रविवार, 17 मई 2009

विश्वास में पास होने की आस



देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तानी वोटर ने तो वो काम कर दिखाया जिस पर उसे 10 में से 10 अंक दिए जा सकते हैं। स्थिर सरकार भी है। कांग्रेस का राज भी है। मनमोहन के सिर पर फिर ताज भी है। ऐसे में बारी हाथ की है कि वो ऐसा साज बजाए जिस पर जनादेश की लाज भी बचे, जनता नाज •भी करे और अगली बार के चुनाव में कामकाज के आधार पर वोटर उसे पूरे अंक भी दे। जनता की राह से पैदा चाह की थाह कांग्रेस को हो ही गई होगी ऐसे में वो ऐसे काज से बाज आए जिसे उखाड़कर फैंकने की शुरूआत इस बार हो चुकी है। ऐसे जनादेश के बाद किसी भी नई सरकार के सामने जो चुनौतियां और जिम्मेदारी होती हैं, कांग्रेस के सामने उससे कहीं ज्यादा होंगी। कारण उसकी नीतियों को जनादेश मिला है। अच्छी बात ये कि साथ में चुनौतियों पर पार पाने का हथियार मिला है। उसे हर कदम सोच समझकर इस तरह उठाना होगा जिससे जनता फिर उसी चौराहे पर नंगी खड़ी नजर ना आए जहां जुगाड़ी नेता रोज उसके वोट की कीमत का सौदा करते आए हैं। इस खेल को जनता ने खत्म किया है। उसकी रोजी, रोटी-कपड़ा और मकान के साथ खेल को मनमोहन सरकार को फेल करना होगा। अपनी सोच से, अपनी नीतियों से और अपने कामों से इस तरह का वातावरण बनाना होगा जिससे केवल कांग्रेस का नहीं बल्कि हर हिंदुस्तानी का हाथ मजबूत नजर आए। जनता की आस में सरकार को पास होना ही होगा, वरना उसका चेहरा उदास और लोकतंत्र फिर बदहवास नजर आएगा और इसके लिए न तो जनता कभी कांग्रेस को माफ करेगी और न ही फिर किसी राजनीतिक दल पर विश्वास करेगी। इस सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती जनता के इसी विश्वास पर पास होने की है। आर्थिक मंदी के दौर के बीच खत्म होते रोजगार के शोर पर सबसे पहले मनमोहन सरकार को ध्यान देना होगा। कोई लाख दावे करे पर यह हकीकत है कि हमारी युवा पीढ़ी पर इस मंदी ने कहर ढाया है। निजी क्षेत्र की चाल गड़बड़ाने से लाखों युवक बेरोजगार हुए हैं। करोड़ों लाइन में खड़े हैं और जितने काम कर रहे हैं उनकी सैलरी पर गाज गिरी है। सपनों को बेरहमी से कुचलती इस मंदी से मनमोहन सरकार को सबसे पहले और मजबूती से निपटना होगा। हिंदुस्तानी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाना होगा ताकि वो रोजगारपरक बन सके। देश मजबूत बन सके। शिक्षा को भी रोजगारपरक बनाना होगा। स्थिर सरकार के बाद इसके आसार ज्यादा हैं। अगली दो तिमाही में ही सरकार इसे पटरी पर लाना होगा। अर्थव्यवस्था को दौड़ाना होगा और चीन से प्रतिस्पर्धा करनी होगी। गांवों में रोजगार धंधे लगाने होंगे ताकि शहरों से दबाव भी घटे। खेती के मोरचे पर भी सरकार को ध्यान देना होगा। अगली हरित क्रांति लाने के प्रयास तेज करने होंगे। बिहार जैसे राज्य इसमें रोल अदा कर सकते हैं। विकास की बेहतर राह के लिए कठोर फैसले •भी करने होंगे। विदेशी पूंजी निवेश को वापस लाने के लिए •भी कदम उठाने होंगे ताकि देश में पूंजी का प्रवाह और रोजगार बढ़े। राजकोषीय घाटा सरकार की चिंता का सबब है। इसके लिए भी कुछ कठोर और कड़वे फैसले करने होंगे या फिर नोट छापकर इसके कुछ हिस्से को पूरा करना होगा। स्थाई सरकार की वजह से सरकारी कंपनियों में विनिवेश की आसान राह •भी यह चाह पूरी कर सकती है। कैंसर की तरह देश को निगलते जा रहे करप्शन पर भी सरकार को वार