देशपाल सिंह पंवार
ईश्वर सर्वशक्तिमान है-इंसान अगर सही राह पर है तो देर सवेर उस पर ऊपर वाले का करम हो ही जाता है। कब,किसकी,कैसे किस्मत पलट जाती है और इंसान नया इतिहास रच जाता है सब देखते रह जाते हैं। बराक हुसैन ओबामा आज ऐसा ही एक नाम है। दो साल पहले तक इस शख्स को अमेरिका के बाहर जानने वाले गिनतियों में थे। आज ये नाम दुनिया के हर वाशिंदे की जुबान पर है। कल तक वो अजनबी चेहरा था, आज उनके चारों ओर भीड़ है। कल तो वो एक आम आदमी थे आज वो दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के राजा है। यही है किस्मत का खेला-इस नाम ने एक झटके में अमेरिका का 220 साल का इतिहास बदल डाला। पहली बार कोई अश्वेत इस पद पर पहुंचा। वो भी एक ऐसे विजेता के रूप में जिसके आसपास लोकप्रियता के पैमाने पर कोई नहीं फटक पा रहा हो। सब जानते हैं अमेरिकी कौम आसानी से कोई बात नहीं मानती, किसी को अपना नहीं बनाती पर दूसरी दुनिया में हर कोई इस बात से हैरत में है कि पद पर पहुंचने से पहले ही ओबामा की लोकप्रियता सातवें आसमान पर कैसे पहुंच गयी? सर्वे बता रहे हैं कि 50 साल में यह करिश्मा केवल ओबामा ही कर पाए हैं। यानि एक ऐसे हीरो के रूप में छाए हैं जिसकी फिल्म रिलीज नहीं हुई हो और वो सुपर स्टार बन गया हो। एक ऐसा सुपर स्टार जिसकी ओर सारी अमेरिकी जनता हसरत से देख रही है और तनाव तथा जंग झेल रही सारी दुनिया भी,ओबामा अमेरिका की छवि संवारेंगे, अपनी जनता को संकट से उबारेंगे, सारी दुनिया को जंग से निजात दिलायेंगे, अमन और शांति का संदेश फैलायेंगे, यही सबको विश्वास है, उनसे आस है, इसीलिए सब दूर होकर उनके पास हैं। यही उनकी लोकप्रियता का असली कारण है और राजपाट के दौरान यही उन पर सबसे बड़ा दबाव भी होगा। उदास,हताश, निराश, बदहवास चेहरों पर मुस्कराहट लाने का, चमक पैदा करने का। अमेरिका के लिए यह साल दो ही बातों के लिए हमेशा इतिहास में याद किया जायेगा। एक से परेशानी की भयावता का एहसास होता है। दूसरी से हैरानी का एहसास होता है। जिस देश की ताकत की मिसालें दी जाती थी, जिसे सारी दुनिया ने अघोषित रूप से सबसे ताकतवर मान लिया था, जिसकी संगत को ज्यादातर देश किस्मत समझने लगे थे, उसी देश से एक ऐसी आंधी चली जिसने उस देश को भी तहस-नहस किया, साथ ही पूरी दुनिया को भी एक झटके में जमीन पर पटक दिया। 80 साल के बाद आर्थिक मंदी का काला साया अमेरिका पर ऐसा मंडराया कि वहां की अर्थनीतियां जिस पर सारी दुनिया चलती थी, मिसालें देती थी, छूत की बीमारी नजर आने लगी। जून से शुरू हुई मंदी की चोट ने उसके सारे सिस्टम के खोट को उजागर कर दिया। उसके बैंक और दूसरे वित्तीय संस्थान एक-एक कर डूबते चले गए और बाकी देश रेत के हवा महल की तरह लुढ़कने लगे। समय गुजरता जा रहा था, परेशानी बढ़ती जा रही थी, एक ओर ऐसा खौफनाक सीन था तो दूसरी ओर यही वो पल थे जब अमेरिकी जनता को यह तय करना था कि कौन इस देश पर राज करेगा, उन्हें बचायेगा,आर्थिक क्रांति का मसीहा बनेगा, सुपरमैन की धरती का असली सुपरमैन बनेगा। ओबामा में वो सब जनता को नजर आया। एक आम आदमी,सामान्य सा चेहरा-अपने ही बीच का कोई शख्स, ठीक जार्ज बुश के सख्त चेहरे के विपरीत। इसके बाद जो हुआ, जैसे हुआ वो सब जानते हैं। एक नया इतिहास रचा गया। 4 अगस्त 1961 को एक साधारण परिवार में जन्मे ओबामा 2005 में इलिनियोस से अमेरिकी सीनेटर बने थे और 4 नवंबर 2008 को वे 53 फीसदी से ज्यादा मतों से राष्ट्रपति पद पर पहुंचे थे। कानून के छात्र रहे ओबामा ने शिकागो ला स्कूल में 12 साल अध्यापन तक किया। वे जिस क्षेत्र में रहे, अलग हटकर अलग अंदाज में काम करते रहे। अब सबसे बड़ी जिम्मेदारी सिर पर है। फिलहाल जीत का जश्न मनाने का दौर चल रहा है। वे खुश हैं, उनके चाहने वाले और ज्यादा खुश हैं। फिलहाल जैसे चेहरे वे अपनी टीम में लेते हुए दिख रहे हैं उससे आशाएं बंधती नजर आती हैं पर जो चुनौतियां उनके सामने हैं वे शायद ही किसी अमेरिकन राष्ट्रपति को झेलनी पड़ी हों। पहला अमेरिकी अर्थव्यवस्था को उन्हें मंदी से निकालना है। निवेशकों में विश्वास जगाना है। जनता के टूटे हुए सपनों पर मरहम लगाना है। यह काम फिलहाल मुश्किल सा नजर आता है। पर ऐसे कदम उन्हें उठाने ही होंगे कि जनता में आशा का संचार हो। वो कदम क्या होंगे ये देखने लायक होंगे। इसके अलावा कई मोरचों पर जिस तरह अमेरिकी फौज जूझ रही है उस पर ओबामा को अपना सारा तजुर्बा लगाना होगा। अफगानिस्तान में चाहे बुश की नीति को समर्थन मिला हो पर इराक में उनकी करनी को महज जिद ही माना गया। ऐसा मानने वाले अमेरिकी ज्यादा हैं। ऐसी अनगिनत गलतियों के कारण चंद देशों को छोड़ बाकी दुनिया में इस देश को खलनायक ही समझा जाता है। विदेश नीति के मोरचे पर उन्हें अमेरिकी छवि को बेहद ठीक करना होगा। यूरोप हो या एशिया अपनी कूटनीति के फ्रंट पर ओबामा की अग्नि परीक्षा होगी। हिंदुस्तान-पाकिस्तान के रिश्तों में हमेशा इस देश का झुकाव सीमा पार ही ज्यादा नजर आता है। इस हकीकत को ओबामा को बदलना होगा। इसके अलावा भी ढेरों ऐसी चुनौतियां उनका इंतजार कर रही हैं जिनसे निपटना आसान नहीं। चुनाव मोरचे पर उन्होंने चाहेलइतिहास रचा हो पर ओबामा को असली इतिहास रचियता तब माना जायेगा जब वे इन सारे झंझावतों को पार कर लेंगे बिल्कुल सुपरमैन की तरह। जिसकी आज गोरों को भी जरूरत है और कालों को भी/ (28.12.08)
राजनेताओं की घटिया सोच का-गद्दी के लिए लोच का-जनता के पांव की मोच का। नेतागिरी से पैदा जंगलराज का-सफेदपोश की देन गुंडाराज का-जनता पर गाज का। बेईमानी के बेहिसाब वार का,जातियों के तकरार का, नपुंसक-निकम्मी सरकार का। बच्चों से दुर्व्यवहार का, बेरोजगारों पर मार का ,अबलाओं पर जारी अत्याचार का। हाकिमों की घूसखोरी का, कालाबाजारियों की जमाखोरी का,टूटती डोरी का।
मंगलवार, 24 मार्च 2009
नया साल- जी का जंजाल
देशपाल सिंह पंवार
ऐसी आदत भी है और चाहत भी,नया साल आता था-राहत लाता था। हर चेहरा दमक जाता था। धमाल होता था। पर इस बार ऐसा नहीं है। 2008 चला गया- चांद दे गया,अमावस्या छोड़ गया। उसी काली रात के साथ 2009 आ गया। आफत न तो टली है और न ही 2009 की बेला भली है। हर शख्स डरा है। हर देश विचलित है। हिंदुस्तान अछूता नहीं। चाहे मंदी की लपटें यहां आकाश छूती हुई नजर न आ रही हों। पर समय ठीक नहीं है। क्या होगा इस साल तमाम कयासबाजी जारी हैं। जनता की अनगिनत चाह है। देश की कंटीली राह है। विकास दर की रफ्तार लाल निशान पर है। पैसे का संकट,बेरोजगारी, युवा वर्ग का गुस्सा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, घूसखोरी, सेहत, शिक्षा, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष विकास के मोर्च पर तगड़ा झटका देने की कगार पर हैं। बाहरी चुनौतियां कम नहीं-आतंकवाद, पड़ौसी देशों से बिगड़ते रिश्ते नींद उडाए हुए हैं। अर्थनीति, कूटनीति, विदेश नीति और जन नीति आसानी से काबू में आती नजर नहीं आ रही है। आर्थिक मोर्चे पर आजाद हिंदुस्तान में इससे खराब साल और कोई नहीं आया। शेयर बाजार धड़ाम। गरीब का काम तमाम। रईस तक कंगाल हो गए। एक जनवरी 2008 को निफ्टी 6000 से ऊपर था। आखिरी दिन वो 2500 के आसपास था। बाजार में मुद्रा के संकट ने बाजा बजा दिया। उधर तमाम विशेषज्ञों के बावजूद अमेरिकी नीति का जनाजा निकल गया। इसकी तर्ज पर चलने वाली हिंदुस्तान की कंपनियां धूल चाटने लगीं। देश में 20 हजार बड़ी कंपनियां हैं जिनके मुनाफे पर असर हो रहा है। छोटी कंपनियों के हालात तो और खराब हैं। उनका मुनाफा तेजी से घटने लगा है। घाटा सामने नजर आने लगा है। जहां-जहां थोड़ा कुप्रबंधन है वहां निश्चित रूप से इस साल ताले नजर आएंगे। बेरोजगार बढ़ेंगे। सरकार लगातार पैकेज की घोषणा कर रही है। सरकारी बैंकों की वाहवाही कर रही है। पर सब जानते हैं कि हमारे बैंक बहुत ज्यादा जोखिम झेलने की स्थिति में नहीं हैं। बैंकों के पास संपदा नहीं है। वे कंपनियों पर टिके रहते हैं। प्राइवेट बैंकों का यही हालत है और सरकारी का भी,पब्लिक सेक्टर के बैंकों में राजनीतिक दखल की वजह से समय पर निर्णय नहीं हो पाते। नतीजा उनसे ज्यादा आस नहीं रहती। हकीकत यही है कि अगर हमारे बैंकों को पांच फीसदी चोट पहुंची तो देश में बैंकिंग संकट पैदा हो