मंगलवार, 30 जून 2009

लालगढ़ का असली मर्ज


देशपाल सिंह पंवार

सुरक्षाबलों ने लालगढ़ खाली करा लिया है। सरकार ने ऐलान कर दिया है कि मिशन लालगढ़ पूरा हो गया है। माओवादियों की किलेबंदी ढह गई है। सब खुश हैं सरकार की ओर से ये जताया जा रहा है। दिखाया जा रहा है। सवाल यही उठता है कि क्या वास्तव में आपरेशन लालगढ़ पूरा हो गया है? किसी इलाके को खाली कराने मात्र से आपरेशन को पूरा मान लिया जाए? यह इलाका अब शांत रहेगा इसकी क्या गारंटी है? अगर गारंटी दी जा सकती है तो सवाल यह भी पैदा होता है कि क्या वास्तव में यहां माओवादियों का राज था? कहीं यह सारा आपरेशन उद्योगपतियों को जमीन दिलाने के वास्ते निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ तो नहीं था। जिस तरह बिना किसी खून खराबे के सुरक्षा बल हर रोज आगे बढ़ते रहे और माओवादियों के खिसकने की खबरें आती रहीं उससे तो यही लगता है कि परदे के पीछे की कहानी कुछ ऐसी ही है। हो सकता है ऐसा ना हो हां अगर वास्तव में ऐसा है तो फिर लोकतंत्र और जनतंत्र के लिए इससे ज्यादा दुखदायी और शर्मनाक अध्याय कोई दूसरा नहीं हो सकता। ऐसे में सारे देश को अंधेरे में रखने के गुनाह से बंगाल सरकार नहीं बच सकती। केंद्र सरकार को इसकी गहराई से जांच करानी चाहिए। सुरक्षा बलों को लीड कर रहे अफसरों और जवानों से बेहतर इस बारे में कोई नहीं बता सकता कि आखिर कड़वा सच क्या है? सिंगूर प्रकरण की हार से तिलमिलाई बंगाल सरकार ने अगर आसानी से जमीन दिलाने के वास्ते ये सारा खेल खेला तो फिर सिंगुर जनआंदोलन को सही और लालगढ़ आंदोलन को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? जांच से ही दूध का दूध और पानी का पानी होगा। आपरेशन पूरा होने के बाद अगर यहां शांति की गारंटी नहीं दी जा सकती तो फिर कैसे मान लिया जाए कि आपरेशन पूरा हो गया है? हकीकत यही है कि इलाका खाली हुआ है। शांत नहीं। शांति तब होगी जब सरकार उस तह तक पहुंच जाएगी जिसकी वजह से ऐसे देश विरोधी हालात बने। उन समस्याओं का निदान भी होगा, विकास भी करना होगा,साथ ही यह अहसास भी कराना होगा कि सरकार आपकी है। आपके साथ है। देश आपका है। आपके हाथ ही उसे मजबूत करेंगे। जल,जंगल और जमीन को खोने वाली कौम के सामने जब जान के लाले पड़ जाते हैं तो वहीं से अविश्वास का पेड़ उग आता है। ये हालात बन आते हैं। जिस दिन सरकार इन लोगों के साथ खड़ी नजर आएगी तो ये माओवादियों की बजाय जनता नजर आएगी। जनता को भी चाहिए कि वो लोकतंत्र में मिले अधिकारों के प्रति जागरूक हो, ना कि बरगलाने और खून खराबा कराने वाली देश और विकास विरोधी ताकतों के पीछे खड़ी नजर आए। किसी भी समस्या का समाधान कभी हथियारों से नहीं हुआ। लालगढ़ या ऐसे ही किसी दूसरे गढ़ में भी नहीं हो सकता। केंद्र सरकार का आपरेशन तभी पूरा होगा जब वो मर्ज को जड़ से खत्म करेगी। वरना ऐसे तमाम लालगढ़ या तो पैदा हो गए हैं या तैयारी कर रहे हैं। प्रतिबंध जैसे कदमों से कुछ नहीं होता क्योंकि पाबंदी का असर उन पर होता है जो सरकार के अधीन हों। सरकार को उन कारकों को रोकना होगा जो लालगढ़ बना रहे हैं।

सोमवार, 29 जून 2009

समलैंगिकता-घनघोर अनैतिकता



देशपाल सिंह पंवार
दूसरी पारी में मनमोहन सरकार कुछ ज्यादा ही जल्दी में है। देश का हर मर्ज सौ दिन में खत्म करना चाहती है। ऐसा कर पाएगी इसके आसार तो बिल्कुल नहीं हैं हां हड़बड़ी में की जा रही घोषणाओं से नई गड़बड़ियां और मर्ज अलग से पैदा होने लगे हैं। यानि गए थे हरिभजन को और ओटन लगे कपास। शिक्षा के मुद्दे पर देश पहले से ही गरम था रही-सही कसर समलैंगिकता को कानूनी अमली जामा पहनाने की मंशा ने पूरी कर दी है। मनमोहन सरकार उस धारा 377 को खत्म करना चाहती है जिसे चंद साल पहले तक कोई नहीं जानता था। वकील तक नहीं। कोई जानता था तो इस पर बात करना नहीं चाहता था। कारण-इस पर सोचना और बोलना गंदा माना जाता था। यह भी हकीकत है कि ऐसे रिश्तों की वकालत करने वाले चाहे परदे के पीछे से कितना भी बोलते रहे हों और जायज ठहराने की कोशिश में लगे रहे हों लेकिन वे भी अपनी पहचान छिपाने पर ज्यादा जोर देते थे। अचानक सरकार को पता नहीं क्या सूझी कि वो इस धारा को खत्म करने की सोचने भी लगी और बोलने भी लगी। नतीजा घर तक में पहचान छिपाने वालों ने रविवार को दिल्ली की सड़कों को पाट दिया। ऐतिहासिक कल्चर के इस देश में ऐसा नंगा नाच ना तो कदापि किसी ने सुना और ना ही देखा। ना जाने इस कलयुग में और क्या -क्या देखना बाकी है? इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको आजादी है, पर इस आजादी का यह मतलब नहीं कि जिसकी जो मनमर्जी हो वो करने लगे। सेक्स से जुड़ीं हर बातें परदे के पीछे ही बेहतर रहती हैं लेकिन समलैंगिकता को परदे के पीछे तक जायज नहीं ठहराया जा सकता। लाख टके का सवाल यही है कि जिस देश में मंदी, गरीबी, बेरोजगारी, करप्शन, आतंकवाद, नक्सलवाद, अशिक्षा और दो वक्त की रोटी के जुगाड़ जैसे हजारों मुद्दे जनता तथा देश को निगलते जा रहे हों वहां की सरकार को क्या करना चाहिए? इन मुद्दों के खिलाफ जंग लड़नी चाहिए या नैतिक मूल्यों के पतन की राह खोलनी चाहिए? जिस सर्वशक्तिमान ने इस संसार की रचना की है, उसने आदमी और औरत को इन रिश्तों के लिए बनाया है,क्या उसकी बनाई रीत को बिगाड़ने का ठेका अब सरकार ने ले लिया है? आदमी का आदमी से रिश्ता और औरत का औरत से रिश्ता आखिर इससे घटिया सोच और क्या हो सकती है? वैसे भी इतिहास इस बात का गवाह है कि प्रकृति समेत उसकी जिस भी धारा को मोड़ने की इंसान ने कोशिश की उसका खामियाजा उठाना पड़ा। वह चाहे पानी का मसला हो या पर्यावरण का। सारे संकट और थपेड़े झेलने के बाद भी क्या हमारी आंख नहीं खुली? जिस पश्चिमी कल्चर की राह पर ये पीढ़ी जाना चाहती है क्या उन देशों के हश्र दिखाई नहीं देते? खैर वे देश जहां जाना चाहें जाएँ पर कम से कम हिंदुस्तान जैसे देश में इस तरह के रिश्तों के लिए ना तो कोई जगह थी, ना है और ना ही होनी चाहिए। हमारा देश आज तक सारी दुनिया को संस्कार-परिवार तथा प्यार का पहाड़ा पढ़ाता आया है क्या अब हमें उससे सीखने को यही एक घिनौना रास्ता मिला था। एक अरब से ज्यादा की आबादी में अगर उंगलियों पर गिने जाने लायक चेहरे इस गलत पर राह पर चले गए हैं तो उनके स्व हितों के लिए पूरे देश के सामाजिक ढांचे को कुर्बान नहीं किया जा सकता। इस तबके की अगर मति मारी गई थी तो सरकार को तो कम से कम दिमाग से काम लेना चाहिए था। आखिर वो क्यों इस तबके की सोच की तरह व्यवहार कर रही है? यह बात किसी के गले नहीं उतरने वाली। किसी भी धर्म के-किसी भी समाज के और किसी भी स्वस्थ मानसिकता के व्यक्ति के। सरकार की इस सोच पर अगर इतना विवाद खड़ा हो गया है तो सोचिए फैसला करने के बाद क्या होगा? फिलहाल हर धर्म के विद्वान भी खफा हैं और साथ ही हर धर्म को मानने वाली ज्यादातर आबादी भी, इन सिरफिरी अतृप्त, कुंठित मानसिकताओं वालों को छोड़कर। यह संवेदनशील मसले से ज्यादा पतनशील रास्ता है, अगर यह वैधानिक हुआ तो फिर घर, परिवार, समाज, राज्य और देश का क्या होगा ये फैसला लेने वालों को सोचना ही होगा। इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा कि ऐसी सोच को खत्म करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए पर सरकार इसे बढ़ावा देने पर तुली है। लोकतंत्र में विचारों की आजादी का ये मतलब तो नहीं था कि इश्मत चुगाई की कहानी लिहाफ के अंदर से सड़कों पर खुले आम पढ़ी-देखी और बोली जाने लगे? उस समय अंग्रेज हुकूमत ने अगर इस पर मुकदमा ठोंक दिया था तो फिर मनमोहन सरकार साथ में खड़ी क्यों नजर आती है? क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि अंग्रेजों को इंडियन समाज की ज्यादा चिंता थी? हो सकता है कि ऐसे बिगड़ी मानसिकता के चेहरे कदापि ना सुधरें पर कम से कम मनमोहन सरकार तो अपनी सोच सुधार सकती है। उसकी जिम्मेदारी देश को बेहतर चलाने की है। उसे देश को ऐसे रास्ते पर नहीं ले जाना चाहिए जो सिर्फ बर्बादी का है। ऐसा हुआ तो क्या इसे छक्कों की सरकार पुकारना गलत होगा?