करने होंगे। इसके बिना यह राहुल के सपनों का देश नहीं बन सकता। विदेशी बैंकों में जमा धन को वापस लाकर सबको मुंह तोड़ जवाब •भी देना होगा। मनमोहन सिंह विशेषज्ञ हैं,उनके चेहरे में आज की युवा पीढ़ी समेत सबको संकट मोचक नजर आता है। राहुल गांधी के चेहरे में सही राह पर ले जाने वाला असली लीडर नजर आता है। उद्योग जगत को भी सरकार से काफी आस है। राजनीतिक स्थिरता से माहौल अनुकूल बनेगा। फैसले जल्दी और बेहतर होंगे तथा बेहतर नतीजे देंगे। उद्योग जगत को ब्याज दरों में और कटौती की आस है। इससे बाजार गुलजार रहेगा और कंज्यूमर की खरीद क्षमता बढ़ेगी। महंगाई और कांग्रेस साथ-साथ चलती हैं कि धारणा को भी सरकार को खत्म करना होगा। हर पेट को रोटी, हर सिर को छत, हर हाथ को काम के मसले पर ज्यादा लचीलापन दिखाना होगा। शिक्षा सुधार, चुनाव सुधार, वेतन सुधार आदि दर्जनों मसलों पर •भी सुधार के कदम उठाने होंगे। आंतरिक सुरक्षा •भी ज्वलंत मुद्दा है। बढ़ता अलगाववाद, नक्सलवाद, उग्रवाद,आतंकवाद और संप्रदायवाद तरक्की की राह में रोड़ा है। इस रोड़े को सरकार को हटाना और मिटाना ही होगा। देश में अमन-चैन के माहौल को और बेहतर बनाना होगा। यह सरकार की अग्निपरीक्षा है। राज्यों और केंद्र के रिश्तों को और बेहतर बनाना होगा। इसमें पारदर्शिता •भी लानी होगी और नियंत्रण भी, हिंदुस्तान के सभी पड़ौसी देशों से रिश्ते बेहत खराब हैं। विदेश नीति पर कहीं ज्यादा काम करना होगा। खासकर पाकिस्तान,बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ। यहीं से देश में आतंकवाद फैलता है। तालिबान की नापाक सोच पर भी चौकन्ना रहना होगा। हिंदुस्तान पिछलग्गू नहीं बल्कि महाशक्ति है इसका अहसास सरकार को भी रहना चाहिए और बाकी दुनिया को •भी कराना चाहिए। सरकार को हर कदम सावधानी से उठाने होंगे ताकि जनादेश से तरक्की की झलक मिले। अहंकार की नहीं। यूपीए में ऐसे नेता हैं। मनमोहन में ऐसी योग्यता है। राहुल में वो हुनर है कि युवाओं के इस देश की चाल पर सारी दुनिया इतराए। जनता इठलाए। गांधी का ये चमन मुस्कराए और सब गर्व से कहें-मेरा देश महान।

गांधी परिवार की आंधी



देशपाल सिंह पंवार
जय हो- समय की,हिंदुस्तान की,लोकतंत्र की, जनता की,युवा पीढ़ी की,सकारात्मक सोच की, काम की, कांग्रेस की, गांधी परिवार की,मनमोहन सिंह व राहुल गांधी की-जो कहना चाहें कह सकते हैं। जिस तरह और जिस अंदाज में जनता ने हाथ का साथ दिया है, अपना हाथ-जगन्नाथ की कहावत को सच ठहराया है, गद्दी की रेस में कांग्रेस के फेस को चमकाया है,तथा विपक्षियों के सारे अरमानों को ठेस पहुंचाई है, उसके लिए सारे शब्द कम पड़ सकते हैं। सरदार फिर सरदार है। कांग्रेस का बेड़ा पार है और विपक्षियों तथा मीडिया के चेहरे शर्मसार हैं। कांग्रेस फिर सरकार बनाने को तैयार है और वो भी इस तरह जिसके बारे में किसी ने नहीं सोचा था। कोई यह मानने को तैयार नहीं था कि यूपीए गठजोड़ 200 की संख्या पार कर पाएगा लेकिन इस फिगर से ज्यादा पर अकेले कांग्रेस ने झंडा फहराकर हर दल पर अपनी बादशाहत साबित कर दी। सबके अरमानों पर पानी फेर दिया है। प्रधानमंत्री बनने और सत्ता की मलाई की कमाई खाने वालों के सपनों को चकनाचूर कर दिया है। वो चाहे जादुई फिगर से दूर रह गई हो पर राज उसी का है। ताज उसी का है। साज उसी का है। काज उसी का है। विरोधियों पर गाज और जनता पर नाज का हक उसी को