
देशपाल सिंह पंवार
हर इंसान के सब्र की एक सीमा होती है। हां जिसका मिजाज गरम - उसके सब्र की कद्र नहीं होती। बोलने पर नजर नहीं होती। जिसे गुस्सा ही ना आता हो, जो कड़वे बोल ही ना बोलता हो, मिजाज हमेशा नरम रहता हो अगर वो इंसान किसी बात पर फटता है,तो सबको आश्चर्य होना लाजिमी है। हां बोल का असर कारण, स्थिति और समय करता है। मनमोहन सिंह का केस ऐसा ही है। अर्थशास्त्री रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि उनका चरित्र राजनेताओं जैसा तो बिल्कुल नहीं होगा। हाल और चाल भी वैसा नहीं होगा। मिजाज लाल होना तो दूर की बात है। हां राजनीति में हैं और देश चला रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि इतना तो सीख ही गए हैं कि चुप्पी कितना फायदा पहुंचा सकती है और कब, कहां और क्या बोल ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं? सबकी आशा के विपरीत जब वे प्रधानमंत्री बने थे तो इसका एकमात्र कारण उनका मिजाज ही था। सबकी सुनने वाला और कम बोलने वाला। इसके सहारे व्यक्तिगत जिंदगी बेदाग चल सकती है, बेदाग कट सकती है लेकिन प्रधानमंत्री की गद्दी कांटों का ताज है, उस पर जरूरत से ज्यादा चुप्पी फायदों से ज्यादा नुकसान पहुंचा जाती है। यही कारण है कि बरसों से हर कोई उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहता आ रहा था वो खामोश थे। उनकी पार्टी के नेता दबे सुर से तो विपक्षी सरेआम चिल्लाते आ रहे थे, वो खामोश थे। आतंकवादी हमले हों या अन्य मसले सब पर उन्हें खरी-खोटी से ज्यादा यही सुनने को मिलता था कि वो डमी हैं और 10 जनपथ से ही देश चलता है, इसके बावजूद वो खामोश थे। ऐसा सोचना और ऐसा कहना विपक्षी खासकर बीजेपी नेताओं की सोची-समझी रणनीति थी। वो जानते थे कि मनमोहन सिंह का मुंह खुलते ही 10 जनपथ और पीएम हाउस के बीच की दीवार इतनी ऊंची हो जाएगी कि न तो मनमोहन की आवाज पार जाएगी और न ही उनकी चुप्पी वार की धार कम कर पाएगी। ऐसे समय में खुद का बचाकर निकल जाना आसान नहीं होता खासकर प्रधानमंत्री की गद्दी पर पहुंचने के बाद। इसी अग्निपरीक्षा से मनमोहन गुजरे। विपक्षी फेल मान सकते हैं लेकिन टकराव की स्थिति से कमजोर प्रधानमंत्री कहलाना फायदे का सौदा था यह अब साबित हो गया है। आज वे कांग्रेस जैसे दल के सबसे बड़े और निर्विवाद फेस हैं। टकराव टलने के दो कारण रहे। एक उनका व्यवहार और दूसरा 10 जनपथ की पावर। कोई बताए कि अगर मनमोहन की जगह कोई दूसरा प्रधानमंत्री बनता तो क्या उस पर यह ठप्पा नहीं लगता? सोनिया की हैसियत के चलते यह आरोप आश्चर्यजनक नहीं है। बरसों से सब सुनते आ रहे हैं। मानते आ रहे हैं। आश्चर्यजनक यह है कि जिस मनमोहन ने इसकी कभी परवाह नहीं की, सफाई नहीं दी,अचानक ऐसा क्या हुआ कि वो राजनेताओं के उसी सुर में बोलने लगे? घाघ नेताओं की तरह मुंह खोलने लगे। वे बीजेपी नेता एल के आडवाणी को पीएम के लायक नहीं मानते। मानना भी नहीं चाहिए। अगर वो मान जायेंगे तो फिर चुनाव किस बात का? जब पार्टी नेता अपनों को पीएम मजबूरी में मानते हैं, मर्जी से नहीं तो फिर विरोधी पर इस काबलियत का ठप्पा लगाकर कौन अपने पैरों को काटेगा? लेकिन कांग्रेस व मनमोहन ने यूं ही