शनिवार, 27 जून 2009

युवराज का राज



देशपाल सिंह पंवार
टीम इंडिया फिर क्रिकेट के मैदान में है। वेस्टइंडीज के खिलाफ उसी धरती पर चार वन डे मैच खेलेगी। युवराज और नेहरा की वजह से पहला वनडे जीत चुकी है। कोई दौरा हो और क्रिकेट प्रेमी उसके लिए उत्साहित ना हों ऐसा अमूमन कभी इंडियन क्रिकेट में हुआ नहीं है। लेकिन इस बार ऐसा ही है। लुटी-पिटी धोनी की टीम में चाहे नकली जोश हो, लेकिन क्रिकेट प्रेमियों में ना इस दौरे की कोई चर्चा है और ना ही टीम से बहुत ज्यादा उम्मीदें। युवराज छक्के जड़ें या धोनी शतक लगाएं या फिर सरदार विकेट की झड़ी लगाएं, क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में वाह-वाह की फीलिंग हिलौरे नहीं लेने वाली। इसमें हैरत की भी कोई बात नहीं है। टी-20 में सेमीफाइनल से पहले ही जिस तरह टीम इंडिया ने घुटने टेके उस वजह से क्रिकेट प्रेमियों के दिलों में नाउम्मीदी या निराशा इस कदर ला दी है कि वे अब इस टीम से बहुत ज्यादा आस नहीं कर रहे हैं। ये सारे खिलाड़ी अब कागजी शेर ही नजर आते हैं। वेस्टइंडीज दौरे पर टीम इंडिया की जीत भी उस निराशा को दूर नहीं कर सकती। हां हार इस निराशा को और बढ़ा जरूर सकती है। इंडियन क्रिकेट और कंपनियों के लिए यह निराशा आने वाले समय में घातक साबित हो सकती है। अगर टीम इंडिया टी-20 में फिर खिताब जीत जाती या फाइट करने के बाद हारती तो इस दौरे का महत्व काफी ज्यादा होता। साथ ही इस दौरे के प्रति इसलिए भी दर्शकों में ज्यादा जोश नहीं है क्योंकि सचिन, सहवाग और जहीर जैसे खिलाड़ी इस टूर पर नहीं हैं। सचिन की उम्र भले ही ढल गई हो लेकिन आज भी सब उसे खेलते देखना चाहते हैं। ऐसे में खुद सचिन और इंडियन बोर्ड को चाहिए कि वे क्रिकेट की सभी फोरम में फिट रहने पर सचिन को जरूर टीम में रखें और सचिन उनमें फिर पुरानी रंगत दिखाएं। इस स्टार की गैरमौजूदगी नकारात्मक असर छोड़ती है इस बात को क्रिकेट चलाने वालों को मान लेना चाहिए। वैसे भी वेस्टइंडीज दौरे के मैच देर रात खत्म होते हैं तब भी दर्शक टी वी से चिपके रहते पर इस बार इसके आसार ना के बराबर हैं। कम से कम इस समय इन क्रिकेटरों का खेल (?) देखने के लिए कोई अपनी नींद खराब नहीं करना चाहता। सीरिज प्रायोजित करने वाली कंपनियों को इसका डर सता भी रहा है। इस सीरिज का महत्व बस इतना सा ही माना जा रहा है कि धोनी इलेविन लगे दाग को थोड़ा साफ करने में कामयाब हो। सवाल यही उठता है कि क्या होगा? धोनी के अलावा युवराज, सरदार जैसे खिलाड़ी ही वेस्टइंडीज के विकटों पर खेले हैं बाकी ज्यादातर क्रिकेटर वहां की पिचों से वाकिफ नहीं हैं। वेस्टइंडीज के कप्तान गेल अगर ये मानते हैं कि इंडिया को हराना कदापि आसान नहीं होता तो यह भी कटु सत्य है कि वेस्टइंडीज की टीम कितनी भी कमजोर हो, घरेलू मैदानों पर उन्हें मात देना हर टीम के लिए मुश्किल होता है। आफ स्पिनर का रोल महत्वपूर्ण होगा, ऐसे में सरदार पर करिश्मे का सबसे बड़ा दारोमदार होगा। धोनी को रन बनाने ही होंगे वरना हर कोई यह मान चुका है कि वो बल्ला चलाना भूल चुका है। अगर चारों मैच इंडिया जीतता है तो शायद इस फार्मेट में कुछ इज्जत बची रहे। ऐसा आसान नहीं। यह तय है। हां युवराज ऐसी फार्म में हैं कि इस समय किसी गेंदबाज को धो सकते हैं। वही प्रेमियों को इस निराशा से उबार सकते हैं।

होमवर्क में सिब्बल कमजोर




देशपाल सिंह पंवार
आजकल देश में ना तो नौकरी का दौर है। ना ही बजट पर जोर है। ना ही घटा घनघोर है। अगर किसी बात का शोर है तो वो है बस पढ़ाई। जिसकी चर्चा पुरजोर है। कपिल सिब्बल एंड पार्टी उत्साह में सराबोर है। विरोधी फैसले से बोर हैं। हों भी क्यों नहीं। सोनिया और मनमोहन का सौ दिन का एजेंडा है। मंत्रियों पर नतीजों के दबाव का डंडा है। ऐसे में हर मंत्री का अपना-अपना फंडा है। हर किसी के हाथ में झंडा है। बिना सोचे समझे ऐलान किए जा रहे हैं जाहिर सी बात है घमासान तो होंगे ही। मानव संसाधन मंत्री ने सबको पीछे छोड़ दिया है। आजादी के बाद 62 साल में जो काम नहीं हो पाया वो 62 दिन में करना चाहते हैं। काम भी ऐसा जो ना केवल मुश्किल है पर नामुमकिन भी दिखता है। कपिल सिब्बल चाहते हैं कि दसवीं का बोर्ड ही ना रहे यानि दसवीं की परीक्षा बोर्ड की ना हो। उनकी मंशा देश में एक ही बोर्ड, एक ही तरह की शिक्षा और कोर्स रखने की है। वो स्कूली पढ़ाई-लिखाई में कायापलट करना चाहते हैं। विदेशी पूंजी निवेश के लिए इसके दरवाजे खोलना चाहते हैं। 50 करोड़ से ज्यादा की युवा पीढ़ी को स्तरीय शिक्षा देने की उनकी मंशा है। प्राथमिक और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति लाने का उनका 34 सूत्री फार्मूला है। वे मानते हैं कि इसे एक-एक कर वो लागू जरूर करेंगे। सारे नीतिगत और प्रशासनिक कदम उठाएंगे। चाहे जो हो जाए वे इसे लागू करके रहेंगे। इसके पीछे उनके अपने तर्क भी हैं। उनकी नजर में 10 वीं बोर्ड परीक्षा की वजह से छात्र भी तनाव में रहते हैं और उनके मां-बाप भी,जब 12 वीं परीक्षा बोर्ड की है ही तो फिर 10 वीं की क्या जरूरत? इस तरह छात्रों और मां-बाप को दोहरा तनाव देने की क्या जरूरत? उनकी चाह की ये राह ना तो अपनों को भा रही है और ना ही विरोधी पार्टी बीजेपी को और ना ही शिक्षा विदों को। इस तेज गरमी में सबकी आंखें लाल हैं। लाख टके का सवाल यही है कि ऐसे में फिर किस तरह, किस रास्ते से वे शिक्षा की दीक्षा के उन सुनहरी सपनों में रंग डालेंगे जो वो युवा पीढ़ी को दिखा गए हैं? इससे बड़ा सवाल ये भी है कि जिस देश की थीम अनेकता में एकता हो, ढांचा कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैला हो,हर 40 किमी पर रहन-सहन, बोलीऔर कल्चर अलहदा नजर आती हो वहां एक बोर्ड,एक शिक्षा और एक कोर्स पर फोर्स इस देश में क्रांति लेकर आएगी या फिर अशांति फैलाएगी? हर कोई मान रहा है कि यशपाल कमेटी की रिपोर्ट लागू करने से स्तर सुधरेगा लेकिन विदेशी विश्वविद्यालय पर ज्यादातर असहमत हैं। खुद कांग्रेसी इस पर खफा हैं। केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश तो खुलेआम कहते हैं कि यह घोषणाएं अव्यवहारिक हैं। जिस देश में विश्वविद्यालयों की हालत अच्छी ना हो, शिक्षकों को समय पर वेतन ना मिलता हो, शिक्षकों और इमारतों का संकट हो, बुनियादी सुविधाओं की कमी हो, वहां विदेशी विश्वविद्यालय खोलना कहां तक जायज है? वे चाहते हैं कि देशी विवि का स्तर विदेशी के बराबर अगर कपिल सिब्बल करें तो यह बड़ी बात होगी। स्कूली शिक्षा में आमूल चूल परिवर्तन की बात भी आसानी से किसी के गले नहीं उतर रही है। बीजेपी ने बिगुल बजा दिया है। शिक्षाविद और इसी महकमे के पूर्व मंत्री मुरली मनोहर जोशी ने दमदार तर्क दिए हैं, जिन्हें आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता । वे इस सोच को विनाशकारी कहते हैं। उनकी नजर में सरकार हड़बड़ी में सबसे बड़ी गड़बड़ी करने जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया है कि आखिर सिब्बल इतनी हड़बड़ी में क्यों है? वे 100 दिन के एजेंडे को ब्रह्मा की लकीर क्यों मान रहे हैं? आखिर शिक्षा का व्यापारी करण करने पर क्यों तुले हैं? वे कानून के ज्ञाता हैं फिर क्यों सबसे सलाह मश्विरा नहीं किया गया? क्यों युवा पीढ़ी को गर्त में धकेलना चाहते हैं? यह क्यों केवल बीजेपी का नहीं है, यह केवल एक शब्द नहीं है, यह तय है कि इस सोच को लागू करने से पहले इस क्यों का जवाब मनमोहन सरकार और कानूनविद कपिल सिब्बल को खोजना होगा। यह भी तय है कि जिस तरह बीजेपी ने तेवर दिखाए हैं, मनमोहन सरकार बीजेपी राज्यों में जबरन एक बोर्ड,एक शिक्षा और एक कोर्स का फार्मूला 100 दिन में तो छोड़िए अगले हजार दिनों में लागू नहीं कर पाएगी। कब लागू होगा यह तो नहीं कहा जा सकता लेकिन इस सोच ने बजट सत्र में सरकार को घेरने का एक हथियार जरूर बीजेपी तथा विपक्ष को दे दिया है। यह तय है कि बजट से ज्यादा हंगामा पढ़ाई-लिखाई पर होगा। अर्जुन सिंह के समय से भी ज्यादा। वो तो निकल गए पर सिब्बल साहब फंस गए। यह भी मुमकिन है कि अपनों और परायों के दबाव के आगे मनमोहन सिंह को ही मोरचा ना झेलना पड़ जाए। सबसे बड़ा सवाल यही उठता है कि सिब्बल की इस सोच में आखिर कितना दम है? साथ ही राज्यों से सलाह मश्विरा के बिना जल्दबाजी में ऐसा ऐलान करना और कदम उठाना कहां तक जायज है? इसमें कोई दो राय नहीं कि कोई भी देश तब और मजबूत नजर आता है जब उसकी अपनी एक बोली हो, शिक्षा हो, झंडा हो, लेकिन जिस देश में लाख प्रयास के बावजूद हिंदी अब तक सर्वमान्य राष्ट्रभाषा नहीं बन पाई, सब जगह अपनी अलख नहीं जगा पाई, सबको नहीं रूझा पाई उस देश में क्या पढ़ाई का एक कोर्स हो सकता है? हर राज्य में अपनी-अपनी बोली में पढ़ाई होती है। उसी की दुहाई होती है। दक्षिणी राज्यों में क्या उस कोर्स को थोपा जा सकता है जो उत्तरी राज्यों में चलता है? महाराष्ट्र में क्या भोजपुरी भाषा की पढ़ाई हो सकती है? हिंदी भाषी राज्यों में क्या तमिल कोर्स का हिस्सा बन सकती है? कहा जा सकता है कि पढ़ाई में भाषा नहीं कंटेंट महत्वपूर्ण हैं। लेकिन कंटेंट को पढ़ाने के लिए भी तो किसी ना किसी भाषा का उपयोग करना ही होगा। इसके लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि कंटेंट हर प्रदेश की भाषा में पढ़ाए जाएँगे यानि देश के हर राज्यों में परीक्षा के लिए अलग-अलग भाषा का प्रयोग या फिर पूरे देश में हिंदी की बजाय हर विषय की अंग्रेजी में परीक्षा। यानि पढ़ने वाले देशी और भाषा विदेशी। ऐलान के वक्त सिब्बल एंड टीम को ऐसे तमाम सवालों के जवाब जनता के सामने रखने चाहिएं थे। उनकी सोच गलत नहीं पर उसमें कमजोर होमवर्क साफ झलकता है। उन्हें पहले यह सोचना होगा कि किस तरह शिक्षा को रोजगार के साथ जोड़ा जाए? यानि जैसी क्लास-जैसे नंबर-सीधे वैसी ही नौकरी। बिना किसी अन्य आयोग या बोर्ड के। अगर यह सोच भी इसके साथ लागू हो तो फिर इस देश में निश्चित रूप से शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति आ जाएगी। मौजूदा अंग्रेजी ढांचे को बदलने की जरूरत तो है पर ऐसा ना हो कि जल्दबाजी में जो है उससे भी हाथ धो बैठें। 10 वीं बोर्ड खत्म करने से सब पास होकर आगे बढ़ेंगे-कालेज हमारे पास हैं नहीं, रोजगार हमारे पास हैं नहीं तो ऐसे में एडमिशन और नौकरी के लिए सड़क पर जो सीन होंगे,जो टेंशन होगी वो 10वीं की टेंशन से हजार गुणा ज्यादा होगी। शिक्षा वैसे भी लगन, निष्ठा और धैर्य से मिलती है। मनमोहन सरकार को धैर्य की राह नहीं छोड़नी चाहिए। युवा पीढ़ी का सवाल है। देश के फ्यूचर का सवाल है।

