बुधवार, 25 मार्च 2009

फेस की रेस


देशपाल सिंह पंवार
हर इंसान के सब्र की एक सीमा होती है। हां जिसका मिजाज गरम - उसके सब्र की कद्र नहीं होती। बोलने पर नजर नहीं होती। जिसे गुस्सा ही ना आता हो, जो कड़वे बोल ही ना बोलता हो, मिजाज हमेशा नरम रहता हो अगर वो इंसान किसी बात पर फटता है,तो सबको आश्चर्य होना लाजिमी है। हां बोल का असर कारण, स्थिति और समय करता है। मनमोहन सिंह का केस ऐसा ही है। अर्थशास्त्री रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि उनका चरित्र राजनेताओं जैसा तो बिल्कुल नहीं होगा। हाल और चाल भी वैसा नहीं होगा। मिजाज लाल होना तो दूर की बात है। हां राजनीति में हैं और देश चला रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि इतना तो सीख ही गए हैं कि चुप्पी कितना फायदा पहुंचा सकती है और कब, कहां और क्या बोल ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं? सबकी आशा के विपरीत जब वे प्रधानमंत्री बने थे तो इसका एकमात्र कारण उनका मिजाज ही था। सबकी सुनने वाला और कम बोलने वाला। इसके सहारे व्यक्तिगत जिंदगी बेदाग चल सकती है, बेदाग कट सकती है लेकिन प्रधानमंत्री की गद्दी कांटों का ताज है, उस पर जरूरत से ज्यादा चुप्पी फायदों से ज्यादा नुकसान पहुंचा जाती है। यही कारण है कि बरसों से हर कोई उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहता आ रहा था वो खामोश थे। उनकी पार्टी के नेता दबे सुर से तो विपक्षी सरेआम चिल्लाते आ रहे थे, वो खामोश थे। आतंकवादी हमले हों या अन्य मसले सब पर उन्हें खरी-खोटी से ज्यादा यही सुनने को मिलता था कि वो डमी हैं और 10 जनपथ से ही देश चलता है, इसके बावजूद वो खामोश थे। ऐसा सोचना और ऐसा कहना विपक्षी खासकर बीजेपी नेताओं की सोची-समझी रणनीति थी। वो जानते थे कि मनमोहन सिंह का मुंह खुलते ही 10 जनपथ और पीएम हाउस के बीच की दीवार इतनी ऊंची हो जाएगी कि न तो मनमोहन की आवाज पार जाएगी और न ही उनकी चुप्पी वार की धार कम कर पाएगी। ऐसे समय में खुद का बचाकर निकल जाना आसान नहीं होता खासकर प्रधानमंत्री की गद्दी पर पहुंचने के बाद। इसी अग्निपरीक्षा से मनमोहन गुजरे। विपक्षी फेल मान सकते हैं लेकिन टकराव की स्थिति से कमजोर प्रधानमंत्री कहलाना फायदे का सौदा था यह अब साबित हो गया है। आज वे कांग्रेस जैसे दल के सबसे बड़े और निर्विवाद फेस हैं। टकराव टलने के दो कारण रहे। एक उनका व्यवहार और दूसरा 10 जनपथ की पावर। कोई बताए कि अगर मनमोहन की जगह कोई दूसरा प्रधानमंत्री बनता तो क्या उस पर यह ठप्पा नहीं लगता? सोनिया की हैसियत के चलते यह आरोप आश्चर्यजनक नहीं है। बरसों से सब सुनते आ रहे हैं। मानते आ रहे हैं। आश्चर्यजनक यह है कि जिस मनमोहन ने इसकी कभी परवाह नहीं की, सफाई नहीं दी,अचानक ऐसा क्या हुआ कि वो राजनेताओं के उसी सुर में बोलने लगे? घाघ नेताओं की तरह मुंह खोलने लगे। वे बीजेपी नेता एल के आडवाणी को पीएम के लायक नहीं मानते। मानना भी नहीं चाहिए। अगर वो मान जायेंगे तो फिर चुनाव किस बात का? जब पार्टी नेता अपनों को पीएम मजबूरी में मानते हैं, मर्जी से नहीं तो फिर विरोधी पर इस काबलियत का ठप्पा लगाकर कौन अपने पैरों को काटेगा? लेकिन कांग्रेस व मनमोहन ने यूं ही बाण नहीं चलाया है। इस बार तस्वीर अलग है। अकेले कोई दल राज में नहीं आने वाला। तीसरे मोरचे का प्रधानमंत्री नहीं बनने वाला। दलों के मोह से जनता निकल चुकी है। वक्त की नजाकत के चलते चुनावी मैदान में पार्टियों की लड़ाई से ऊपर कौन बनेगा पीएम की धारा बहने लगी है। बीजेपी आडवाणी को पहले ही पीएम के रूप में पेश कर चुकी है। मैदान में उतार चुकी है। ऐसे में कांग्रेस ही पीछे क्यों रहती? उसने समय-समय पर मनमोहन के पीछे खड़े होने की बात पुख्ता तरीके से रखी। घोषणा पत्र जारी करते समय सोनिया ने तमाम जनहित के वायदे किए और साफ किया कि मनमोहन ही होंगे यूपीए के प्रधानमंत्री। साफ है पहली बार अमेरिका की तर्ज पर चेहरों की लड़ाई रंग जमाएगी। मनमोहन को इसी वजह से आगे रखा जा रहा है कि जनता ही बताए-कौन है लायक? आपात स्थिति में कप्तान को हमेशा फ्रंट से लड़ना पड़ता है। इससे ज्यादा आपात स्थिति और क्या होती, इसीलिए मनमोहन ने आव न देखा ताव और आडवाणी पर पिल पड़े। पहली बार इस अंदाज में बोले तो जाहिर है मीडिया तक ने हाथों-हाथ लिया। रोज बोलेंगे तो धीरे-धीरे असर घटता जाएगा पर राजनीति का यही दौर है कि अपनी अच्छाई बताने से ज्यादा दूसरे के दोष उजागर करो। अपनी कमीज सफेद रखने और दिखाने की बजाए दूसरे की कमीज पर कीचड़ उछालो। बीजेपी नेता अरसे से करते आ रहे हैं। मनमोहन ने शुरूआत कर दी है। चुनावी बेला में वोटर चाहे बोर हो पर वाणों की लड़ाई के इस शोर में वो जरूर पोर-पोर रहेगा। दोनों में यह सीन रोजाना उस समय तक जरूर चलेगा जब तक वोटर यह ना बता दे कि ये है कमजोर पहलवान। तब तक फ्री में देखते रहिए दो बांकों की लड़ाई।