जायेगा। अगर बैंकों की ये हालत है तो अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए वे महत्वपूर्ण रोल निभा पाएंगे यह कल्पना से परे है। विदेशी मुद्रा कोष घटता जा रहा है। लगातार तीन साल नौ फीसदी से ऊपर की विकास दर हमनें देखी। अगले साल यह 6 प्वाइंट पर अटकती नजर आ रही है। हां रिजर्व बैंक जरूर मानकर चल रहा है कि हम 7.5 तक रहेंगे। अगर ऐसा रहा तो यह ज्यादा खराब संकेत नहीं है। पर सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि देश दस करोड़ नए युवाओं को रोजगार कहां से देगा? जिस तरह 2004 के बाद रहन-सहन का ढंग बदला है उसे बनाए रखने की दिक्कत सामने आने लगी हैं। आधी आबादी 25 साल से कम की है। यह मजबूत पक्ष है लेकिन जो हालात सामने है बढ़ती बेरोजगारी उसपर घी का काम करेगी। युवाओं को झेलना दिक्कत तलब होगा। देश को अपनी ही अर्थनीति से इससे पार पाना होगा। विकास दर के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की है। साथ ही शिक्षा, सेहत और आंतरिक सुरक्षा के मसले बड़ा रोड़ा हैं। घटता उत्पादन,बढ़ती बेईमानी, खराब गर्वनेंस, गरीबी, सामाजिक संघर्ष, घरेलू आतंकवाद, बाल श्रम, महिलाओं पर अत्याचार और मौसमी मार हमें नीचे की ओर धकेल रही हैं। इस पर फतह के लिए जरूरी है अच्छा शासन। राज्यों में भी और देश में भी,गठजोड़ की राजनीति के दौर में यह मुश्किल नजर आता है लेकिन देश बचाना है तो अब दूसरा कोई चारा राजनेताओं के सामने नहीं है। सोच और क्रियान्वयन में परिवर्तन की जरूरत है। करप्शन पर काबू पाने की जरूरत है। कठोर फैसलों की दरकार है। समय पर निर्णय नहीं होता। नतीजा निराशा जन्म लेती है। अराजकता फैलती है। वर्ग संघर्ष पनपता है। आतंकवाद ने देश को गहरी चोट पहुंचायी है। 2009 में यह डर सामने खड़ा है। नक्सलवाद विकास को थाम रहा है। आतंकवाद हमें तोड़ रहा है। आए दिन के हमले हमारी आन-बान और शान के साथ मान पर चोट कर रहे हैं। अब तक आतंकवाद की कोई जात नहीं थी लेकिन अब कहीं से मुस्लिम आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद का जहर घुलता जा रहा है जो ज्यादा चिंता का विषय है। इसका असर कम करना और इसे मिटाना जरूरी है। 2001 में हमले के बाद जो गलती अमेरिका ने की वह हिंदुस्तान नहीं कर सकता। उस देश में मुस्लिमों के खिलाफ जो माहौल बना वह सबसे बड़ी गलती थी। क्या हम उसी डगर पर जायेंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है।पड़ौसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। 2009 में यह एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के साथ शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा है। इस समय तनाव चरम पर है। जंग के आसार हैं। इसे टालना तो है ही साथ ही रिश्तों को बेहतर बनाना है ताकि हम सारा ध्यान विकास और मंदी पर काबू पाने में लगा सके। जंग से हालात और बिगड़ेंगे। इसके अलावा अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मयांमार, नेपाल और श्रीलंका सब अच्छे पड़ौसी साबित नहीं हो रहे हैं। हां चीन के साथ रिश्ते थोड़े बेहतर हैं जो अच्छे लक्ष्ण हैं। जहां तक राजनीतिक चुनौतियों का सवाल है। हांगकांग के एक संगठन का दावा है कि हिंदुस्तान 2009 में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट झेलेगा। मई में संसदीय चुनाव होने हैं। आशंका यही सता रही है कि इस दौरान पाकिस्तान हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक दंगे करा और आतंकवादी हमले करा सकता है। पाकिस्तान की अस्थिरता का सीधा असर हम पर पड़ने की आशंका जतायी जा रही है। वैसे तो यह राजनेताओं के गले नहीं उतरेगा लेकिन अगर हम ये मानते हैं कि देश संकट में है तो क्या ऐसे आपात समय में राष्ट्रीय सरकार बन सकती है? इसके नुकसान चाहे ज्यादा ना हों लेकिन फायदे ढेरों हैं। चुनाव के नाम पर हजारों करोड़ नहीं लुटेगा। काला धन नहीं बहेगा। सारा धन विकास में लगेगा। समय बचेगा। समय की नजाकत तो यही है। जरूरत यही है। खतरे बहुत हैं। पर कुछ अच्छे लक्ष्ण जरूर हैं। देश में हर उस चीज का उत्पादन होता है जो इंसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। इसी कारण मंदी काल अब तक निगल नहीं पाया है। दूसरे हमारी छवि ऐसी है कि चाहे सरकार किसी की बने विदेशी निवेशकों को कोई फर्क नहीं पड़ता। खुद मनमोहन सिंह इस बात को मानते हैं कि जब-जब विपदा आती है तो यह देश दुर्योग को सुखद संयोग में बदलता नजर आया है। ज्योतिषी मानते हैं कि मंदी का कहर सितंबर तक आते-आते दम तोड़ देगा। चाहे उन पर आधी से ज्यादा आबादी यकीन न करती हो पर इस समय उनकी बात सुनकर अच्छा लग रहा है। काश ऐसा हो। 2009 का सब पर रहमोकरम हो। चारों तरफ खुशहाली हो। हमारा देश सबसे महान हो। हम सब एक सुर से यही कहें-ऐसा साल बार-बार आए। हजार बार आए। (31.12.08)
ऐसी आदत भी है और चाहत भी,नया साल आता था-राहत लाता था। हर चेहरा दमक जाता था। धमाल होता था। पर इस बार ऐसा नहीं है। 2008 चला गया- चांद दे गया,अमावस्या छोड़ गया। उसी काली रात के साथ 2009 आ गया। आफत न तो टली है और न ही 2009 की बेला भली है। हर शख्स डरा है। हर देश विचलित है। हिंदुस्तान अछूता नहीं। चाहे मंदी की लपटें यहां आकाश छूती हुई नजर न आ रही हों। पर समय ठीक नहीं है। क्या होगा इस साल तमाम कयासबाजी जारी हैं। जनता की अनगिनत चाह है। देश की कंटीली राह है। विकास दर की रफ्तार लाल निशान पर है। पैसे का संकट,बेरोजगारी, युवा वर्ग का गुस्सा, इन्फ्रास्ट्रक्चर, घूसखोरी, सेहत, शिक्षा, राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष विकास के मोर्च पर तगड़ा झटका देने की कगार पर हैं। बाहरी चुनौतियां कम नहीं-आतंकवाद, पड़ौसी देशों से बिगड़ते रिश्ते नींद उडाए हुए हैं। अर्थनीति, कूटनीति, विदेश नीति और जन नीति आसानी से काबू में आती नजर नहीं आ रही है। आर्थिक मोर्चे पर आजाद हिंदुस्तान में इससे खराब साल और कोई नहीं आया। शेयर बाजार धड़ाम। गरीब का काम तमाम। रईस तक कंगाल हो गए। एक जनवरी 2008 को निफ्टी 6000 से ऊपर था। आखिरी दिन वो 2500 के आसपास था। बाजार में मुद्रा के संकट ने बाजा बजा दिया। उधर तमाम विशेषज्ञों के बावजूद अमेरिकी नीति का जनाजा निकल गया। इसकी तर्ज पर चलने वाली हिंदुस्तान की कंपनियां धूल चाटने लगीं। देश में 20 हजार बड़ी कंपनियां हैं जिनके मुनाफे पर असर हो रहा है। छोटी कंपनियों के हालात तो और खराब हैं। उनका मुनाफा तेजी से घटने लगा है। घाटा सामने नजर आने लगा है। जहां-जहां थोड़ा कुप्रबंधन है वहां निश्चित रूप से इस साल ताले नजर आएंगे। बेरोजगार बढ़ेंगे। सरकार लगातार पैकेज की घोषणा कर रही है। सरकारी बैंकों की वाहवाही कर रही है। पर सब जानते हैं कि हमारे बैंक बहुत ज्यादा जोखिम झेलने की स्थिति में नहीं हैं। बैंकों के पास संपदा नहीं है। वे कंपनियों पर टिके रहते हैं। प्राइवेट बैंकों का यही हालत है और सरकारी का भी,पब्लिक सेक्टर के बैंकों में राजनीतिक दखल की वजह से समय पर निर्णय नहीं हो पाते। नतीजा उनसे ज्यादा आस नहीं रहती। हकीकत यही है कि अगर हमारे बैंकों को पांच फीसदी चोट पहुंची तो देश में बैंकिंग संकट पैदा हो जायेगा। अगर बैंकों की ये हालत है तो अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए वे महत्वपूर्ण रोल निभा पाएंगे यह कल्पना से परे है। विदेशी मुद्रा कोष घटता जा रहा है। लगातार तीन साल नौ फीसदी से ऊपर की विकास दर हमनें देखी। अगले साल यह 6 प्वाइंट पर अटकती नजर आ रही है। हां रिजर्व बैंक जरूर मानकर चल रहा है कि हम 7.5 तक रहेंगे। अगर ऐसा रहा तो यह ज्यादा खराब संकेत नहीं है। पर सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि देश दस करोड़ नए युवाओं को रोजगार कहां से देगा? जिस तरह 2004 के बाद रहन-सहन का ढंग बदला है उसे बनाए रखने की दिक्कत सामने आने लगी हैं। आधी आबादी 25 साल से कम की है। यह मजबूत पक्ष है लेकिन जो हालात सामने है बढ़ती बेरोजगारी उसपर घी का काम करेगी। युवाओं को झेलना दिक्कत तलब होगा। देश को अपनी ही अर्थनीति से इससे पार पाना होगा। विकास दर के लिए सबसे बड़ी चुनौती इन्फ्रास्ट्रक्चर की है। साथ ही शिक्षा, सेहत और आंतरिक सुरक्षा के मसले बड़ा रोड़ा हैं। घटता उत्पादन,बढ़ती बेईमानी, खराब गर्वनेंस, गरीबी, सामाजिक संघर्ष, घरेलू आतंकवाद, बाल श्रम, महिलाओं पर अत्याचार और मौसमी मार हमें नीचे की ओर धकेल रही हैं। इस पर फतह के लिए जरूरी है अच्छा शासन। राज्यों में भी और देश में भी,गठजोड़ की राजनीति के दौर में यह मुश्किल नजर आता है लेकिन देश बचाना है तो अब दूसरा कोई चारा राजनेताओं के सामने नहीं है। सोच और क्रियान्वयन में परिवर्तन की जरूरत है। करप्शन पर काबू पाने की जरूरत है। कठोर फैसलों की दरकार है। समय पर निर्णय नहीं होता। नतीजा निराशा जन्म लेती है। अराजकता फैलती है। वर्ग संघर्ष पनपता है। आतंकवाद ने देश को गहरी चोट पहुंचायी है। 