किंग-आउट आफ रिंग



देशपाल सिंह पंवार
चाहे आपको नाच पसंद है या नहीं। चाहे आप उसे पसंद करते थे या नहीं लेकिन 26 जून की सुबह जिसकी जब आंख खुली और जैसे ही मौत की खबर कानों में गई। मुंह से पहला शब्द यही निकला होगा-अरे। अगर उसे पसंद ना करने वालों को ऐसा झटका लग सकता है तो फिर उसके चहेते युवा वर्ग की हालत कैसी होगी,अंदाजा लगाया जा सकता है। माइकल जैक्सन उर्फ मिकाइल-मशहूर डांसर और सिंगर इस दुनिया में नहीं रहे। 35 साल से तमाम अपवाद की मिसाल व विवाद के बवाल खड़ा करने वाले इस शख्स का वही दिल धोखा दे गया जिसने इसे विवादित बनाया और बहुत सारा दुख •भी पहुंचाया। नियति यही थी। पैर पर उसका नियंत्रण था। पैरों से उसने सारी दुनिया को हिलाया। नचाया। गंवाया। अपना बनाया। दिल पर काबू नहीं था। वो •भी जानता था। सब जानते थे। वही दिल उसे अपने साथ ले गया। पैर कुछ नहीं कर पाए। दिल के सामने हार गए। डाक्टर भी हार गए। मौत के सामने जिंदगी ने घुटने टेक दिए। इस दिल के सामने उसके फैन भी मजबूर हैं। गमगीन हैं। वो जब तक जिंदा रहा। हमेशा चर्चा में रहा। अपने डांस और गीत के कारण। बच्चों के साथ यौन संबंध के कारण। दिवालिया घोषित करने के कारण। दो बार शादी करने के कारण। घोषित रूप से आधा दर्जन से ज्यादा महिलाओं से रिश्ते बनाने के कारण। वाल, थ्रिलर,बैड और डेंजरस जैसी एल्बम के कारण। 75 करोड़ से अधिक प्रतियों के बिकने के कारण।13 ग्रैमी अवार्ड के कारण। इस्लाम धर्म कबूलने के कारण। आए दिन की हरकतों के कारण। जिंदा रहने के कारण। इस तरह मरने के कारण। जिंदगी ने भले ही साथ छोड़ दिया हो लेकिन चर्चा ने साथ नहीं छोड़ा। चर्चा हो रही है कि यह सामान्य मौत नहीं है। कोई ना कोई तो रहस्य है। आखिर इस सुपर स्टार को जब दिल का दौरा पड़ा तो कोई उसके पास क्यों नहीं था? चर्चा यह भी है कि अमरीका जैसे देश में डाक्टर अस्पताल तक जैक्सन को सकुशल क्यों नहीं ले जा पाए? उसके प्रशंसकों को जैसे ही दिल के दौरे की खबर मिली तो रीगन अस्पताल के बाहर लोग बेकाबू रही। बाहर तो सुरक्षा के सारे बंदोबस्त हो गए लेकिन अंदर डाक्टर फेल हो गए। खोई हुई सांस को वो नहीं लौटा पाए। यमराज के आगे वो हार गए। मौत ही सबसे बड़ा सत्य है। इसे जैक्सन के प्रशंसकों को स्वीकारना ही होगा। जैक्सन की मौत हुई है लेकिन जो वो दे गए, वो हमेशा उसके चहेतों के दिलों पर राज करती रहेगा। उसकी मौत के साथ ही वे सारे विवाद भी दफन हो जाएंगे जो जिंदगी के संग-संग चल रहे थे। ईश्वर ने उसे सब कुछ दिया लेकिन एक इच्छा अधूरी लिए ही वो चला गया। लंदन में अगले माह फिर शो करने की। 50 शो के जरिए सारी दुनिया को ये दिखाने की-जैक्सन अभी मरा नहीं, बेताज बादशाह था, है और रहेगा। पर होनी के आगे किसकी चलती है। महज 50 साल की उम्र में आखिरी इच्छा साथ लिए वो परलोक चला गया। रह गई हैं तो सिर्फ यादें जो कभी नहीं मिट सकती। मर सकती।

सोमवार, 22 जून 2009

जान के नाम पर घमासान




देशपाल सिंह पंवार
जिस जल,जंगल और जमीन पर हक पाने को कुछ सिरफिरों ने दशकों पहले आंदोलन का रास्ता अपनाया था,गरीबों को उकसाया था,सरकारी व्यवस्था को निशाना बनाया था,हथियारों से नया जमाना लाने का इरादा जताया था,वह आंदोलन और उसे चलाने वाले नक्सली संगठन अब पूरी तरह उसी जल, जंगल और जमीन को मटियामेट करते जा रहे हैं। हैरत इस बात की है कि फिर भी जनता इनके गलत इरादों को नहीं •भांप पा रही है। उसे समझा और सिखा दिया गया है कि अब जान के लिए झगड़ा है। जिंदा रहने का सवाल है। हर रोज बारूदी सुरंगों से जमीन का सीना फटता जा रहा है। खून से उसी जमीन का दामन रंगता जा रहा है। इस पागलपन से जल भी लाल हो गया है और जंगल भी धमाकों से उजड़ते जा रहे हैं। इतना ही नहीं इन जंगलों में बसेरा करने वाले पक्षी कब के डर कर जा चुके हैं और जानवर भी मौत के डर से नया ठिकाना तलाश रहे हैं। हैरत की बात यही है कि रोजाना के धमाकों से अपना ही सब कुछ लूटते जनता देख रही है, फिर भी खामोश है। छत्तीसगढ़ हो या दूसरे राज्यों के नक्सल प्रभा वित क्षेत्र। सब जगह जमीन में नक्सलियों ने बारूद बिछा दिया है। पता नहीं,कब, कहां किसका पैर पड़े और यमराज की गाज आ गिरे। आए दिन तमाम मां के लाल छिन रहे हैं। औरतें विधवा हो रही हैं। जवान शहीद हो रहे हैं। दंतेवाड़ा की सीमा के पास तोंगपाल थाने के कोकावाड़ा में शनिवार की शाम यही कायराना हरकत फिर नक्सलियों ने की। सीआरपीएफ के जवानों से अटे ट्रक को बारूदी विस्फोट से उड़ा दिया। एक दर्जन जवान शहीद हो गए। इतने ही घायल अस्पताल में मुश्किल से सांस ले रहे हैं। आखिर ये कैसा खूनी खेल है? किसके लिए वे खून बहा रहे हैं? जहां मिट्टी की सौंधी गंध बारूद की बदबू में बदल चुकी हो, जहां की हवा में धमाकों का जहर घुल चुका हो, वहां वो कौन सा हवामहल खड़ा करना चाहते हैं? जब कुछ बचेगा ही नहीं तो फिर क्या पाने के वास्ते ये पागलपन की जंग लड़ी जा रही है। ऐसी कायराना हरकतों की देश के हर शख्स को तीव्र निंदा करनी चाहिए। इन इलाकों में रहने वाली जनता को भी अब ऐसे सिरफिरों को सबक सीखाने के लिए मोरचा ले लेना चाहिए। सरकार को भी चाहिए कि वो अब हथियार डालने का इन नक्सली संगठनों को आखिरी मौका दे और तय सीमा निकलने के बाद इनके खात्मे के वास्ते निर्णायक जंग लड़े। बातों से शायद ही इनकी समझ में समाज बड़ा है, राज्य बड़ा है और सबसे ज्यादा देश बड़ा है कि बात समझ में आएगी। सीमा के अंदर गदर कर रही इन ताकतों को एक बार नेस्तानाबूद करना ही होगा। तरक्की के रास्ते में ये सबसे बड़ा रोड़ा हैं। जमीन बरबाद हो रही है। जल गंदा हो रहा है। जंगल जल रहे हैं। लोग मर रहे हैं। हवा प्रदूषित हो रही है। विकास चौपट हो रहा है। अब नक्सली संगठनों को हमेशा के लिए खत्म करने का वक्त आ गया है। ज्यादा देरी से यह देश दंतेवाड़ा जैसी और ना जाने कितनी बारूदी सुरंगें फटते हुए देखेगा। जवानों को शहीद होते देखेगा। अब देखने का नहीं करने का वक्त आ गया है।