देश के हाल विकट- सबको चाहिए टिकट

देशपाल सिंह पंवार
मंदी का दौर है। गरीबी पुरजोर है। जनता बोर है। पेट में नहीं कौर है। दिखता नहीं ठौर है। मसले ढेरों और हैं। पर बोली कमजोर हैं। कारण चुनाव का जोर है। टिकट का शोर है। हाईकमान सिरमौर है। थामे हुए डोर है। टिकटधारी नेता पोर-पोर हैं। बेटिकट मुंहजोर हैं। गुस्से से सराबोर हैं। वाणी कठोर हैं। ये नजारे हरओर हैं। असंतोष घनघोर है। दिल मांग रहा मोर है। दिखता नहीं वो छोर है-कैसे सबको टिकट मिले? हर बड़े दल में सीट से दस गुणा ज्यादा दावेदार। हर कोई जनसेवक बनना चाह रहा है। वो भी जो गनधारी हैं.वो भी जो भ्रस्ताचारी हैं। वो भी जो अत्याचारी है। वो भी जो दुराचारी हैं। वो भी जो निरक्षरधारी हैं। हैरत की बात यही है कि जो लायक हैं वो कम बोल रहे हैं, खुद को तोल रहे हैं। जो नहीं हैं वो जहर घोल रहे हैं। अपनों पर हमले बोल रहे हैं। विरोधी दलों को टटोल रहे हैं। लाख टके का सवाल यही है कि अगर ऐसे नेता जातिवाद,,परिवारवाद और समीकरणों के सहारे जनसेवक बन भी गए तो किसका कल्याण करेंगे?अपना या जनता का? सब जानते हैं। कड़वा सच यही है कि सबसे बड़े लोकतंत्र में जनता की चाह और राजनीति की राह की खाई लगातार चौड़ी होती जा रही है। पर इसकी परवाह किसे है? बचपन में सुना था,जवानी में पढ़ा था-जिंदगी एक बार मिलती है। बेहदअनमोल होती है। जीवन की थीम रोटी-कपड़ा और मकान पर टिकी होती है। सारी धूरी इसके चारों ओर ही घूमती है। लेकिन उस देश में जिंदगी का आसानी से लगाया जा सकता है जहां आम जनता को दो वक्त की रोटी के लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं, बिना घर मौसम के वार झेलने पड़ते हैं,एक जोड़ी वस्त्र में ही गुजारे करने पड़ते हैं। इन सबकी कीमत आम जनता को पता होती है,पर अफसोस ये पीड़ा लगातार राष्ट्रीय मुद्दा नहीं बन पाती। राजनेता भी आंख बंद किए रहते हैं और मीडिया भी,देश में कितनी जनता खाली पेट सोती है? कितने लोगों के सिर पर छत नहीं है? कितने लोग नंगे रहने को मजबूर हैं? बता सकता है कोई राजनीतिक दल या राजनेता, या मीडिया का कोई भी रूप? शायद नहीं। क्यों-क्योंकि इसके लिए जनता के बीच जाना पड़ता है? उनके दर्द में शामिल होना पड़ता है? पर इसके लिए किसके पास समय है? मीडिया भी आसानी से मिली खबरों में ही पस्त है और नेता भी चुनाव के वक्त रटे-रटाये बोल बजाकर मस्त हैं, जो हमेशा सरकारी होते हैं जिनका सच से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं होता। अगर असली जमीनी सच्चाई का उन्हें ज्ञान नहीं है तो फिर garib लोग क्यों हैं? क्यों छत नहीं है? क्यों नंगे हैं? या कैसे भूख मिटेगी? कैसे छत मिलेगी? कैसे तन ढपेंगे? इससे उनका कैसा वास्ता? नेता इस पर ना बोले और ना सोचें समझ में आता है क्योंकि काफी हद तक इसके लिए वे ही जिम्मेदार होते हैं। पर मीडिया में यह मसला क्यों सुर्खियों में नहीं रहता है इसे समझना टेढ़ी खीर है। क्या अब यह मान लिया जाये कि राजनीति और मीडिया एक ही राह पर चल रहे हैं? सुनने में सकारात्मक लगता है लेकिन... । राजनीति हो या मीडिया- इस समय सुर्खियों में मंदी नहीं, बेरोजगारी नहीं, गरीबी नहीं, अगर है तो सिर्फ टिकट। जिस पर फिदा जनता सारी है। जिसका मिलना भारी है। जिसके लिए मारामारी है। टिकट समाज में जहर घोलने लगा है। टिकट शांति के लिए खतरा बनने लगा है। टिकट राष्ट्रीय समस्या बनने लगा है। टिकट जिंदगी से अनमोल लगने लगा है। देख लीजिए-टिकट चाहे रेल का हो या खेल का,टिकट चाहे फिल्म का हो या इल्म का, टिकट चाहे उड़नखटोले का हो या बाबा का, टिकट चाहे काज का हो या यमराज का। आसानी से नहीं मिलता। सस्ते में नहीं मिलता। जब ये टिकट आसानी से नहीं मिलते, जिन्हें खुलेआम खरीदा जा सकता है, पाया जा सकता है तो फिर सोचिए-गद्दी की राह का टिकट पाना कितना विकट है? वैसे तो बाकी टिकटों की तरह राजनीति के टिकट के लिए किसी मापदंड की जरूरत नही, किसी योग्यता की दरकार नहीं, बस केवल उम्र का फेरा है। बाकी टिकट किसी उम्र में मिल सकते हैं,चुनाव लड़ने के लिए 25 बसंत देखने जरूरी हैं। ऊपर से पावर का मजा अलग से। यही कारण है कि हर कोई जनसेवक बनना चाहता है। अगर जनसेवा के लिए योग्यता का कोई मापदंड तय हो जाता तो यकीन मानिए टिकट के दावेदारों की इतनी फौज नजर नहीं आती। लेकिन राजनेता कभी ऐसा नहीं सोचेंगे। उल्टे आजकल तो ज्यादातर दलों की तरफ से जमघट और विरोध के कार्यक्रम प्रायोजित होने लगे हैं। जितना जमघट,जितना विरोध-उतनी ही बड़ी पार्टी। उतना ही ज्यादा प्रचार। वैसे भी जनसेवा का स्थान पब्लिसिटी ने ले ही लिया है। तो फिर यह अनोखी बात कहां? फिलहाल पोल से पहले टिकट के ढोल ही सभी जगह बोल रहे हैं। जीतने वाले प्रत्याशी के चयन के नाम पर पार्टी में विरोधियों को ठिकाने लगा देना,अपने चहेतों और नातेदारों को आगे बढ़ा देना सब दलों में आम बात हो गयी है। इसकी मार झेलने वालों को दर्द होना लाजिमी है। मलाल चेहरों से झलकना लाजिमी है। यानि जैसा दल,वैसा ही टिकट का दल-दल। जिस दल के सत्ता में आने की आस है, वहां हर सीट के लिए ढेरों नेता पास हैं। जिन्हें नहीं मिलते वे उदास हैं। खूब निकाल रहे bhadash हैं। हैरत की बात तो यही है कि कल तक ऐसे नेता सरेआम जिनके पैर छूते नजर आते थे,आज उनकी ही टांग खींचते नजर आते हैं। जब चाहो-जहां चाहो, जिसे चाहो-गरियाओ। अपने दलों को छोड़कर दुश्मनों को गले लगाओ। अगर ये लोग अपने दलों के नहीं हो सकते तो फिर किसके हो सकते हैं? कम से कम जनता के तो नहीं। पर लोकतंत्र की सबसे बड़ी एक खूबी यही है कि जहां चुनाव का ऐलान हुआ, जनता सारे गिले-शिकवे भूल जाती है। सारे दर्द भूल जाती है। जो उसके हाल के लिए जिम्मेदार होते हैं उन्हें भी वो प्यार करने लगती है। ये हारेगा-ये जीतेगा का राग अलापने लगती है। वो आते हैं, सारी गलती दूसरों पर थोप देते हैं। वादे करते हैं। जीत जाते हैं तो ठीक,वरना हारने पर इतनी कमाई तो कर ही लेते हैं कि पांच साल तक कोई दिक्कत न हो। यही राजनीति का फलसफा बनता जा रहा है। हमने देखा है। हम देख रहे हैं। हम देखेंगे।(27।10।08)

