शनिवार, 16 मई 2009

पर्दा आज हटेगा

देशपाल सिंह पंवार
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सिस्टम का आज एक और सबसे बड़ा दिन है। जनादेश से परदा उठेगा। नतीजे सबको पता हैं पर निगाहें लगी हुई हैं। नेताओं की भी, जनता की भी,पड़ौसी देशों की भी और बाकी दुनिया की भी,तेज गरमी,नेताओं के झगड़े, नक्सलवाद और अपराधियों के रगड़े के बीच डेढ़ माह तक जूझते हुए जिस तरह आयोग और फोर्स ने चुनाव संपन्न कराए, वह काबिले तारीफ है। तारीफ के सबसे कम हकदार बस दो हैं- एक नेता और दूसरी जनता। नेताओं के नकारेपन से वोटर बूथ से विमुख और इससे विखंडित जनादेश (तय) की बात ढेरों को यह संतोष दे सकती है कि वो जो सोचते थे वही हुआ। लेकिन क्या यही होना चाहिए था? दस हजार करोड़ और इससे दस गुणा ज्यादा श्रम शक्ति की देश को चोट के बाद वोट का यही खोट सामने आना चाहिए था? यहां जनता का राज है। जनता ही जनार्दन है। वही तय करती है कि कौन बनेगा राजा और किसक ा बजेगा बाजा? यह भी माना जाता है कि जनता सब जानती है। कितना कोई नहीं बता पाता। ना जनता जता पाती। शायद वो भी सब नहीं जानती। ना जानना चाहती। या फिर जानकर अंजान बने रहना चाहती है। नतीजा जनता जनार्दन बस एक वाक्य नजर आता है, जिसके सहारे लोकतंत्र की बीन बज रही है। अगर जनता का राज है तो फिर ऐसा क्यों है? क्या जनता ऐसा ही राज चाहती है? क्या जनता फटेहाल ही रहना चाहती है? अगर सब जानती है तो फिर वो अच्छों को क्यों नहीं जिताती? पूर्ण बहुमत किसी को क्यों नहीं देती? अपराधियों का सफाया क्यों नहीं करती? दल-बदलुओं को सबक क्यों नहीं सिखाती? राजनीति से करप्ट चेहरों को बाहर क्यों नहीं करती? हकीकत यही है कि वो बस एक वोटर है। इस चाल में शामिल है। वोट दिया काम खत्म। उसके वोट से संख्या बनती है। जिनको आज चुनेगी पीएम बनाना अब उनका जिम्मा। वो जिस तरीके से चुनेंगे यह दिखने लगा है। गठजोड़ की राजनीति और राजनीति के गठ जोड़ जिस तरह चुनाव से पहले खुलते और नतीजों के दौरान बनते हैं वह हैरतअंगेज है। जिन्हें कोस-कोसकर दल वोट की गुहार लगाते हैं। संख्या बल जुटाने के वास्ते उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर अब यह जताने लगे हैं कि हम एक हैं, हम करेंगे राज। हमें दो ताज। गाज गिरेगी जनता पर। वो जिसे हितैषी मानती है और जिसके खिलाफ वोट देती है, उनकी अचानक दोस्ती धीरे से जोर का झटका दे जाती है। वो देखती चली जाती है। ये क्या हुआ बोलती चली जाती है। क्यों हुआ सोचती रह जाती है। नतीजे आज कुछ •भी हों यहां नेताओं की मदमस्त चाल है। जनता हलाल है। लोकतंत्र बेहाल है। देश लाल है। फिर ये कैसा जनता का राज? जहां राजा (जनता) कंगाल और नेता मालामाल। फन से भी ,मन से भी -धन से भी -गन से भी और जन से •भी, जनता के पास ना तो धन ना ही गन। है तो सिर्फ कंगाल तन। जब तक उसमें जान है- नेताओं का मस्त जहान है। तो आज देखिए और आज के नतीजों के बाद फिर जल्दी ही देखिएगा इस ना खत्म होने वाली फिल्म को-जहां हर पल, हर सीन में एक साथ कहीं खुशी-कहीं तमाम गम है। इसके बावजूद नेता और जनता हमकदम है। है ना हैरत की बात।

कैसे बनेगी कांग्रेस की सरकार



देशपाल सिंह पंवार
