
देशपाल सिंह पंवार
रंग कौन बदलता है? इसका जवाब सब जानते हैं। पढ़े-लिखे भी और अनपढ़ भी,इस जमात के अलावा एक और बिरादरी है जिसे ये हुनर मिला है और वो है राजनेताओं की एक खास ब्रीड की। इस बार के आम चुनाव को ही देख लीजिए। ऐलान होते ही चाल भी बदल गई थी और ढाल भी,शरीर भी लाल हो गया था और गाल तो ऐसे बजने लगे थे जैसे ये जन्म-जन्म के दुश्मन हों। गरियाने, कोसने, धज्जियां उड़ाने और नंगा करने की भी एक सीमा होती है पर इस बार आचार-व्यवहार की सीमा इतनी बार लांघी और रौंदी गई कि वो फिर खड़ी होगी इस पर संदेह है। किसी भी दल और नेता ने अपनी खूबी और काम के आधार पर वोट नहीं मांगे। जनहित के मुद्दों को नहीं पकड़ा। अपनी कमीज को सफेद रखकर, बताकर या दिखाकर वोटर को अपना बनाने की कोशिश नहीं की बल्कि दूसरे की कमीज को गंदा करने में जुटे रहे। जनता को यह दिखाने में जुटे रहे कि इसे मत चुनना-ये इतना खराब है। मुझमें इससे कम खोट है-मुझे ही वोट देना। यह काम हर किसी दल और नेता ने किया। किसी ने कम-किसी ने ज्यादा। सारी कमीज गंदी नजर आ रही हैं। तमाम शरीफों के बोल उनकी शराफत की पोल खोलते रहे। वोट लेने का दौर जब तक चलता रहा-देश की फिजां में शोर गूंजता रहा। ध्वनि प्रदूषण मापने वाले यंत्र बता देंगे कि भारत में कभी आज तक इतना शोर-शराबा कभी नहीं हुआ। सारे रिकार्ड़ टूट गए। नया रिकार्ड़ बन गया। इधर वोट मांगने का शोर बंद-ऊधर झगड़े-टंटे सब खत्म। वो सब ड्रामा जनता के लिए था। जनता से मतलब निकल गया तो अब गरियाने का नहीं-गद्दी पाने का समय है। इसके लिए प्यार जताने, पटाने और मिलने-मिलाने का समय है। बिहार के एक केंद्रीय मंत्री के बयान-ऐसे आरोप-प्रत्यारोप को होली के मजाक की तरह लिया जाना चाहिए से यह साबित भी हो जाता है कि चुनाव के दौरान होने वाली बयानबाजी इन नेताओं के लिए बस वोट पाने की एक नौटंकी होती है। तो फिर सवाल यही उठता है कि क्या ये नेता हैं या नौटंकीबाज? इससे बड़ा सवाल यह भी खड़ा होता है कि क्या हिंदुस्तान का सबसे बड़ा महापर्व अब नौटंकी से मनाया जाएगा? देख लीजिए वे सारे एक-दूजे को नंगा करने वाले, सबसे खराब बताने वाले, दुश्मनी का पाला खींचने वाले, हर समय ऐंठे रहने वाले अब हम निवाले बनने लगे हैं। तुम मुझे पंत कहो-मैं तुम्हें निराली की शैली में बोलने भी लगे हैं,साथ चलने भी लगे हैं। सत्ता की चाह में न जाने कैसे-कैसे गठजोड़ बनेंगे? न जाने कौन-कब-कहां-किसके साथ बैठा मिलेगा-ईश्वर जाने या फिर ये नेता। वे इसे संभावना का खेल बताते हैं। लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या राजनीति वास्तव में संख्या का खेल है? क्या यह जनता की फीलिंग के साथ खेल नहीं है? निष्ठा, नैतिकता, जवाबदेही, जिम्मेदारी, आदर्शवाद क्या राजनीति के क्षेत्र में महज वोट पाने के ही काम आते हैं? राज बनाने या चलाने के वक्त इनके कोई मायने नहीं? जनता है सब जानती है। इसी कारण विखंडित जनादेश सिर पर है। जिस दिन नकारात्मक वोटिंग का हक मिलेगा शायद उस दिन राजनीति का चीरहरण करने वाले भी सीन में नजर ना आएं।