है। छत्तीसगढ़ और बिहार को अगर छोड़ दिया जाए तो बाकी सारे देश में हाथ और उसके साथ ने विरोधियों को ऐसी मात दी है कि इसका पोस्टमार्टम करने में ही 2009 निकल जाएगा। हो सकता है फिर भी वे किसी नतीजे पर ना पहुंच पाएं। सिर उठाकर ना चल पाएं। लाख टके का सवाल यही है कि आखिर जब पूरा देश, मीडिया, नेता और दल विखंडित जनादेश का रोना रो रहे हों , देश में राजनीतिक अस्थिरता का डर जता रहे हों, फिर जल्द ही चुनाव की बात कह रहे हों तो ऐसे माहौल में आखिर कांग्रेस इस तरह का प्रदर्शन करने में कामयाब कैसे हो गई? आखिर वे कारण क्या रहे कि जनता ने सारे कयासों, दावों की हवा निकाल दी और कांग्रेस को फिर उस शाही अंदाज में सत्ता पर बिठा दिया जिसके बारे में वे पिछले 18 साल से सोच भी नहीं पा रहे थे, करना और पाना तो दूर की कौड़ी नजर आ रही थी। अगर इसकी तह में जाया जाए तो इसके कई कारण हैं। गांधी परिवार का नाम,मनमोहन सरकार का काम, किसानों को फसल का दाम, जनहित की योजनाओं में सारा अवाम, सरकार के एजेंडे पर आदमी आम, आतंकी गतिविधियों पर लगाम, महंगाई जाम ने जनता की भा वनाओं पर बाम लगाने का काम किया, जिससे इस सरकार की इनिंग की शाम नहीं हो पाई। यह मानना पड़ेगा। इसके अलावा जनता जोड़-तोड़ की राजनीति से भी तंग आ गई थी। रोज लोकतंत्र का जिस तरह चीरहरण हो रहा था उसका इलाज जनता के ही पास था और उसने बखूबी किया। किसी को पता भी नहीं चलने दिया। पता चला तो ऐसा झटका दिया कि सब सिसकते नजर आ रहे हैं। कांग्रेस की सकारात्मक और बीजेपी की नकारात्मक सोच ने भी वोटर पर गहरी छाप छोड़ी। सोनिया गांधी और राहुल गांधी जैसे चेहरों के बावजूद चुनाव के दौरान कांग्रेस ने लगातार मनमोहन सिंह के चेहरे को आगे करके आम आदमी की बात की। जनता के हितों की बात की। रोजगार की बात की। अपने किए हुए काम गिनाए और आगे वे क्या-क्या करेंगे इसके इरादे जताए। इसकी ठीक उलट चाल बीजेपी ने चली और तीसरे मोर्चे या कहा जाए लेफ्ट फ्रंट ने •भी ,बीजेपी राम का नाम लेने लगी। वादों के जरिए अपने इरादे जताने की बजाय कमजोर प्रधानमंत्री का रोना रोने लगी। खाली पेट न तो किसी को कोसा जाता है और ना ही राम का नाम सुहाता है। यह छोटी सी बात बीजेपी की समझ में नहीं आई। हैरत की बात है कि एल के आडवाणी जैसे नेता नकारात्मक फोबिया के शिकार हो गए । अपनी उम्र और तजुर्बे के बावजूद उन्होंने मनमोहन सिंह पर कमजोर प्रधानमंत्री के जिस तरह और जितने तंज कसे, 10 जनपथ की गुलामी के ताने मारे, इस नकारात्मक सोच से मनमोहन सिंह को हमदर्दी भी मिलती गई और फोकट की पब्लिसिटी भी, मुंबई कांड समेत सब हमलों और महंगाई आदि मसलों के लिए मनमोहन सिंह पर ताबड़तोड़ हमलों की बात उस जनता को हजम नहीं हुई जो आडवाणी समेत सब बीजेपी नेताओं को कंधार में आतंकवादियों को छोड़ने का दर्द झेल चुकी है। वो जानती है कि इसी कर्म का मर्म वो झेल रही है। इसके बावजूद हैरत इस बात की भी है कि इस पार्टी ने अपनी सबसे बड़ी हार को ही अपने विज्ञापनों की थीम बनाया। कंधार की मार के बीच मजबूत सरकार का नारा कैसे फिट बैठ सकता था? कांग्रेस की जीत में सबसे बड़ा रोल अल्पसंख्यक वोटर ने प्ले किया। विवादित ढांचा गिरने के बाद इस वोट बैंक ने हाथ का साथ छोड़ दिया था लेकिन मुलायम-कल्याण की दोस्ती ने उत्तर प्रदेश में रंग खिलाया, बीजेपी शासित राज्यों में डर ने असर दिखाया, दक्षिणी