साइना नेहवाल-कर दिखाया कमाल



देशपाल सिंह पंवार
जय हो साइना नेहवाल की, हिसार की, हरियाणा की, हिंदुस्तान की। 19 साल की साइना ने 49 मिनट में इतिहास रच डाला है। इंडोनेशिया ओपन खिताब अब नेहवाल के नाम है। सुपर सीरिज टूर्नामेंट जीतने वाली वो पहली इंडियन हैं। साइना की जीत कई मायनों में बेमिसाल है। उसने सिंगापुर ओपन में मिली हार का बदला •भी चुकाया । साथ ही बैडमिंटन कोर्ट पर न केवल चीनी और इंडोनेशियन साम्राज्य को ध्वस्त किया बल्कि यह भी जता दिया कि रैंकिंग मायने नहीं रखती। अगर देश की आन-बान-शान का जज्बा दिल में हो तो हर नतीजा पाया जा सकता है। देश की नंबर एक और दुनिया की नंबर 6 साइना ने अपने से कहीं ज्यादा मजबूत चीन की वांग लिन को कोर्ट पर ऐसा नचाया कि हर कोई हैरत में था। पहला गेम जब साइना हार गई तो ऐसा लग रहा था कि नतीजा विपरीत ही होगा। पर इसके बाद वो हुआ जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी पर साइना को यकीन था। उसका यकीन इसी बात से झलकता है कि आखिरी गेम में चीनी खिलाड़ी किसी तरह नौ ही अंक जुटा पाई। इस जीत को प्रकाश पादुकोन तथा पी गोपीचंद की उपलब्धि के समकक्ष माना जा रहा है। यह जीत ऐसे समय में मिली है जब 20-20 में धोनी एंड कंपनी की हार से इंडियन खेल पे्रमी उदास थे। महिला क्रिकेट टीम की हार से निराश थे पर अब साइना की जीत से पूरे देश में उल्लास है। सबको उस पर गर्व है। पिता डा हरवीर सिंह को गर्व है। इन पलों का ही उन्हें अरसे से इंतजार था। हिसार की धरती पर साइना ने जन्म लिया और हैदराबाद में 8 साल की उम्र में रैकेट थामा। उसका जज्बा देख वैज्ञानिक पिता ने तब से अपनी आधी आमदनी और सारा पीएफ का पैसा उसके सपने पूरे करने में लगा दिया। उसे स्टेडियम ले जाने के लिए वो रोज 50 किमी स्कूटर दौड़ाते थे। 99-04 तक उसे कोई प्रायोजक भी नहीं मिला था। किसी तरह वो आगे बढ़ती गई। लगन की पक्की थी। ना फिल्म देखने का शौक था और ना ही सहेलियों संग पार्टी का। खेल की वजह से पढ़ाई पर भी असर पड़ा। लेकिन कहावत है कि मेहनत कभी जाया नहीं जाती। 2007 में जिस तरह साइना खेली और 2008 में जब उसे विश्व बैडमिंटन संस्था ने सबसे बेजोड़ खिलाड़ी घोषित किया तो साफ लग गया था कि एक ना एक दिन साइना धमाका जरूर करेगी। वो दिन आखिरकार आ ही गया और सचमुच यह साइना की मेहनत और एक पिता के प्यार और मार्गदर्शन का ही नतीजा है कि ये सुनहरी पल हमारे हैं। ठीक फादर्स डे के मौके पर एक पिता को एक बेटी की ओर से इससे बड़ा तोहफा और क्या हो सकता है? ऐसे तोहफे पर सारी दौलत और मेहनत कुर्बान। देखना यही है कि जिस तरह क्रिकेट पर पैसा बहता है क्या इस लड़की की हौसलाआफजाई के लिए भी लोग आगे आएंगे? फिलहाल साइना की जीत पर मंगल गीत गाने का दिन है। ढेर सारी मंगलकामनाएं। साइना इसी तरह और खुशियों के पल लेकर आए।जीत का सफर * 2003 में चेकोस्लोवाकिया में जूनियर ओपन टूर्नामेंट जीता।* 2004 में बेडिगो (आॅस्ट्रेलिया) में आयोजित दूसरे कॉमनवेल्थ खेलों में रजत पदक पर कब्जा।* कनाडा में 2004 में हुए जूनियर विश्व कप में प्री-क्वार्टर फाइनल में जगह बनाई।* एशियन सेटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट का खिताब अपनी झोली में डाला। * विश्व जूनियर बैडमिंटन चैंपियन्स में फाइनल तक पहुँचने में कामयाब।*कॉमवेल्थ खेलों में मिश्रित समूह स्पर्धा के सेमीफाइनल में उच्च वरियता प्राप्त ट्रेसी हालम को हराया।* मलेशिया की जूलिया झिएन पी वाँग और कई अन्य उच्च वरीयता प्राप्त खिलाड़ियों को हराकर फिलिपींस ओपन स्पर्धा जीती। * इंडियन इंटरनेशनल सेटेलाइट बैडमिंटन चैंपियनशिप की विजेता।*जनवरी 2007 में पटना में आयोजित राष्टÑीय बैडमिंटन (अंडर-19) चैंपियनशिप जीती। इसी साल मार्च में गुवाहाटी में हुई स्पर्धा में स्वर्ण पदक प्राप्त 33वीं राषट्रीय खिलाड़ी बनीं।

रविवार, 21 जून 2009

नक्सलवाद: देश बरबाद



देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि जर,जोरू और जमीन ही सब झगड़ों की जड़ हैं। नक्सलवाद भी इनमें से ही एक जमीन की वजह से उपजा। जमीन की लड़ाई की दुहाई देते-देते और कमाई खाते-खाते आज सारी जमीन ही खून से लाल हो गई है। बंजर हो गई है। सोच कंजर हो गई है। चारों ओर खून-खराबे का मंजर हो गई है। पश्चिम बंगाल के एक छोटे से गांव नक्सलबाड़ी से 42 साल पहले उठा यह जुनून आज देश के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। कश्मीर से भी बड़ा। इस समय 20 हजार से भी ज्यादा नक्सली विंग देश विरोधी साजिश में लिप्त हैं। देश की 40 फीसदी जमीन को अपनी गिरफ्त में ले चुका है। 92 हजार किलोमीटर रकबा इस जुनून की आग में जल चुका है। छत्तीसगढ़, उड़ीसा, आंध्र प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश समेत कई राज्यों में दहशत फैला रहा है। 30 हजार से ज्यादा लोग जान गंवा चुके हैं। देश की लगभ ग 10 लाख करोड़ संपत्ति को सीधे-सीधे निगल चुका है। फिर •भी इसका पेट खाली है। गेट नहीं गिरा है। वेट नहीं गिरा है। सोचिए अगर नक्सलवाद से ये नुकसान नहीं हुआ होता तो विकास के मामले में देश किस स्थिति में होता? जिस विकास की चाह में इन लोगों ने हथियार उठाए थे वही हथियार आज उन इलाकों के विकास की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बने हुए हैं जहां ये अपना शिकंजा जमाए हुए हैं। खुद सरकारी व्यवस्था और संविधान पर विश्वास नहीं और अपने साथ करोड़ों निर्दोष लोगों के जीवन से खेलने की इनकी सोच का ही नतीजा है कि जहां-जहां नक्सलवाद जड़ जमाए हुए है वहां विकास नहीं विनाश की ज्वाला फूट रही है। जो जीवन देश और समाज हित में काम आना चाहिए था वो देश और समाज पर निशाना साधने में बीत रहा है। जंगल की खाक छानने में बीत रहा है। अपनों को मारने में बीत रहा है। देश की संपदा को तबाह करने में बीत रहा है। अपनों को बर्बाद करने में बीत रहा है। देश के विकास को चौपट करने में बीत रहा है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दुनिया के किसी •भी कोने में हथियारों के बल पर नया जमाना नहीं आया। सरकारी व्यवस्था को ना मानने और हथियारों के बल पर देश में नक्शा पलट की इनकी सोच का आधार क्या है ये तो यही जानें पर इस सोच से देश की चाल में मोच जरूर आ गई है। 25 मई, 1967 में जब नक्सलबाड़ी से चारू मजुमदार और कानू सान्याल ने आंदोलन शुरू किया था,तब ही हिंसा की नींव पड़ गई थी। जमीन को लेकर आए दिन के हमलों ने जता दिया था कि आने वाला समय कैसा होगा? कोलकाता में कालेज से निकलने वाले छात्र इनके विचारों के झांसे में आते गए। जनता बढ़ती गई। हिंसा बढ़ती गई। एक समया ऐसा भी आया कि सारे स्कूल बंद कर दिए गए। नक्सली छात्रों ने जादवपुर विवि पर कब्जा कर लिया। मशीन दुकानों में पुलिस से टक्कर के लिए पाइपगन बनाने लगे। मुख्यालय कोलकाता के प्रेसिडेंट कालेज को बना डाला। उनके निशाने पर जमीन मालिक तो थे ही। साथ ही अध्यापकों, नेताओं, सरकारी अफसरों और पुलिस अफसरों को भी उन्होंने असली दुश्मन घोषित कर दिया। मजूमदार की लीडरशिप के खिलाफ 71 में बगावत हुई। 72 में अलीपोर जेल में उनकी मौत। इससे नक्सली आंदोलन को गहरा झटका लगा। 80 के दशक तक आते-आते इन नक्सली नेताओं के अलावा 30 से ज्यादा नक्सली गुट बन गए थे। 30 हजार से ज्यादा नक्सली इन गुटों में शामिल थे। ये न्याय दिलाने के नारे लगाते थे और विरोधियों को मौत के घाट उतार देते थे। 90 के दशक में नक्सलवाद और तेजी के साथ फैला। केंद्र सरकार भी यह मानती है कि पाकिस्तान और कश्मीर के आतंकवादियों से कहीं ज्यादा खतरनाक नक्सलवाद है। हर साल तबाह होने वाली संपत्ति बढ़ती जा रही है। नक्सलवाद की वजह से जान गंवाने वाले भी हर साल बढ़ रहे हैं। मां से बेटे छिन रहे हैं। बहन से भाई छिन रहे हैं। औरतों से सुहाग और देश से लाल। अभी पांच साल की संख्या पर अगर निगाह डाली जाए तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किस हद तक जमीन की चाह खूनी खेल की राह बन गई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2004 में 570,05 में 893, 06 में 749, 07 में 654, 08 में 938 लोगों ने नक्सली हिंसा में जान गंवाई। सब जानते हैं कि सरकारी आंकड़ों से कितने गुणा मरने वालों की असली संख्या होती है। आगे आने वाले बरसों में ये जुनून और कितना खून पिएगा यह समय ही बताएगा। पर इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि इसके फैलाव पर अंकुश उस तरह नहीं लग पाया जितना अब तक लग जाना चाहिए था। इसका खास कारण यही है कि नक्सलियों ने हर उस इलाके में अपनी पकड़ जमाई जहां विकास ज्यादा नहीं हुआ था। जंगलों का फायदा उठाया। सरकारी व्यवस्था से निराश ग्रामीण जनता को उकसाया और उसके सहयोग से अपना सिक्का जमाया। जिस कौम को इन्हें ठीक करने में सहयोग करना चाहिए था वही इसकी सबसे बड़ी ताकत बन गई। यही सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी दिक्कत है। जंगल के रास्ते सब राज्यों की सीमा जुड़ी होने से भी इन्हें अपना दायरा बढ़ाने में मदद मिली। साथ देश और समाज विरोधी ताकतों से भी रिश्ते जगजाहिर रहे हैं। चाहे वीरप्पन था या पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई या अब आतंकवादी संगठन लश्कर। सबने इनकी खुराक बढ़ाई। खूंखार बनाया। आधुनिक हथियारों से लैस कराया। देश के उन क्रीम इलाकों तक इसने अपना शिकंजा जमाया जो देश की तरक्की में अहम रोल प्ले करते हैं। इसके अलावा देश के बाकी तमाम हिस्सों में भी ऐसे-ऐसे अलगाववादी गुट अरसे से जंग लड़ रहे हैं जिनका मकसद कभी पूरा नहीं होगा। मौका पड़ने पर ये सब आपस में हाथ मिला लेते हैं। सरकार इन्हें कुचलने को सीरियस है। जनता इनसे छुटकारा पाने को अधीर है। ये तय है कि एक दिन नक्सलवाद बर्बाद होगा,अमन का दौर आबाद होगा लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि किस कीमत पर? बड़ी कीमत वसूल चुका है। देश और जनता को इसकी और क्या कीमत चुकानी होगी, कितनी कुर्बानी देनी होगी यही सबसे बड़ा सवाल है।

