सोमवार, 30 मार्च 2009

लाहौर पर हमला-भारत नहीं संभला


देशपाल सिंह पंवार
आतंकवाद हर सीमा पार कर चुका है। रौंद चुका है। तैयारी और हौसले देखिए -पुलिस केंद्रों और सेना शिविरों पर हमले करने में भी झिझक नहीं होती। जब, जिस जगह, जैसे चाहते हैं-हमला करते हैं। खून बहाते हैं। दहशत कायम करते हैं। नतीजन पाकिस्तान धधक रहा है। लाहौर फिर जल रहा है। आतंकवादियों के समूह ने जिस तरह हिंदुस्तान की सीमा से लगे लाहौर पुलिस केंद्र को निशाना बनाया-दर्जनों लोगों का खून बहाया घंटों 500 से ज्यादा पुलिस जवानों को बंधक बनाया उससे वहां के हालात की भयावह तस्वीर और आतंकवाद की गहरी जड़ों का अंदाजा फिर हो जाता है। स्वात घाटी पर तालिबानी काबिज हैं। नीले रत्नों की घाटी को वे लूटते जा रहे हैं। अफगान से सटा सारा हिस्सा गिरफ्त में है। धीरे-धीरे आधे से ज्यादा पाकिस्तान पर सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से आतंकवादी या कहा जाए तालिबानी हुकूमत है। जंगलराज कायम है। स्कूल-कालेज बंद हो चुके हैं। तोप से उडा दिए गए हैं। ऐतिहासिक धरोहरों पर बुल्डोजर और गोले चल चुके हैं। लड़कियां और औरतें घरों में कैद है। न गीत कोई गुनगुनाने वाला-न कोई सुनने वाला। धमाकों की आवाज का बेसुरा साज बज रहा है। आधी जनता अपने ही मुल्क में लाखों लोग शरणार्थी बन धक्के खा रही है। दाम के लिए काम नहीं। रोजगार मांगों तो ए के 47 मिलती है। रोटी मांगों तो गोली मिलती है। शिक्षा मांगों तो कट्टरपंथ की घुट्टी पिलाई जाती है। इज्जत मांगों तो नंगा लटका दिया जाता है। जनता लाचार है। आईएसआई के खाद से पनप रही आतंकवादियों की इस फौज के सामने जरदारी सरकार लाचार है। सेना मुंह फेरे खड़ी है। पुलिस की कोई हैसियत नहीं है। जनता की हिम्मत नहीं है। ऐसे में लाख टके का यही सवाल है कि जिस देश की सरकार निकम्मी हो, फौज राजनीति करती हो,आईएसआई धन और हथियार देती हो, मदरसों में बच्चों में जहर भरा जाता है,सुरीले गीतों की जगह विरह की आह हो, विकास की जगह विनाश की धारा बहती हो उस देश का क्या होगा? उसकी आग की तपिश से तप रहे भारत को कितना खामियाजा झेलना होगा? आंधी-तूफान की तरह फैल रही तालिबानी बेल से किस तरह भारत निपट पाएगा? एशिया के ये देश इस समय नाजुक मोड़ पर खड़े हैं। धमाके पाकिस्तान में होते हैं और सिहरन हिंदुस्तान में। बम लाहौर में फटते हैं और दिल दिल्ली में दहलते हैं। ये दौर कब तक चलेगा आज हर पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी इसी सवाल का जवाब तलाश रहा है। तालिबान के पास जवाब है। अलकायदा के पास जवाब है। सारे आतंकवादी संगठनों के पास जवाब है। जवाब अगर नहीं है तो सिर्फ जरदारी और ओबामा के पास। अगर हम समय पर नहीं चेते तो फिर भारत के पास भी इसका कोई जवाब नहीं होगा। लाहौर में सोमवार को जो हुआ। जिस अंदाज में हुआ वह श्रीलंका टीम पर हमले की तरह है। किसी ने जिम्मेदारी नहीं ली है पर यह तय है कि इसमें भी तालिबानी संगठन अलकायदा या उसकी शह पर पाक में फल-फूल रहे