गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

हुड्डा का जमता गोड्डा


देशपाल सिंह पंवार
जिस सूबे में हर जन स्याणा हो। जाना-पहचाना हो। गरीबी से अनजाना हो। दूध-दही का खाना हो। खड़ी बोली में गाना-बजाना हो, देश में ऐसा राज्य सिर्फ हरियाणा ही हो सकता है। सबसे जुदा स्टाइल और अजब-गजब अंदाज। बोलना,खाना ,रहना, चलना और करना सब अलहदा। ये रईसी और अलमस्त अंदाज ही बताता है कि कुछ तो बात है इसमें। इसकी माटी में। आर्यसमाज के वाहक इस प्रदेश को हमेशा हर मामले में सबसे आगे गिना जाता है। राजनीति में भी,आन-बान और शान पर हरदम जान देने को तैयार कौम। खरी-खरी बोलना पसंद पर सुनना नापसंद। ऐसे राज्य का बंदा होना जितने गौरव की बात है उससे ज्यादा गर्व की बात है इस राज्य का मुखिया होना। वह भी उस हालत में जबकि आप किसी लाल के खानदान से ना जुड़े हों। लाल यानि हरियाणा के तीन लाल-देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल , यह गीत इस सूबे के साथ-साथ देश और दुनिया की फिजां में तीन दशक तक गूंजता रहा। उनकी आवाज की गूंज चाहे गुम हो गई हो पर उनके नाम की गूंज आज भी राजनीति के मैदान में साफ-साफ सुनाई देती है। एक समय इन तीन लालों के नामों के सहारे ढेरों की नैया इस सूबे में पार होती गई। इनके बिना ढेरों की मझधार में डूबती चली गई। एक का जाना-दूसरे का आना, तीसरे का सत्ता पाना यही इस राज्य की अरसे तक रीत रही। उनके वारिस या खानदानी आज भी राजनीति में हैं पर उन जैसी बात कहां? वह युग जब चरम पर था तब इस शख्स ने राजनीति का ककहरा सीखा । राजनीति की इससे बड़ी कोई पाठशाला दूसरी हो भी नहीं सकती थी। उसने ताऊ देवीलाल की जिद, बंसीलाल की सोच और भजनलाल की लोच को अपनी आंखों से देखा। जो सही था उसे सहेजा। जो खराब था उसे धीरे से जोर का झटका देकर इस अंदाज में पटका कि उसे खटका भी ना लगे। सूबे की कड़वी पर सच्ची बात कहने की रीत के ठीक विपरीत हर समय अपने व्यवहार से प्रीत दिखाई। राजनीति में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कांग्रेस को जीत की राह दिखाई। वो एक घाघ राजनेता आज भी नजर नहीं आते पर इसमें कोई दो राय नहीं कि खेल के शौकीन इस शख्स को अच्छी तरह पता है कि असली खिलाड़ी वही होता है जो हाकी के मैदान की डी में स्टिक हाथ में लेकर हमेशा मुस्तैद खड़ा नजर आए। जैसे ही गेंद सामने हो और कोई साथी उसकी ओर झपटे उससे पहले गेंद गोल में दाग दो। 2005 में उन्होंने ऐसा ही मा्स्टर गोल दागा था जिसका यकीन किसी को नहीं था और जिसकी गूंज ढेरों साथियों के दिलो दिमाग पर आज तक गूंज रही है। वो शख्स अच्छी तरह जानता है कि इस प्रदेश की जनता का मूड किस तरह, किन बातों पर और कब जल्दी खराब होता है? ऐसा कोई मौका वो आने नहीं देता। अपने सरल व्यवहार और आसानी से उपलब्ध रहने की कला या आदत के चलते विरोधी तक उसके गुणगान करते नजर आते हैं। यह बात दीगर है कि विरोध के नाम पर विरोध करना उनकी मजबूरी होता है। उसके राज में विकास के कामों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं पर इस बात पर कोई सवाल खड़ा नहीं हो सकता कि वो चाहे