गुरुवार, 18 जून 2009

पहले ये बताओ-राजनीति जनसेवा है या धंधा?

देशपाल सिंह पंवार
मैं जानता था कि मठाधीशों के पैर छुए बिना हिंदी पत्रकारिता में आना गुनाह है,यहां टिकना गुनाह है और बड़े ओहदों पर पहुंच जाना तो सबसे बड़ा गुनाह है। मैं ये भी जानता था कि ऐसे मठों के सामने से सिर झुकाए बिना निकलना गुनाह है, उनकी ओर आंख उठाकर देखना गुनाह है और उनके बारे में बोलना तो सबसे बड़ा गुनाह है। यह कैसे हो सकता है कि इन मठाधीशों की चरण वंदना,इन मठों की चाकरी की भबूत बिना कोई पत्रकार बने और कहलाए। ना चाहते हुए भी मुझ अज्ञानी जैसे ढेरों ये गुनाह कर बैठे हैं या कर रहे हैं तो मठों की चाकरी करने वालों का हल्ला बोल तो झेलना ही होगा। आज की दुनिया में नोनसेंस सबसे बड़ी पावर है और यही इन मठों का सबसे बड़ा हथियार है। एक सुर में इतना हल्ला मचाओ कि असली मुद्दा ही गौण हो जाए। ये पाक और दूसरे नापाक दिखने लगें-लगने लगें। चरण वंदना से दूर अपनी काबलियत से अगर कोई साथी टी वी चैनलों में बड़े ओहदे पर पहुंचता है, लाख-दो लाख का वेतन लेता है,दफ्तर और घर बखूबी चलाता है तो इन्हें पत्रकारिता खतरे में नजर आने लगती है। चैनल पर इन्हें प्राइम टाइम में नहीं बुलाता तो फिर उस भाई की खैर नहीं। उसे पता भी नहीं चलेगा- पत्रकारिता की अस्मिता और देश की कल्चर का उसे हत्यारा घोषित कर देंगे ये मठवाले। ऐसे में उसके सामने तीन ही रास्ते होते हैं- चुप रहे, सफाई दे या फिर शरण ले। प्रिंट को ले लीजिए,जहां-जहां इनके ज्ञान की धारा सिकुड़ती गई वे सब इनकी नजर में चोर हैं। पत्रकारिता के ढोर हैं। किसी दल में दाल नहीं गली तो वहां दलदल बताएंगे, दूसरों को भ स्मासुर ठहराएंगे और अपनी गोटी फिट करने को गिटपिट करेंगे। मानना पड़ेगा भाई- - शब्दों की जादूगरी से नैतिकता की बात,व्यवहार तथा चरित्र से अनैतिकता को मात, दोनों को खूबसूरती से साथ लेकर चलने व चलाने वाले हाथ की करामात सिर्फ इन्हीं के पास है। ये भी कला है,जो चाहे इसे सीख सकता है। फौरी तौर पर फीस बस इतनी सी दिखती है- पैर छुओ-मठ की रक्षा की कसम खाओ-बिना दिमाग लगाए विरोधियों पर वार में जुट जाओ-जहरीले शब्दों के वाण बरसाओ और नेताओं की तरह चिल्लाओ-जो हमसे टकराएगा,चूर-चूर हो जाएगा। अंदरखाने और भी कुछ करना पड़ता है, मुझे जानकारी नहीं है। इस बार भी ये यही कर रहे हैं। मुद्दा कुछ और था पर चाहत-आदत से मजबूर व निष्ठा में बंधे भाई लोग उसे बांध आए मठ की सबसे बड़ी गद्दी से। जो सबसे ज्यादा पावन है। पत्रकारिता की जननी है। जिस पर बैठा पुरोधा पत्रकारिता का रखवाला है। पत्रकारिता की दीक्षाशाला है। जो हम सबका आदर्श है। जो कभी गलती नहीं करता। यानि या तो वो भगवान् है या फिर राजा। लाख टके का सवाल यही है कि अगर वो भगवान् है तो हम जैसे तुच्छ इंसानों को ठीक क्यों नहीं करता? अगर वो राजा है तो फिर उस राजा का ये राज कैसा? पत्रकारिता का ये बेसुरा साज कैसा? मुद्दा था-चुनाव में कुछ अखबारों द्वारा पैसा लेकर खबर छापने का, जनता को धोखा देने का, पत्रकारिता को बचाने का और उस अखबार मालिक का नाम खोलने का। मेरा सिर्फ यही कहना था कि शिक्षा कौन दे सकता है? सही रास्ते पर चलने की बात करने का नैतिक अधिकार किसे है? क्या झूठ के रास्ते पर चलने वाले सच के नारे लगा सकते हैं? मैंने पढ़ा भी था, सुना •भी था और गुना भी था कि जिसने कोई पाप ना किया हो वही पत्थर फैंक सकता है। खासकर राजाओं के मामले में यह मापदंड और भी सख्ती से लागू होता है। पाप भले ही आपके हाथों से ना हुआ हो पर आपके राज में हुआ हो,आपकी मौन सहमति से आपके चहेतों ने किया हो, आपकी आंखों के आगे या पीछे आपकी फौज ने किया हो उससे आप बच नहीं सकते। ऐसे में दूसरों को नैतिकता का पाठ आप पढ़ा नहीं सकते। पहले खुद को ठीक करो,घर ठीक करो,राजपाट ठीक करो,आदर्श की स्थिति पैदा करो तो फिर बिना टोके, बिना कहे, बिना लिखे, बिना नसीहत दिए और बिना रोए सारा जमाना आपके पीछे होगा। मठ का घंटा बजाकर कोई साधु नहीं होता। हल्ला बुलवाकर मसीहा का दर्जा नहीं पाया जा सकता। पत्रकारिता को नहीं बचाया जा सकता। खास लोगों के साथ दिखना,बैठना,खड़े रहना, गलत-सही बात पर उनकी हिमायत करना आम को कदापि पास नहीं आने देता और जब तक पत्रकारिता में ये खास और आम का अंतर है तब तक ये धारा यूं ही मैली होती जाएगी। कोई इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि इस चुनाव में पैसा लेकर खबर छापने वाले अखबार बस एक-दो ही नहीं हैं। हां इससे बचने वाले बस एक-दो हो सकते हैं। वे सही राह पर हैं,पत्रकारिता को बचाने की चाह पर हैं यही एकमात्र कारण नहीं होगा। हो सकता है उनके मिशन और बड़े हों। उनके मालिकों या संपादकों को राज्यसभा जाना हो, या कोई विशिष्ट नागरिक सम्मान पाना हो। देख लेना जिस दिन उनका ये मिशन पूरा हो जाएगा वे •भी इस बिरादरी के साथ गोते लगाते नजर आएंगे। दूसरों को छोड़िए -ज्ञानी पुरोधा जिस अखबार से जुड़े हैं, जिनके पास फ्रैंचाइजी है, वहां भी इस चुनाव में यही खेल खेला गया। वहां •भी ऐसी पैसे वाली खबरों के अलावा ऐसे-ऐसे सरकारी व अन्य उत्पादों के विज्ञापन छपते हैं कि सुबह-सवेरे देखकर ही चाल और हाल समझ में आ जाते हैं। घर में नैतिकता हलाल और जगत में बजते गाल का धमाल सही नहीं। जहां तक चुनाव के दौरान पैसा लेकर खबर छापने का सवाल है, तो इसे गलत ठहराने से पहले कुछ और सवालों के जबाव खोजने होंगे। अगर उनके जबाव मिल गए तो यकीनन चाह की राह को थाह जरूर मिल जाएगी। पहले इस बात पर बहस होनी चाहिए कि राजनीति जनसेवा है या धंधा? अगर जनसेवा है तो फिर आज जनसेवक नजर क्यों नहीं आते? ये मठाधीश उन्हें ठीक क्यों नहीं करते? हां अगर मठाधीशों को आज •भी जनसेवक नजर आते हैं तो मेरे जैसा अज्ञानी उनके दर्शन से धन्य जरूर होना चाहेगा। वैसे यकीन है कि ये मठवाले भी इस बात को मानेंगे कि राजनीति धंधा बन गई है। अगर ऐसा है तो फिर चुनाव के दौरान पैसा लेकर इन धंधेबाजों को स्पेस देना कहां का गुनाह है? समाज में जहर घोलने वाली नेताओं की बातों में अगर कोई जनहित नहीं है तो फिर उन्हें समाज में फैलाने का वाहक मीडिया क्यों बने और वो भी फ्री में? है ना बेतुकी बात-नेता आग लगाने की बात करते रहें और मीडिया उनके लिए इस आग के वाहक का रोल अदा करता रहे। अगर इससे इंकार करें तो अपनों की ओर से पत्रकारिता के मूल्यों का हवाला हमारे गले में मुसीबत का निवाला बन जाए। 