बोल का जहर-तनाव में शहर

देशपाल सिंह पंवार
देश की आबादी सूद की तरह बढ़ती जा रही है, मंदी की मार गहराती जा रही है,खजाने से विदेशी मुद्रा घटती जा रही है, लक्ष्मी दामन छुड़ाती जा रही है, देश की बान बिगड़ती जा रही है, हर सेक्टर की शान मिटती जा रही है, कौम की आन लुटती जा रही है, युवा पीढ़ी टूटती जा रही है, गरीबी कहर ढ़ाती जा रही है, पड़ौसियों की काली छाया फैलती जा रही है,आतंक की बेल फलती जा रही है, सुरक्षा प्रहरियों की सांसें फूलती जा रही हैं,धरती लाल खोती जा रही है,कोख उजड़ती जा रही हैं,मांग सूनी होती जा रही है, ऐसे समय जरूरत थी भाई चारे की,प्यार की,एकता की, कड़े अनुशासन की, कठोर परिश्रम की,जज्बे की, विश्वास की। लेकिन जो हो रहा है, जो दिख रहा है, जिसका डर खाये जा रहा है वो ठीक इसका उल्टा है। आए दिन वोट की राजनीति जो चोट करती जा रही है, उसका घाव नासूर बनता दिखायी देने लगा है। लोकतंत्र का कदम डगमगाने लगा है। हम की जगह मैं ने ले ली है। मुंबई मेरी है, मेरी बपौती है, मैं जो चाहूंगा, वही यहां होगा, वही यहां रहेगा, वही यहां खायेगा, वही यहां काम करेगा, वही यहां जिंदा रहेगा। काश इस तोड़ने वाली, समाज में जहर घोलने वाली सोच को समय रहते ही कुचल दिया जाता तो आज ये दिन देखने न पड़ते। कोने-कोने से नफरत की लपटें फैलती जा रही हैंं और कानून चुप है? एक शख्स गुंंडाराज चलाता आ रहा है,दूसरा उसका सिर कलम करने के लिए खुलेआम एक करोड़ के इनाम का एलान करता है, कहीं ट्रेनें जल रही हैं, कहीं अपनों को मारने की साजिशें पल रही हैं। सरहद के अंदर सरहदें खींचने की फलती-फूलती गंदी सोच। ये जंगलराज है या लोकतंत्र? सवाल राज ठाकरे का नहीं है। सवाल मराठियों और गैर मराठियों का नहीं है। सवाल ये भी नहीं है कि देश के कौन नेता क्या बोल रहे हैंं? क्या चाहते हैं? सबसे बड़ा सवाल है इस देश की एकता का। सवाल है हिंदू-मुस्लिम, सिख-ईसाई , सब हैं भाई-भाई की उस थीम का, जिस पर ये देश चलता आ रहा है। सवाल है विकास का। सवाल है मंदी से निपटने का। सवाल है गरीबी को मिटाने का। सवाल है युवा पीढ़ी के बेहतर आज और कल का। सवाल है जनसंख्या बम पर नियंत्रण का। सवाल है हर दिमाग को ज्ञान, हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी, हर तन को कपड़ा, हर सिर को छत का। सवाल है उस मजदूर कौम का-जिसके यहां दिहाड़ी के बाद ही चूल्हा जलता है। नफरत की आग चाहे धधक रही हो पर उन लाखों मजदूरों के चूल्हों की राख ठंडी पड़ी है, जो इसकी चपेट में हैं। एक वक्त की रोटी, एक जोड़ी कपड़े और सिर पर झोंपड़ी की क्या अहमियत होती है काश ये एक छोटी सी बात उन नेताओं को पता होती जो अनाप-शनाप बोल रहे हैं। ये खुद को जनप्रतिनिधि कहते हैं-महलों में रहते हैं। ये खुद को हमदर्द कहते हैं- आए दिन दर्द बढ़ा जाते हैं। ये खुद को शहर, समाज, कौम और राज्य का रहनुमा मानते हैं। काम करते हैं-शहर में तनाव, समाज में जहर, कौम में दूरी और राज्य पर बदनुमा दाग लगाने का । अंग्रेज दुश्मन थे, ये अपने हैं। वे करते थे तो गलत था और ये अंग्रेजी कल्चर की पैदाइश जो कर रही है तो उसे क्या कहें-गलत या सही? गलत कहें तो पिटने या मरने का डर, सही कहें तो.......। लोकतंत्र कहता है-जनता सर्वोपरि या जनता का राज। इतिहास कहता है-जैसा राजा, वैसी प्रजा। आज का दौर कहता है-जैसी जनता,वैसा राजा। क्या ये मान लिया जाये कि अपना राज,अपना कानून चलाने वाले चंद चेहरे जनता की ही देन हैं? जनता उनके पीछे नहीं होगी तो क्या वे इस तरह जहर फैला सकते हैं? इसमें सच्चाई है पर लाख टके का सवाल यही है कि क्या वास्तव में हमारे यहां जनता का राज है? आजाद देश का इतिहास गवाह है कि अधिकतर चुनावों में 35-40 फीसदी वोट पड़ते हैं। आधे फर्जी वोटर होते हैं। बोगस मतदाता सूची, बोगस वोटर के किस्से फैले पड़े हैं। आधी आबादी चुनाव के दिन घर से बाहर नहीं निकलती। इस तरह 15-20 फीसदी सही वोटर तकदीर लिख देते हैं। वोट की राजनीति के इसी गणित का सबसे ज्यादा फायदा अपराधियों ने उठाया और चंद सिरफिरों ने भी,70-80 के दशक तक ऐसे चेहरे नेताओं के पिछलग्गू होते थे। चुनाव जिताने की लत जीतने की ललक में बदल गयी नतीजा अपराधियों की राजनीति और राजनीति के अपराधीकरण की ये काली नदी उफान लेती चली गयी। 80 के दशक के बाद विधानसभा हो या संसद-दागियों की लंबी फौज हर बार लोकतंत्र की देहरी को रौंदती नजर आती है। काश इस देश में कभी तो 80-90 फीसदी मतदान हो। असली जनप्रतिनिधि की पहचान हो। जिंदगी आसान हो। करना जनता को ही पड़ेगा। मुंबई से उठी चिंगारी की वजह वोट की राजनीति ही है। इतिहास गवाह है कि मुंबई कभी मराठी कौम का गढ़ नहीं रही है। कभी पुर्तगालियों का कब्जा रहा तो 17 वीं मध्य शताब्दी से अंग्रेजों का। गोरों को नाकों चने चबवाने वाले और मराठियों की पहचान कायम करने वाले वीर शिवाजी महाराज ने मुंबई को अपना गढ़ नहीं बनाया। शिवाजी महाराज का गढ़ था कोंकण क्षेत्र का रायगढ़। 18वीं सदी में जब पेशवा और मराठाओं के राज का सूरज फैलता जा रहा था तो पुणे इस राज की राजनीतिक और कल्चरल राजधानी कहलाती थी। आज तक पुणे, कोल्हापुर और सतारा मराठियों के पारंपरिक शहर माने जाते हैं। कला, साहित्य और गीत-संगीत के लिए ये पहले भी विख्यात थे और आज तक हैं। हकीकत यह है कि मुंबई हमेशा ही मिली-जुली कल्चर का शहर रहा है। सिद्धांतों की जंग लड़ने वाली कौम के साथ गुंड़ा तत्व का नाम जोड़कर कौन अपना उल्लू सीधा कर रहा है, यह सब जानते हैं। मुंबई की दो करोड़ आबादी में से 30-40 फीसदी उत्तर भारतीय हैं। इनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी,यही आबादी शिवसेना और मनसे के साम्राज्य स्थापित होने में सबसे बड़ा रोड़ा है जिसकी वजह से उसे बाहर खदेड़ने की चाल चली गयी। 20 फीसदी दक्षिणी हैं। मराठियों की आबादी 28 फीसदी है। इसमें से ज्यादातर अति पिछड़ा और दलित वर्ग से हैं। आजादी के बाद से ही गिरांगांव इनका गढ़ रहा है। बाल गंगाधर तिलक से लेकर दत्ता सामंत तक के दौर में यही इलाका मजदूरों के संघर्ष में हमेशा आगे रहा है। इनके साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया पुरबियाओं और उत्तर भारतीय मजदूरों ने। 1857 में ब्रिटिश आर्मी में काम कर रहे हिंदू और मुस्लिम पुरबियाओं ने इनके साथ मिलकर ही जंग लड़ी थी। अब उन्हें अलग करने की साजिश रची जा रही है। मंदी के दौर से देश उबर सकता है। देश विकास कर सकता है पर कड़वी वाणी ने जो जहर घोल दिया है उसे आपसी मेल से नहीं निपटाया गया तो कल और खराब होगा। जो मुंबई में हुआ वो गलत है। जो बिहार में हो रहा है वो और ज्यादा गलत है। जो दूसरे राज्यों में चल रहा है वो सबसे ज्यादा गलत है। सपा विधायक ने राजठाकरे के सरेआम कत्ल पर एक करोड़ रूपये इनाम की बात कही वह निहायत बेवकूफी है। क्या उसे जेल के अंदर नहीं होना चाहिए? इतनी सारी गलतियों को दोहराकर हम क्या साबित करना चाहते हैं? क्या इस देश से हमें प्यार नहीं है? क्या इस देश में कोई कायदा कानून नहीं है? क्या हम बिहार, पंजाब, दिल्ली या यूपी की सरहदों में ही सिसकना चाहते हैं ? सही समय यही है कि हम उन घाव पर मरहम लगायें। कानून ऐसे चेहरों पर लगाम लगाये जो अपनी जुबान से जहर घोल रहे हैं। जिस दिन हम छोटे-छोटे खानों से ऊपर उठ जायेंगे फिर कोई भी हमें बरगला नहीं सकता, उकसा नहीं सकता, अपना उल्लू सीधा कर नहीं सकता। (3.11.08)