गन्ना ना दे पर गुड़ हमेशा हाथ में लेकर चलता है। चार बार सांसद होने के बावजूद वो कभी केंद्र की राजनीति का हीरो नहीं बन पाया पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज यह उसी के नाम या काम का इनाम है कि इस राज्य में कांग्रेस की कम और उसके नाम की सरकार ज्यादा दिखाई देती है। वो आज इस मुकाम पर है जहां उसके नाम के बिना इस राज्य की राजनीति की कोई बात नहीं हो सकती। किसी भी राजनेता के लिए इससे बड़ा इनाम और तमगा दूसरा क्या हो सकता है? वो जन्मजात राजनेता भी नहीं है। वो एक अर्थशास्त्री भी नहीं है। वो एक ब्यूरोक्रेट भी नहीं है। उसमें जाटों की जिद भी नहीं है। वो दिल से भी नहीं चलता है। वो खरी-खोटी भी कम सुनाता है। फिर भी ऐसे राज्य में जहां पत्रकारिता भी आसान नहीं और राजनीति भी ,वहां राजनीति की पारी में शतक ठोंकना और अपनी टीम को जिताना इस शख्स को अब खूब आता है। इस बार का पोल बताएगा कि हमेशा परिवर्तन का ढोल पीटने वाले इस प्रदेश को उसके राजकाज में झोल नजर आता है या मोल?
बीएस हुड्डा
0-रोहतक जिले का सांघी गांव-15 सितंबर,1947 को चौधरी रणबीर सिंह के यहां जन्म। 15 अक्टूबर 1976 को आशा देवी से विवाह। पत्नी शिक्षिका। एक बेटा,एक बेटी। बेटा दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी सांसद। शिक्षा हरियाणा में। पंजाब और दिल्ली विवि से बीए तथा एलएलबी की पढ़ाई। खेती पुश्तैनी पेशा। नामी वकील रहे। वकालत से राजनीति में प्रवेश। किलोई क्षेत्र। 72-77 तक ब्लाक कांग्रेस के अध्यक्ष। 80-82 तक हरियाणा यूथ कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष। 82-83 में अध्यक्ष। 83-87 तक पंचायत समिति रोहतक के चेयरमैन। 84-87 तक पंचायत परिषद हरियाणा के चेयरमैन। 91 में रोहतक से सांसद बनें। 92 से अब तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य। 94 से अब तक कांग्रेस संसदीय बोर्ड में। 94-96 में हरियाणा संसदीय गु्रप के संयोजक।96 में फिर सांसद निर्वाचित। 96-97 में संसद की एग्रीकल्चर कमेटी में। 97-02 तक हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष। 98 में फिर सांसद निर्वाचित। कई कमेटियों के सदस्य। किलोई सीट से 2000 में विधायक। 02-04 तक विपक्ष के नेता। 04 में फिर सांसद निर्वाचित। पांच मार्च को हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ग्रामीण क्षेत्रों में समाजसेवा में ज्यादा रूचि। पढ़ने और खेलने के शौकीन। हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया, यूएई,सोवियत संघ, पाकिस्तान, अमेरिका, चीन और नेपाल आदि देशों की यात्रा। हरियाणा की राजनीति के सबसे बड़े और लोकप्रिय चेहरों में से एक। मुख्यमंत्री के रूप में बेहद सफल। सूबे में विकास के ढेरों काम। आम आदमी की सरकार तक पहुंच। विनम्र पर दमदारी से अपनी बात कहने की आदत। सूबे में कांग्रेस को अपने कंधों पर ढोने का माद्दा। सादा जीवन-उच्च विचार की परंपरा के वाहक। चुनाव में निर्णायक नेताओं में से एक।

कडवी जुबान




देशपाल सिंह पंवार
