सोमवार, 18 मई 2009

राहुल ब्रिगेड और मनमोहन की कप्तानी?


देशपाल सिंह पंवार
जनता ने इस उम्मीद के साथ जनादेश दिया है कि नए जमाने में नया हिंदुस्तान बनाने की इबारत यूपीए जरूर लिखेगा। खासकर राहुल गांधी से जनता को ढेरों आस हैं। जिनका जादू सबके सिर चढ़कर बोल रहा है। चुनाव से पहले राहुल का जितना असर था उससे हजार गुणा ज्यादा अब है। उस समय गांधी परिवार का चिराग होने की वजह से बात काटने की किसी की हैसियत नहीं थी,अब खुद की हैसियत के आगे किसी के बोलने, बात काटने और फैसला बदलने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता। ऐसे दौर में जब राहुल गांधी का सूरज जेठ की दोपहरी की तरह तप रहा हो, राहुल की यूथ ब्रिगेड कमान लेने को तैयार बैठी हो- कुछ अरसे बाद राहुल का पीएम बनना तय हो,ऐसे समय में मनमोहन सिंह फिर राजपाट लेने जा रहे हैं। अब तक मनमोहन सिंह को लालू-शरद पवार जैसे सहयोगियों के नखरे झेलने पड़ते थे इस बार उन्हें राहुल और उनकी यूथ ब्रिगेड को •भी झेलना होगा और साथ ही जनता के सपनों को •भी पूरा करना होगा। यह कहीं बड़ी चुनौती होगी। उम्र का फासला •भी है। सोच का अंतर भी है। गांधी परिवार का दबाव •भी है,और अपनी साफ सुथरी छवि को बरकार रखने का सवाल भी सामने है। ऐसे में राहुल ब्रिगेड की कप्तानी किस तरह मनमोहन सिंह करेंगे यह देखने वाली बात होगी। फिलहाल बड़ा सवाल यही पैदा होता है कि सरकार का स्वरूप कैसा होगा? यूपी समेत जिन राज्यों में कांग्रेस का बेड़ा पार होता दिख रहा है उन राज्यों को कितना प्रतिनिधित्व मिलेगा? किस तरह जनता के सरकार बनकर मनमोहन सिंह दिखाएँगे? यूपीए या कहा जाए कांग्रेस के पास जो जनादेश है और राहुल गांधी का जो असर है उसे देखते हुए इस बार मनमोहन सिंह की कैबिनेट का स्वरूप निश्चित रूप से बदला हुआ होगा। दागी चेहरों को छांटा जा सकता है। वैसे भी लालू प्रसाद के बाहर होने से यह रोग काफी हद तक खत्म हो गया है। फिर •भी कुछ चेहरे कांग्रेस के पास •भी ऐसे हैं जिन्हें सत्ता से दूर रखने का फैसला करना आसान नहीं होगा। वे पुराने घाघ हैं। उन्हें बाहर करने से पहले सौ बार सोचना होगा। फिर मनमोहन सिंह की पसंद अलग है। वे जिनके साथ काम कर चुके हैं, जिनकी योग्यता को समझते और जानते हैं उन पर विश्वास करना ज्यादा पसंद करेंगे लेकिन सवाल यही उठता है कि उनकी पसंद चलती कितनी है? क्या उनकी पसंद का वित्त मंत्री बनेगा? वो अफसर होगा या फिर राजनेता ? इसके बाद ही रोजगार और आर्थिक मंदी से निपटने की सरकार की चाल और हाल के बारे में कुछ आकलन किया जा सकता है। महत्वपूर्ण मंत्रालय कांग्रेस अपने पास रखेगी लेकिन उनमें पुराने चेहरों को तरजीह मिलेगी या फिर राहुल ब्रिगेड को या दोनों में संतुलन के रास्ते को अपनाया जाएगा? फिलहाल आसार दूसरी राह पर जाने का ही है। कांग्रेस को उत्तरप्रदेश, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा ,आंध्र जैसे राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व देना होगा जहां कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया है। खासकर यूपी और बिहार में। जहां कांग्रेस फिर जिंदा हुई है। यूपी से जीतने वाले मुस्लिम चेहरों को स्थान देकर एक संदेश जरूर पार्टी छोड़ना चाहेगी। पार्टी को उत्तर और दक्षिण हिस्से में समन्वय •भी रखना होगा। क्योंकि उत्तर के बिना लाल किले पर झंड़ा फहराना मुश्किल होता है। बिहार से चाहे संख्या ज्यादा ना हो लेकिन वहां की बारी रहेगी जरूर। मायावती की काट के लिए एक दलित नेता •भी कांग्रेस को तैयार करना होगा। फिलहाल सरकार बनाना आसान है लेकिन सरकार का स्वरूप तय करना इतना आसान नहीं और जनता तथा बाजार की अपेक्षाओं पर खरा उतरना तो और भी मुश्किल। देखना यही है कि कैसी टीम मनमोहन को मिलती है और उस टीम से कैसा प्रदर्शन वे कराते हैं? क्या जनता के विश्वास की आस पर सरकार पास होगी? काफी हद तक कैबिनेट का स्वरूप इसे तय कर देगा।