2009 में यह डर सामने खड़ा है। नक्सलवाद विकास को थाम रहा है। आतंकवाद हमें तोड़ रहा है। आए दिन के हमले हमारी आन-बान और शान के साथ मान पर चोट कर रहे हैं। अब तक आतंकवाद की कोई जात नहीं थी लेकिन अब कहीं से मुस्लिम आतंकवाद और हिन्दू आतंकवाद का जहर घुलता जा रहा है जो ज्यादा चिंता का विषय है। इसका असर कम करना और इसे मिटाना जरूरी है। 2001 में हमले के बाद जो गलती अमेरिका ने की वह हिंदुस्तान नहीं कर सकता। उस देश में मुस्लिमों के खिलाफ जो माहौल बना वह सबसे बड़ी गलती थी। क्या हम उसी डगर पर जायेंगे? यह सबसे बड़ा सवाल है।पड़ौसी देशों के साथ रिश्ते बिगड़ते जा रहे हैं। 2009 में यह एक बड़ी चुनौती है। पाकिस्तान के साथ शुरू से ही छत्तीस का आंकड़ा है। इस समय तनाव चरम पर है। जंग के आसार हैं। इसे टालना तो है ही साथ ही रिश्तों को बेहतर बनाना है ताकि हम सारा ध्यान विकास और मंदी पर काबू पाने में लगा सके। जंग से हालात और बिगड़ेंगे। इसके अलावा अफगानिस्तान, बांग्लादेश, मयांमार, नेपाल और श्रीलंका सब अच्छे पड़ौसी साबित नहीं हो रहे हैं। हां चीन के साथ रिश्ते थोड़े बेहतर हैं जो अच्छे लक्ष्ण हैं। जहां तक राजनीतिक चुनौतियों का सवाल है। हांगकांग के एक संगठन का दावा है कि हिंदुस्तान 2009 में सबसे बड़ा राजनीतिक संकट झेलेगा। मई में संसदीय चुनाव होने हैं। आशंका यही सता रही है कि इस दौरान पाकिस्तान हिंदुस्तान में साम्प्रदायिक दंगे करा और आतंकवादी हमले करा सकता है। पाकिस्तान की अस्थिरता का सीधा असर हम पर पड़ने की आशंका जतायी जा रही है। वैसे तो यह राजनेताओं के गले नहीं उतरेगा लेकिन अगर हम ये मानते हैं कि देश संकट में है तो क्या ऐसे आपात समय में राष्ट्रीय सरकार बन सकती है? इसके नुकसान चाहे ज्यादा ना हों लेकिन फायदे ढेरों हैं। चुनाव के नाम पर हजारों करोड़ नहीं लुटेगा। काला धन नहीं बहेगा। सारा धन विकास में लगेगा। समय बचेगा। समय की नजाकत तो यही है। जरूरत यही है। खतरे बहुत हैं। पर कुछ अच्छे लक्ष्ण जरूर हैं। देश में हर उस चीज का उत्पादन होता है जो इंसान के जिंदा रहने के लिए जरूरी है। इसी कारण मंदी काल अब तक निगल नहीं पाया है। दूसरे हमारी छवि ऐसी है कि चाहे सरकार किसी की बने विदेशी निवेशकों को कोई फर्क नहीं पड़ता। खुद मनमोहन सिंह इस बात को मानते हैं कि जब-जब विपदा आती है तो यह देश दुर्योग को सुखद संयोग में बदलता नजर आया है। ज्योतिषी मानते हैं कि मंदी का कहर सितंबर तक आते-आते दम तोड़ देगा। चाहे उन पर आधी से ज्यादा आबादी यकीन न करती हो पर इस समय उनकी बात सुनकर अच्छा लग रहा है। काश ऐसा हो। 2009 का सब पर रहमोकरम हो। चारों तरफ खुशहाली हो। हमारा देश सबसे महान हो। हम सब एक सुर से यही कहें-ऐसा साल बार-बार आए। हजार बार आए। (31.12.08)
कब सुधेरेंगे
देशपाल सिंह पंवार
पुराना साल तो ढेरों घाव देकर गया ही, नए साल की शुरूआत तक ठीक नहीं रही। वही आतंक की जंग-वही सत्ता का बेढंगा रंग। इसे अपशकुन कहिए या पुरानी गलतियों या लापरवाहियों का फल। पहला दिन-शाम का वक्त,जश्न का माहौल और गुवाहाटी की धरती खून से लाल। वही आतंकवाद का खूनी खेल। वही खौफनाक अंदाज। शांति के दुश्मन फिर कामयाब। चारों ओर चीत्कार। मरने वाले मर गए। ढेरों अपंग हो गए। उनके लिए,उनके परिवारों के लिए तो निश्चित रूप से यह साल सबसे मनहूस साबित हो ही गया। आगे और जाने किस जगह, किसके साथ, क्या होगा यह कोई नहीं जानता सिवाय कुदरत के या फिर उग्रवादियों या आतंकवादियों के। कम से कम केंद्र सरकार या राज्य सरकारें तो कतई नहीं जानती। ना उनका खुफिया तंत्र ये जानता या जानने की कोशिश करता कि आखिर मौत के सौदागरों का अगला निशाना कब, कौन और कहां होगा? अगर वे जानते या जानने की कोशिश करते तो पिछले साल असम में 28 बम धमाकों की वारदात की संख्या जरूर कम होती। अगर वे जानते तो साल के पहले दिन उल्फा उग्रवादी खून न बहाते। साल का पहला दिन हो और उग्रवादी तीन-तीन जगह धमाके कर जाएं, गृहमंत्री चंद मिनट पहले शहर में आए हों और उग्रवादी खुलेआम चुनौती दे जाएं क्या ये हमारी कमजोरी को नहीं दर्शाते? क्या ये अपनी ताकत का इजहार नहीं करते? क्या ये देश की एकता और अखंडता पर वार नहीं करते? हकीकत यही है कि इस विशाल देश के चारों छोर और हर मोड़ पर जिस तरह आए दिन उग्रवादी और आतंकवादी खूनी खेल खेल रहे हैं वो यह जरूर दर्शाता है कि कहीं न कहीं समय पर हम फैसले नहीं कर पाते। कर लेते हैं तो उनका क्रियान्वयन नहीं कर पाते। उग्रवादियों और आतंकवादियों को पैदा करने वाली जमीन को बंजर नहीं कर पाते। कभी पाकिस्तान की ओर से भारत की जमीन पर खून की होली खेली जाती है, कभी बांग्लादेश की ओर से। हम बस देखते रहते हैं। मार के बाद पुकार में लीन हो जाते हैं। कुछ दिन के शोर के बाद खामोश हो जाते हैं। नींद फिर किसी हमले या वारदात के बाद ही टूटती है। फिर वही सीन। बस हम बीमारी को रोकने की कोशिश करते हैं, उसे जड़ मूल से मिटाने की सोचते तक नहीं। करना तो बहुत दूर की बात है। इस ब्लास्ट से एक बार फिर साबित हो गया है कि जब तक उग्रवादियों और आतंकवादियों के अड्डे ध्वस्त नहीं किये जाते, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि अब कहीं खून नहीं बहेगा। कोई नहीं मरेगा। अमन रहेगा। मुंबई पर हमले के बाद चिदंबरम ने घर के मुखिया का पद लिया था। देश में हंगामा हुआ। नेताओं पर निशाने साधे गए। ठंड में संसद तक गरम रही। देश में चौकसी के तमाम बंदोबस्त किए गए। सारे देश में सुरक्षा का जाल बिछाया गया। तमाम वादे और इरादे दिखाए गए। जनता को एहसास कराया गया कि अब कहीं आसानी से कुछ नहीं होगा। हर साजिश विफल हो, केंद्र की पकड़ हो, इसके वास्ते खुफिया एजेंसी का पुनर्गठन हुआ। उसकी बैठक चिदंबरम कई बार ले चुके हैं। पहली जनवरी को गुवाहाटी के लिए उड़ने से पहले उन्होंने बैठक ली। विश्वास जताया कि सब ठीक हो जायेगा। दो माह पहले हुए धमाकों की जांच के लिए वे गुवाहाटी उतरते ही थे कि उल्फा उग्रवादियों ने तीन धमाके कर डाले। नए मुखिया को पहली सीधी सलामी। गए थे जांच करने, जाना पड़ा घायलों को देखने अस्पताल। उन्होंने दो टूक कहा-उग्रवादियों के खिलाफ अब निर्णायक जंग होगी। राजनीति की गिरावट के इस दौर में भी चिंदबरम उन राजनेताओं में से एक हैं जिनके शब्दों की विश्वसनीयता बची है। उम्मीद यही जतायी जानी चाहिए कि या तो उग्रवादी रास्ते पर आएंगे या देश उन्हें नेस्तानाबूद करेगा। असम अरसे से उल्फा की मार का शिकार सभी पूर्वोत्तर राज्यों में इस उग्रवादी संगठन का एक समय दबदबा रहा है। धीरे-धीरे जब दबाव बढ़ा तो इसकी जड़े कमजोर होने लगी। लेकिन पड़ौसी देश बांग्लादेश इसकी शरणस्थली बन गया। इस बार के हमले में उल्फा की 709 बटालियन का हाथ माना जा रहा है। इसका आधार बांग्लादेश है। हमारा सीमा प्रबंधन कमजोर है। आए दिन कोई बांग्लादेश की तरफ से घुस आता है। या चला जाता है। पूववर्ती खालिदा जिया की सरकार के विरोधी रूख के कारण इस विंग को वहां पनाह मिली और खाद-पानी भी-न खालिदा सरकार ने उन्हें टोका और न ही आपातकाल में पनपी सरकार ने। इस बार धमाके कर उन्होंने यह जाहिर करने की कोशिश की है कि राज चाहे किसी का हो, हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ये धमाके शेख हसीना को भी चुनौती है। उन्होंने कहा है कि उनकी धरती से किसी को आतंकवाद फैलाने की छूट नहीं दी जा सकती। शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद ये उम्मीद जगी है कि हिंदुस्तान के कूटनीतिक दबाव के बाद इस उल्फा बटालियन का बेस कैंप वहां ध्वस्त