किस्मत के खेल निराले- वो भी उसी खानदान का चिराग है जिसके बिना देश की राजनीति की दास्तान पूरी नहीं हो सकती। इसी खानदान के दूसरे चिराग को युवराज कहा जाता है। अगला प्रधानमंत्री माना जाता है। नरम और दूरदर्शी सोच का युवा नेता पुकारा जाता है। दूसरी ओर इस युवक की गरम मिजाजी चर्चा में रहती है। बयानबाजी हंगामा कराती रहती है। चाल माहौल को लाल बनाती रहती है। जो दिल में वही जुबान पर। वो राजनेताओं के कहने पर कुछ बोल सकता है लेकिन अपनी तरफ से राजनीति नहीं कर सकता। जिस उम्र में पढ़ाई-लिखाई या शादी-विवाह की बात होती है उस उम्र में वो अपने जहरीले बोल से दुनिया में सर्वाधिक चर्चा में है। वो चाहे अब तक सांसद ना बना हो पर तमाम तजुर्बेकार सांसदों से ज्यादा लोकप्रिय है। कट्टर हिंदू उस पर जान छिड़कते हैं। कट्टर मुसलमान उसकी जान जाने की दुआ करते हैं। वो कहीं नायक है तो कहीं खलनायक। वो देश प्रेम की बात करता है लेकिन ढेरों लोगों की नजर में उसकी बात देश को तोड़ने वाली है। वो हिंदुओं की एकजुटता की बात करता है लेकिन साथ ही ये भूल जाता है कि ये सर्व धर्म की नीति पर चलने वाला देश है। ऐसा नहीं है कि उसकी जुबान चुनाव के दौरान ही कड़वी होती है। बचपन में जब मां ने दादी का घर छोड़ा तो इस बच्चे ने अपनी मां को दोषी ठहराया। जब वो युवावस्था में पहुंचा तो अपने कजिन और अपनी ताई सोनिया गांधी पर जमकर तीर चलाए। उसे भी सोनिया विदेशी नजर आती थी। उसने न नरेंद्र मोदी को बख्शा और न ही महात्मा गांधी को। देश का नक्शा पलटने की कोई सोच या योजना चाहे उसके पास नहीं थी लेकिन देश का बेड़ा गर्क कैसे और कौन लोग करते रहे इस पर वो घंटों बोल सकता था या बोल सकता है। लोकतंत्र में उसकी यही बातें जहर मानी जाती हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वो संजय गांधी का बेटा है। वो संजय गांधी जिसमें एक समय देश की तकदीर बदलने वाले आगामी चेहरे की झलक लोगों को दिखती थी। वो भी जुबान के कड़वे थे। उनकी भी चाल तेज थी वो जो चाहते थे करने का माद्दा रखते थे। बचपन में पिता की मौत और लगातार महत्वाकांक्षी मां के साए में पलने वाले युवक की जुबान में मिठास कैसे हो सकता है? हां हर जुल्म-ज्यादती का बदला लेने की आग जरूर होती है। यही इस युवा नेता की चाल-ढाल और हाल से नजर भी आता है। कितनी अजीब विडम्बना है कि गांधी खानदान का चिराग दुश्मन के कैंप में जलता नजर आता है। इसका मलाल सोनिया गांधी या राहुल गांधी को चाहे कितना भी हो लेकिन न तो इस युवा नेता को है और न ही मेनका गांधी को। मां को तो शायद इसी दिन का इंतजार था जब उसका बेटा उसकी सारी इच्छाएं और प्रतिज्ञाएं पूरी करेगा। अब वो समय सामने है। चाहे आप उसे कोसें या प्यार करें पर आज वो सबसे बड़ा हिंदुवादी चेहरा है। उसे चाहे लोग युवराज ना कहें पर युवराज का खेल खराब करने का माद्दा उसमें है। रासुका में जेल जाने का तजुर्बा उसे और मजबूत करेगा। इस चेहरे की बदौलत वो लंबी पारी खेलेगा यह तय है। बीजेपी खुश है उसके पास वे कंधे हैं जिन पर रखकर वो 10 जनपथ पर तीर चला सकती है। देखना है इस बार क्या नतीजे रहते हैं? उसके पिता ने दुनिया को मारूति दी वो क्या देता है यह सबसे बड़ा सवाल है?