80 के दशक तक राजनीति धंधा नहीं थी। चुनाव लड़ने वाले नेता भी कम थे और जहर घोलने वाले तो गिने-चुने ही थे। उस समय यह बात सही थी कि हर चुनाव से पहले प्रिंट मीडिया अपनी गाइडलाइन तय कर लेता था। क्या करना है और क्या नहीं करना। उस दौर में भी ढेरों नेताओं को ये पीड़ा रहती थी कि उन्हें स्थान नहीं मिल रहा है। वे पत्रकारों और संपादकों को पटाते थे। कड़वा सच यह •भी है कि उस दौर में •भी मठाधीशों की ओर से प्रत्याशियों पर बराबरी का सिद्धांत लागू नहीं होता था। खैर वो पुरानी बात है और दफ्न मुर्दे निकालना हमारा मकसद नहीं। लेकिन आज के दौर में जब सारा सीन ही बदल चुका है, हर कोई माननीय होने के वास्ते सारे हथकंडे अपना रहा है, जनता को लड़ा रहा है तो फिर लाख टके का सवाल यही है कि पत्रकारिता के वे सारे सिद्धांत इन नेताओं और आज की राजनीति पर हुबहू क्यों लागू हों? क्या उनमें परिवर्तन की जरूरत नहीं है? क्या पत्रकारिता के ग्रंथ में समय के हिसाब से किसी परिवर्तन की कोई गुंजाईश नहीं है? अगर है तो करो, ताकि कोई रास्ता नजर आए। अगर नहीं है तो फिर इसी तरह से रोते फिरो,कोई रास्ता नहीं मिलने वाला,कोई हल नहीं निकलने वाला। जिनके पास स्पेस है, वे दे रहे हैं, लेने वाले ले रहे हैं, जनता भी जानती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि खबर किसी •भी कीमत पर नहीं बिकनी चाहिए लेकिन अब ये भी तय हो जाना चाहिए कि किसकी और कैसी खबर को इस दायरे में रखा जाए? राजनीति का अपराधीकरण और अपराधियों की राजनीति के गुणगाण को भी क्या सच्ची और अच्छी खबरों की श्रेणी में रखा जाए? इस श्रेणी को पत्रकारिता से हटाने तथा विज्ञापन की ओर वैधानिक रूप से ठेलने का वक्त आ गया है। ताकि पत्रकारिता •भी बचे और बिना खाए-पिए अठन्नी का ग्लास तोड़ने के लांछन से पत्रकार भी बचें। चुनाव आयोग ही कोई रास्ता निकाले तो बात बने। एक बात और-मुद्दा सामूहिक था और साथी उसे व्यक्तिगत बनाने में जुट गए। किसी के •भी बौद्धिक अस्तित्व पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है। किसी की निष्ठा को •भी कोई दूसरा तय नहीं कर सकता। लेखनी और व्यक्तित्व दो अलग-अलग बातें हैं। दोनों का घालमेल करना ठीक नहीं। मैं इन पुरोधाओं की लेखनी का कायल हो सकता हूं लेकिन ये कहां की जबरदस्ती है कि उन्हें महान व्यक्तित्व का स्वामी भी मानूं। महान व्यक्तित्व बायस नहीं होते। संकुचित दायरे में नहीं जीते। गलत फैसले नहीं करते। विश्वविख्यात पत्रकार ने हमें दी नसीहत में खुद इसका उल्लेख किया है कि पत्रकारिता के इस पुरोधा ने जिन-जिन पत्रकारों को चुना वे निकम्मे और करप्ट निकले। इस भाई को छोड़कर। जो लगातार दफ्तरों में मारपीट और गालीगलौज करता रहा पर तरक्की पाता गया। जहां मारपीट व गालीगलौज ही तरक्की का जरिया रहा हो, जहां ऐसी अनुशासनहीनता को शह मिलती रही हो वहां का आलम कैसा रहा होगा अंदाजा लगाया जा सकता है? खोज और ज्ञान का विषय ये •भी है कि ऐसा क्यों होता रहा? इस राज को मेरे जैसे हजारों लोग भी जानना चाहेंगे। उम्मीद है ये सच पुरोधा द्वारा ही लिखवाया जाएगा ताकि आने वाली पीढ़ी को पता चले कि पत्रकारिता में ज्ञान की बात से ज्यादा लात की महत्ता होती है। जब लात और हाथ चलाने वाले नैतिकता की बात करते हैं तो कुछ कहना ही फिजूल है। वैसे इनकी एक और खूबी की दाद देनी पड़ेगी कि बात कहां की हो रही थी और ये अपने ही कसीदे पढ़ने लगे। ये तक भूल गए कि अपने शब्दों से ये अपने आका को ही पलीता लगा रहे हैं। कितने गर्व से कह रहे हैं कि बेटे की नौकरी मैंने लगवाई। यानि काबिल बेटे को नौकरी इनके रहमोकरम से मिली। कहीं यही तो वो राज नहीं। मूल विषय से भ टककर वो बार-बार कद का एहसास कराने में जुटे रहे। आखिर वो ये क्यों बताना चाह रहे हैं कि पुरोधा की चाह राज्यसभा जाने की नहीं थी? अब ये मत कहना कि राज्यसभा जाना गुनाह है इसलिए नहीं गए। अगर चाह नहीं थी तो फिर इस पर इतना जोर देने की जरूरत क्या है? कहीं अंगूर खट्टे तो नहीं थे? वैसे इनकी एक बात से मेरा ज्ञान भी बढ़ा है कि लालू प्रसाद जैसे नेताओं का उद्धार इस पुरोधा की सिफारिश पर हुआ। मेरा सवाल इनसे यही है कि क्या यह भी पत्रकारिता है? क्या नेता बनाना •भी पत्रकारों का काम है? क्या ये पत्रकारिता के मूल्यों का हनन नहीं है? ऐसा करके क्या अपने कद और पद की हद नहीं लांघी गई? अगर ऐसा है तो फिर किस बिना पर हम नैतिकता की बात करते हैं? वैसे मैंने लालू जी से इस बारे में जानकारी चाही है। जो उन्होंने बताया है वो ठीक उल्टा है। जल्दी ही इन साथियों को जानकारी मिल जाएगी। सच सामने आ जाएगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि अखबार बेहद लोकप्रिय था। अब इसका श्रेय चाहे सही वक्त और सही चाह को दें,उनकी कप्तानी को दें, या भाषा को लेकिन इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि उस भाषा को लिखने व बोलने वाले युवाओं का परीक्षा में डिब्बा गोल हो जाता था। अब आप ही बताएं-ऐसी भाषा से फायदा हुआ या नुकसान? इस अखबार से किसी जमाने में जुड़े साथियों ने प्रसार संख्या पर भी जोर दिया है। मैं इससे इंकार भी नहीं कर रहा हूं पर सब जानते हैं कि भारत में प्रसार संख्या किस तरह से बढ़ाई जाती है। विज्ञापन पाने को किस तरह से उस संख्या को हासिल किया जाता है। या तो सरकारों की नासमझी समझ लीजिए या फिर बिजली महकमे की शराफत-•भारत के किसी •भी कोने में अखबार जो फिगर बताते हैं, उसके हिसाब से बिजली का वास्तविक खर्च अगर वसूला जाए तो सबको पता चल जाएगा। उस दिन बेहद मुश्किल हो जाएगी जिस दिन सरकारें ये चाह लेंगी। तब पता चलेगा कौन कितने पानी में था और है? हो सकता है देश के इतिहास का यह सबसे बड़ा घोटाला हो। मेरे ये साथी जिन अखबार मालिकों को पानी पी-पीकर कोस रहे हैं वहीं पर जाकर इनकी लाइन ठहरती है और हर माह पैसा लेकर आती है। यह दोहरी चाल क्यों? अगर वे गलत हैं तो उनसे कैसा वास्ता? पैसा पाने का ये कैसा रास्ता? मुझे नहीं पता था मुझे अब पता चला कि भात्गिरी ही है असली सत्य पथ। मेरे एक दूसरे साथी रोजी-रोटी को मां और बहन तक ले गए हैं। ऐसी भाषा लिखने से क्या पत्रकारिता के मूल्य बच जाएंगे? तर्क पर बात करिए। व्यक्तिगत स्तर पर जो आपके पास है, उसे बेचने की बात करिए। ये 35 साल में दर्जनों किताबें लिख चुके हैं। अच्छी ही लिखी होंगी जरूर पढ़ना चाहूंगा। उन्हें बेचकर मुघे भी बताना कि क्या एक महीने का राशन घर में आ गया है? अगर हां मैं कायल हूं। वैसे ये •भी कमाल की बात है कि अखबार में कोई शख्स संपादक ना हो फिर भी वो दर्जनों किताब लिख सकता है। वरना किसको सिर उठाने की फुरसत मिलती है। शायद जरूरत से ज्यादा ज्ञानी हैं, काम से ज्यादा नाम पर ध्यान देते हैं इसलिए समय मिल गया होगा या निकाल लिया होगा। ये बेधड़क कथित अखबार का नाम बता देते हैं। जिसके बारे में चाहो इनसे पूछ सकते हो। शायद ये इस धरती के सबसे अच्छे अखबार का हिस्सा हैं। जहां विज्ञापन के नाम पर, प्रसार के नाम पर समूह संपादक कोई बात नहीं करते। बस पत्रकारिता के मूल्यों को ही आगे बढ़ाते हैं। सबको एक नजर से देखते हैं। इन मेरे साथी को आजकल के संपादकों से भी नफरत है। इनकी नजर में सब पैर छूकर संपादक बने हैं और 24 घंटे घुंघरू बांधकर मालिकों के सामने नाचते हैं। शायद इनका ऐसे ही संपादकों से पाला पड़ा होगा। जैसा इन्होंने भोग व देखा होगा उससे ही ऐसी धारणा बनाई होगी। खैर इन बातों में कुछ नहीं रखा है और ना ही कुछ निकलने वाला। एक-दूजे को कोसने व नंगा करने से कुछ नहीं होने वाला। अगर पत्रकारिता गलत राह पर है तो सही रास्ते पर लाने के रास्ते खोजे जाएं। जो बिगड़ चुके हैं उन्हें सुधारने की बजाय जो आ रहे हैं उन्हें बचायाऔर सही रास्ता दिखाया जाए। एक बार सबको पत्रकारिता के मूल्यों से अवगत कराया जाए, हो सकता है 70 फीसदी फौज को जंग के कायदे-कानून ही ना पता हों। राज्य और राष्ट्र के स्तर पर कोई कमेटी बनाई जाए जो मीडिया के हर स्तर पर मान्य हो। और सबसे बड़ी बात-साथ ही यह भी देखा जाए कि मीडिया का कोई भी अंग घाटे में ना जाए। मालिकों को भी दो पैसे का मुनाफा हो,अखबार बंद ना हों, चैनल दम ना तोड़े। रोजगार चलता और बढ़ता रहे। काबिल पत्रकारों को उनकी असली जगह मिलती रहे। मुझे पूरा विश्वास है कि जिस दिन ये गोल खत्म हो जाएंगे पत्रकारिता का भी उद्धार हो जाएगा और पत्रकारों का भीभरे हुए पेट वाले •भूखों का •भविष्य तय नहीं कर सकते। हवा में तैरने वाले पैदल चलने वालों को रास्ता नहीं दिखा सकते। पर आदत है। आसानी से नहीं जाएगी।