बाण नहीं चलाया है। इस बार तस्वीर अलग है। अकेले कोई दल राज में नहीं आने वाला। तीसरे मोरचे का प्रधानमंत्री नहीं बनने वाला। दलों के मोह से जनता निकल चुकी है। वक्त की नजाकत के चलते चुनावी मैदान में पार्टियों की लड़ाई से ऊपर कौन बनेगा पीएम की धारा बहने लगी है। बीजेपी आडवाणी को पहले ही पीएम के रूप में पेश कर चुकी है। मैदान में उतार चुकी है। ऐसे में कांग्रेस ही पीछे क्यों रहती? उसने समय-समय पर मनमोहन के पीछे खड़े होने की बात पुख्ता तरीके से रखी। घोषणा पत्र जारी करते समय सोनिया ने तमाम जनहित के वायदे किए और साफ किया कि मनमोहन ही होंगे यूपीए के प्रधानमंत्री। साफ है पहली बार अमेरिका की तर्ज पर चेहरों की लड़ाई रंग जमाएगी। मनमोहन को इसी वजह से आगे रखा जा रहा है कि जनता ही बताए-कौन है लायक? आपात स्थिति में कप्तान को हमेशा फ्रंट से लड़ना पड़ता है। इससे ज्यादा आपात स्थिति और क्या होती, इसीलिए मनमोहन ने आव न देखा ताव और आडवाणी पर पिल पड़े। पहली बार इस अंदाज में बोले तो जाहिर है मीडिया तक ने हाथों-हाथ लिया। रोज बोलेंगे तो धीरे-धीरे असर घटता जाएगा पर राजनीति का यही दौर है कि अपनी अच्छाई बताने से ज्यादा दूसरे के दोष उजागर करो। अपनी कमीज सफेद रखने और दिखाने की बजाए दूसरे की कमीज पर कीचड़ उछालो। बीजेपी नेता अरसे से करते आ रहे हैं। मनमोहन ने शुरूआत कर दी है। चुनावी बेला में वोटर चाहे बोर हो पर वाणों की लड़ाई के इस शोर में वो जरूर पोर-पोर रहेगा। दोनों में यह सीन रोजाना उस समय तक जरूर चलेगा जब तक वोटर यह ना बता दे कि ये है कमजोर पहलवान। तब तक फ्री में देखते रहिए दो बांकों की लड़ाई।
हर इंसान के सब्र की एक सीमा होती है। हां जिसका मिजाज गरम - उसके सब्र की कद्र नहीं होती। बोलने पर नजर नहीं होती। जिसे गुस्सा ही ना आता हो, जो कड़वे बोल ही ना बोलता हो, मिजाज हमेशा नरम रहता हो अगर वो इंसान किसी बात पर फटता है,तो सबको आश्चर्य होना लाजिमी है। हां बोल का असर कारण, स्थिति और समय करता है। मनमोहन सिंह का केस ऐसा ही है। अर्थशास्त्री रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि उनका चरित्र राजनेताओं जैसा तो बिल्कुल नहीं होगा। हाल और चाल भी वैसा नहीं होगा। मिजाज लाल होना तो दूर की बात है। हां राजनीति में हैं और देश चला रहे हैं तो जाहिर सी बात है कि इतना तो सीख ही गए हैं कि चुप्पी कितना फायदा पहुंचा सकती है और कब, कहां और क्या बोल ज्यादा असरदार साबित हो सकते हैं? सबकी आशा के विपरीत जब वे प्रधानमंत्री बने थे तो इसका एकमात्र कारण उनका मिजाज ही था। सबकी सुनने वाला और कम बोलने वाला। इसके सहारे व्यक्तिगत जिंदगी बेदाग चल सकती है, बेदाग कट सकती है लेकिन प्रधानमंत्री की गद्दी कांटों का ताज है, उस पर जरूरत से ज्यादा चुप्पी फायदों से ज्यादा नुकसान पहुंचा जाती है। यही कारण है कि बरसों से हर कोई उन्हें कमजोर प्रधानमंत्री कहता आ रहा था वो खामोश थे। उनकी पार्टी के नेता दबे सुर से तो विपक्षी सरेआम चिल्लाते आ रहे थे, वो खामोश थे। आतंकवादी हमले हों या अन्य मसले सब पर उन्हें खरी-खोटी से ज्यादा यही सुनने को मिलता था कि वो डमी हैं और 10 जनपथ से ही देश चलता है, इसके बावजूद