वरुण फिरोज गांधी
0-13 मार्च 1980 को नई दिल्ली में जन्म। पिता संजय गांधी, माता मेनका गांधी। तीन माह की उम्र में पिता की विमान हादसे में मौत। 4 साल की उम्र में दादी श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या। मां मेनका गांधी शुरू से ही महत्वाकांक्षी। कांग्रेस का लगातार विरोध। दादी का घर छोड़ने के मां के फैसले का विरोध। मां का पशु-पक्षियों से ज्यादा लगाव। इनके लिए काम करने वाली सशक्त महिला। आंध्र प्रदेश के रिषि वैली स्कूल में पढ़ाई। लंदन विवि से डिग्री। शुरुआत से राजनीतिक माहौल। 99 अगस्त में राजनीतिक कैरियर की शुरुआत। पिल्लिभित्त में मां के लिए चुनाव प्रचार की बागडोर ,ओजस्वी भास्न्न इसी दौरान एक किताब लिखी। मेनका गांधी और प्रमोद महाजन के कहने पर 2004 में विधिवत रूप से बीजेपी ज्वाइन। सोनिया गांधी इस फैसले से दुखी। फिर भी सफलता की बधाई दी। बीजेपी ने 04 में स्टार प्रचारक की तरह उन्हें इस्तेमाल किया। लगातार कांग्रेस और सोनिया गांधी पर तीखे प्रहार। इसी साल बीजेपी कार्यसमिति में शामिल। शिवराज सिंह चौहान की खाली विदिशा सीट से 06 में चुनाव लड़ने की पेशकश। फिर मिर्जापुर से उपचुनाव लड़ने की पेशकश। दोनों बार इंकार। इस बार पांच बार पीलीभीत से सांसद रहीं मेनका ने बेटे के लिए सीट छोड़ी। खुद आंवला से चुनाव मैदान में। बीजेपी का फिर स्टार प्रचारक। 6 मार्च 09 को रैली में अल्पसंख्यकों के लिए जहर उगला। माहौल तनावपूर्ण होने से मायावती ने रासुका थोपी। जेल में डाला गया। मामला और गरमाया। बीजेपी ने मुद्दा बनाया। हर दल ने माया को गरियाया। सुप्रीम कोर्ट में फिर कड़वा बयान न देने का हलफनामा। दो हफ्ते के लिए रिहा। परचा भरा ,सारी दुनिया की नजर इस सीट पर। अब बीजेपी का सबसे आकर्षक हिंदुवादी चेहरा। पूरी पार्टी पीछे।

असली राजकुमार


देशपाल सिंह पंवार
जीवन-मरण सब ईश्वर के हाथ है लेकिन ज्यादातर के दिल में हमेशा ये मलाल जरूर रहता है कि वे फलां खानदान में पैदा क्यों नहीं हुए? यह राजनेता ऐसे ही गांधी खानदान में पैदा हुआ, जहां हर नाम देश की राजनीति में स्थापित था। ऐसे खानदान का चिराग होना जितना अच्छा दिखता है उससे ज्यादा वो बलिदान भी लेता है। बचपन सोने की चम्मच से खाते बीता पर बाकी जीवन बस रोने और पुरानी यादों को संजोने में ही गुजरता गया। दस साल की उम्र से पहले दादी की सत्ता छिन गई। चाचा की मौत हो गई। फिर दादी सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री निवास में ही उनकी हत्या हो गई। पिता प्रधानमंत्री बने तो उनकी जान को खतरा बढ़ता चला गया। दूसरे लड़कों की तरह वो ना कहीं घूम सकता था और ना ही किसी को अपना दोस्त बना सकता था। इतिहास में दर्ज युवराजों की तरह वो अपनी रियाया के बीच जश्न मनाने भी नहीं जा सकता था। मूंछें ढंग से निकली भी नहीं थी कि लिट्टे ने इस युवराज से वो छीन लिया जिसकी कमी किसी के लिए कभी कोई दौलत पूरी नहीं कर पाती। पिता का साया सिर पर नहीं था। चारों तरफ के ताने और साजिशों की बढ़ती फेहरिस्त इस युवक से कितना