मोल खत्म-रोल खत्म

देशपाल सिंह पंवार
वक्त क्या-क्या रंग दिखाता है? कभी छोटी सी जीत को मन तरसता है। मिलने पर खूब चहकता है। कभी बड़ी जीत पर दिल भी मायूस और चेहरा भी,इस बार हमारी जीत-विश्व चैंपियन की हार यही एहसास करा रही है। इतिहास में दर्ज होगा-हमने 2008 में कंगारूओं को नचाया था, हराया था। पर बड़ी कीमत भी चुकायी थी। जंबो और दादा की विदाई का गम झेला था। मजबूत दीवार (राहुल द्रविड)को दरकते हुए देखा था। लक्ष्मण को लाज बचाते देखा था। सचिन की तरफ तनी उंगलियों को देखा था। बिस्तर से ज्यादा क्रिकेट के दीवानों को निराश-हताश और उदास देखा था। यह सच है। वे जीत से जितने खुश हैं -दादा और जंबो की जुदाई से उससे ज्यादा दुखी। जीत की ये कुर्बानी पच नहीं रही है। सोचिए अगर हार जाते तो॥। दो की संख्या पांच होती। तब? कहा जाता है-जो होता है अच्छा ही होता है। इसमें क्या अच्छाई छिपी हुई है यह तो विधाता ही जाने पर यह सिलसिला न तो जंबो व दादा से शुरू हुआ है और न इन पर खत्म होगा। ये बेजोड़ हैं,खुशकिस्मत हैं इसीलिए विदाई सुर्खियों में है। वरना क्रिकेट का इतिहास कारनामों से अटा पड़ा है। क्रिकेटरों को हमेशा ताश के पत्तों की तरह फैंटा गया। समझदार खुद निकलते रहे। ढेरों धकियाये जाते रहे। सैंकड़ों को रिटायर करने की जरूरत ही नहीं पड़ी। देख लीजिए-76 साल में लार्ड्स से नागपुर तक 425 टेस्ट खेले। सी के नायडू से लेकर एम विजय तक 260 क्रिकेटर मैदान में उतारे। सौ से ज्यादा आया राम-गया राम ही रहे। कोई एक टेस्ट खेला तो कोई दो। बिना रिकार्ड बुक देखे कोई बता सकता है उनके नाम। पर वो आये भी और गये भी,यही कुदरत का संगीत है। यही जिंदगी का गीत है। यही जमाने की रीत है। परिवर्तन तय है। यही नियम जीवन पर लागू होता है। यही नियम क्रिकेट पर लागू होता है। आका की नजर पर टिका रहता है। मोल खत्म-रोल खत्म। विदाई और अच्छाई का ये कौन सा रिश्ता है? कौन सी परम्परा है? जब तक कोई महान क्रिकेटर रिटायर नहीं होता,जाने की बाट जोहते रहते हैं। सारे खोट नजर आते रहते हैं। जब जाने का वक्त आता है तो मानस पटल पर सिर्फ अच्छाई ही अच्छाई काबिज रहती है। यही कड़वा सच है। जंबो अब तुम उडान नहीं भरोगे -मैदान पर नहीं उतरोगे। उंगलियों का जादू नहीं दिखाओगे। बल्लेबाजों को नहीं छकाओगे। गिल्लियां नहीं बिखोरेगे। यकीन नहीं होता पर करना तो पड़ेगा। यही तुम्हारा फैसला है। यही हमारी मजबूरी है। 18 साल की आदत है। उबरने में थोड़ा समय लगेगा। दिल मानने को तैयार नहीं कि तुम खुद चले गए। जेहन में यही जद्दोजहद है कि कुछ तो गड़बड़ है। कारण-तुम बदलने वालों में से रहे हो,पीठ दिखाने वालों में से नहीं। तो फिरअब क्यों? यही करना था तो पहले कर सकते थे कई बार ऐसे मौके आए। तुम तब कर सकते थे जब विश्वकप में तुम्हें बैंच पर बिठाया गया। तब कर सकते थे जब हम श्रीलंका से पिटकर लौटे। जो दलील तुमने दी हम कैसे मान लें? 6 साल पहले वो तुम ही थे। एंटीगुआ का मैदान। टूटा हुआ जबड़ा। दूसरा कोई होता-बिस्तर पर कराहता नजर आता पर तुम बल्ला लेकर मैदान में थे। सब हैरान थे। अब ऐसा क्या हुआ? हमें तो तुम्हारा शरीर बूढ़ा नजर नहीं आता। कंधे झुके हुए नजर नहीं आते। उंगलियां थकी हुई नजर नहीं आती। हां ये हो सकता है कि विकेट कम मिल रहे हों पर तुम तो आशावादी थे। एक साल तो खेल सकते थे।फिर?आखिर सच क्या है? तुम तो नहीं बताओगे पर एहसास सबको है। समय बता ही देगा कि दाल में कुछ काला था या फिर सारी दाल ही काली है? बोर्ड की राजनीति से तुम वाकिफ हो और हम भी,सच बताओ क्या वही पुरानी कहानी नहीं दोहराई गई? क्या तुम्हें कप्तानी नहीं ले डूबी? बेंगलूर में तुम्हारा चोट खाना, मोहाली में अमित मिश्रा का चमकना, धोनी की कप्तानी में जीतना,नकली चोट के नाम पर दिल्ली में सरदार का बाहर बैठना-सारा सच सामने है। बस अब और नहीं-यही था ना बोर्ड का इशारा। समझदार को इशारा ही काफी है। नागपुर तक खेल सकते थे पर कोटला से बेहतर अवसर और क्या होता? हां जब तक खेले-खूब खेले। हम दुखी हैं और खुश भी,दुखी इस बात पर -तुम मैदान छोड़ गए। खुश हैं तो सिर्फ सम्मान के साथ विदाई पर। तुम्हारे जैसा ना कोई था, ना है और ना होगा। हमेशा दिलों पर राज करोगे। वहां से तुम कभी रिटायर नहीं हो सकते। चाहने वाले बेमुरव्वत नहीं हैं। हां राज करने वालों की यह फितरत हमेशा रही है। दादा तुम भी अब ड्रेसिंग रूम में दिखाई नहीं दोगे। कैसा लगेगा तुम्हारे बिना? चाहे लक्ष्मण कुछ बोलें या राहुल मुंह ना खोलें पर यह तय है कि ये जल्दी ही तुम्हारी सूची में शामिल होने वाले हैं। दादा इसमें दो राय नहीं कि तुम्हारे साथ बोर्ड ने ज्यादती की। कोई बताए-तुम्हारे जैसे बोल्ड और गोल्ड कप्तान कितने रहे? तुम्हारे जैसे जीवट के क्रिकेटर कितने हुए? तुम रहमोकरम पर न तो टीम में आए-न रहे, न कप्तान बने। तुमने इंडिया को लगातार जीतने की आदत डाली। 49 टेस्ट में 21 में जीत। सी के नायडू से अजीत वाडेकर तक 16 कप्तान 136 टेस्ट खेलकर इतने टेस्ट जिता पाये थे। वन डे में भी हम तुम्हारी कप्तानी में 146 में से 76 मैच जीते। 113 टेस्ट और 7000 से ज्यादा रन। और बहुत कुछ। बोर्ड के आकाओं की चाह को तुमने हमेशा मुंह तोड़ जवाब दिया। इस बार सीरीज से पहले जिस समय तुम रिटायरमेंट का ऐलान कर रहे थे, तुम्हारे चेहरे के तेज से वही जज्बा झलक रहा था। तुम कुछ करोगे-सबको आस थी। तुमने किया। तुम असली बंगाल टाइगर थे, हो और रहोगे। तुम मूंछे ऐंठकर जा रहे हो और वे मुंह छिपाये बैठे हैं। सारा देश पूछ रहा है कि और कैसा खेल दिखाना पड़ता है? खेल जरूरी है या शक्ल? इसका जवाब बोर्ड के पास नहीं होगा। पर बोर्ड को समझने में कैसे चूक गए? कप्तानों के साथ यही तो होता आया है। 31 में से कितने जबरन हटाये गये सबको पता है। सी के नायडू, लाला अमरनाथ, विजय हजारे, वीनू मांकड़, पाली उमरीगर, नबाब पटौदी, चंदू बोर्डे, अजीत वाडेकर, बिशन सिंह बेदी, सुनील गावस्कर, कपिल देव व अजहरूद्दीन को इन्होंने नहीं बख्शा तो फिर बाकी की क्या बिसात? यह पूरा ग्रंथ है। हैरत है कि सचिन से भी सबक नहीं सीखा। 25 टेस्ट और 73 वन डे में ही सचिन का मन भर गया था। जान गये थे कि कप्तानी ले डूबेगी। तौबा की। नतीजा सामने है। कप्तान होते तो विदा हो जाते। फिलहाल धोनी के सितारे बुलंद हैं। जिस दिन हार से सामना होगा, बोर्ड आंखें तरेरना शुरू कर देगा। यही होता आया है। यही होगा। बस वक्त की बात है। क्या कभी कोई इतिहास को सिखा पाया है? सिर्फ बोर्ड ही ये करिश्मा कर सकता है। इंतजार करिए अगले शिकार का। साथ ही उस दिन का जब सचिन रिटायर होंगे। वो इंडियन क्रिकेट का सबसे बड़ा रिटायरमेंट होगा।भूतो न भविस्यतो (8।11.08)