वो खामोश थे। ऐसा सोचना और ऐसा कहना विपक्षी खासकर बीजेपी नेताओं की सोची-समझी रणनीति थी। वो जानते थे कि मनमोहन सिंह का मुंह खुलते ही 10 जनपथ और पीएम हाउस के बीच की दीवार इतनी ऊंची हो जाएगी कि न तो मनमोहन की आवाज पार जाएगी और न ही उनकी चुप्पी वार की धार कम कर पाएगी। ऐसे समय में खुद का बचाकर निकल जाना आसान नहीं होता खासकर प्रधानमंत्री की गद्दी पर पहुंचने के बाद। इसी अग्निपरीक्षा से मनमोहन गुजरे। विपक्षी फेल मान सकते हैं लेकिन टकराव की स्थिति से कमजोर प्रधानमंत्री कहलाना फायदे का सौदा था यह अब साबित हो गया है। आज वे कांग्रेस जैसे दल के सबसे बड़े और निर्विवाद फेस हैं। टकराव टलने के दो कारण रहे। एक उनका व्यवहार और दूसरा 10 जनपथ की पावर। कोई बताए कि अगर मनमोहन की जगह कोई दूसरा प्रधानमंत्री बनता तो क्या उस पर यह ठप्पा नहीं लगता? सोनिया की हैसियत के चलते यह आरोप आश्चर्यजनक नहीं है। बरसों से सब सुनते आ रहे हैं। मानते आ रहे हैं। आश्चर्यजनक यह है कि जिस मनमोहन ने इसकी कभी परवाह नहीं की, सफाई नहीं दी,अचानक ऐसा क्या हुआ कि वो राजनेताओं के उसी सुर में बोलने लगे? घाघ नेताओं की तरह मुंह खोलने लगे। वे बीजेपी नेता एल के आडवाणी को पीएम के लायक नहीं मानते। मानना भी नहीं चाहिए। अगर वो मान जायेंगे तो फिर चुनाव किस बात का? जब पार्टी नेता अपनों को पीएम मजबूरी में मानते हैं, मर्जी से नहीं तो फिर विरोधी पर इस काबलियत का ठप्पा लगाकर कौन अपने पैरों को काटेगा? लेकिन कांग्रेस व मनमोहन ने यूं ही बाण नहीं चलाया है। इस बार तस्वीर अलग है। अकेले कोई दल राज में नहीं आने वाला। तीसरे मोरचे का प्रधानमंत्री नहीं बनने वाला। दलों के मोह से जनता निकल चुकी है। वक्त की नजाकत के चलते चुनावी मैदान में पार्टियों की लड़ाई से ऊपर कौन बनेगा पीएम की धारा बहने लगी है। बीजेपी आडवाणी को पहले ही पीएम के रूप में पेश कर चुकी है। मैदान में उतार चुकी है। ऐसे में कांग्रेस ही पीछे क्यों रहती? उसने समय-समय पर मनमोहन के पीछे खड़े होने की बात पुख्ता तरीके से रखी। घोषणा पत्र जारी करते समय सोनिया ने तमाम जनहित के वायदे किए और साफ किया कि मनमोहन ही होंगे यूपीए के प्रधानमंत्री। साफ है पहली बार अमेरिका की तर्ज पर चेहरों की लड़ाई रंग जमाएगी। मनमोहन को इसी वजह से आगे रखा जा रहा है कि जनता ही बताए-कौन है लायक? आपात स्थिति में कप्तान को हमेशा फ्रंट से लड़ना पड़ता है। इससे ज्यादा आपात स्थिति और क्या होती, इसीलिए मनमोहन ने आव न देखा ताव और आडवाणी पर पिल पड़े। पहली बार इस अंदाज में बोले तो जाहिर है मीडिया तक ने हाथों-हाथ लिया। रोज बोलेंगे तो धीरे-धीरे असर घटता जाएगा पर राजनीति का यही दौर है कि अपनी अच्छाई बताने से ज्यादा दूसरे के दोष उजागर करो। अपनी कमीज सफेद रखने और दिखाने की बजाए दूसरे की कमीज पर कीचड़ उछालो। बीजेपी नेता अरसे से करते आ रहे हैं। मनमोहन ने शुरूआत कर दी है। चुनावी बेला में वोटर चाहे बोर हो पर वाणों की लड़ाई के इस शोर में वो जरूर पोर-पोर रहेगा। दोनों में यह सीन रोजाना उस समय तक जरूर चलेगा जब तक वोटर यह ना बता दे कि ये है कमजोर पहलवान। तब तक फ्री में देखते रहिए दो बांकों की लड़ाई।