कुछ छीन कर ले गई इसका एहसास सिर्फ उसे ही हो सकता है जिस पर बीतती है। फिर भी विरासत में मिला खानदान का नाम उसे रोने नहीं देता था। दादी का हौसला उसे टूटने नहीं देता था। पिता की सोच उसे डिगने नहीं देती थी। मां का धैर्य उसे आस बंधाता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। यही हुआ भी ,आज वो युवा वर्ग का चहेता राजनेता है। अपनों के लिए युवराज है। विरोधी चाहे खानदान के नाम की वजह से उसे कोसते हों पर सबको उससे आस है। वो गरीबों और कमजोर तबके के पास है। उसके पास संयम है। सोच है। कुछ कर गुजरने की चाह है। सामने राह है। वो चाश्नी में शब्दों को डुबोकर नहीं बोलता। वो खरी-खरी और सच बात कहने में कोई लाग लपेट नहीं करता। वो सदन में भी राजनेताओं की तरह नहीं बोलता। वो केवल मुंह खोलने के लिए एनर्जी वेस्ट नहीं करता। उसकी आवाज एक आम आदमी की आवाज का एहसास कराती है। सुरक्षा के तामझाम उसे जनता के बीच जाने से चाहे रोकते हों लेकिन उसके पैर हमेशा वहीं पर जाकर ठहरते हैं जहां असली जिंदगी बसती है। शायद जीवन के खालीपन को दूर करने की यह एक कोशिश है। वो राजनीति के चक्रव्यूह की लड़ाई लड़ रहा है। जहां उसे सोचना भी है। बोलना भी है। करना भी है। सारे द्वार ध्वस्त भी करने हैं और पार्टी तथा देश की उम्मीदों पर खरा भी उतरना है। चुनावी नतीजें कुछ भी हों पर यह तय है कि बूढ़ी हो चुकी कांग्रेस के पास वो सुरीला साज है। जिस दिन वो पूरे लय से बजेगा उस दिन इस युवराज के सिर पर ताज भी होगा और युवा फौज को नाज भी,उसके दर्द को देखते हुए हो सकता है वही जनता का असली राज हो। फिलहाल उसकी चाल और ढाल से इस दल के पुराने सारे दिग्गज अपनी उम्र नजरअंदाज कर उसे खुश करने में जुटे रहते हैं। देखना यही है कि जनता क्या फैसला सुनाती है?
राहुल गांधी

0-19 जून,1970 को नई दिल्ली में गांधी परिवार में जन्म। सर्वाधिक प्रतिष्ठित और शक्तिशाली परिवार। दिल्ली के माडर्न स्कूल में पढ़ाई। 81-83 में दून स्कूल का छात्र। सुरक्षा कारणों से बाद में घर में पढ़ाई। सेंट स्टीफन्स कालेज में प्रवेश विवादास्पद। पिस्टल शूटर बेस पर एडमिशन। एक साल बाद ही कालेज छोड़ा। चाचा संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मौत। 14 साल की उम्र में दादी श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या। 21 साल की उम्र में पिता राजीव गांधी की लिट्टे द्वारा हत्या। 94 में फ्लोरिडा के रोलिंस कालेज से बीए। राऊल विन्सी विवि से आगे की पढ़ाई। स्पेनिश लड़की विरोनिका गर्ल फ्रैंड। राजनीति के कारण रिश्ता टूटा। 2004 के आम चुनाव के दौरान एमफिल की डिग्री ट्रिनीटी कालेज कैंब्रिज से पाने का दावा। मानिटर ग्रुप लंदन के लिए रणनीतिक सलाहकार के रूप में काम करने का तजुर्बा। 03 में राजनीति में आने की अटकलें। मां के साथ चुनावी रैलियों में जाने की शुरूआत। मार्च 2004 में राजनीति में आने का ऐलान। अमेठी से चुनाव लड़ा। सोनिया गांधी रायबरेली से लड़ीं। कांग्रेस मात्र 10 सीट जीती। राहुल गांधी एक लाख से अधिक वोटों से विजयी। बहन प्रियंका के हाथों में चुनाव की बागडोर। 