स्टार का अनाचार

देशपाल सिंह पंवार
समाज के हर क्षेत्र में पतन हो रहा है। खासकर चारित्ररिक पतन। यह साफ-साफ दिखता है। इसके बावजूद किसी भी क्षेत्र का जब कोई जाना-पहचाना नाम किसी •भी मामले में फंसता है तो कहीं न कहीं दिल के कोने को कष्ट होता है। सिने जगत भी पतन की इस राह से अछूता नहीं है। कभी कोई स्टार माफिया डान से रिश्तों के कारण चक्कर काटता नजर आता है तो कभी कोई हत्या जैसे अपराध से जुड़ा नजर आता है। कभी स्टिंग आपरेशन में नैतिकता को धूल में मिलाता दिखाई देता है तो कभी अश्लील हरकतों से सबका सिर शर्म से झुका जाता है। गैंगस्टर, वो लम्हे जैसी फिल्मों के नायक शाइनी आहूजा ने इस सूची को और लंबा तथा सिने जगत को और बदनाम करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। नौकरानी के साथ रेप और मुंह खोलने पर मारने की धमकी देकर उन्होंने जता और दिखा दिया है कि परदे के ये नायक नकली तथा सामान्य इंसान हैं और मौका मिलने पर असली खलनायक होते हैं। नौकरानी की शिकायत पर पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया है और अदालत ने 18 जून तक हिरासत में भेज दिया है। शाइनी आहूजा ने तर्क दिया है कि सहमति के बाद ही उन्होंने संबंध बनाया। क्या यह तर्क गले उतर सकता है? वो शादी-शुदा हैं। अपने जीवन साथी को धोखा देना क्या नैतिकता है? अब समय आ गया है कि ऐसे चेहरों को सजा मिलनी ही चाहिए। महेश उनके कुकर्म से दुखी हैं और निंदा कर रहे हैं। पर अपने कारनामों से बदनाम हो चुकी इस फिल्म इंडस्ट्री को अगर बचाना और चलाना है तो ऐसे चेहरों को सबी निर्माताओं को अब दरकिनार करना चाहिए जिनके दामन पर दाग हैं। माना कि परदे पर रियल नहीं रील लाइफ होती है लेकिन जिन कहानियों का असर समाज पर होता हो और जो सिने स्टार पूजे जाते हों वो अगर ऐसे काम करेंगे तो एक दिन ये धंधा इतना गंदा हो जाएगा कि उन्हें ना कोई देखने वाला होगा और ना सराहने वाला। वैसे भी फिल्म इंडस्ट्री में शोषण की कहानियां रोज इतनी बन रही हैं कि अच्छे घरों की बेटियां इधर जाने से घबराती है। अगर सब घरों ने इनकी कहानियों को देखना बंद कर दिया तो सारे सड़क पर नजर आएंगे। जनता से सीधे जुड़े सब क्षेत्रों के बड़े नामों का हर कदम अगर चर्चा का विषय बनता है तो वो यह कहकर पीछा नहीं छुड़ा सकते कि यह उनकी व्यक्तिगत जिंदगी है। आदर्श चेहरों को और ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है लेकिन फिल्मी दुनिया के ढेरों चेहरों को यह सब महज शब्द नजर आते हैं। जैसे ये स्टार हैं, ऐसी ही कहानियां परदे पर नजर आने लगी हैं। जितनी तेजी से आती हैं उतनी ही तेजी से बिसरा दी जाती हैं। इस मायानगरी को दुनिया में नाम दिलाने वालों की राह पर चलने वाले कम रह गए हैं। जो हैं भी उन्हें अब यह अलख जगानी चाहिए कि फिर कोई शाइनी आहूजा जैसा भोगी उनके बीच ना टिक पाए। फिलहाल तो यही कहा जा सकता है कि ग्लैमर और दौलत की चकाचौंध में सारी नैतिकता तार-तार हो चुकी है।

ईरान में घमासान

देशपाल सिंह पंवार
शायद ही कदापि ईरान में राष्ट्रपति चुनाव इस तरह चर्चा में रहे हों। महमूद अहमदीनेजाद दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए हैं। यानि ईरान में फिर कट्टरपंथी राज है। खुमैनी की परंपरा फिर दो कदम आगे बढ़ गई है। उदारवादी व्यवस्था यानि खुले में सांस लेने की ईरानी जनता की ख्वाहिश फिर दम तोड़ गई है। अपनी इस जीत को महमूद अहमदीनेजाद आगे के सपनों को निहार रही जनता की आस का फल बता रहे हैं। वो कह रहे हैं कि सारे अधूरे मिशन पूरे किए जाएंगे। जो वादे किए गए थे वो सब पूरे होंगे। उनके ये बढ़े हुए हौसले जितने लोगों और देशों को अच्छे लग रहे हैं उससे दस गुणा ज्यादा जनता और देशों को अनिष्ट की आशंका से डरा रहे हैं। सबको लग रहा है कि अब महमूद कहीं ज्यादा निरंकुश शासक के रूप में काम करेंगे। ऐसे सब लोग उम्मीद लगा रहे थे कि उदारवादी नेता मीर हुसैन मूसावी बाजी मार लेंगे और इस क्षेत्र में भी ऐसे ही लोगों का राज होगा पर बड़े अंतर से उनकी हार ने न केवल अमरीका और उनके चहेते देशों को झटका दिया है बल्कि कट्टरपंथी मुस्लिम देशों को और ताकत भी दे दी है। परमाणु मसले पर किसी भी देश की ना सुनने वाले अहमदीनेजाद अब और ज्यादा कड़वे फैसले लेने से नहीं हिचकेंगे चाहे वो अपनी जनता और दुश्मन देश अमरीका को पसंद ना आएं। बराक ओबामा ने जो हाथ बढ़ाया था और जिस तरह मूसावी का साथ दिया था उनकी हार से मुस्लिम देशों में अपनी पैठ बढ़ाने की उनकी चाह को गहरा झटका लगा है। चंद देशों को अगर छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मुस्लिमदेश अमरीका को फूटी आंखों नहीं देखना चाहते इस नतीजे ने यह भी दिखा दिया है कि ईरान की धरती पर कट्टरपंथ को पसंद करने वाले लोग ज्यादा हैं। दरअसल जिस तरह हर मुस्लिम देश में हिंसा और अराजकता का माहौल है, उस दौर में ईरान मजबूती से झ्रखड़ा रहा। दर-दर की ठोकरें खाने से बेहतर अपने हकों की कुर्बानी देना ईरानी जनता ने ज्यादा सही माना। अगर ये देश सही राह पर होते तो शायद ईरान की जनता पर इसका असर होता। मूसावी यह बात और अपनी हार मानने को तैयार नहीं। उनका आरोप है कि जमकर धांधली हुई। मूसावी की ओर से विरोध के आह्वान पर समर्थक सड़कों पर उतर आए। यही कारण है कि तेहरान समेत देश के कई हिस्सों में तनाव फैला हुआ है। इसे तो नियंत्रण में कर लिया जाएगा पर इस जीत के बाद इस देश की बेलगाम सोच पर कैसे नियत्रंण हो पाएगा। यह देखने वाली बात होगी। महमूद ने पिछले कार्यकाल में ना तो किसी देश की बात सुनी और ना ही अमरीका जैसे देशों को घास डाली। धमकी देने की तो किसी की हिम्मत ही नहीं हुई। उल्टे ईरान इस स्थिति में था कि वो दूसरों के झगड़ों में मुखिया का रोल प्ले करे। इस बार के काल में ईरान इस राह पर ज्यादा छाती चौड़ी करके निकल सकता है। अब यह बात अमरीका को पसंद कैसे आ सकती है?