राज्यों में काम और स्थिर सरकार की चाह ने रंग जमाया-नतीजा 18 साल बाद अल्पसंख्यक वोटर ने फिर कांग्रेस का हाथ पकड़ा। उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में ऐसी सफलता का यह भी कारण है। राहुल गांधी फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। देश में 10 करोड़ से ज्यादा युवा पहली बार वोटर बने। ये वो पीढ़ी है जो 20 साल पहले पैदा हुई। इसने न कांग्रेस के अवगुण देखे और न ही पुराने चेहरों में उसकी कोई दिलचस्पी थी। ये ग्रुप जब जवान हुआ तो देश में मनमोहन के राज में आर्थिक उदारवाद की लहर देखी, राहुल गांधी की तस्वीर में अपनी झलक देखी, मंदी और बेरोजगारी की पीड़ा से छुटकारा दिलाने वाली बेहतर तस्वीर देखी। इसी सरकार में अपनी बेहतर तकदीर देखी। उन्हें विपक्षी दलों के एजेंडे भी उनके घिसे-पिटे नेताओं जैसे ही नजर आए। ऐसे में युवा पीढ़ी राहुल के लिए वोट करती नजर आई। खासकर यूपी में। जहां कांग्रेस फिर जिंदा हो गई। यही अंतर उसके प्रदर्शन से साफ झलक रहा है? इसके अलावा राजद-लोजपा,सपा, राकांपा जैसे सहयोगियों द्वारा आंख दिखाने की रणनीति ने कांग्रेस का फायदा ही किया। उसने साथ नहीं छोड़ा। बिहार में चाहे कांग्रेस को इस बार ज्यादा फायदा ना मिला हो पर वहां वो जिंदा हो गई है और अगले एसेम्बली चुनाव में इसका असर साफ दिखेगा। अकेला चलो की राहुल की सोच ने विरोधियों की चाल में लोच तो पैदा कर ही दी है। इस बार के नतीजों ने और भी कई संदेश छोड़े हैं। सोनिया का विदेशी मूल का मुद्दा अब हमेशा के लिए खत्म। वामदलों की ऐंठ खत्म। सौदेबाजी की राजनीति खत्म। अस्थिर राजनीति का दौर खत्म। वोटर को बेवकूफ मानने की सोच खत्म। लालू-मुलायम की हैंकड़ी खत्म। मायावती, शरद पवार और करात की पीएम बनने का सपना खत्म। आडवाणी की राजनीति खत्म। बीजेपी की कथित एकता खत्म। तमाम कयासबाजियों का दौर-विखंडित जनादेश का शोर मचाने वालों को जनता व शनिचर महाराज ने एक झटके में ही ऐसा बोर किया है कि उन्हें दूर-दूर तक ये क्या हुआ,कैसे हुआ की डोर पकड़ में नहीं आ रही है। डोर उन हाथों से भी छूट गई है जो राजनीति को अपने हिसाब से हांकना चाहते थे। 2-2,4-4 सीटें जीतने वाले नेता और दल जिस तरह राजनीति की धारा को जोड़-तोड़ के जुगाड़ से गंदा करने में जुटे हुए थे, अब गद्दी की चाह की कंटीली राह पर आह करते नजर आ रहे हैं। सौदेबाजी, कलाबाजी, दगाबाजी और नौटंकीबाजी की कमाई खाने वाले ऐसे नेताओं को अब जनता की सोच की थाह समझ में आ रही होगी। ये कांग्रेस की जीत से ज्यादा उनकी हार है। जनता को बेवकूफ समझने की उनकी सोच की हार है। ये मीडिया की हार है। जिताना और हराना जनता का काम है लेकिन देश के मीडिया ने इसका ठेका ले लिया है। एक- दूसरे के पीछे चलने की बीमारी और अपने फायदे के लिए किसी की भी तरफदारी उसकी विश्वसनीयता पर कितनी भारी पड़ सकती है, इन नतीजों को जनता के सामने परोसने के बाद उन्हें इस पर मंथन जरूर करना चाहिए। चुनावी प्रक्रिया के जरिए मंथन से जो जनादेश निकला है वह इस बात को भी साबित करता है कि इस देश में लोकतंत्र की जड़ें बेहद मजबूत हैं। फिलहाल स्थाई सरकार देने के साथ-साथ खजाने बचाने के इस जनादेश को सलाम। अब कांग्रेस की बारी है, राहुल गांधी की पारी है-वो इस देश को फिर बुलंदियों पर लेकर जाए। युवा सपनों में ऐसे रंग संजोए जिससे देश फिर सोने की चिड़िया कहलाए।