होगा। अगर शेख हसीना कट्टरपंथियों के सामने नहीं झुकी और अपने वादे पर कायम रहीं तो यह माना जा सकता है कि पूर्वोत्तर में आने वाले समय में इतना खून खराबा नहीं होगा। हां इसके लिए हिंदुस्तान सरकार को न केवल अपना दबाव और ज्यादा बढ़ाना होगा बल्कि सीमा पर पहरा और कड़ा करना होगा ताकि उग्रवादी घसुपैठ बंद हो। उग्रवादियों को खत्म किया जा सकता है और काबू में लाया जा सकता है-भूटान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। उसने उल्फा के खिलाफ 2003 में जंग छेड़ी थी नतीजा वहां उल्फा की 27 वीं बटालियन का कोई नाम लेवा तक नहीं है। म्यांमार में उल्फा की जड़ें कमजोर हो चुकी हैं। वहां तीन में से सिर्फ एक बची है। अगर ये छोटे से देश उग्रवाद की जड़ें हिला सकते हैं तो फिर हम क्यों नहीं? समय इसीलिए सही है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों में किसी जमाने में हिंसा में लीन कुछ संगठन अब मुख्य धारा की बात करने लगे हैं। हिंसा की खिलाफत करने लगे हैं और जनता तक उनकी गतिविधियों से आजिज आ चुकी है। कुछ गुट, कुछ उग्रवादी हमारी आन-बान-शान को अगर ललकार रहे हैं तो फिर उनका मुंह तोड़ जबाब हमें देना ही होगा। चिदंबरम ये काम कर सकते हैं। (3.1.09)
पुराना साल तो ढेरों घाव देकर गया ही, नए साल की शुरूआत तक ठीक नहीं रही। वही आतंक की जंग-वही सत्ता का बेढंगा रंग। इसे अपशकुन कहिए या पुरानी गलतियों या लापरवाहियों का फल। पहला दिन-शाम का वक्त,जश्न का माहौल और गुवाहाटी की धरती खून से लाल। वही आतंकवाद का खूनी खेल। वही खौफनाक अंदाज। शांति के दुश्मन फिर कामयाब। चारों ओर चीत्कार। मरने वाले मर गए। ढेरों अपंग हो गए। उनके लिए,उनके परिवारों के लिए तो निश्चित रूप से यह साल सबसे मनहूस साबित हो ही गया। आगे और जाने किस जगह, किसके साथ, क्या होगा यह कोई नहीं जानता सिवाय कुदरत के या फिर उग्रवादियों या आतंकवादियों के। कम से कम केंद्र सरकार या राज्य सरकारें तो कतई नहीं जानती। ना उनका खुफिया तंत्र ये जानता या जानने की कोशिश करता कि आखिर मौत के सौदागरों का अगला निशाना कब, कौन और कहां होगा? अगर वे जानते या जानने की कोशिश करते तो पिछले साल असम में 28 बम धमाकों की वारदात की संख्या जरूर कम होती। अगर वे जानते तो साल के पहले दिन उल्फा उग्रवादी खून न बहाते। साल का पहला दिन हो और उग्रवादी तीन-तीन जगह धमाके कर जाएं, गृहमंत्री चंद मिनट पहले शहर में आए हों और उग्रवादी खुलेआम चुनौती दे जाएं क्या ये हमारी कमजोरी को नहीं दर्शाते? क्या ये अपनी ताकत का इजहार नहीं करते? क्या ये देश की एकता और अखंडता पर वार नहीं करते? हकीकत यही है कि इस विशाल देश के चारों छोर और हर मोड़ पर जिस तरह आए दिन उग्रवादी और आतंकवादी खूनी खेल खेल रहे हैं वो यह जरूर दर्शाता है कि कहीं न कहीं समय पर हम फैसले नहीं कर पाते। कर लेते हैं तो उनका क्रियान्वयन नहीं कर पाते। उग्रवादियों और आतंकवादियों को पैदा करने वाली जमीन को बंजर नहीं कर पाते। कभी पाकिस्तान की ओर से भारत की जमीन पर खून की होली खेली जाती है, कभी बांग्लादेश की ओर से। हम बस देखते रहते हैं। मार के बाद पुकार में लीन हो जाते हैं। कुछ दिन के शोर के बाद खामोश हो जाते हैं। नींद फिर किसी हमले या वारदात के बाद ही टूटती है। फिर वही सीन। बस हम बीमारी को रोकने की कोशिश करते हैं, उसे जड़ मूल से मिटाने की सोचते तक नहीं। करना तो बहुत दूर की बात है। इस ब्लास्ट से एक बार फिर साबित हो गया है कि जब तक उग्रवादियों और आतंकवादियों के अड्डे ध्वस्त नहीं किये जाते, कोई यह दावा नहीं कर सकता कि अब कहीं खून नहीं बहेगा। कोई नहीं मरेगा। अमन रहेगा। मुंबई पर हमले के बाद चिदंबरम ने घर के मुखिया का पद लिया था। देश में हंगामा हुआ। नेताओं पर निशाने साधे गए। ठंड में संसद तक गरम रही। देश में चौकसी के तमाम बंदोबस्त किए गए। सारे देश में सुरक्षा का जाल बिछाया गया। तमाम वादे और इरादे दिखाए गए। जनता को एहसास कराया गया कि अब कहीं आसानी से कुछ नहीं होगा। हर साजिश विफल हो, केंद्र की पकड़ हो, इसके वास्ते खुफिया एजेंसी का पुनर्गठन हुआ। उसकी बैठक चिदंबरम कई बार ले चुके हैं। पहली जनवरी को गुवाहाटी के लिए उड़ने से पहले उन्होंने बैठक ली। विश्वास जताया कि सब ठीक हो जायेगा। दो माह पहले हुए धमाकों की जांच के लिए वे गुवाहाटी उतरते ही थे कि उल्फा उग्रवादियों ने तीन धमाके कर डाले। नए मुखिया को पहली सीधी सलामी। गए थे जांच करने, जाना पड़ा घायलों को देखने अस्पताल। उन्होंने दो टूक कहा-उग्रवादियों के खिलाफ अब निर्णायक जंग होगी। राजनीति की गिरावट के इस दौर में भी चिंदबरम उन राजनेताओं में से एक हैं जिनके शब्दों की विश्वसनीयता बची है। उम्मीद यही जतायी जानी चाहिए कि या तो उग्रवादी रास्ते पर आएंगे या देश उन्हें नेस्तानाबूद करेगा। असम अरसे से उल्फा की मार का शिकार सभी पूर्वोत्तर राज्यों में इस उग्रवादी संगठन का एक समय दबदबा रहा है। धीरे-धीरे जब दबाव बढ़ा तो इसकी जड़े कमजोर होने लगी। लेकिन पड़ौसी देश बांग्लादेश इसकी शरणस्थली बन गया। इस बार के हमले में उल्फा की 709 बटालियन का हाथ माना जा रहा है। इसका आधार बांग्लादेश है। हमारा सीमा प्रबंधन कमजोर है। आए दिन कोई बांग्लादेश की तरफ से घुस आता है। या चला जाता है। पूववर्ती खालिदा जिया की सरकार के विरोधी रूख के कारण इस विंग को वहां पनाह मिली और खाद-पानी भी-न खालिदा सरकार ने उन्हें टोका और न ही आपातकाल में पनपी सरकार ने। इस बार धमाके कर उन्होंने यह जाहिर करने की कोशिश की है कि राज चाहे किसी का हो, हम पर कोई फर्क नहीं पड़ता। ये धमाके शेख हसीना को भी चुनौती है। उन्होंने कहा है कि उनकी धरती से किसी को आतंकवाद फैलाने की छूट नहीं दी जा सकती। शेख हसीना के सत्ता में आने के बाद ये उम्मीद जगी है कि हिंदुस्तान के कूटनीतिक दबाव के बाद इस उल्फा बटालियन का बेस कैंप वहां ध्वस्त होगा। अगर शेख हसीना कट्टरपंथियों के सामने नहीं झुकी और अपने वादे पर कायम रहीं तो यह माना जा सकता है कि पूर्वोत्तर में आने वाले समय में इतना खून खराबा नहीं होगा। हां इसके लिए हिंदुस्तान सरकार को न केवल अपना दबाव और ज्यादा बढ़ाना होगा बल्कि सीमा पर पहरा और कड़ा करना होगा ताकि उग्रवादी घसुपैठ बंद हो। उग्रवादियों को खत्म किया जा सकता है और काबू में लाया जा सकता है-भूटान इसका सबसे अच्छा उदाहरण है। उसने उल्फा के खिलाफ 2003 में जंग छेड़ी थी नतीजा वहां उल्फा की 27 वीं बटालियन का कोई नाम लेवा तक नहीं है। म्यांमार में उल्फा की जड़ें कमजोर हो चुकी हैं। वहां तीन में से सिर्फ एक बची है। अगर ये छोटे से देश उग्रवाद की जड़ें हिला सकते हैं तो फिर हम क्यों नहीं? समय इसीलिए सही है क्योंकि पूर्वोत्तर राज्यों में किसी जमाने में हिंसा में लीन कुछ संगठन अब मुख्य धारा की बात करने लगे हैं। हिंसा की खिलाफत करने लगे हैं और जनता तक उनकी गतिविधियों से आजिज आ चुकी है। कुछ गुट, कुछ उग्रवादी हमारी आन-बान-शान को अगर ललकार रहे हैं तो फिर उनका मुंह तोड़ जबाब हमें देना ही होगा। चिदंबरम ये काम कर सकते हैं। (3.1.09)
हडताल की पड़ताल
देशपाल सिंह पंवार