कैसी नैतिकता ?

देशपाल सिंह पंवार
पाटिल साहब जा रहे हैं। पद छोड़ रहे हैं। नैतिक जिम्मेदारी के बोझ तले दबे जा रहे हैं। मान रहे हैं -चूक हो गई। काश सोचने और बोलने से ज्यादा करने पर ध्यान दिया होता तो आज ये नौबत न आती। देश चार हजार करोड़ से ज्यादा की फौरी चोट खा गया। 200 से ज्यादा लोगों के खून से धरती लाल हो गयी। साठ घंटे हमें अमिट दुख से पाट गये। संसार में हमारी किरकिरी हो गई। देश की आन-बान और शान पर एक दाग लग गया इतना सब कुछ होने के बाद ही नैतिकता की दुहाई बेमानी नजर आती है। जो हुआ क्या उनका इस्तीफा इसकी कीमत अदा कर सकता है?आखिर इस फैसले तक पहुंचने में इतनी देरी क्यों? देश के हर कोने में लगातार हो रहे आतंकवादी हमलों के बीच यह नैतिकता कहां थी? जाना था तो तब नैतिकता की बात कहकर जा सकते थे। लाख टके का सवाल यही है कि अगर सिर पर चुनाव नहीं होते तो क्या प्रधानमंत्री उन्हें जाने के लिए कहते? पाटिल साहब इस्तीफा देते? हकीकत यही है कि कांग्रेस ने मुंबई के बहाने एक तीर से कई शिकार साध लिए हैं। घर से पाटिल की विदाई तो तय थी पर खजाने से चिदंबरम का जाना बता रहा है कि उनके काम तक न तो जनता को पच रहे थे और न ही सरकार को। चुनाव सिर पर हैं और मनमोहन सरकार ऐसे में कोई खतरा नहीं उठाना चाहती। अब अपने खुश, पराये चुप। साथ ही जनता में संदेश अलग से। वित्त मंत्रालय उनके हाथ में है। चुनाव से पहले के समय में अब खूब रेवड़ियां बंटेंगी। सारे जख्मों पर मरहम लगाने की कोशिश होगी यह तय है। सही हो या गलत पर देश की राजनीति में एक लंबे अरसे के बाद नैतिकता शब्द सुनाई दिया है। 80 के दशक से पहले यह मायने रखता था। बाद में यह महज एक शब्द बनकर रह गया। जब-जैसा मौका देखो, इस्तेमाल करो। वाक्यों में पिरोओ, गर्दन बचाओ,जनता को बरगलाओ, विरोधियों से पीछा छुड़ाओ और चैन की बंसरी बजाओ। इतिहास इस बात का गवाह है कि सत्ता में बैठे तमाम नेताओं ने समय,काल और परिस्थिति को देखकर इस शब्द को हमेशा अचूक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। सिर पर चुनाव है-नैतिकता की बात करो। जनता का डर है-नैतिकता की बात करो। वोट पाना है तो नैतिकता को गुनगुनाना जरूरी है। इस बार यही हो रहा है। अरसे से लगातार देश पर हमले होते आ रहे हैं। आतंकवादी जगह-जगह खून बहाते आ रहे हैं। पर हर बार सख्ती से कुचलेंगे बोलकर पाटिल साहब राज चलाते रहे। ईश्वर सहारे देश चलाते रहे। जिस समय दिल्ली में आतंकवादी हमला हुआ उस समय वे इस्तीफा दे देते तो शायद नैतिकता की दुहाई का असर होता पर अब चाहे वे लाख दावे करें कि उन्होंने नैतिकता के चलते इस्तीफा दिया है लेकिन जनता सब जानती है। इतने बड़े वार के बाद उन्हें जाना ही था। मनमोहन सरकार की फेस सेविंग के सवाल पर उन्हें कुर्बान होना ही था। अगर नैतिकता की बात ही सर्वोपरि होती तो फिर अकेले पाटिल साहब ही क्यों? क्या यह उनके नायब श्रीप्रकाश जायसवाल की असफलता नहीं है? क्या यह सारी मनमोहन सरकार की विफलता नहीं है? क्या समूची सरकार को इस्तीफा नहीं देना चाहिए था? क्या रक्षा मंत्री को इसकी जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए थी कि नौसेना की कहीं न कहीं कोई चूक है? क्या कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियों को इसकी जिम्मेदारी नहीं लेनी चाहिए थी? क्या यह महाराष्ट्र सरकार की असफलता नहीं है? क्या विलासराव देशमुख को गद्दी पर बने रहने का हक है? अगर इन सबको हक है तो फिर अकेले शिवराज पाटिल ही क्यों? अगर पाटिल फेल हैं तो फिर मनमोहन सिंह पास कैसे हैं? जहां तक नैतिकता का सवाल है तो विपक्षी दल किस मुंह से नैतिकता की बात कहते हैं? पोरबंदर से हथियारों का जखीरा चलता है तो क्या गुजरात सरकार की कोई नैतिक जिम्मेदारी नहीं बनती थी? कांग्रेस और बीजेपी नेता एक दिन साथ रहे। एक ही सुर में बोलते दिखाई दिए लगा संकट में सब साथ हैं, देश राजनीति से उपर है पर अगले ही दिन वही राग। देश के प्रति ये कैसी नैतिकता? क्या इंडियन मीडिया ने नैतिकता दिखाई? देश पर सबसे बड़ा आतंकवादी हमला चल रहा था और तमाम चैनल रंगीले गाने पेश कर रहे थे। हमले के कारण देश उदास था। शोक में डूबा हुआ था। वी पी सिंह के निधन के कारण तिरंगा झुका हुआ था और निजी चैनल वो सब परोस रहे थे जिसकी ऐसे माहौल में न तो जरूरत थी और न ही वो देखना और सुनना किसी बाल मन तक को अच्छा लगता है। तो फिर कहां थी नैतिकता? कड़वा सच यही है कि इस देश में हर कोई खुद नैतिकता की राह पर चलने के बजाय दूसरों को इसका पहाड़ा पढ़ाने में जुटा हुआ है। अकेले शिवराज पाटिल के जाने से न तो इस देश में आतंकवादी हमलों को टाला जा सकता और न ही जान-माल की हानि को बचाया जा सकता। जरूरत है हर देशवासी के दिल में देश प्रेम के जज्बे की। देश के प्रति निष्ठा की। समर्पण की। इसके बाद कोई सरकार या कोई भी मंत्री शायद ही अपने फर्ज से मुंह मोड़ पाए? अगर ऐसा नहीं हुआ तो वोट की चाह की चोट हमें हमेशा यूं ही खानी होगी। (30.11.08)

