
देशपाल सिंह पंवार
वो दुनिया की तीसरी और हिंदुस्तान की सबसे ताकतवर महिला हैं। संसार की 100 सबसे मजबूत शख्सियतों में से एक हैं। गांधी खानदान की हैं। इंदिरा गांधी जैसी मजबूत हौसलों की महिला की बहू हैं। देश में कंप्यूटर क्रांति के जनक व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव की पत्नी और राहुल की मां है। इतना ही नहीं सबसे पुरानी उस पार्टी की कमान हाथ में है जिसे किसी जमाने में सरदार पटेल जैसी हस्तियां चलाया करती थीं। आज की तारीख में इस दल में एक से दस नंबर तक कोई दूसरा नहीं है। वो सत्तारूढ़ यूपीए (?) की चेयरपर्सन भी हैं। ऐसा शख्स जो चाहे वो कर सकता है। सब मानते हैं और कहते हैं कि देश पर राज 10 जनपथ से चल रहा है। लेकिन इसके बावजूद इसे रणनीति कहें, मजबूरी कहें, नाम के संग जुड़ा अपशकुन कहें, या फिर ग्रहों का फेर- नसीब का खेला वे उस ताज से कल भी दूर थी,आज भी हैं और शायद कल भी रहेंगी जिसे पाने की ख्वाहिश हर नेता में होती है। जिसे इस राह की आखिरी चाह माना जाता है। यानि प्रधानमंत्री पद। पांच साल पहले ये झोली में था-पर सिर पर न सज सका। वह बलिदान था या मजबूरी-चाहे जो कहें। हां यह हकीकत है कि शिखर पर बैठे ढेरों चेहरों के साथ कुछ संयोग व दुर्योग साथ-साथ चलते हैं। जिसकी चाह नहीं होती वह मिलता जाता है और जिसकी चाह होती है वो दूर चला जाता है। यह सुपर लेडी भी उनमें से एक है। नसीब तथा समय की धारा इटली के एक छोटे गांव से बहाकर उस तख्तो ताज तक ले आई जहां तक आने की न कोई चाह थी और न कोशिश। पर आना पड़ा। हिंदुस्तान नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। राजनीति में नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। अध्यक्ष पद नहीं चाहती थीं-झेलना पड़ा। प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश नहीं थी- मिलते-मिलते रह गया। हां जो चाहा था वो हो न सका। गृहणी की जिंदगी गुजारना, पति को राजनीति से दूर रखना,बच्चों को दुखों से बचाए रखना,अपनों-परायों के वार से आशियाने को बचाने की ख्वाहिश पूरी ना हो सकी। पूरी तरह हिंदुस्तान की होने पर भी विदेशी कहे जाने का मर्म पूरी तरह मिट न सका। इसमें शक नहीं कि जीवन ने इतने थपेड़े अगर किसी को भी दिए होते तो शायद वो शख्स बिखर चुका होता। पर वे जीवट की महिला हैं। इसमें अब विरोधियों को भी संदेह नहीं रहना चाहिए। इसी जीवट की फिर अग्निपरीक्षा है। जंग का मैदान सज चुका है। हर कोई प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहा है। राजनीति के महारथी सामने हैं। ऐसी जंग में वो उस फौज को लेकर मोरचे पर हैं जिसके सारे सिपहसलार बूढ़े हो चुके हैं,अपने छोड़कर जा चुके हैं। उन्हें लड़ना भी है और अपनी फौज में जीत का जज्बा पैदा करना भी है। चाहे कल उनका कांग्रेस के बिना गुजारा हो जाता पर आज जिस मुकाम पर हैं वहां से न उनका कांग्रेस के बिना कोई अस्तित्व है और कांग्रेस का तो आजादी के बाद कभी गांधी परिवार के बिना कोई वजूद रहा ही नहीं। इस बार के नतीजे एक नई दास्तां जरूर लिखेंगे यह तय है। ये भी तय है कि सोनिया प्रधानमंत्री तभी बन सकती हैं जब पार्टी को बहुमत मिले। इस बार मनमोहन को जबान दी जा चुकी है। अगली बार तक राहुल तैयार हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि सोनिया किसी ऐसी आपात स्थिति में ही यह पद ले सकती हैं जैसी उनके पार्टी अध्यक्ष बनने के दौरान थी । या जिनकी वजह से वो राजनीति में आईं।