जिस देश की सीमाओं पर चारों ओर दुश्मन हो,रोज जंग का खतरा मंडराता हो, हर पल आतंकवाद या नक्सलवाद का खूनी खेल खेला जाता हो, धर्म के नाम पर ठेकेदार जहर फैलाते हों, वोट के नाम पर नेता चोट पहुंचाते हों, बेईमानी का बोलबाला हो, हर ईंट के नीचे घोटाला हो, करोड़ों बीमारों का तबेला हो, गरीबों से पटा मेला हो, मंदी का साया फैला हो, बेरोजगारों का बढ़ता रेला हो, समस्याओं का झमेला हो,पैसे का संकट बढ़ रहा हो, विकास दर मरती जा रही हो, महंगाई घटती जा रही हो, डिफ्लेशन का खतरा गहरा रहा हो, दो वक्त की रोटी दूर होती नजर आ रही हो, जीना दुश्वार दिखाई दे रहा हो ऐसे समय में देश को बचाने की जरूरत होती है। राजनेताओं से कठोर फैसलों की दरकार होती है। राजधर्म पर चलने की आस होती है। हर शख्स से राष्ट्रधर्म के जज्बे की उम्मीद होती है । देश के लिए कुर्बानी की जरूरत होती है। अनेकता को एकता में बदलने की जरूरत होती है। समूचे राष्ट्र को एक होने की जरूरत होती है लेकिन ऐसे समय में हर कोई मनमर्जी से कर रहा है पड़ताल और चल रही है हड़ताल। जो लाखों रूपये हर माह लेते हैं वे हड़ताल कर रहे हैं, जिनके हाथों में जिंदगी की रेखा की कमान है वे हड़ताल पर हैं । ये हड़ताल कर रहे हैं और बाकी सोच रहे हैं, देर सबेर वे करेंगे हड़ताल। तेल के बिना देश की व्यवस्था का खेल बिगड़ गया है, उनका हड़ताल से मेल है। गैस के बिना हर भूखे पेट में गैस पैदा होने लगी है, वे हड़ताल पर हैं। दवा के संकट से बीमार मरेंगे, उन्हें हड़ताल से प्यार है। बच्चों को सब्जी नसीब नहीं होगी, उन्हें हड़ताल की दरकार है। किसी की जिंदगी का सवाल है तो किसी का पैसों को लेकर धमाल है। तेल अधिकारी ज्यादा वेतन मांग रहे हैं। ट्रक आपरेटर डीजल की कम कीमत देना चाह रहे हैं। बस इसी बात को लेकर है ये हड़ताल। सरकार संकट में है। देश संकट में है। जनता संकट में है। तेल अधिकारी और ट्रक आपरेटर अपनी मांग को जायज ठहरा सकते हैं लेकिन कड़वा सच यही है कि हड़ताल के समय को जायज नहीं ठहराया जा सकता। जनता को होने वाले संकट को जायज नहीं ठहराया जा सकता। लाख टके का सवाल यह है कि क्या ऐसे आपात समय में देश में हड़ताल पर रोक नहीं होनी चाहिए? 2008 जिस तरह से सारी दुनिया और देश को चोट देकर गया सब जानते हैं। बुझे दिल से किसी जादुई चमत्कार की आस में सारी जनता ने इस साल का स्वागत किया था लेकिन पांच दिन नहीं गुजरे कि दुखों के काले साये और गहरा गए। सारे देश पर कोहरा छाया हुआ है।सत्यम ने सारी दुनिया में नाक कटवा दी है। हर कोई हमें अविश्वास की नजर से देख रहा है। हजारों लोग बेरोजगार होने के कगार पर हैं। करोड़ों निवेशक तबाह हो गए हैं। अरबों रुपये की चोट लगी है। ऐसे समय में देश हड़ताल की गिरफ्त में है। ऊपर वाले का ही यह प्रकोप है। करनी किसी की और झेलनी पड़ रही है जनता को। ट्रक आपरेटर चार दिन से हड़ताल पर हैं। वे चाहते हैं कि डीजल की दर 10 रुपये घटायी जाए,टोल टैक्स खत्म हो, सर्विस टेक्स के एग्रीमेंट पर अमल हो, साथ ही सरकार डीजल की दरों पर श्वेत पत्र लाए। उनके पास अपनी मांगों को जायज ठहराने के लिए तर्क हैं। उनके निशाने पर तेल कंपनियां हैं। उनका दावा है कि तेल कंपनियां सत्यम की तरह अपने खातों में हेराफेरी कर घाटा दिखाती हैं जिसका खामियाजा ट्रक आपरेटरों को उठाना पड़ता है। वे सरकार से इसकी जांच चाहते हैं। अगर उन्होंने आरोप लगाए हैं तो सरकार को जांच करानी चाहिए। सत्यम के बाद तो यह और जरूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी नजर आए। पर इस हड़ताल ने जिस तरह सारे देश और जनता को बेहाल कर दिया है। पेट्रोल की राशनिंग होने लगी हो, पेट्रोल पंप सूखे नजर आने लगे हो, सड़कों से वाहन नदारद होने लगे हों, सब काम अटकने लगे हों, गैस-दवा, सब्जी और जिंदगी के लिए जरूरी अन्य सामान की किल्लत नजर आने लगी हो तो इसमें उस जनता का क्या दोष? इस पर जरूर ट्रक आपरेटरों को सोचना चाहिए। सरकार इस हड़ताल को सख्ती से कुचलेगी या फिर ट्रक आपरेटरों की बात मानेगी, एक न एक दिन तो ये खत्म होगी लेकिन इतने दिनों की हड़ताल को हिसाब कौन देगा? जनता के दुख का हर्जाना कौन भरेगा ? ट्रकों पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के घरों में चूल्हे नहीं जलेंगे, बच्चे बिलबिलायेंगे इसका हिसाब कौन देगा? जनता को सरकार से उम्मीद है। ट्रक आपरेटरों को सरकार से उम्मीद है। अगर सरकार को ये पता था कि हड़ताल का देश और जनता पर इतना गहरा असर पड़ेगा तो उसने सारे बंदोबस्त समय पर क्यों नहीं किए? इसका हिसाब कौन देगा? लोकतंत्र की यही त्रासदी है कि जिस जनता पर यह टिका हुआ है उसके प्रति किसी की जवाबदेही नहीं होती। अगर होती तो हड़ताल पर ट्रक आपरेटरों को जाने की नौबत नहीं आती, आती तो उससे पहले सरकार सारे बंदोबस्त कराती। सरकार अब जो करे लेकिन उसके पास न तो कोई जवाब है, हिसाब तो बहुत दूर की बात है। चाहे सरकार सख्ती कर रही हो पर जिस तरह जनता में हाहाकार है उससे कम से कम ट्रक आपरेटर हड़ताल का तो बेड़ा पार है। छत्तीसगढ़ में चावल मिलों की हड़ताल है। उनके मालिक घटते मुनाफे का रोना रो रहे हैं। उनकी मांग एक बार जायज ठहरायी जा सकती है लेकिन 14 तेल कंपनियों के उन 55हजार अफसरों के हड़ताल पर जाने की कोई तुक समझ में नहीं आती। वे अच्छा खासा वेतन और सुविधाएं पाते हैं लेकिन इतने पर उन्हें बस नहीं है,और चाहिए। उनका तर्क है-अतंर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर उनके वेतन घटे थे अब दाम कम हो गए हैं तो उनका वेतन बढ़ना चाहिए। वे केंद्रीय कर्मचारियों की तरह महंगाई भत्ता बेसिक में मर्ज कराना चाहते हैं 1 जनवरी 2005 से। वे केंद्र सरकार को झूठा ठहरा रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि वादा करके सरकार पलट गयी अगर उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो उन्हें इसी वेतन पर दस साल काम करना होगा जो उन्हें गंवारा नहीं। सरकार पर उन्होंने दबाव बढ़ाया है। उनके कब्जे में देश की रीढ़ है जाहिर सी बात है कि सरकार को उनके सामने झुकना होगा। मांगे मानी जायेंगी। खजाने से धन जायेगा, जिसे जनता की जेब से वसूला जायेगा। देश के हालात विकट है। ऐसे में सरकार को फिर से अपनी सारी नीतियों पर विचार की जरूरत है। चीजों के दाम घटते जा रहे हैं। महंगाई नीचे की ओर है। डिफ्लेशन का खतरा सिर पर है। देश को बचाने के लिए फिर से वेतन की समीक्षा होनी चाहिए। राज्य और केंद्रीय कर्मचारियों के कैडर का अंतर मिटना चाहिए। एक समान रैंक - एक समान वेतन। देश को बचाने के लिए अगर सरकार को सख्ती करनी पड़े तो होनी चाहिए । सबको खुद समझना चाहिए देश पहले है। अगर वही नहीं रहा तो कैसी वेतन बढ़ोत्तरी और उसके लिए कैसी हड़ताल? (9.1.09)
जिस देश की सीमाओं पर चारों ओर दुश्मन हो,रोज जंग का खतरा मंडराता हो, हर पल आतंकवाद या नक्सलवाद का खूनी खेल खेला जाता हो, धर्म के नाम पर ठेकेदार जहर फैलाते हों, वोट के नाम पर नेता चोट पहुंचाते हों, बेईमानी का बोलबाला हो, हर ईंट के नीचे घोटाला हो, करोड़ों बीमारों का तबेला हो, गरीबों से पटा मेला हो, मंदी का साया फैला हो, बेरोजगारों का बढ़ता रेला हो, समस्याओं का झमेला हो,पैसे का संकट बढ़ रहा हो, विकास दर मरती जा रही हो, महंगाई घटती जा रही हो, डिफ्लेशन का खतरा गहरा रहा हो, दो वक्त की रोटी दूर होती नजर आ रही हो, जीना दुश्वार दिखाई दे रहा हो ऐसे समय में देश को बचाने की जरूरत होती है। राजनेताओं से कठोर फैसलों की दरकार होती है। राजधर्म पर चलने की आस होती है। हर शख्स से राष्ट्रधर्म के जज्बे की उम्मीद होती है । देश के लिए कुर्बानी की जरूरत होती है। अनेकता को एकता में बदलने की जरूरत होती है। समूचे राष्ट्र को एक होने की जरूरत होती है लेकिन ऐसे समय में हर कोई मनमर्जी से कर रहा है पड़ताल और चल रही है हड़ताल। जो लाखों रूपये हर माह लेते हैं वे हड़ताल कर रहे हैं, जिनके हाथों में जिंदगी की रेखा की कमान है वे हड़ताल पर हैं । ये हड़ताल कर रहे हैं और बाकी सोच रहे हैं, देर सबेर वे करेंगे हड़ताल। तेल के बिना देश की व्यवस्था का खेल बिगड़ गया है, उनका हड़ताल से मेल है। गैस के बिना हर भूखे पेट में गैस पैदा होने लगी है, वे हड़ताल पर हैं। दवा के संकट से बीमार मरेंगे, उन्हें हड़ताल से प्यार है। बच्चों को सब्जी नसीब नहीं होगी, उन्हें हड़ताल की दरकार है। किसी की जिंदगी का सवाल है तो किसी का पैसों को लेकर धमाल है। तेल अधिकारी ज्यादा वेतन मांग रहे हैं। ट्रक आपरेटर डीजल की कम कीमत देना चाह रहे हैं। बस इसी बात को लेकर है ये हड़ताल। सरकार संकट में है। देश संकट में है। जनता संकट में है। तेल अधिकारी और ट्रक आपरेटर अपनी मांग को जायज ठहरा सकते हैं लेकिन कड़वा सच यही है कि हड़ताल के समय को जायज नहीं ठहराया जा सकता। जनता को होने वाले संकट को जायज नहीं ठहराया जा सकता। लाख टके का सवाल यह है कि क्या ऐसे आपात समय में देश में हड़ताल पर रोक नहीं होनी चाहिए? 2008 जिस तरह से सारी दुनिया और देश को चोट देकर गया सब जानते हैं। बुझे दिल से किसी जादुई चमत्कार की आस में सारी जनता ने इस साल का स्वागत किया था लेकिन पांच दिन नहीं गुजरे कि दुखों के काले साये और गहरा गए। सारे देश पर कोहरा छाया हुआ है।