अफ़सोस

देशपाल सिंह पंवार
जिस देश की आबादी बनिया के बही खाते के ब्याज की तरह बढ़ती जा रही हो, गरीबों की तादाद का सेंसेक्स चढ़ता जा रहा हो,मंदी की मार से हजारों युवाओं की नौकरी छिनती जा रही हो,अपराध के नये आयाम स्थापित होते जा रहे हों, आम आदमी के बच्चों से शिक्षा दूर होती जा रही हो, दो वक्त की रोटी,सिर पर छत की चिंता में आधी जनता की सेहत बिगड़ती जा रही हो, आतंक के कहर से देश की हालत खराब होती जा रही हो हैरत की बात है कि वहां प्रेम लीलाओं के चलते राजनीति की थीम बहक रही है। वहां की जनता चांद-फिजा की कहानी पर चहक रही है। वहां की फिजा में चांद-फिजा महक रही है। वैसे इसके लिए किसे दोष दिया जाए- जिस देश का हर बच्चा दादा-दादी,नाना-नानी की कहानी सुनकर बड़ा होता हो वहां कहानियों का मोल क्या होता है यह समझा जा सकता है ,फिर इस किस्से में तो हर वो एंगिल छिपा है। जिस पर गुस्सा आ सकता है। दर्द उठ सकता है। कड़वाहट निकाली जा सकती है। चटखारे लिए जा सकते हैं। जिसकी जैसी सोच-वैसा एंगिल। जितने मुंह-उतनी बातें। हां यह तय है कि अगर इसमें एक राजनेता शामिल न होता तो शायद इतना तमाशा न होता। अगर वो शादी शुदा न होता तो शायद इतना बखेड़ा न होता। अगर चांद और फिजा(?) की शादी का ये अंजाम न होता तो शायद इतना प्रेम का उपहास न होता। अगर इस कहानी में मीडिया का रोल न होता तो शायद इतना प्रचार न होता। अगर राजनेता ऐसा न होता तो ये सब न होता। न ये गूंज होती। न जग हंसाई होती। आखिर परिवार का क्या कसूर? आखिर बच्चों का क्या कसूर? आखिर पहली पत्नी का कसूर? आखिर फिजा का क्या कसूर? आखिर उस जनता का क्या कसूर जो ऐसे राजनेताओं को सिर माथे पर बैठाती है? लाख टके का सवाल यही है कि आखिर राजनेता इस राह पर जाते क्यों हैं? क्यों उनकी नैतिकता जवाब दे जाती है? क्यों वे व्यक्तिगत इच्छाओं के आगे जनता को कुर्बान कर देते हैं? कड़वा सच यह •ाी है कि चांद या चंद्रमोहन न तो ऐसे पहले राजनेता हैं और न ही आखिरी। यह धारा आज उफान पर है। खतरे के निशान पर है। राजनीति आंकड़ों का खेल है। पावर का मेल है। दौलत-शोहरत की रेलमपेल है। आखिर जिस क्षेत्र की नींव ही इस पर टिकी हो, जहां ताकत और दौलत की नदियां बहती हों वहां ऐसी कहानियां हर पल जन्म लेती हैं। कोई इस बात का दावा नहीं कर सकता कि राजनेताओं के प्रति महिलाओं का आकर्षण या राजनेताओं का महिलाओं के प्रति रुझान पहले नहीं हुआ है और आगे नहीं होगा । इतिहास गवाह है। आदि काल से होता आया है। हो रहा है और होता रहेगा। पहले ज्यादा नेता इस कोयले की खान से दूर थे। अब यह संख्या कुछ कम है आगे हो सकता है कि उंगलियों पर गिनने लायक ही बचें। हकीकत यही है कि इस देश में आज की तारीख में कोई इस बात की गारंटी नहीं ले सकता कि राजनीति की यह धारा साफ सुथरी बह रही है और आगे बहेगी। आजादी के बाद से ही नेताओं के प्रेम किस्से हवाओं में तैरने लगे थे। समय गुजरता गया और नेता तथा उनके किस्सों की किताब मोटी होती गयी। चाहे इस राह पर खुलेआम कम नेताओं ने सफर तय करने की हिम्मत जुटायी हो पर काजल की कोठरी में कंबल ओढ़कर घी पीने वालों की तादाद इतनी ज्यादा है कि अगर ईश्वर का दबाव हो और नेताओं को एक पल के लिए मजबूरी में सच बोलना पड़े तो अंतरंगता से जो परदे हटेंगे उससे यह तय है कि राजनीति का परदा ही हमेशा के लिए गिर जायेगा। राजनीति के धुरंधर हमेशा मानते आये हैं और मान रहे हैं कि जो सीन सामने है, परदे के पीछे की हकीकत उससे हजार गुणा खराब है। सब इस दलदल में शामिल न हों पर ढेरों नेता ऐसे हैं जो शादीशुदा होने के बावजूद दूसरी महिलाओं से जुड़े है। किसी राज्य का उदाहरण ले लीजिए सबका यही हाल है। एक हिंदी राज्य तो ऐसा है जहां के हर तीसरे नेता ने या तो दूसरी शादी रचाई या फिर किसी महिला के साथ रिश्ते आम रखे। 2007 में इस राज्य के एक कैबिनेट मंत्री का नाम उछला। घर टूटते-टूटते बचा। दूसरी महिला को जेल जाना पड़ा। मंत्री की गद्दी गयी सो अलग। एक अन्य खानदानी नेता की दूसरी पत्नी मौत के बाद संपत्ति की जंग लड़ रही है। एक बड़े नेता ने दूसरी शादी रचा डाली-पहली बीबी मरते दम तक फिर शक्ल ही नहीं देख पायी। एक और बड़े नेता की बीबी ने दूसरी के चक्कर में जान दे दी पर वो नहीं सुधरे। अब बेलगाम हैं। जिसका राज खुल गया वो बदनाम, बाकी..। हकीकत यही है कि जब तक ढेरों नेता जनता के बीच रहते हैं वे शरीफ नजर आते हैं, जैसे ही पावर और मनी का मेल होता है इस डगर का सफर शुरू होता है। सब जानते हैं कि बड़े-बड़े काम कैसे कराये जाते हैं। या तो माया का रोल या फिर...। यह •ाी सच है कि जब कोई शादीशुदा शख्स नया प्रेम संबंध बनाता है तो वह सिर्फ प्यार नहीं होता। इसमें रूतबा, आर्थिक सुरक्षा और पारिवारिक कारण तक जुड़े होते हैं। इसके अलावा क्षणिक आकर्षण। रिश्ते बनाना आसान है पर उसे चलाना उतना ही मुश्किल। जैसे ही हकीकत के थपेड़े पड़ते हैं तो प्रेम गायब। तमाम रिश्तों के साथ धोखा। प्रेम अपराध नहीं लेकिन पहली पत्नी के होते दूसरी शादी, दूसरी औरत से प्रेम, शारीरिक संबंध को न कानून और न ही नैतिकता के नाते जायज ठहराया जा सकता। खासकर नेताओं के मामलों में। जनता में गलत संदेश जाता है। विश्वास टूटता है। सामाजिक और राजनीतिक मर्यादा का पालन होना ही चाहिए। ऐसे चरित्र के नेताओं का राजनीति और सामाजिक स्तर पर तिरस्कार जरूरी है। शायद ये दिन आए पर जल्दी आए तो ज्यादा बेहतर। (यह लेख काफी पहले लिखा गया था)

