मंगलवार, 9 जून 2009

सबको आस

देशपाल सिंह पंवार
फिलहाल सारा देश उम्मीद के सहारे चल रहा है। बाजार आर्थिक मंदी जल्द दूर होने की उम्मीद कर रहा है। युवा वर्ग रोजगार की उम्मीद कर रहा है। जिनके पास रोजगार है वे ज्यादा सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जनता रोटी-कपड़ा और मकान की उम्मीद कर रही है। मजदूर अच्छी दिहाड़ी की उम्मीद कर रहा है। हर वर्ग,हर शख्स, हर घर, हर गांव, हर कस्बा, हर शहर, हर राज्य हर समय कुछ न कुछ उम्मीद कर रहा है। सारी उम्मीदें घूम फिरकर जिस गलियारे में गूंजती है वो है केंद्र सरकार का। देश की सत्ता का। जब सब उम्मीद कर रहे हैं तो फिर केंद्र सरकार ही पीछे क्यों रहे? प्रधानमंत्री भी उम्मीद कर रहे हैं कि इस वित्तीय साल में तमाम झंझावत के बावजूद देश सात फीसदी की विकास दर को हासिल करेगा। आर्थिक मंदी का उसपर असर हो रहा है लेकिन इतनी विकास दर हासिल करने में हम कामयाब होंगे। संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने आधारभू त ढांचा और सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए अधिक संसाधनों का वादा किया। सात फीसदी की विकास दर कैसे रहेगी यह तो वे नहीं बता पाए लेकिन अगर इसके आस पास रही तो इसका तर्क उन्होंने खोज लिया है। आर्थिक मंदी की एक ऐसी छत्र छाया सरकार के पास है जिसका नाम लेकर वैतरणी पार की जा सकती है। प्रधानमंत्री ने इसके संकेत भी दिए। कहा-मैं आपसे वादा तो नहीं करता कि आर्थिक मंदी का हम पर असर नहीं पड़ेगा लेकिन हम 8-9 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर हासिल करने में सक्षम होंगे। दुनिया की विकास दर चाहे गिर जाए पर हम सात फीसदी को हासिल करके रहेंगे। सवाल यही पैदा होता है कि क्या सरकार जनता की सारी उम्मीदों को पूरा कर पाएगी? क्या सरकार की ये उम्मीद पूरी हो पाएगी? जिस देश की आर्थिक विकास दर नौ को छू चुकी हो क्या वो सात फीसदी की दर से वे सारे सपने पूरे कर पाएगा जो जनता ने इस सरकार को चुनते समय देखे थे? इस बार वामदलों या अन्य अड़ियल सहयोगियों का दबाव भी सरकार के ऊपर नहीं है। ऐसे में अगर आर्थिक सुधारों की गाड़ी सरपट नहीं दौड़ पायी तो फिर किसका दोष? आर्थिक मंदी का असर उन देशों पर ज्यादा है जो खाने-पीने और दूसरी मूल जरूरतों के लिए दूसरों पर डिपेंड रहते हैं लेकिन हमारे साथ तो ऐसा नहीं है। यहां कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जो यहां पैदा ना होता हो। जरूरत इसी बात की है कि सरकारी स्तर पर करप्शन खत्म हो। 100 पैसे में से 90 पैसे धरातल पर खर्च करने का समय है। डकारने का नहीं। बाजार में मुद्रा आए। साथ ही नई एग्रीकल्चर नीति बनाई जाए। अगर खेती की जमीन पर इमारतें खड़ी हो जाएंगी तो फिर उत्पादन कहां से होगा? सरकार को इस बारे में सोचना होगा। साथ ही साथ मनमोहन सिंह को ये भी दिखाना होगा कि बिना दबाव की सरकार ज्यादा बेहतर राज कर सकती है और ज्यादा बेहतर सुविधाएं जनता को मुहैया कर सकती है। जनता की उम्मीद पर खरा उतरने से ही सरकार की उम्मीद भी पूरी होगी।