सत्यम ने सारी दुनिया में नाक कटवा दी है। हर कोई हमें अविश्वास की नजर से देख रहा है। हजारों लोग बेरोजगार होने के कगार पर हैं। करोड़ों निवेशक तबाह हो गए हैं। अरबों रुपये की चोट लगी है। ऐसे समय में देश हड़ताल की गिरफ्त में है। ऊपर वाले का ही यह प्रकोप है। करनी किसी की और झेलनी पड़ रही है जनता को। ट्रक आपरेटर चार दिन से हड़ताल पर हैं। वे चाहते हैं कि डीजल की दर 10 रुपये घटायी जाए,टोल टैक्स खत्म हो, सर्विस टेक्स के एग्रीमेंट पर अमल हो, साथ ही सरकार डीजल की दरों पर श्वेत पत्र लाए। उनके पास अपनी मांगों को जायज ठहराने के लिए तर्क हैं। उनके निशाने पर तेल कंपनियां हैं। उनका दावा है कि तेल कंपनियां सत्यम की तरह अपने खातों में हेराफेरी कर घाटा दिखाती हैं जिसका खामियाजा ट्रक आपरेटरों को उठाना पड़ता है। वे सरकार से इसकी जांच चाहते हैं। अगर उन्होंने आरोप लगाए हैं तो सरकार को जांच करानी चाहिए। सत्यम के बाद तो यह और जरूरी है ताकि दूध का दूध और पानी का पानी नजर आए। पर इस हड़ताल ने जिस तरह सारे देश और जनता को बेहाल कर दिया है। पेट्रोल की राशनिंग होने लगी हो, पेट्रोल पंप सूखे नजर आने लगे हो, सड़कों से वाहन नदारद होने लगे हों, सब काम अटकने लगे हों, गैस-दवा, सब्जी और जिंदगी के लिए जरूरी अन्य सामान की किल्लत नजर आने लगी हो तो इसमें उस जनता का क्या दोष? इस पर जरूर ट्रक आपरेटरों को सोचना चाहिए। सरकार इस हड़ताल को सख्ती से कुचलेगी या फिर ट्रक आपरेटरों की बात मानेगी, एक न एक दिन तो ये खत्म होगी लेकिन इतने दिनों की हड़ताल को हिसाब कौन देगा? जनता के दुख का हर्जाना कौन भरेगा ? ट्रकों पर काम करने वाले दिहाड़ी मजदूरों के घरों में चूल्हे नहीं जलेंगे, बच्चे बिलबिलायेंगे इसका हिसाब कौन देगा? जनता को सरकार से उम्मीद है। ट्रक आपरेटरों को सरकार से उम्मीद है। अगर सरकार को ये पता था कि हड़ताल का देश और जनता पर इतना गहरा असर पड़ेगा तो उसने सारे बंदोबस्त समय पर क्यों नहीं किए? इसका हिसाब कौन देगा? लोकतंत्र की यही त्रासदी है कि जिस जनता पर यह टिका हुआ है उसके प्रति किसी की जवाबदेही नहीं होती। अगर होती तो हड़ताल पर ट्रक आपरेटरों को जाने की नौबत नहीं आती, आती तो उससे पहले सरकार सारे बंदोबस्त कराती। सरकार अब जो करे लेकिन उसके पास न तो कोई जवाब है, हिसाब तो बहुत दूर की बात है। चाहे सरकार सख्ती कर रही हो पर जिस तरह जनता में हाहाकार है उससे कम से कम ट्रक आपरेटर हड़ताल का तो बेड़ा पार है। छत्तीसगढ़ में चावल मिलों की हड़ताल है। उनके मालिक घटते मुनाफे का रोना रो रहे हैं। उनकी मांग एक बार जायज ठहरायी जा सकती है लेकिन 14 तेल कंपनियों के उन 55हजार अफसरों के हड़ताल पर जाने की कोई तुक समझ में नहीं आती। वे अच्छा खासा वेतन और सुविधाएं पाते हैं लेकिन इतने पर उन्हें बस नहीं है,और चाहिए। उनका तर्क है-अतंर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने पर उनके वेतन घटे थे अब दाम कम हो गए हैं तो उनका वेतन बढ़ना चाहिए। वे केंद्रीय कर्मचारियों की तरह महंगाई भत्ता बेसिक में मर्ज कराना चाहते हैं 1 जनवरी 2005 से। वे केंद्र सरकार को झूठा ठहरा रहे हैं और तर्क दे रहे हैं कि वादा करके सरकार पलट गयी अगर उनकी मांगे नहीं मानी गयी तो उन्हें इसी वेतन पर दस साल काम करना होगा जो उन्हें गंवारा नहीं। सरकार पर उन्होंने दबाव बढ़ाया है। उनके कब्जे में देश की रीढ़ है जाहिर सी बात है कि सरकार को उनके सामने झुकना होगा। मांगे मानी जायेंगी। खजाने से धन जायेगा, जिसे जनता की जेब से वसूला जायेगा। देश के हालात विकट है। ऐसे में सरकार को फिर से अपनी सारी नीतियों पर विचार की जरूरत है। चीजों के दाम घटते जा रहे हैं। महंगाई नीचे की ओर है। डिफ्लेशन का खतरा सिर पर है। देश को बचाने के लिए फिर से वेतन की समीक्षा होनी चाहिए। राज्य और केंद्रीय कर्मचारियों के कैडर का अंतर मिटना चाहिए। एक समान रैंक - एक समान वेतन। देश को बचाने के लिए अगर सरकार को सख्ती करनी पड़े तो होनी चाहिए । सबको खुद समझना चाहिए देश पहले है। अगर वही नहीं रहा तो कैसी वेतन बढ़ोत्तरी और उसके लिए कैसी हड़ताल? (9.1.09)
सपनों से दूर
देशपाल सिंह पंवार
देश में आबादी खूब है। गरीबी खूब है। अमीरी खूब है। हर तबके के लिए मनोरंजन खूब हैं। सस्ते और महंगे साधन खूब हैं। हर बोली में फिल्में बनती खूब हैं। पिटती खूब हैं। चलती खूब हैं। अच्छे निर्देशक खूब हैं। कमजोर निर्देशक खूब हैं। बालीवुड की फिल्में कमाई चाहे खूब करती हों पर एक बात तय है कि ऐसी फिल्मों की संख्या खूब नहीं है जिन्हें अच्छी फिल्में कहा जा सके। हकीकत यही है कि देश में अच्छी फिल्मों की नींव में थीम का दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं। जो फिल्म जितना ज्यादा धंधा करे वो उतनी ही अच्छी। अच्छी को आर्ट फिल्मों की श्रेणी में डाल दिया जाता है और कमाऊ फिल्मों को दौलत के असर से बेहतरीन साबित कर दिया जाता है। कमाऊ फिल्में चाहे आज तक हजारों बन गई हों,उनके नाम तक सबको याद हों पर कड़वा सच यही है कि जितने साल से यह धंधा चल रहा है उतनी फिल्में यह उद्योग आज तक ऐसी नहीं दे पाया जिन्हें यह कहा जा सके कि ये हैं सबसे बेहतरीन चलचित्र। ये है आम आदमी का दर्द। ये है आम आदमी की संवेदनाएं। ये है आम आदमी के सपने। ये है आम आदमी की पसंद। यदा-कदा ऐसी फिल्में आती हैं। न आने का पता चलता और न ही उनके हटने का। नाम याद रहना या रखना तो दूर की बात है। वे बस नाम के लिए आती हैं। इतिहास में दर्ज होने के लिए बनती हैं। समीक्षकों की तीखी नजर (?) के लिए ही सिनेमाघरों में लगती हैं। सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल के इस देश में मनोरंजन के नाम पर जो दिखाया जाता है और जो देखा जाता है उसे क्या कहा जाए? लाख टके का सवाल यही है कि देश के निर्देशक क्या दिखाना चाहते हैं और देश के दर्शक क्या देखना चाहते हैं? शायद इस रहस्य को आज तक किसी निर्देशक ने समझने की कोशिश ही नहीं की। नतीजा सपनों की नगरी में बेढ़ंगे सपनों और औरत के शरीर की नुमाइश के सहारे तिजौरियां फुल करने की कामना फलती-फूलती रही। वे दिखाते रहे-हम देखते रहे। कारोबार चलता रहा। मनोरंजन होता रहा। यूं ही होता रहेगा। हां श्याम बेनेगल, मीरा नायर जैसे चंद निर्देशकों की जो ताशीर हैं वो लीक से हटकर आम आदमी की तस्वीर को ही उस पर्दे पर उतारेंगे जो धन से बंजर है। दर्शकों से महरूम है। वे इस सच को जानते हैं। हैरत की बात यही है कि जो आम आदमी के सपने, जो दर्द हमारे निर्देशकों को दिखाई नहीं देते वो एक विदेशी महसूस करता है। एक गोरा निर्देशक आता है। मुंबई की झोपड़ पट्टियों में जाता है। स्लम डाग मिलिनेयर नाम से वहां का सच दुनिया के सामने लाता है। रातों-रात छा जाता है। हर बड़े मंच पर अवार्ड पाता है। हमारे देश का नाम होता है। चारों ओर जयजयकार होती है। दिल से या मजबूरी से हर कोई खुश नजर आता है लेकिन एक हिंदुस्तानी होने के नाते ये कसक या ये आवाज हमारे दिल से जरूर उठ रही है कि काश ऐसी फिल्में हमारे निर्देशक बना पाते। लेकिन वे कहां से बनायेंगे? वे तो उस फैक्ट्री में काम कर रहे हैं जहां निर्माता का टार्गेट धन होता है। कहानी चाहे न हो पर धन कैसे आयेगा, इसका कागज पर पूरा ब्योरा दर्ज होता है। इसी कागज के आधार पर बिना दिल और दिमाग लगाये हमारे निर्देशक बनाते हैं मसाला फिल्में। ऐसी-ऐसी फिल्में जिनमें सारी नैतिकता दांव पर लगी नजर आती हैं। हाल में आयी एक फिल्म को ही ले लीजिए-एक पति अपनी पत्नी को ही पाने के लिए दूसरा चोला पहनता है। दूसरे मर्द की ओर उसे प्रेरित करता है। प्यार जगाता है। रिश्तों में विश्वास की धज्जियां उड़ाता है। विडम्बना देखिए-सामने हमारे संस्कारों की बलि चढ़ रही होती है और दर्शक तालियां बजा रहे होते हैं। टिकट खिड़की हाउसफुल से लदी होती है। रब ने बना दी जोड़ी हिट हो जाती है। खूब दौलत कमाती है। घरों में कहा जाता है क्या फिल्म है? जिस तरह राजनीति में पुरातन थीम अब जैसी प्रजा-वैसे राजा में बदल चुकी है उसी तरह जैसे दर्शक-वैसी फिल्म का दौर देश में अरसे से सिर चढ़कर बोल रहा है। आगे भी यूं ही उटपटांग फिल्में बनेंगी और चलेंगी लेकिन कहीं सराही जायेंगी इसकी न तो कोई गारंटी है और न ही हमारे निर्देशकों की कोई चाह है। फिलहाल हमें तारीफ करनी चाहिए स्लम डाग मिलिनेयर की- जिसने हिल्टन में चार गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतकर सबको चकित कर दिया है। इसका श्रेय अंग्रेज निर्देशक डैनी बायल को जाता है और साथ ही संगीतकार ए आर रहमान को भी,हमारे खाते में आज सारे अवार्ड है। जो कोर्ई हमारा निर्देशक तो नहीं दिला पाया पर एक विदेशी की फिल्म में रहमान के संगीत के जादू से जरूर हमारे देश में आ गया है। इसी फिल्म से इरफान जैसे अजनबी कलाकार आज स्टार हैं। जहां दिन-रात सपनों पर बुलडोजर चलते हैं उन झोपड़ पट्टियों में भी बहार है। वो मुंबई की हों या देश के दूसरे हिस्से की सब गुलजार हैं। घर लुटाकर तमाशा देखने वाली कौम की इस तस्वीर से हमारे निर्देशकों को सबक सीखने की दरकार है। काश ऐसा हो। (12.1.09)