वो दुनिया की तीसरी और हिंदुस्तान की सबसे ताकतवर महिला हैं। संसार की 100 सबसे मजबूत शख्सियतों में से एक हैं। गांधी खानदान की हैं। इंदिरा गांधी जैसी मजबूत हौसलों की महिला की बहू हैं। देश में कंप्यूटर क्रांति के जनक व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव की पत्नी और राहुल की मां है। इतना ही नहीं सबसे पुरानी उस पार्टी की कमान हाथ में है जिसे किसी जमाने में सरदार पटेल जैसी हस्तियां चलाया करती थीं। आज की तारीख में इस दल में एक से दस नंबर तक कोई दूसरा नहीं है। वो सत्तारूढ़ यूपीए (?) की चेयरपर्सन भी हैं। ऐसा शख्स जो चाहे वो कर सकता है। सब मानते हैं और कहते हैं कि देश पर राज 10 जनपथ से चल रहा है। लेकिन इसके बावजूद इसे रणनीति कहें, मजबूरी कहें, नाम के संग जुड़ा अपशकुन कहें, या फिर ग्रहों का फेर- नसीब का खेला वे उस ताज से कल भी दूर थी,आज भी हैं और शायद कल भी रहेंगी जिसे पाने की ख्वाहिश हर नेता में होती है। जिसे इस राह की आखिरी चाह माना जाता है। यानि प्रधानमंत्री पद। पांच साल पहले ये झोली में था-पर सिर पर न सज सका। वह बलिदान था या मजबूरी-चाहे जो कहें। हां यह हकीकत है कि शिखर पर बैठे ढेरों चेहरों के साथ कुछ संयोग व दुर्योग साथ-साथ चलते हैं। जिसकी चाह नहीं होती वह मिलता जाता है और जिसकी चाह होती है वो दूर चला जाता है। यह सुपर लेडी भी उनमें से एक है। नसीब तथा समय की धारा इटली के एक छोटे गांव से बहाकर उस तख्तो ताज तक ले आई जहां तक आने की न कोई चाह थी और न कोशिश। पर आना पड़ा। हिंदुस्तान नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। राजनीति में नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। अध्यक्ष पद नहीं चाहती थीं-झेलना पड़ा। प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश नहीं थी- मिलते-मिलते रह गया। हां जो चाहा था वो हो न सका। गृहणी की जिंदगी गुजारना, पति को राजनीति से दूर रखना,बच्चों को दुखों से बचाए रखना,अपनों-परायों के वार से आशियाने को बचाने की ख्वाहिश पूरी ना हो सकी। पूरी तरह हिंदुस्तान की होने पर भी विदेशी कहे जाने का मर्म पूरी तरह मिट न सका। इसमें शक नहीं कि जीवन ने इतने थपेड़े अगर किसी को भी दिए होते तो शायद वो शख्स बिखर चुका होता। पर वे जीवट की महिला हैं। इसमें अब विरोधियों को भी संदेह नहीं रहना चाहिए। इसी जीवट की फिर अग्निपरीक्षा है। जंग का मैदान सज चुका है। हर कोई प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहा है। राजनीति के महारथी सामने हैं। ऐसी जंग में वो उस फौज को लेकर मोरचे पर हैं जिसके सारे सिपहसलार बूढ़े हो चुके हैं,अपने छोड़कर जा चुके हैं। उन्हें लड़ना भी है और अपनी फौज में जीत का जज्बा पैदा करना भी है। चाहे कल उनका कांग्रेस के बिना गुजारा हो जाता पर आज जिस मुकाम पर हैं वहां से न उनका कांग्रेस के बिना कोई अस्तित्व है और कांग्रेस का तो आजादी के बाद कभी गांधी परिवार के बिना कोई वजूद रहा ही नहीं। इस बार के नतीजे एक नई दास्तां जरूर लिखेंगे यह तय है। ये भी तय है कि सोनिया प्रधानमंत्री तभी बन सकती हैं जब पार्टी को बहुमत मिले। इस बार मनमोहन को जबान दी जा चुकी है। अगली बार तक राहुल तैयार हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि सोनिया किसी ऐसी आपात स्थिति में ही यह पद ले सकती हैं जैसी उनके पार्टी अध्यक्ष बनने के दौरान थी । या जिनकी वजह से वो राजनीति में आईं।