किसी आतंकी संगठन का ही हाथ होगा। ऐसे हमले कैसे विफल हों, तालिबान पर कैसे अंकुश लगे, आतंक के खिलाफ किस तरह जंग लड़ी जाए, इस राह पर जाने की बजाय पाक सरकार भारत को कोसने पर ज्यादा ध्यान देगी। नतीजा कुछ नहीं निकलेगा हां आतंकवाद एक कदम और आगे बढ़ जाएगा। अलकायदा और मजबूत हो जाएगा। जनमत और कमजोर हो जाएगा। अलकायदा जहमियत का नाम है। जिहाद के नाम पर लोगों को अगवा करना, आतंकवाद में झोंकना, हत्या करना, इस्लाम के नाम पर जंग करना ही मकसद है। यह एक रक्त बीज की तरह है जिससे महामारी के इलाज की तरह ही निपटा जा सकता है। यह जड़ से मिटाने पर ही खत्म होगा। इससे मुश्किल है तालिबान का खात्मा। कारणतालिबान एक विचारधारा है। जो एक समूह,एक जगह और एक देश तक सीमित नहीं है। अमेरिका 8 साल से कोशिश कर रहा है। जब तक आईएसआई पर शिकंजा था तालिबान शांत था लेकिन अब वह बेलगाम नजर आ रहा है। तालिबान पस्तो शब्द का अपभ्रंश है। मायने हैं-तालीम लेने वाले छात्र। लेकिन उन्हें मदरसों में इल्म की बजाय हथियार चलाने की ट्रेनिंग मिली। 1980 में जब सोवियत संघ की सेना अफगानिस्तान में घुसी थी तब इसे टक्कर देने के वास्ते शरणार्थियों और पाक फौजियों का एक संगठन जेहाद के नाम पर ख़ड़ा किया गया जो बाद में तालिबान में बदल गया। अमेरिका इसके पीछे था। 1987 में पाकिस्तान के रास्ते ही तालिबानियों को 70 हजार टन हथियार अमेरिका ने मुहैया कराए थे। बेशुमार दौलत लुटाई थी। वहीं से पड़ी नींव पर अब आतंक का महल खड़ा है। करनी का फल सामने है। अफगानिस्तान, भारत और अमेरिका की तबाही उसका मकसद है। समय की कैसी अजीब विडम्बना है। उस समय पाकिस्तान ने तालिबानियों को ट्रेनिंग के नाम पर अमेरिका से बेशुमार दौलत खसौटी-अब वह तालिबानियों को खत्म करने के नाम पर दूह रहा है। अमेरिका तब भी गलत था और आज है। ओबामा पाकिस्तान को सबसे खतरनाक देश तो मानते हैं लेकिन उस पर डालर की बरसात बंद नहीं करते। जबकि सच्चाई यही है कि तालिबानियों को खत्म करने की एवज में लिया जा रहा सारा धन उनकी जड़ों को मजबूत बना रहा है। इरादा है काबुल से विरोधी सरकार को भगाना, भारत को अस्थिर करना। कश्मीर को कब्जाना। इसके लिए तन और धन की जरूरत पड़ती। तन तालिबानी और धन अमेरिकी। इसी के सहारे पाकिस्तानी हुकूमरान अपने दांव खेलते आ रहे हैं। पाक के कब्जे वाले कश्मीर और उसकी सीमा में सारे आतंकवादी कैंप चल रहे हैं। लाहौर तक उनका राज है। भारत में वे प्रवेश कर चुके हैं। ओबामा इसी तरह अगर पाक की मदद करते रहे। हवा में तीर चलाते रहे और पाक में हो रहे धमाकों पर भारत आंख बंद किए बैठा रहा तो यकीनन आने वाला समय बेहद खौफनाक होगा। पाक इस तरह के हालात बनाने और उसमें जीने का आदि रहा है उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन लाहौर जैसे धमाकों से भारत पर असर जरूर पड़ता है। जल्द ही इसका निदान खोजना जरूरी है। वरना यह नासूर बन जाएगा। उन्हें ऐसे हालात में रहने की आदत है लेकिन महात्मा गांधी के इस देश को शांति के मायने पता हैं।