देश में आबादी खूब है। गरीबी खूब है। अमीरी खूब है। हर तबके के लिए मनोरंजन खूब हैं। सस्ते और महंगे साधन खूब हैं। हर बोली में फिल्में बनती खूब हैं। पिटती खूब हैं। चलती खूब हैं। अच्छे निर्देशक खूब हैं। कमजोर निर्देशक खूब हैं। बालीवुड की फिल्में कमाई चाहे खूब करती हों पर एक बात तय है कि ऐसी फिल्मों की संख्या खूब नहीं है जिन्हें अच्छी फिल्में कहा जा सके। हकीकत यही है कि देश में अच्छी फिल्मों की नींव में थीम का दूर-दूर तक कोई स्थान नहीं। जो फिल्म जितना ज्यादा धंधा करे वो उतनी ही अच्छी। अच्छी को आर्ट फिल्मों की श्रेणी में डाल दिया जाता है और कमाऊ फिल्मों को दौलत के असर से बेहतरीन साबित कर दिया जाता है। कमाऊ फिल्में चाहे आज तक हजारों बन गई हों,उनके नाम तक सबको याद हों पर कड़वा सच यही है कि जितने साल से यह धंधा चल रहा है उतनी फिल्में यह उद्योग आज तक ऐसी नहीं दे पाया जिन्हें यह कहा जा सके कि ये हैं सबसे बेहतरीन चलचित्र। ये है आम आदमी का दर्द। ये है आम आदमी की संवेदनाएं। ये है आम आदमी के सपने। ये है आम आदमी की पसंद। यदा-कदा ऐसी फिल्में आती हैं। न आने का पता चलता और न ही उनके हटने का। नाम याद रहना या रखना तो दूर की बात है। वे बस नाम के लिए आती हैं। इतिहास में दर्ज होने के लिए बनती हैं। समीक्षकों की तीखी नजर (?) के लिए ही सिनेमाघरों में लगती हैं। सत्यजीत रे, श्याम बेनेगल के इस देश में मनोरंजन के नाम पर जो दिखाया जाता है और जो देखा जाता है उसे क्या कहा जाए? लाख टके का सवाल यही है कि देश के निर्देशक क्या दिखाना चाहते हैं और देश के दर्शक क्या देखना चाहते हैं? शायद इस रहस्य को आज तक किसी निर्देशक ने समझने की कोशिश ही नहीं की। नतीजा सपनों की नगरी में बेढ़ंगे सपनों और औरत के शरीर की नुमाइश के सहारे तिजौरियां फुल करने की कामना फलती-फूलती रही। वे दिखाते रहे-हम देखते रहे। कारोबार चलता रहा। मनोरंजन होता रहा। यूं ही होता रहेगा। हां श्याम बेनेगल, मीरा नायर जैसे चंद निर्देशकों की जो ताशीर हैं वो लीक से हटकर आम आदमी की तस्वीर को ही उस पर्दे पर उतारेंगे जो धन से बंजर है। दर्शकों से महरूम है। वे इस सच को जानते हैं। हैरत की बात यही है कि जो आम आदमी के सपने, जो दर्द हमारे निर्देशकों को दिखाई नहीं देते वो एक विदेशी महसूस करता है। एक गोरा निर्देशक आता है। मुंबई की झोपड़ पट्टियों में जाता है। स्लम डाग मिलिनेयर नाम से वहां का सच दुनिया के सामने लाता है। रातों-रात छा जाता है। हर बड़े मंच पर अवार्ड पाता है। हमारे देश का नाम होता है। चारों ओर जयजयकार होती है। दिल से या मजबूरी से हर कोई खुश नजर आता है लेकिन एक हिंदुस्तानी होने के नाते ये कसक या ये आवाज हमारे दिल से जरूर उठ रही है कि काश ऐसी फिल्में हमारे निर्देशक बना पाते। लेकिन वे कहां से बनायेंगे? वे तो उस फैक्ट्री में काम कर रहे हैं जहां निर्माता का टार्गेट धन होता है। कहानी चाहे न हो पर धन कैसे आयेगा, इसका कागज पर पूरा ब्योरा दर्ज होता है। इसी कागज के आधार पर बिना दिल और दिमाग लगाये हमारे निर्देशक बनाते हैं मसाला फिल्में। ऐसी-ऐसी फिल्में जिनमें सारी नैतिकता दांव पर लगी नजर आती हैं। हाल में आयी एक फिल्म को ही ले लीजिए-एक पति अपनी पत्नी को ही पाने के लिए दूसरा चोला पहनता है। दूसरे मर्द की ओर उसे प्रेरित करता है। प्यार जगाता है। रिश्तों में विश्वास की धज्जियां उड़ाता है। विडम्बना देखिए-सामने हमारे संस्कारों की बलि चढ़ रही होती है और दर्शक तालियां बजा रहे होते हैं। टिकट खिड़की हाउसफुल से लदी होती है। रब ने बना दी जोड़ी हिट हो जाती है। खूब दौलत कमाती है। घरों में कहा जाता है क्या फिल्म है? जिस तरह राजनीति में पुरातन थीम अब जैसी प्रजा-वैसे राजा में बदल चुकी है उसी तरह जैसे दर्शक-वैसी फिल्म का दौर देश में अरसे से सिर चढ़कर बोल रहा है। आगे भी यूं ही उटपटांग फिल्में बनेंगी और चलेंगी लेकिन कहीं सराही जायेंगी इसकी न तो कोई गारंटी है और न ही हमारे निर्देशकों की कोई चाह है। फिलहाल हमें तारीफ करनी चाहिए स्लम डाग मिलिनेयर की- जिसने हिल्टन में चार गोल्डन ग्लोब अवार्ड जीतकर सबको चकित कर दिया है। इसका श्रेय अंग्रेज निर्देशक डैनी बायल को जाता है और साथ ही संगीतकार ए आर रहमान को भी,हमारे खाते में आज सारे अवार्ड है। जो कोर्ई हमारा निर्देशक तो नहीं दिला पाया पर एक विदेशी की फिल्म में रहमान के संगीत के जादू से जरूर हमारे देश में आ गया है। इसी फिल्म से इरफान जैसे अजनबी कलाकार आज स्टार हैं। जहां दिन-रात सपनों पर बुलडोजर चलते हैं उन झोपड़ पट्टियों में भी बहार है। वो मुंबई की हों या देश के दूसरे हिस्से की सब गुलजार हैं। घर लुटाकर तमाशा देखने वाली कौम की इस तस्वीर से हमारे निर्देशकों को सबक सीखने की दरकार है। काश ऐसा हो। (12.1.09)
दाल में काला
देशपाल सिंह पंवार
मुंबई में जो हुआ वो सब जानते हैं। कितने मरे-किसने मारा, किसने किया ये भी सब जानते हैं। हिंदुस्तान का लगातार आंखें तरेरना, दो टूक अल्टीमेटम देना, जंग की बात करना, सीमा पर फौज लगाना तक सब जानते हैं। पाकिस्तान का मुकरना, सबूतों को झुठलाना, घुटने न टेकना,उल्टे हमें हड़काना तो सब जानते ही हैं। अमरीका का कूटनीतिक चाल चलना, हिंदुस्तान को सहलाना, पाक को नीचे से उकसाना,दुनिया के सामने बिग बास बनना भी सब जानते हैं। वही पुरानी नीति-चोर से कहना-चोरी करो और जागते रहो की पुकार करना भी सब जानते हैं लेकिन लोग यह नहीं जान पाये और शायद जान भी न पाएं कि आखिर 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ कि सारी तस्वीर ही उल्टी नजर आने लगी। सारी दाल ही काली नजर आने लगी। सारी कोशिश (?) ही सियासत नजर आने लगी। सारी रणनीति खोखली और नंगी नजर आने लगी। इस मोरचे पर हिंदुस्तान की हार नजर आने लगी। चाहे जो हो- जनता यह जरूर जानना चाहती है कि आतंकवादी दो- आतंकी कैंप ध्वस्त करो- पाकिस्तान सुधर जाओ की रट लगाने वाले, आखिरी सीमा तक जाने की धमकी देने वाले हिंदुस्तान का तीखा सुर कोयल वाणी में बदलने का राज क्या है? क्यों वह इस बात को मान गया कि जांबाजों का खून बहाने वाले आतंकवादियों पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस आधार पर यह बात उसके गले उतर गयी कि पाकिस्तान में इन पर निष्पक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस वजह से उसने डेढ़ माह में फिर उस देश के सामने घुटने टेके जिसकी वजह से भगवन बुद्ध की यह धरती बार-बार लाल होती आयी है, अपने लाल खोती आयी है। एक अरब से ज्यादा जनता और मुंबई कांड के शहीदों की आत्मा के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि आतंकवादियों के गिरोह का सरगना अपनी ही जमात के आतंकियों के केस का फैसला करेगा और ऐसी अदालत को हमारा खुला समर्थन होगा। लाख टके का सवाल यही है कि अगर कोई देश आन-बान और शान के सवाल पर अपने कदम खींच सकता है। राह बदल सकता है। यू टर्न ले सकता है तो फिर इस बात की क्या गारंटी कि कल पाकिस्तानी अदालत सारे सबूतों को खारिज कर दे और एकतरफा फैसले पर हमारी मौन सहमति नहीं होगी? जानने वाले, दुनिया पर चौधराहट चलाने वाले चाहे हमारी बात न मानें, पाकिस्तान को दोषी न मानें लेकिन कड़वा सच यही है कि उन्होंने हिंदुस्तान को ठगा और हमारी हुकूमत ने जनता को बरगलाने की कोशिश की । हमारे विदेश मंत्री की जुबान फिसली या चौतरफा उबाल का असर 24 घंटे में फिर वही सुर निकालने की कोशिश