बनेगा युग परिवर्तक? कोई तो आगे आए। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश में प्रेस आजाद है। सरकार की ओर से ज्यादा बंदिशें नहीं हैं। लोकतंत्र में मिली इसी छूट का सबने फायदा उठाया। किसी ने कम तो किसी ने ज्यादा। जाहिर सी बात है कि जब अति होती है तो आवाज उठती है। बीच-बीच में आवाजें उठी पर प्रेस की आजादी के नाम पर सब इसी तरह एक हो गए जिस तरह वेतन और सुविधाएं बढ़ाने के नाम पर हमेशा सांसद व विद्यायक दलों की हदों को पार कर एक साथ सुर मिलाते हैं। जनता की पीड़ा और सरकार के पेट की ऐंठ का दर्द यह आवाज हमेशा दबाती चली गई। सरकार ने उन्हें हक भी दिया था कि वे खुद ही तय करें कि सारे सामाजिक और कानूनी दायरों का लिहाज करते हुए वे किस तरह और क्या-क्या दिखाना चाहते हैं? प्रसारकों का स्व नियामक बना पर वो कहीं वजूद में है भी -इसका एहसास ना तो उसने कराया और ना ही किसी देशवासी को हो रहा है। सब चैनल बेलगाम नजर आते हैं। बेशर्मी की हद को पार कर अश्लीलता को परोसे जा रहे हैं। ये सारा काम वो चैनल भी कर रहे हैं जिन्हें न्यूज चैनल का दर्जा मिला है। जो राष्ट्रीय कहलाते हैं। कोई इनसे पूछना वाला हो कि आखिर उन्हें खबर दिखाने का लाइसेंस मिला है या फिर बैडरूम की जिंदगी परोसने का। कत्ल पर इस तरह सनसनी फैलाते हैं कि जैसे वो कातिल के संग-संग सब कुछ देख रहे थे। महाभारत में संजय की तीसरी आंख की तरह। हिंदुस्तान जैसे देश में एक चैनल नंगई से एक-एक औरत की दर्जन शादी दिखा देता है। कोई बाल विवाह के महिमा मंडन में जुटा है। एक चैनल सच का सामना दिखा रहा है। तर्क दिया जा रहा है कि इसे ऐसे समय दिखाया जा रहा है ताकि बच्चे ना देख पाएं। सवाल यही पैदा होता है कि ऐसा क्यों? यानि इसमें ऐसा कुछ है जिसका बच्चों पर बुरा असर पड़ेगा। अगर ऐसा है तो फिर इसे दिखाया ही क्यों जा रहा है? हकीकत यही है कि यह दौलत का खेल है। वही दिखता है-जो बिकता है की राह पर हैं। चैनलों को हर कीमत पर दौलत चाहिए। जो सच बोलने का ढोंग कर रहे हैं वे कितने पाक हैं सब पहले से ही जानते हैं। उनमें कौन सा ऐसा है जिसे हमारे समाज के लिए आदर्श माना जाए। ना वो शो से पहले थे, दिखने के बाद तो और भी नंगे नजर आते हैं। शक्ल से भी -अक्ल से भी और विचारों से भी । अगर यथार्थ और सच का अंतर इन्हें तथा चैनल वालों को नहीं मालूम तो फिर इनका ऊपर वाला ही मालिक है? अगर इस चैनल को सच ही दिखाने का शौक है तो क्या वो इन नचनियों और गंवैयों की सुहागरात के सीन दिखाएगा? क्या वो इनमें से किसी को बाथरूम में नंगा दिखाएगा? नीचता की सोच है और इसी का गंदा धंधा है ये। मर्यादा लांघने की घटिया कोशिश। चैनलों पर अश्लीलता की सारी हदें पार होने से जनता नाराज है। नंगई दिखाओ-टीआरपी बढ़ाओ-दौलत कमाओ से संसद गरम है। जिस तरह तमाम सांसदों ने सदन में इसके खिलाफ आवाज उठायी है उसकी तारीफ करनी होगी। वो बात दीगर है कि राजनीति में झूठ की फसल खूब लहलहा रही है। हर पार्टी ने इस पर एतराज जताया है। सरकार पर दबाव डाला है कि वो कुछ करे। सरकार अभी तक इसलिए डरती आई है कि कहीं विपक्षी दल इसे आजादी पर हमला ना समझ लें। पर अब जिस तरह सब एक हैं और सरकार शिकंजा कसने को नियामक बनाने जा रही है उसके बाद इन चैनलों को एहसास हो जाना चाहिए कि उन्होंने टीआरपी के लिए, दौलत के लिए, शोहरत के लिए हिंदुस्तानी मीडिया से क्या छीन लिया है? 1980 में जब देश में चैनल की शुरूआत हुई तो सिर्फ राष्ट्रीय चैनल था। रामायण और महाभारत जैसे सीरियल के वक्त सड़कें सूनी हो जाया करती थीं। अब घर में टीवी खोलते वक्त बाप डरा रहता है। इस समय 480 से ज्यादा चैनल हैं। 200 से ज्यादा न्यूज चैनल हैं। 