जाना हबीब तनवीर और ओमप्रकाश आदित्य का





देशपाल सिंह पंवार
कुदरत का नियम है-जो आया है, वो जाएगा। सबसे बड़ा शाश्वत सत्य मौत ही है। इसे कोई झुठला नहीं सकता। कुछ किस्मत की खाते हैं और कुछ कर्म की। अपनी पारी खेलकर सबको जाना होता है। अनगिनत लोगों के जाने का पता नहीं चलता लेकिन चंद चेहरे जिस तरह छोड़कर जाते हैं वो पल कष्टदायक तो होते हैं, आंखों को नम तो करते हैं पर साथ ही हमेशा के लिए अपनी अमिट छाप और अमिट याद दिलों में बसा जाते हैं। हबीब तनवीर एक ऐसे ही नाम हैं। जिनके इंतकाल से सारा देश उदास है। उनका जाना महज थियेटर जगत के लिए नहीं, महज छत्तीसगढ़ के लिए नहीं बल्कि सारे देश और समूचे रंगमंच जगत के लिए दुख की घड़ी है। थियेटर की दुनिया पर अमिट छाप छोड़ने वाले हबीब तनवीर तीन हफ्ते से सांस्कृतिक नगरी भो पाल में अस्पताल में भ र्ती थे जहां काल के क्रूर पंजों ने उन्हें हमसे छीन लिया पर वो जो देकर गए हैं उससे वे हमेशा दिलों में रहेंगे। एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब शुरूआत में पत्रकार थे लेकिन बाद में उन्होंने रंगमंच की दुनिया को अपनाया। उन्होंने रंगमंच को लाहौर नहीं वेख्या, ओ जम्या नहीं और बाजार जैसे कालजयी नाटक तो दिए ही साथ ही अपने लेखन के जादू से आगरा बाजार और चरणदास चोर जैसे नाटक की रचना कर सारे जगत को अपना बना लिया। लेखक, निर्देशक, नाटककार,कलाकार के साथ-साथ जितने हुनर कालजयी चरित्रों में होने चाहिएं वे सब हबीब साहब में थे। उन्हें संगीत नाटक एकादमी, पद्यम श्री, पद्यम विभू षण जैसे सम्मान मिले पर जो सम्मान उनका जनता के दिलों में था उसके सामने हर अवार्ड फीका था। वे पांच दशकों तक जनता के दिलों पर राज करते रहे। 1972 से 78 तक संसद के उच्चसदन में रहे और सदन की गरिमा को बढ़ाया। हबीब साहब के कारनामों को चंद शब्दों में समेटना नामुमकिन है। वे जो लकीर खींचकर गए हैं, रंगमंच में वो हमेशा मील का पत्थर रहेगी। यह भी अजीब दुर्योग है कि जिस भो पाल में हबीब साहब ने अंतिम सांस ली उसी की सीमा में काव्य जगत की मशहूर हस्ती ओमप्रकाश आदित्य को कुदरत ने हमसे छीन लिया। विदिशा में बेतवा उत्सव से काव्यपाठ कर भो पाल आ रहे कवियों की गाड़ी सड़क हादसे का शिकार हो गई। ड्राईवर की नींद की झपकी ने हमसे ओमप्रकाश आदित्य, लाड़सिंह गुर्जर और नीरजपुरी की छीन लिया। जानी बैरागी और ओमव्यास घायल हैं। इन कवियों की मौत से स्तब्ध हैं। देश में कोई ऐसा काव्य मंच नहीं रहा जिसकी शान ओमप्रकाश आदित्य ने ना बढ़ाई हो। उनका अंदाज निराला था। उनके व्यंग निराले थे। वे देश के सबी कवियों में सबसे अलग और महत्वपूर्ण शख्सियत थे। मंच अब भी सजेंगे, पर आदित्य नहीं होंगे, उनकी कमी शिद्दत से हर कोई महसूस करेगा। 8 जून सोमवार का यह दिन हमेशा याद रहेगा, इसने हमसे मंच के नायक छीन लिए हैं। यादें रहेंगी उसे कोई दिन,कोई पल नहीं मिटा सकता।