06 में हैदराबाद में पार्टी सम्मेलन में बड़ा ओहदा देने पर जोर। 06 में सोनिया 4 लाख से अधिक मतों से रायबरेली से जीतीं। 07 में राहुल की कप्तानी में कांग्रेस ने यूपी का चुनाव लड़ा। पार्टी को मात्र 22 सीटें मिली। इसी साल सितंबर में राहुल पार्टी के महासचिव नियुक्त। यूथ कांग्रेस और छात्र यूनियन का जिम्मा। कांग्रेस में युवा पीढ़ी की शुरूआत। यूपी समेत बाकी राज्यों का लगातार दौरा। बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम चलाई। इस बार फिर मैदान में। वही मुहिम। मनमोहन सिंह पर ही दांव। देर सबेर पीएम बनने के प्रमुख दावेदार। कई विवादित बयानों पर बवाल।साफगोई से बात कहने की खूबी। युवा वर्ग इनका दीवाना। गरीबों के प्रति हमदर्दी।

अम्मा की शान निराली



देशपाल सिंह पंवार
बचपन की ओर पहला कदम भी नहीं रखा था कि पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया। जवानी की ओर कदम भी नहीं रखा था कि पढ़ाई-लिखाई में होशियार होने के बावजूद कालेज से नाता टूट गया। राजनीति में ढंग से पहला कदम बढ़ाया नहीं था कि राजनीतिक गुरू और दिल के बेहद करीबी एमजीआर हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। पार्टी में ग्रिप की ओर पहला कदम भी नहीं बढ़ाया था कि एमजीआर की विधवा के साथ ठन गई। संसदीय माहौल की तरफ पहला कदम ढंग से रखा नहीं था कि अनेक अनचाहे दुश्मन खड़े हो गए। विधानसभा में विपक्ष की नेता के रूप में पहला कदम रखा ही था कि द्रमुक नेताओं के तानों से ऑंखें भर आई। तौहीन इतनी दिल को छू गई कि फिर सदन में नेता के रूप में ही वापस आई। देश की राजनीति में रमने की ओर कदम बढ़ाया था तो अटल सरकार गिराने का टींकरा सिर फूट गया। सीएम के रूप में पारी की ओर कदम बढ़ाया ही था कि बेईमानी के अनगिनत आरोप दामन पर लगने लगे। साड़ियां, सोना-चांदी, हीरे-जवाहारात और चप्पल-जूतियों के शौक मीडिया में जोक बनने लगे। मंत्री भी पीछे नहीं रहे। सबने दोनों हाथों से दौलत कमाई। राज्य में जल्दी ही फिर ऐसे हालात बने कि परपंरागत दुश्मन करूणानिधि फिर सत्ता में आ गए। उन्होंने गद्दी पर बैठते ही सारी फाइलों को खंगालना शुरू कर दिया। नतीजा दर्जनों मामले चारों ओर मंडराने लगे। तमिलनाडु की राजनीति दो ही दलों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक से जनता बोर तो फिर दूसरे दल का जोर। फिर दूसरी बार सत्ता की ओर कदम बढ़ाया तो पांच साल के प्रहार ने व्यवहार बदल कर रख दिया। संत हो या संपादक, नेता हो या कलाकार सबको जेल की हवा खिलाई। वे सबकी अम्मा कहलाने लगी थीं पर उनके तेवर और कामकाज से न कल अम्मा का रूप झलकता था और न ही आज। वे एकता कपूर के सीरियल की किरदार अम्मा जैसी बार-बार नजर आतीं रहीं। ऐसी अम्मा जो गलतियों पर किसी भी हद तक सजा देने से ना हिचकिचाए। ऐसी अम्मा जो अपने राजपाट को बचाने या बनाने के लिए किसी भी हद तक पद और पावर का इस्तेमाल करने में न हिचकिचाए। ऐसी अम्मा जिसका बचपन चाहे गरीबी में बीता हो पर