जरूर की जा रही है लेकिन फटी बांसुरी से रणभेरी का सुर नहीं निकाला जा सकता। जो हुआ जनता जानती है और मानती है कि यह सब उस अमेरिका के इशारे पर हुआ जो दिन में सच बोलने का नाटक करता है और 24 घंटे झूठ के रास्ते पर चलता है। यह सब उस गोरे देश ब्रिटेन के इशारे पर हुआ जिसने सदियों तक हमारी धरती को भी रौंदा था और हमारी अस्मिता को भी ,चाहे सरकार माने या ना माने लेकिन इस बात के कई कारण हैं कि देश बैकफुट पर कई दिनों से नजर आ रहा था। लगातार कहने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का खुला समर्थन न मिलना। फिर हाल ही में ब्रिटेन का यह कहना कि फरार को सौंपना जरूरी नहीं और उन पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अलावा बिग बास ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह सिर पर आना एक बड़ा कारण है। गुरुवार को तेजी से जिस तरह दोनों ओर घटनाक्रम चलते और बदलते रहे उसके बाद किसी प्रमाण की जरूरत नहीं रह जाती। दिन में पाकिस्तान जमात के सारे कैंप बंद करने का ऐलान करता है। सईद और लखवी समेत 124 से ज्यादा आतंकवादियों को गिरफ्तार करता है। आतंकवादियों और आतंकी ठिकानों को पनाह न देने की कसम खाता है। यह झूठा दिखावा करता है कि वो हमसे जंग नहीं चाहता। शाम होते-होते एक चैनल पर हिंदुस्तान के विदेश मंत्री बोलने लगते हैं कि वैसे तो सब आतंकी हमें मिलने चाहिए लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है और पाकिस्तान में निष्पक्ष मुकदमा चलता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। हां यह दिखावटी नहीं बल्कि पारदर्शी मुकदमा होना चाहिए। कम से कम किसी हिंदुस्तानी के गले तो यह बात नहीं उतरी कि आखिर किस देश से और किस बिना पर वो ऐसी आस लगा बैठा? हाथ से तीर निकल चुका था और सारी जनता का सीना छलनी कर गया था। बोल की तेज धार के वार तेज होने लगे। बीजेपी समेत सारी पार्टियां बिफरने लगीं। सरकार के अंदर खलबली मचना तय था । चौतरफा दबाव के बाद शुक्रवार की शाम होते-होते फिर विदेश मंत्री बोलते हैं कि उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा था। हम अपने रूख पर कायम है। लेकिन पाकिस्तान द्वारा जिस तरह कार्रवाई की गयी और हमारी ओर से बयान आया उससे तो यही लग रहा है कि किसी तीसरे की वजह से दोनों देशों के बीच खिचड़ी पक चुकी है। पाकिस्तान में जिनके सहारे सत्ता चलती है उन पर हाथ डालना, जेल भेजना , जमात पर पाबंदी लगाना और उपर से खुलेआम ऐलान करना यही बताता है कि अगर वो एक कदम पीछे हट रहा है तो हम एक कदम आगे कैसे जा सकता है? हमें तो लौटना ही पड़ेगा। फिर ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अगर ऐसा होता है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम आखिर इतना आगे जाते क्यों हैं? आखिर क्यों? (16।1.09)
मुंबई में जो हुआ वो सब जानते हैं। कितने मरे-किसने मारा, किसने किया ये भी सब जानते हैं। हिंदुस्तान का लगातार आंखें तरेरना, दो टूक अल्टीमेटम देना, जंग की बात करना, सीमा पर फौज लगाना तक सब जानते हैं। पाकिस्तान का मुकरना, सबूतों को झुठलाना, घुटने न टेकना,उल्टे हमें हड़काना तो सब जानते ही हैं। अमरीका का कूटनीतिक चाल चलना, हिंदुस्तान को सहलाना, पाक को नीचे से उकसाना,दुनिया के सामने बिग बास बनना भी सब जानते हैं। वही पुरानी नीति-चोर से कहना-चोरी करो और जागते रहो की पुकार करना भी सब जानते हैं लेकिन लोग यह नहीं जान पाये और शायद जान भी न पाएं कि आखिर 15 जनवरी को ऐसा क्या हुआ कि सारी तस्वीर ही उल्टी नजर आने लगी। सारी दाल ही काली नजर आने लगी। सारी कोशिश (?) ही सियासत नजर आने लगी। सारी रणनीति खोखली और नंगी नजर आने लगी। इस मोरचे पर हिंदुस्तान की हार नजर आने लगी। चाहे जो हो- जनता यह जरूर जानना चाहती है कि आतंकवादी दो- आतंकी कैंप ध्वस्त करो- पाकिस्तान सुधर जाओ की रट लगाने वाले, आखिरी सीमा तक जाने की धमकी देने वाले हिंदुस्तान का तीखा सुर कोयल वाणी में बदलने का राज क्या है? क्यों वह इस बात को मान गया कि जांबाजों का खून बहाने वाले आतंकवादियों पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस आधार पर यह बात उसके गले उतर गयी कि पाकिस्तान में इन पर निष्पक्ष मुकदमा चलाया जा सकता है? क्यों व किस वजह से उसने डेढ़ माह में फिर उस देश के सामने घुटने टेके जिसकी वजह से भगवन बुद्ध की यह धरती बार-बार लाल होती आयी है, अपने लाल खोती आयी है। एक अरब से ज्यादा जनता और मुंबई कांड के शहीदों की आत्मा के साथ इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है कि आतंकवादियों के गिरोह का सरगना अपनी ही जमात के आतंकियों के केस का फैसला करेगा और ऐसी अदालत को हमारा खुला समर्थन होगा। लाख टके का सवाल यही है कि अगर कोई देश आन-बान और शान के सवाल पर अपने कदम खींच सकता है। राह बदल सकता है। यू टर्न ले सकता है तो फिर इस बात की क्या गारंटी कि कल पाकिस्तानी अदालत सारे सबूतों को खारिज कर दे और एकतरफा फैसले पर हमारी मौन सहमति नहीं होगी? जानने वाले, दुनिया पर चौधराहट चलाने वाले चाहे हमारी बात न मानें, पाकिस्तान को दोषी न मानें लेकिन कड़वा सच यही है कि उन्होंने हिंदुस्तान को ठगा और हमारी हुकूमत ने जनता को बरगलाने की कोशिश की । हमारे विदेश मंत्री की जुबान फिसली या चौतरफा उबाल का असर 24 घंटे में फिर वही सुर निकालने की कोशिश जरूर की जा रही है लेकिन फटी बांसुरी से रणभेरी का सुर नहीं निकाला जा सकता। जो हुआ जनता जानती है और मानती है कि यह सब उस अमेरिका के इशारे पर हुआ जो दिन में सच बोलने का नाटक करता है और 24 घंटे झूठ के रास्ते पर चलता है। यह सब उस गोरे देश ब्रिटेन के इशारे पर हुआ जिसने सदियों तक हमारी धरती को भी रौंदा था और हमारी अस्मिता को भी ,चाहे सरकार माने या ना माने लेकिन इस बात के कई कारण हैं कि देश बैकफुट पर कई दिनों से नजर आ रहा था। लगातार कहने के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का खुला समर्थन न मिलना। फिर हाल ही में ब्रिटेन का यह कहना कि फरार को सौंपना जरूरी नहीं और उन पर पाकिस्तान में ही मुकदमा चलाया जा सकता है। इसके अलावा बिग बास ओबामा का शपथ ग्रहण समारोह सिर पर आना एक बड़ा कारण है। गुरुवार को तेजी से जिस तरह दोनों ओर घटनाक्रम चलते और बदलते रहे उसके बाद किसी प्रमाण की जरूरत नहीं रह जाती। दिन में पाकिस्तान जमात के सारे कैंप बंद करने का ऐलान करता है। सईद और लखवी समेत 124 से ज्यादा आतंकवादियों को गिरफ्तार करता है। आतंकवादियों और आतंकी ठिकानों को पनाह न देने की कसम खाता है। यह झूठा दिखावा करता है कि वो हमसे जंग नहीं चाहता। शाम होते-होते एक चैनल पर हिंदुस्तान के विदेश मंत्री बोलने लगते हैं कि वैसे तो सब आतंकी हमें मिलने चाहिए लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है और पाकिस्तान में निष्पक्ष मुकदमा चलता है तो उसे कोई आपत्ति नहीं होगी। हां यह दिखावटी नहीं बल्कि पारदर्शी मुकदमा होना चाहिए। कम से कम किसी हिंदुस्तानी के गले तो यह बात नहीं उतरी कि आखिर किस देश से और किस बिना पर वो ऐसी आस लगा बैठा? हाथ से तीर निकल चुका था और सारी जनता का सीना छलनी कर गया था। बोल की तेज धार के वार तेज होने लगे। बीजेपी समेत सारी पार्टियां बिफरने लगीं। सरकार के अंदर खलबली मचना तय था । चौतरफा दबाव के बाद शुक्रवार की शाम होते-होते फिर विदेश मंत्री बोलते हैं कि उन्होंने ऐसा तो नहीं कहा था। हम अपने रूख पर कायम है। लेकिन पाकिस्तान द्वारा जिस तरह कार्रवाई की गयी और हमारी ओर से बयान आया उससे तो यही लग रहा है कि किसी तीसरे की वजह से दोनों देशों के बीच खिचड़ी पक चुकी है। पाकिस्तान में जिनके सहारे सत्ता चलती है उन पर हाथ डालना, जेल भेजना , जमात पर पाबंदी लगाना और उपर से खुलेआम ऐलान करना यही बताता है कि अगर वो एक कदम पीछे हट रहा है तो हम एक कदम आगे कैसे जा सकता है? हमें तो लौटना ही पड़ेगा। फिर ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है। अगर ऐसा होता है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यही है कि हम आखिर इतना आगे जाते क्यों हैं? आखिर क्यों? (16।1.09)
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