बहुमत किसी को नहीं मिलने वाला तय है। सबको एहसास है फिर भी दिल की धड़कनें सबकी तेज हैं। यह जानने को सब बेताब हैं कि किसे-कितनी सीटें मिलेंगी?,कौन जीतेगा? किस-किस में होगा तकरार? किस-किस में होगा प्यार? इस तकरार और प्यार से किसका होगा बेड़ा पार? सबसे ज्यादा दिलचस्पी इसमें है कि किसकी बनेगी सरकार? कौन बनेगा बड़ा सरकार? क्या राजग गठजोड़ गद्दी पाएगा, या वक्त फिर 2004 की कहानी दोहराएगा, या कोई नया किस्सा लिखा जाएगा? ऐसी जिज्ञासा हर दिल-ओ-दिमाग में उठ रही है। पर साथ ही साथ सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि कैसे बनेगी सरकार? राजग हो या यूपीए या फिर तीसरा मोरचा(?), सब नए साथी तलाश रहे हैं। हर घर दस्तक दे रहे हैं। दुहाई दे रहे हैं। मनुहार कर रहे हैं। गद्दी की रोड पर जोड़-तोड़ की होड़ मची हुई है। कुछ वादा भी कर रहे हैं। पर इरादा तब झलकेगा जब नतीजे सामने होंगे। ये दल जानते हैं कि उनकी जरूरत है। जो जरूरत पूरी करेगा उसके साथ खड़ा होने में उन्हें संकोच •भी नहीं होगा। बहती इसी धारा की वजह से नैतिकता, ईमानदारी, निष्ठा ये सब शब्द राजनीति में बेमायने हो गए हैं। लिहाजा फिर कंबल ओढ़कर घी पीने का दौर चलेगा। कारण ये जानते भी हैं और कहते •भी हैं कि इनके बिना सरकार नहीं बनेगी। यह सच भी है कि सरकार बनने के केवल यही चांस हैं-या तो राजग की, या यूपीए की या फिर कांग्रेस के समर्थन से तीसरे मोरचे की या राजग के समर्थन से किसी और गठजोड़ की। इसी वजह से बीजेपी,कांग्रेस को छोड़ बाकी का रोल सरकार बनाने से ज्यादा बनवाने में होगा। फिलहाल राजग सबसे मजबूत गठजोड़ दिखाई दे रहा है लेकिन कांग्रेस ज्यादा उत्साहित और विश्वस्त नजर आ रही है। लाख टके का सवाल यही पैदा होता है कि आखिर इसका आधार क्या है और कैसे बनेगी उसकी सरकार? क्या 272 के जादुई आंकड़Þे का जुगाड़ हो गया है?कांग्रेस के रणनीतिकार सारे जोड़-तोड़ लगा रहे हैं। आलाकमान को नए-नए रास्ते बता रहे हैं। विश्वास दिला रहे हैं कि सारे रास्ते सत्ता तक लेकर जाएंगे। क्या होगा यह तो 16 मई को ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल जो सीन पैदा रहा है वह कांग्रेस के विश्वास की असलियत की चुगली ज्यादा करता दिख रहा है। हां हो सकता है कि तीर निशाने पर जा बैठे। कारण-राजनीति संभावना का मेल है, संख्या बल का खेल है। तमाम सर्वेक्षण •भी यही बता रहे हैं और यही आसार •भी हैं कि बीजेपी और कांग्रेस में बराबर की लड़ाई है। दोनों दल आधे से ज्यादा सीटों पर काबिज होंगे यानि बाकी सब अगर मिल •भी जाएं तो भी सरकार नहीं बना सकते। कांग्रेस के विश्वास के कई कारणों में से एक यह भी है। साथ ही साथ तमाम दलों के आपस के पैंच उसका हौसला और बढ़ा रहे हैं। वो अपनी वजह से कम और बीजेपी की सांप्रदायिक छवि की वजह से ज्यादा शुकून में है। कांग्रेस जानती है कि मायावती हो या वामदल किसी भी कीमत पर बीजेपी के साथ खड़े नहीं होंगे। न उन्हें समर्थन देंगे और न लेंगे। यही बात उसके विश्वास का असली कारण है। जैसे की आसार हैं-अगर वो 150 सीटों को पार कर गई तो इसी का फायदा वो फिर उठाएगी। कांग्रेस जानती है कि वामदलों के बिना भी जोड़-तोड़ से उसकी सरकार बन सकती है लेकिन तीसरे मोरचे की सरकार कांग्रेस के बिना नहीं बन सकती यह कटु सत्य है। वामदलों का यूपीए संग जाने में बस एक ही रोड़ा है और वो है परमाणु करार। इस मसले पर भले ही वामदल फिलहाल झुकने को तैयार नजर नहीं आते हों लेकिन विपक्ष में बैठने की कांग्रेस की जिद और राजग के सत्ता में आने की बात शायद वामदलों को परमाणु करार से भी ज्यादा मुश्किल नजर आए। उसकी यह फीलिंग या मजबूरी भी कांग्रेसी समझते हैं। वैसे भी अब वो दौर नहीं रहा जब विचारधारा से तय होता था कि कौन किसके साथ जाएगा? अगर जार्ज जैसा नेता बीजेपी के साथ खड़ा हो सकता था तो फिर इनकी क्या ऐंठ? वैसे 100-125 सीटों वाला संभा वित तीसरा मोरचा पहले यही चाहेगा कि कांग्रेस उन्हें