जवानी और उसके बाद का दौर जिसका शानो शौकत में बिताया। ग्लैमर से लेकर धन दौलत तक ऊपर वाले ने खूब उन्हें दिया। हां इस पर किसी को बोलने या लिखने का अधिकार अम्मा ने किसी को नहीं दिया। बचपन और जवानी में डांस की माहिर अम्मा अब सबको अपने आगे-पीछे खूब नचाती है। खासकर विरोधी द्रमुक नेताओं को या फिर उन्हें जो उनके सहारे अपनी नैया पार करने की सोचते हैं। उनका सपना देश की अम्मा बनने का है। इसके लिए वे नए-नए गठजोड़ करने में पीछे नहीं हटतीं। बशर्ते हाथ मिलाने की बजाय दूसरा हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर उन्हें अम्मा कहे। अम्मा चालाक राजनेता से ज्यादा एक जिद्दी राजनेता मानी जाती हैं। इस बार वे इस स्थिति में आ सकती हैं कि अगली सरकार में उनकी तूती बोले। अगर ऐसा हुआ तो यकीनन अम्मा का असली रूप तब देखने को मिलेगा। अम्मा से ज्यादा एक महारानी का रूप-जिसे ना सुनना पसंद नहीं।
जयललिता जयराम

0-24 फरवरी,1948 को मैसूर में जन्म। दो साल की उम्र में पिता का निधन। परिवार बेहद गरीब। बैंगलूर के बिशप स्कूल से हाईस्कूल। मां संध्या के साथ फिर मद्रास शिफ्ट। मां तमिल फिल्मों की अदाकारा। केंद्र सरकार की ओर से उच्च शिक्षा के लिए स्कालरशिप। मां की सलाह पर फिल्मों में प्रवेश। 61 में वीवी गिरि के बेटे की अंग्रेजी फिल्म एपिस्टल से शुरूआत। तमिल फिल्मों की सुपरस्टार। 72 में फिल्म इज्जत में धर्मेंद्र की हीरोइन। 1981 में अन्नाद्रमुक ज्वाइन। राजनीति की शुरूआत। 88 में उच्चसदन में । एमजी रामचंद्रन से बेहद नजदीकी रिश्ते। एजीआर की मौत के बाद पार्टी में अलग-थलग। खलनायिका की छवि। 89 में विधानसभा चुनाव जीतीं। विरोधी दल की पहली महिला नेता। द्रमुक पर सदन में तौहीन के आरोप। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस से गठजोड़। अन्नाद्रमुक पर काबिज। चुनाव में फतह। 91 में पहली चुनी हुई महिला मुख्यमंत्री। सर्वाधिक विवादास्पद नेताओं में से एक। 92 में महिला आईएएस चंद्रलेखा पर सरेआम चेन्नई की सड़क पर तेजाब फैंका गया। जयललिता के इशारे पर कांड। 95 में एक वकील पर कातिलाना हमला। दर्जनों करप्शन के मामले। 96 में द्रमुक के हाथों हार। ज्यादातर मंत्रियो की हार। केंद्र में अटल की सरकार गिराने के लिए जिम्मेदार। 2001 में फिर सत्ता में। तांसी मामले में पांच साल की सजा। सीएम बनने पर बवाल। गद्दी छोड़नी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट से सबूत के बिना राहत। 03 में शिक्षकों की हड़ताल। 1,70 हजार शिक्षक बर्खास्त। 04 में फिर बहाल। स्वामी जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार कराया। एम करूणानिधि, मुरासोली मारन और टीआर बालू को गिरफ्तार कराया। हिंदू अखबार के संपादक को 15 दिन तक जेल में रखा। जिद्दी महिला। 2006 में फिर सत्ता से बाहर। विपक्षी नेता पद पर बवाल। पार्टी पर शिकंजा कमजोर। किसी तरह फिर जया उस गद्दी पर। ज्योतिष पर विश्वास। कई विवि की ओर से डीलिट की विवादास्पद उपाधि। देश पर राज करने का सपना। द्रमुक की घनघोर विरोधी।