सोनिया गांधी
0-इटली का एक छोटा सा गांव लुसियाना- रोमन कैथोलिक परिवार में 9 दिसंबर 1946 को जन्म। पिता बिल्डर और फौजी। 1983 में निधन। मां और दो बहनें ओरबासानो निवासी। यहीं पर सोनिया की कैथोलिक स्कूल में पढ़ाई।0-1964 में कैंब्रिज के एक स्कूल में पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में। वेटर का काम किया।रेस्टोरेंट में राजीव गांधी से इसी साल मुलाकात। 1968 में दोनों की शादी।0-1970 में राहुल,1972 में प्रियंका का जन्म। राजनीति से दूरी। राजीव पायलट-सोनिया पर घर का जिम्मा। 23 जून 1980 को संजय की मौत। मां इंदिरा गांधी का दबाव-1982 में राजीव का राजनीति में प्रवेश। सोनिया का बस परिवार पर ध्यान।0-1983 में हिंदुस्तान की नागरिकता। 1984 में श्रीमती इंदिरा गाधी की हत्या। राजीव पीएम। पहली बार पब्लिक लाइफ। राज्यों में पति संग दौरों पर। अमेठी सीट पर राजीव के सामने मेनका। सोनिया प्रचार में शामिल। जीत। राजीव पीएम। पांच साल तक राज। 0-बोफोर्स का जिन्न बाहर। इटली के उद्योगपति और सोनिया के कथित परिचित क्वात्रोची घेरे में। राजीव-सोनिया की छवि पर दाग। आम चुनाव में लिट्टे द्वारा राजीव की हत्या। पार्टी अध्यक्ष बनने से सोनिया का इंकार। राजनीति से दूर। राव नए पीएम।0- पार्टी पतन की ओर। 1996 में सत्ता से बाहर। माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, ममता बनर्जी, मूपनार, चिदंबरम और जयंती द्वारा खुलेआम सीताराम केसरी के खिलाफ विद्रोह। 1997 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता। 62 दिन बाद अध्यक्ष।0-1997 में बेल्लारी और अमेठी से सांसदी चुनाव। दोनों सीटों से जीत। बेल्लारी में सुषमा स्वराज की करारी हार। 1999 में विपक्ष की नेता। विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर शरद पवार की बगावत। पार्टी छोड़ी। 2003 में वाजपेयी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव।0-2004 में राजग का इंडिया शाइनिंग नारा ध्वस्त। कांग्रेस सबसे बड़ा दल। यूपीए के बैनर तले 15 दलों का आगमन। वामदलों का बाहर से समर्थन। 16 मई को यूपीए की निर्विवाद नेता। प्रधानमंत्री बनना तय। सुषमा स्वराज ने विदेशी मूल का मसला फिर उठाया। सिर मुंडाने और आजीवन जमीन पर सोने की धमकी। हंगामा। 18 मई को पद ठुकराने और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का एलान। फेवर में लहर। 0-कप्तानी में आंध्र प्रदेश, हरियाणा और आसाम में सत्ता में वापसी। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों में पार्टी की हार। अब तक यूपीए की चेयरपर्सन।0-2004 में बेटा राहुल अमेठी से सांसद। प्रियंका का राजनीति में आने से इंकार।0-फायदे के पद पर रहने का आरोप। सांसदी छोड़ी। रायबरेली से फिर चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और सूचना के अधिकार का हक।0- कांग्रेस की आजादी के बाद पहली और अब तक की पांचवी विदेशी पार्टी अध्यक्ष। राजीव पर दो किताबें-राजीव और राजीव की दुनिया। नेहरू-इंदिरा पत्रों का संपादन।