11 करोड़ से ज्यादा घरों में टीवी हैं। आधी से ज्यादा आबादी टीवी देखती है। एक सशक्त माध्यम हैं पर सारे समाज को अशक्त करता जा रहा है। नैतिकता पर गन तनी है। समाज पर गन तनी है। मीडिया पर गन तनी है पर अफसोस इस बात का है कि वे अब भी अपना सपना मनी-मनी खेलते जा रहे हैं। लोकतंत्र में आजादी के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या किया जा सकता है? सरकार चेत रही है पर अब समय आ गया है कि जनता भी इस पर आवाज बुलंद करे। ताकि ये समाज बचे। ये युवा कौम बचे। देश का फ्यूचर बचे। मर्यादा पुरूष पुरषोत्तम राम के देश में मर्यादा बचे। हे राम।

सब परेशान

देशपाल सिंह पंवार
दिल्ली आजकल गरम है वो भी सावन में। ऊपर से बारिश नहीं हो रही है-जनता परेशान है। अपनों और परायों के तीरों की जमकर बारिश हो रही है-सत्ता परेशान है। मिस्र में अचानक जिस तरह प्रधानमंत्री ने पाक से बातचीत के लिए आतंकवाद की शर्त हटाई गई और साझा बयान में बलूचिस्तान को शामिल किया गया उससे सोनिया समेत सारी कांग्रेस हैरान और परेशान है। जाहिर सी बात है कि चौतरफा फजीहत से प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा परेशान हैं। संसद से सड़क तक वारे के बाद इसका इलाज खोजना कांग्रेस और प्रधानमंत्री दोनों की ही मजबूरी थी तो शायद खोज भी लिया गया है। कहीं से कोई विवाद ना हो इसकी हिदायत दे दी गई है और बंदोबस्त कर लिए गए हैं। सोनिया की ओर से भी अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जा रहा है कि कहीं कोई दूरी नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने भी साफ किया है कि सब मीडिया की उपज है। कहीं कोई दूरी नहीं हैं। पर यह सवाल तो पैदा होता है कि जो दूरी दुश्मन देश के साथ बातचीत के दौरान दिखना चाहिए था वह यहां क्यों दिख रहा है? ऐसी नौबत ही क्यों आई? सांप के निकलने के बाद लकीर पीटने की जरूरत क्यों पड़ रही है? वैसे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मिस्र में जो कुछ हुआ इसके जवाब उनके पास हैं। संसद में 29 जुलाई को सरकार माकूल जवाब देगी। ऐसा कहते वक्त मनमोहन सिंह विश्वास से सराबोर नजर आ रहे थे लेकिन 29 को संसद में यह विश्वास नैया पार लगाएगा इसका विश्वास कम से कम फिलहाल कांगे्रसियों के चेहरों से तो नजर नहीं आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गलती छिपाने के लिए जब अदने से इंसान के पास तर्क हो सकते हैं तो फिर ये तो सरकार है। उसे तर्क खोजने में इतनी माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी जितनी अपनों को इन तर्को को समझाने में। अगर अपनों के हलक के नीचे ये तर्क नहीं उतरेंगे तो फिर विपक्ष तो इसी की कमाई खाता है। अब जिस मोड़ पर सरकार खड़ी है वहां कांग्रेसियों को इन्हें हलक के नीचे तो ले जाना भी होंगा और मुस्कराना भी होगा। चाहे मन तैयार ना हो, तन तैयार ना हो, पेट अपच हो जाए। अब चाहे जो जवाब संसद में दिए जाएं, समझाने की कोशिशें की जाएं पर इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि सरकार ने इस मसले पर देश व यहां की जनता की किरकिरी तो करा ही दी है। झुकना पाकिस्तान को चाहिए था, झुके हुए हम नजर आ रहे हैं। जिस विश्वास के साथ पाकिस्तान हम पर बलूचिस्तान को लेकर वार कर रहा है, यह तो दर्शाता ही है कि हमनें कहीं न कहीं चूक कर दी है। अमेरिका हमें दुश्मन के सामने झुकाने में सफल तो हो ही गया है। बार-बार धोखा खाने के बावजूद आखिर मनमोहन सरकार कब ये समझेगी कि अमेरिका की इज्जत पाकिस्तान में दांव पर लगी है ऐसे में वो कैसे हमारे लिए पाक को घाव दे सकता है। उसे पाक का ख्याल रखना ही है। अब सारे देश को 29 जुलाई का इंतजार है। पता तो है पर देखना भी है कि मिस्र में हम कितना खोकर आए हैं?