जहां तक हबीब तनवीर का सवाल है तो पांच दशक तक रंगमंच और जनता के दिलों पर राज करने वाले हबीब अहमद खान उर्फ हबीब तनवीर का जन्म एक सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। ये हिंदी के प्रसिद्ध नाट्यकार,रंगमंच निदेशक, कवि और कलाकार थे। उन्होंने 1954 में आगरा बाजार तथा 1975 में चरनदास चोर जैसे नाटक लिखे। उन्होंने भो पाल में 1959 में नया थिएटर नाम की एक थिएटर कंपनी की स्थापना की। वर्ष 1982 में एडिनबर्ग अंतरराष्ट्रीय नाट्य उत्सव में उनके नाटक चरनदास चोर को फ्रिंग फर्स्ट अवार्ड मिला। इनके पिता का नाम हाफिज अहमद खान था जो पेशावर के थे। उन्होंने रायपुर के लाउरी म्यूनिसिपल हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की और बाद में वर्ष 1944 में नागपुर के मोरिस कालेज से बीए पास किया। उसके बाद उन्होंने एमए करने के लिए एक वर्ष के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उन्होंने अपने जीवन के आरंभ में कविताएं लिखनी शुरू की। उन्होंने अपना नाम तनवीर रखा तथा उसके शीघ्र बाद में वे हबीब तनवीर के नाम से जाने जाने लगे। वर्ष 1954 में वे मुबंई गए तथा आल इंडिया रेडियो में बतौर प्रोडयूसर कार्य करने लगे। मुंबई में रहते हुए वे हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे तथा कुछ फिल्मों में अभी नय भी किए। उन्होंने प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्ल्यूए) ज्वाइन किया और एक अभी नेता के रूप में इंडियन पीपुल्स एसोसिएशन के आवश्यक अंग बन गए। बाद में जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने के कारण आईपीटए के प्रमुख सदस्य जेल चले गए तब उनको संगठन को चलाने के लिए कहा गया। वर्ष 1954 में वे दिल्ली गए और वहां कुसिया जैदा के हिन्दुस्तानी थिएटर में काम किया। उन्होंने बच्चों के थिएटर के लिए भी कार्य किया तथा अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात सह निदेशक मोनिका मिश्रा से हुई और उन्होंने शादी कर ली। बाद में उसी वर्ष उन्होंने मिर्जा गालिब की पीढ़ी के बूढ़े उर्दू कवि नाजिर अकबराबादी के कृतियों पर आधारित अपना प्रथम नाटक आगरा बाजार लिखा। इस नाटक में उन्होंने स्थानीय निवासियों और दिल्ली के ओखला गांव के लोक कलाकारों का व्यवहार किया। उन्होंने इस नाटक को एक ऐसा रंग दिया जिसे इससे पहले थिएटर में पहले कदापि नहीं देखा गया था। यह एक ऐसा नाटक था जिसे रंगमंच पर खेलने की बजाय बाजार में खेला गया। अप्रशिक्षित रंगकर्मियों और लोक कलाकारों के साथ उनका यह फीलिंग बाद में उनके नाटकों में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को लेकर देखने को मिलता है। वर्ष 1955 में हबीब लंदन गए। उन्होंने रायल अकादमी आफ ड्रामैटिक आर्ट्स में प्रशिक्षण लिया तथा ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में वर्ष 1956 में निदेशक का प्रशिक्षण लिया। अगले दो वर्षो तक वह यूरोप की यात्रा करते रहे तथा थिएटर संबंधी विभी न्न क्रिया