समर्थन दे और अगर कांग्रेस इस पर राजी नहीं होती तो यकीनन बीजेपी के सत्ता में आने के आसार से वामदल देश हित की दुहाई देकर साथ में खड़े नजर आ सकते हैं। वैसे भी जो विशेषज्ञ इस बात को कहते हैं कि वामदल परमाणु करार करने वालों के साथ खड़े नहीं होंगे वे कहीं न कहीं गलतफहमी में हैं। परमाणु करार पर कांग्रेस को अछूत मानने वाले वामदल अगर अछूत के समर्थन से सरकार बनाने की बात कर सकते हैं तो फिर समर्थन दे भी सकते हैं। हां इसकी कीमत वे वसूल सकते हैं-मनमोहन सिंह के रूप में। सवाल यही उठता है कि क्या कांग्रेस इस पर झुकने को तैयार होगी? अगर कांग्रेस की सीटें 170 के आसपास रही तो यकीनन वो नहीं झुकेगी। अगर वो 150 के नीचे रही और सरकार बनाने की मंशा रही तो वो नाम बदलने पर विचार कर सकती है। तमाम कांग्रेसियों को भी इस पर कोई एतराज नहीं होगा सिर्फ सोनिया गांधी को छोड़कर। शरद पवार भी यही चाहते हैं। वामदलों को फेस सेविंग का रास्ता •भी मिल जाएगा। सरकार बनाने का कांग्रेसी गणित बड़ा दिलचस्प नजर आता है। पासवान-लालू-मुलायम की तिकड़ी को यूपीए से बाहर और सर्वेक्षणों को सही मानें तो यूपीए को 200 के आसपास सीटें मिलती दिख रही हैं। तिकड़ी को 38 तथा वामदलों को भी इतनी ही। एक रास्ता यही है कि कांग्रेस चौथे मोरचे को साथ रखे और वामदलों को नए सिरे से पटाए। यह आसान नहीं पर असंभव •भी नहीं। हां सत्ता में बड़ा हिस्सा देना पड़ सकता है। वामदलों के आने से ममता राजग के पाले में जा सकती हैं। इसका डर कांग्रेस को है। वह यह नहीं चाहेगी। इसके अलावा कांग्रेस के सामने जो विकल्प हैं वे एक बार सत्ता तक तो ले जा सकते हैं लेकिन दूरगामी राजनीति के लिहाज से घातक हो सकते हैं। तमिलनाडु में करुणानिधि और यूपी में मुलायम का साथ छोड़ने व जयललिता तथा मायावती से समर्थन लेने की सोचने से उसे आने वाले वक्त में सहयोगियों के लाले पड़ सकते हैं। हां इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस पासवान को अपने संग और लालू से छुटकारा चाहती है। नीतीश कुमार के आने से उसे बेहद फायदा हो सकता है। नीतीश और पासवान में ज्यादा अदावत भी नहीं है। दोनों साथ रह सकते हैं। इससे बिहार में नीतीश सरकार की सेहत पर भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। कांग्रेस रालोद, जद एस, जैसे छोटे-छोटे दलों को •भी आसानी से अपने पाले में लाकर संख्या बढ़ा सकती है। इस सबके लिए पहले जरूरी है वो बीजेपी से ज्यादा सीटें लेकर आए। राष्ट्रपति सबसे बड़े दल के नाम पर उसे बुलाएं तो हो सकता है इनके अलावा भी एक-दो और अवसरवादी दल देश हित और बीजेपी विरोध के नाम पर उसके पाले में टपक आएं। अगर हित सधे तो ऐसे दल भी साथ आ सकते हैं जो एक-दूजे को फूटी आंखों नहीं सुहाते। नंबर गेम में राजग और यूपीए में से वही जीतेगा जो सबको खुश करने में कामयाब होगा। हकीकत यही है कि बीजेपी की एनर्जी ज्यादा खर्च होगी और कांग्रेस की कम। कुल मिलाकर 10 हजार करोड़ से ज्यादा में बनने वाली यह फिल्म सुपर हिट नहीं होने जा रही है यह तो सबको पता है लेकिन बुरी तरह ना पिट जाए इसका सबको डर है। पिटी तो फिर खजाना इसी तरह खाली होगा। पांच साल में एक बार तो ये देश बर्दाश्त कर सकता है लेकिन जिस तरह दुनिया के हालात हैं और विश्व बैंक देश की खराब तस्वीर दिखा रहा है,गद्दी के तहेते नेताओं को छोड़ बाकी हर हिंदुस्तानी यही चाह रहा है कि किसी की भी बने पर बन जाए और पांच साल चल भी जाए। जनता का हित वैसे भी नहीं होना वाला,कम से कम खजाने का तो कुछ हित हो जाए। देश का तो कुछ हित हो जाए।