जवान देश का बूढा वेश

देशपाल सिंह पंवार
कैसा दुर्योग है- जिस देश की आबादी एक अरब से ज्यादा हो,उसे हर बार चंद आतंकवादी दहलाकर चले जाते हैं। जिस देश के पास सबसे बड़ी युवा शक्ति हो, वह बार-बार आतंकवादी हमलों के वक्त बूढ़ों की तरह चलता नजर आता है। जिस देश पर बार-बार हमले हो रहे हों, वो देश ऐसी घड़ियों में अमूमन सोता हुआ नजर आता है। जिसके पास दुनिया की सबसे बड़ी फौज हो,वो आतंकवाद से जंग में जूझता ही नजर आता है। जो दुनिया का सबसे बड़ा और मजबूत लोकतांत्रिक देश हो, वो आतंकियों की करतूत से बार-बार हिलता नजर आता है। जिस देश का इतिहास वीरता के किस्सों से अटा पड़ा हो, उसके बच्चे आतंक के कहर से डरे नजर आते हैं। जिस देश की 10 फीसदी आबादी को एक वक्त का ही भोजन नसीब होता हो,वहां की ही काली कमाई आतंकवाद का पेट भर्ती नजर आती है। इसके अलावा भी ढेरों ऐसे कड़वे सच हैं जो बार-बार ये सोचने को विवश करते हैं कि आखिर ऐसा क्यों? आखिर ऐसा कब तक चलेगा? कब तक हमारी धरती यूं ही खून से लाल होती रहेंगे, हम अपनों को गंवाते रहेंगे, हमारे बच्चे दहशत में जीते रहेंगे, हम अपनी मेहनत की कमाई खोते रहेंगे,भारत की आन-बान और शान पर चोट सहते रहेंगे। कब तक हम हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? इस क्यों और कब तक का जवाब तलाशने में हम पहले ही काफी वक्त गंवा चुके हैं और कितना लेंगे? क्या हमें और वक्त चाहिए? अगर हां तो फिर ईश्वर ही मालिक है। अगर नहीं तो फिर देर किस बात की। सही चाह की सही राह का यही सही समय है। घर हो या समाज या फिर राष्ट्र सबसे बड़ी पूंजी होती है मानव शक्ति। खासकर हिंदुस्तान के परिपेक्ष्य में जहां मानवता सर्वोपरि है। इस मामले में वैसे भी कुदरत हम पर हमेशा मेहरबान रही है। हां यह जरूर है कि इस मेहरबानी की हमने कीमत नहीं समझी। इसे नेमत समझने की बजाय आफत की तरह लिया जाता रहा। अगर समय रहते इसके बेहतर इस्तेमाल के रास्ते तलाश लिए जाते तो शायद आज जिस आतंकवाद से सारी दुनिया जूझ रही है,इंडिया पर ये खतरा कहीं कम मंडरा रहा होता। खैर किसने गलती की, न तो यह कोसने का वक्त है और न ही रोना रोने का। सही वक्त है खुद को बदलने का और आतंकवाद पर नकेल कसने का। वैसे भी कहावत है जो होता है अच्छे के लिए ही होता है। मुंबई पर हमले ने अगर हमसे बहुत कुछ छीना है तो दिया भी है। अतंर्राष्ट्रीय बिरादरी का साथ। हर इंडियन के एकजुट हाथ। इसी ताकत से हम दे सकते हैं आतंकवाद को मात। पहल सबको करनी होगी-सरकार को भी और हर भारतीय को भी,सारे ढांचे में आमूल चूल परिवर्तन की जरूरत है। जनता और देश पर वोट की राजनीति की चोट का सिलसिला बंद करने की जरूरत है। विश्वास पैदा करने की जरूरत है। सरकार के स्तर पर दो स्तरीय रणनीति बनाने की जरूरत है। एक फौरी इलाज और दूसरा स्थाई। फौरी इलाज के लिए सबसे पहले मुद्रा राक्षस (आतंकवादी मुद्रा)पर चोट करनी होगी। सरकार जानती है कि किस तरह देश के अंदर एक नेटवर्क इसका पोषक बना हुआ है,यहीं से कमा रहा है और आतंकवादियों को दे रहा है। उसे सख्ती से कुचलने की जरूरत है। दूरगामी रणनीति के तहत सबसे पहले शिक्षा को रोजगारपरक बनाने की जरूरत है,ताकि हमारे नौजवान बेरोजगार न रहें और निराशा में आतंकवादियों,नक्सलवादियों और असमाजिक तत्वों का आसान चारा न बने -जैसी पढाई-वैसी नौकरी। हर हाथ को काम, हर पेट को रोटी और हर सिर को छत जब तक नहीं मिलेगी तब तक सारी बातें और आशाएं बेमानी हैं। साथ ही गाँव स्तर से ऊपर तक ऐसे जाबांज नौजवानों का एक संगठन बने जो जाति,धर्म और राजनीतिक विचारधारा से ऊपर उठकर देश के लिए काम करे। जिसे न केवल सीधे विकास के काम से भी जोड़ा जाए बल्कि साथ ही यह जिम्मेदारी सौंपी जाए कि हर असामान्य गतिविधि पर वो नजर रखे। ये जज्बा सरकार को ही पैदा करना होगा कि देश पर मर मिटने वालों का दर्जा सबसे ऊपर है। सबसे बड़ी त्रासदी अब तक यही है कि खेलों में जीते गए मेडल की कीमत वो करोडों में आंकती है और देश पर मर मिटने वालों की लाखों में। एक मेडल से कहीं ऊपर जवान होता है। सरकार को इसका एहसास करना भी है और कराना भी है। मीडिया को भी असली हीरो के रूप में शहीदों को समाज के सामने पेश करना होगा ताकि उस राह पर चलने की युवा पीढ़ी को प्रेरणा मिले। जब तक शहीदों को सर्वोच्च दरजा समाज में नहीं दिया जाएगा तब तक देश प्रेम केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही नजर आएगा। यह भी कड़वा सच है कि इसका एहसास हमारे बच्चे ही कराते हैं,इन दो खास दिन बस उनके ही हाथों में तिरंगा नजर आता है। हकीकत यही है कि हम केवल अपने और अपने घर के बारे में ही सोचते हैं। समाज,राज्य और देश बाद में। इस सोच से क्या किसी देश का कल्याण हो सकता है? जरूरत है हर देशवासी के दिल में देश प्रेम की। देश के प्रति निष्ठा की। समर्पण की। उसी जज्बे की जिसके बल पर हमने आजादी पायी थी। जब ऐसा हो जायेगा तो फिर कोई भी राजनेता या सरकार कोई ऐसी गलती नहीं कर पायेगी जिसकी हमें मुंबई की तरह फिर बड़ी कीमत चुकानी पड़े। चारों ओर अमन का राज हो। शांति हो। विकास हो।-आमीन। (15.12.08)