कलापों का बड़ा ही बारीकी के साथ अध्ययन करते रहे। वर्ष 1956 में वह बर्लिन में आठ महीने रहे तथा इस दौरान उन्होंने बरटोल्ट ब्राट के अनेक नाटकों को देखा जिसका उनेक दिमाग पर गहरा असर पड़ा। संस्कृति से परे कहानियों तथा आदर्शो को व्यक्त करने के लिए उन्होंने अपने नाटकों में स्थानीय मुहावरों का प्रयोग किया। उनकी नाट्य शैली,प्रस्तुति तथा तकनीकी में सरलता देखी गई। इसके बावजूद उनके नाटक पापुलर हुए। वर्ष 1958 में हबीब लौटे और उन्होंने पूर्णकालिक निर्देशन का काम शुरू कर दिया। उन्होंने शुद्रक के संस्कृत नाटक मृचकट्टिका पर आधारित मिट्टी की गाड़ी प्रोडयूस की। यह छत्तीसगढ़ में उनका पहला महत्वपूर्ण प्रोडक्शन बना। लंदन से वापस लौटने के बाद वह छह लोक कलाकारों के साथ कार्य किए और यह उसी का नतीजा था। इसके बाद वह पीछे मुड़ कर नहीं देखे। वर्ष 1970से 1973 के दौरान उन्होंने थिएटर की एक बंदिश को तोड़ा। उन्होंने हिंदी बोलने वाले लोक कलाकारों की बजाए छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को ज्यादा तरजीह दिया। बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ की एक गायन शैली पंडवानी पर प्रयोग करना शुरू किया। उनके नाटकों में क्षेत्रीयता की छाप देखने को मिली तथा लोक कलाकारों को व्यक्ति की आजादी मिली। उन्होंने 1972 में एक कामिक लोक कहानी पर आधारित छत्तीसगढ़ी नाच शैली पर गांव का नाम ससुर और मोर नाम दामाद नामक नाटक लिखा। इस नाटक में दिखाया गया कि एक बूढ़ा व्यक्ति एक जवान महिला के साथ प्यार कर बैठता है और वह महिला एक युवक के साथ bhaग जाती है। अपने जीवनकाल के दौरान हबीब ने रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी समेत नौ फिल्मों में काम किया। धार्मिक पाखंड पर आधारित उनके नाटक पोंगा पंडित को लेकर वर्ष 1990 में सबसे पहले विवाद शुरू हुआ। यद्यपि नाटक साठ के दशक से ही मंचित होता रहा, लेकिन बाबरी मस्जिद तोड़ने की घटना के बाद सामाजिक परिवेश में कटुता आ गई थी। हिन्दू कट्टरवादियों खासकर आरएसएस को उनका यह नाटक नागवार गुजरा और उसके समथर्को ने इसको लेकर हो-हल्ला किया। यहां तक की जहां नाटक मंचित हो रहा था वहां जाकर आरएसएस समथर्को ने प्रेक्षागृह खाली करवा दिया। इसके बावजूद वे अपने नाटक को देश में मंचित करते रहे। उनके छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार ट्रूप ने वर्ष 1992 में असगर वजाहत के जिसने लाहौर नहीं देखा के साथ एक बार फिर तहलका मचा दिया। इसके बाद वर्ष1993 में उनका कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना नाटक आया। वर्ष 2002 में नाटककार की भो पाल गैस ट्रेजडी पर आधारित का हिंदी रूपांतरण जहरीली हवा का उन्होंने निर्देशन किया। वर्ष 2005 में उनके जीवन पर एक वृतचित्र गांव का नाम थिएटर,मोर नाम हबीब बनायी गई। हबीब के जाने से छत्तीसगढ़ उदास है। सारा सारा रायपुर उदास है। सारा रंगमंच उदास है। उनकी यादें हमेशा हर दिल में रहेंगी। यह तय है।