बेमिसाल

देशपाल सिंह पंवार

ऐतिहासिक,अविश्वसनीय, चमत्कार या जो कहना चाहें, दिल खोलकर चेन्नै में टीम इंडिया की जीत पर कह सकते हैं। जिस तरह और जिस माहौल में टीम इंडिया ने हार को जीत में बदला उसके लिए ये शब्द बेमेल और छोटे नजर आते हैं । मुंबई पर हमला, गोरों का जाना, दौरा खटाई में पड़ना, फिर लौटना, स्थान बदलना, मायूसी का माहौल,चार दिन तक गोरों का हावी रहना, स्ट्रास का दोनों पारियों में शतक ठोकना, पीटरसन का पारी घोषित करना, अंधेरे में सहवाग की आतिशबाजी , आखिरी दिन टूटती पिच पर सचिन और युवराज के पराक्रम के अलावा इस टेस्ट में वो सारे पल मौजूद थे, जो क्रिकेट को आसमान पर बिठाए हुए हैं। यही अनिश्चितता सबको दीवाना बनाती है। पल में हीरो-पल में जीरो, किसी को नहीं पता होता अगले पल क्या होगा, इस थीम को चेन्नै टेस्ट ने और मजबूत किया है। यह महज हमारी जीत नहीं। यह क्रिकेट की जीत है। इसके चाहने वालों की जीत है। आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने वालों की जीत है। मायूसी पर खुशी की जीत है। अंधेरे पर उजाले की जीत है। क्रिकेट के इतिहास की सबसे यादगार और सम्माननीय जीत है। यह गोरों के हौसले की जीत है। काश यह टेस्ट मुंबई में ही होता, इतनी ही शानदार क्रिकेट वहां होती। दर्शकों से मैदान अटा हुआ होता तो यह उन ताकतों को और ज्यादा मुंहतोड़ जवाब होता जिन्होंने खूनखराबे की साजिश रची। क्रिकेट आंकड़ों का खेल है। ढेरों नए रिकार्ड बने पर इस रिकार्ड को अब क्रिकेट के इतिहास से मिटाया नहीं जा सकता। 15 दिसंबर,2008 की तारीख हमेशा सुनहरी अक्षरों में चमकती रहेगी। वो 1933 का साल था। यही तारीख थी। हां दिन रविवार था। लार्ड्स का मैदान था और गुलाम देश इंडिया टेस्ट में पदार्पण कर रहा था। राजे-रजवाड़ों के पैसे से किसी तरह टीम वहां पहुंची थी। न ढंग के कपड़े थे और न ही वो सम्मान था। टूर के कप्तान तक राजा साहब ही थे। पर कप्तानी का अवसर मिला था सी के नायडू को। वहां भारत हारा था पर शान से। आज तक कप्तानों में अदब से नायडू का नाम लिया जाता है। वो इतिहास गुलामी की बेला में लिखा गया। चेन्नै का इतिहास ठीक 75 साल बाद आतंकवाद की काली छाया के बीच लिखा गया। हां खास बात है लिखने का अंदाज। मुंबई हमले के बाद सब गमगीन थे। चारों तरफ निराशा और गुस्से का वातावरण दिख रहा था, हर चेहरा पीड़ित नजर आ रहा था ऐसे माहौल में खेलना ही कठिन है और ऐसा खेलना तो उससे ज्यादा मुश्किल। मुंबई कांड पूरी टीम पर हावी था दर्शक और क्रिकेट प्रेमी उदास दिख रहे थे। चौथे दिन चाय तक कोई सोच नहीं सकता था कि इंग्लैंड यहां से हार भी सकता है। पर जो हुआ, होनी को यही मंजूर था। वैसे भी किस्मत बहादुरों का ही साथ देती है। सहवाग ने शाम के वक्त जो पारी खेली उसने नींव रख दी। युवराज के पास इससे बेहतर कोई मौका नहीं हो सकता था कि वो टूटती पिच पर अपनी तकनीक और धैर्य का लोहा मनवाएं। वो खुशकिस्मत थे कि दूसरे छोर पर सचिन थे। युवराज ने दिखाया कि क्रिकेट का कोई रूप हो वो सबमें फिट बैठते हैं। सचिन के असाधारण शतक ने न केवल इंडिया को जिताया बल्कि मुंबई की पीड़ा को काफी हद तक कम किया। सचमुच उनकी ये पारी अनमोल है। मुंबई के शहीदों के नाम समर्पित कर उन्होंने इसे वो दर्जा दे दिया जहां तक कोई इंडियन क्रिकेटर पहुंच ही नहीं सकता। इस पारी को खेलते समय उनकी मानसिकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। मुंबई पर हमले के वक्त वो रोये थे। हर इंडियन की तरह उनके घर में मातम था। उनकी बेटी सारा के दो सहपाठियों के माता-पिता की मौत से ये और ज्यादा बढ़ गया था। सचमुच यह सबसे उनकी महान पारी है सचिन के स्तर के हिसाब से बेजोड़। राहुल की असफलता को छोड़ दिया जाए तो जीत का श्रेय पूरी टीम को जाता है खासकर धोनी की कप्तानी का इसमें कम रोल नहीं है। सी के नायडू की परम्परा के असली वाहक धोनी की काट न तो आस्ट्रेलिया तलाश पाया था और न ही इंग्लैंड। सब नतमस्तक हैं। धोनी की धुन के आगे नाच रहे हैं। जिस तरह यह युवा कप्तान अनुभावी खिलाड़ियों की टीम का संचालन कर रहा है उसकी मिसाल इंडियन क्रिकेट में दूसरी नहीं मिलेगी। टीम में जोश भी है और होश भी-ऐसी टीम को कौन हरा सकता है? इतना ही नहीं जिस टीम में मैन आफ दी मैच के कई हकदार हर टेस्ट में होते हों उसे नंबर वन की गद्दी पर जाने से कौन रोक सकता है और कितने दिन? हर उस इंडियन को अब उसी दिन का इंतजार है जिसे क्रिकेट से प्यार है। (16.12.08)