बढ़ता डर

देशपाल सिंह पंवार
टीम इंडिया का 20-20 विश्वकप ताज खतरे मे है। वेस्टइंडीज से हारने के कारण नहीं बल्कि जिस तरह टीम (?) हारी और खेल रही है उससे तो अब सेमीफाइनल में जाने के भी लाले पड़ गए हैं। एक और हार उसका बोरिया बिस्तर बांधने के लिए काफी है। यानि अब टीम को अगर सेमीफाइनल में पहुंचना है तो बाकी दोनों मैच जीतने होंगे। टीम जीतेगी ही यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। वैसे •भी क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है। यह थ्योरी इस लघु संस्करण में और सख्ती से लागू होती है। यानि कब-कौन, कैसे पल में मैच का नक्शा बदल दे, जीत जाए-कोई नहीं कह सकता। एक खिलाड़ी मैच छीन लेता है। वेस्टइंडीज के ब्रावो ने यही कर दिखाया। टीम इंडिया के लिए अब तक ऐसा एक खिलाड़ी इस टूर्नामेंट में कोई नहीं बन पाया। एक गलती मैच हरवा देती है-हमारी टीम अब तक हर मैच में गलती दर गलती करती जा रही है। वो लकी है कि अब तक टिकी हुई है। पर कब तक यह लाख टके का सवाल है। अगर यही चाल-ढाल और हाल रहा तो इंडियन टीम किसी भी समय हलाल हो सकती है। आज भी और 16 जून को •भी ,इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस ग्रुप में हम है वो बेहद मजबूत है। चारों ही टीमें बेहतरीन हैं। खासकर टीम इंडिया और दक्षिण अफ्रीका को तो हर विशेषज्ञ भी खिताब का दावेदार मान रहा है। ऐसे में यह आस सबको थी कि वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को हराकर धोनी की टीम सेमीफाइनल में प्रवेश कर लेगी । ऐसे में दक्षिण अफ्रीका से अगर हार भी गया तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पर कहावत है कि सोचा हुआ सारा हुबहू नहीं होता। धोनी की टीम वेस्टइंडीज से क्या पिटी, इंडियन जनता के सारे सपने भी बिखर गए और साथ ही आगे जाने के सारे गणित और समीकरण भी गड़बड़ा गए। अब उसे दोनों मैच जीतने होंगे। आज इंग्लैंड को भी हराना होगा और 16 को दक्षिण अफ्रीका को भी,सब जानते •ाी हैं और मानते •ाी हैं कि दक्षिण अफ्रीका कागज और मैदान दोनों जगह हर क्षेत्र में हमसे मजबूत है। ऐसे में यह मैच इस टूर्नामेंट का सबसे बड़ा मैच साबित हो सकता है। पर इससे पहले उसे इंग्लैंड से पार पानी होगी। अंग्रेज टीम कमजोर है पर इतनी •ाी कमजोर नहीं कि हलवे की तरह पेट में चली जाएगी। पीटरसन या बोपारा जैसा एक •ाी खिलाड़ी अगर चल गया तो धोनी की टीम के गले में कांटे की तरह फंस जाएगी। आज जो •ाी हारेगा वो टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगा। सवाल यही है कि क्या अपने दर्शकों के सामने अंग्रेज टीम का मिशन यहीं खत्म हो जाएगा या विश्व चैंपियन टीम इंडिया की पोल यहीं खुल जाएगी? इंडियन दर्शक पूजा कर रहे हैं। दुआ कर रहे हैं कि टीम किसी तरह जीत जाए। आस कर रहे हैं कि उनके सपने ना टूटें पर यह विश्वास कहीं न कहीं हिला और डिगा हुआ नजर आता है। टीम पूजा से नहीं जीत सकती उसे मैदान पर अपने जौहर दिखाने होंगे। सवाल यही पैदा हो रहा है कि धोनी की टीम का यह हाल क्यों है? सब जानते हैं कि किसी •ाी क्षेत्र में कोई •ाी बेहतर नतीजा पाने के लिए कई कारक होते हैं। अगर वो सौ फीसदी अपने-अपने रोल को अदा कर रहे हैं तो फिर जीत तय है। टीम की जीत के लिए महत्वपूर्ण होती है-एकजुटता, कर गुजरने का जुनून, लक्ष्य पर अर्जुन जैसी नजर, लगन, हौसला, शानदार कप्तानी और परिस्थितियों का तुरंत फायदा उठाने का फैसला साथ ही एटीट्यूड। पर कड़वा सच यही है कि इस बार धोनी ब्रिगेड मैदान पर टीम की तरह नजर ही नहीं आती। मैदान पर खिलाड़ी तो 11 दिखते हैं पर एक वो टीम नहीं जिसके लिए धोनी ब्रिगेड जानी जाती थी। व्यक्तिगत चेहरे दिख रहे थे। विकेट गिरने पर वो घेरा नजर नहीं आता जो सौरव गांगुली के समय की देन और टीम इंडिया की सबसे बड़ी उत्साह पैदा करने वाली रणनीति बन गया था। इस टूर्नामेंट में वेस्टइंडीज से पहले तक हम किसी मजबूत टीम के खिलाफ नहीं लड़े थे। उन मैचों में टीम ने तमाम गलतियां कीं। वेस्टइंडीज के खिलाफ तो सारे ही रिकार्ड़ तोड़ दिए। विकेट पर ना रन बना पाए और ना ही मैदान पर रोक पाए। ब्रावो या सिमंस या फिर चंद्रपाल ने जहां चाहे-वहां से चौक्के उड़ाए। मैदान में क्षेत्ररक्षक नजर ही नहीं आ रहे थे। हमने मान लिया था कि गेल आउट तो टीम फतह। जब तक गेल क्रीज पर थे। मैदान में धोनी की अच्छी कप्तानी नजर आ रही थी। मैच की रणनीति नजर आ रही थी लेकिन उनके आउट होते ही पता नहीं टीम को क्या हुआ कि सारे के सारे बेदम,बेबस नजर आए। महज चार ओवरों में मैच का नक्शा ही पलट गया। इस तरह की घटिया कप्तानी, घटिया गेंदबाजी, घटिया बल्लेबाजी और घटिया क्षेत्ररक्षण के सहारे कोई टीम खिताब जीत सकती है? मैदान पर खिलाड़ियों की बाडी लेंग्वेज ऐसी लग रही थी जैसे वे मजबूरी में खेल रहे हैं। उन्हें बस मैच पूरा करना है। नतीजा सबके सामने है। आंखों पर चढ़े चश्मों का कलर शायद इतना गहरा हो गया है कि टीम को अपनी खामियां नजर नहीं आ रही हैं। वे खेलने जाते हैं या फैशन करने। एक तो हमारी गेंदबाजी की कमजोरी जगजाहिर है उपर से धोनी इस तरह हर ओवर के बाद गेंदबाज बदल रहे थे जैसे पहले ही तय हो चुका हो कि अगर सबको ओवर नहीं मिलेगा तो वो अगले मैच की कप्तानी से हटा दिए जाएंगे। सरदार मेडन ओवर फैंकते हैं। अगले में हटा दिए जाते हैं। तेज गेंदबाज एक ओवर में लय पाता है। अगला कब मिलेगा बाट जोहता रहता है। धोनी ने प्रेस कांफ्रेस में जो ये बात कही है कि वे बदल गए हैं तो वह सच ही है। वो धोनी नजर ही नहीं आ रहा है जिसकी वजह से आज वो इस मुकाम पर है। ना उसकी कप्तानी बेहतर दिख रही है, ना उसकी बल्लेबाजी बेहतर दिख रही है और ना ही उसकी वाणी संयमित है। इस टूर्नामेंट में टीम इंडिया पूरी तरह बिखरी हुई है यह मानना होगा। सहवाग प्रकरण ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। असंतोष की खबरों ने कहीं न कहीं टीम का माहौल खराब किया है। अगर वो चोटिल थे और उन्होंने यह बात छुपाई तो फिर बोर्ड़ उन्हें टीम होटल में क्यों रखे हुए है? सहवाग जैसे खिलाड़ियों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास रहना ही चाहिए। वह तो भला हो युवराज का वो सही समय पर फार्म में हैं वरना लीग मैच में ही हमारा बोरिया बिस्तर बंध गया होता। जिस टीम में जज्बा ही नहीं दिखाई दे रहा हो उससे खिताब बचाने की उम्मीद महज पांच फीसदी है। इसके बावजूद अगर वो जीत गई । खिताब फिर ले आई तो इस यह करिश्मा भी होगा और क्रिकेट की अनिश्चितता की थ्योरी का एक और प्रमाण। खुदा करे वो जीत आएं। हर इंडियन यही चाहता है। (14।6.09)

बुधवार, 10 जून 2009

झूठ का रास्ता और सच के नारे

देशपाल सिंह पंवार
वैसे तो मैं विवादों से दूर ही रहता हूं खासकर पत्रकारिता के-लेकिन यमुना की तरह हर रोज काला होता पानी अब अपच हो रहा है। ना तो मैं प्रभाष जोशी जी की तरह ज्ञानी हूं और ना ही बाकी साथियों की तरह अनचाहे लेक्चर की डोज देने वाला पत्रकार। कारण इनकी डोज से अगर मेरा पेट खराब हो चुका है तो फिर मैं क्यों किसी का हाजमा और खोपड़ी खराब करूं। जिस तरह की पत्रकारिता और जिस कथित सच की ये मठाधीश डुगडुगी पीट रहे हैं, जनता से क्रांति का आह्वान कर रहे हैं इनसे यह पूछा जाना चाहिए कि अपने समय में इन्होंने कब, कहां और कैसे इस धंधे को मिशन में तब्दील करने के प्रयास किए? इन मठाधीश पत्रकारों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि आखिर इस राह पर चलने के लिए कितने पत्रकार इन्होंने पैदा किए? अगर किए तो ये धारा फिर मैली क्यों है? अगर नहीं कर पाए हैं तो फिर लेक्चर देने का क्या इन्हें नैतिक अधिकार है? क्या इन्हें याद है कि सच की राह पर चलने वाले कितने पत्रकारों की इन्होंने पीठ थपथपाई? पैर छूने वालों को छोड़कर कितनों को साथ लिया और कितनों का साथ दिया? दिल्ली के बाहर दिन-रात संघर्ष करने वाले कितने पत्रकारों के नाम इन्हें याद हैं? उन्हें बधाई देना तो दूर शायद ही उनके फोन तक रिसीव किए होंगे। अपना और अपनों का छोड़ कितनों का लिखा सच इन्हें याद है? क्या ये सच-सच बता सकते हैं कि कब-कब इन्होंने पद और कद का फायदा उठाते हुए पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों की हद लांघी? ऐसा हो ही नहीं सकता कि ऐसा ना किया हो। मुझे तो हैरत हो रही है कि कंबल ओढ़कर घी पीने वाले शब्दों के ये जादूगर किस खूबसूरती से खुद को पाक और दूसरों को नापाक बता रहे हैं। झूठ के रास्ते पर चलने वाले सच के नारे लगा रहे हैं। रात के जुगनुओं का अस्तित्व ना मानने वाले दिन में जुगनु पकड़ने का आह्वान कर रहे हैं। हकीकत यही है कि जब-जब और जब तक ये लोग उस सबसे बड़ी गद्दी पर रहे,चंद चेहरों के अलावा बाकी पत्रकारिता जगत इनके लिए दलित था और पत्रकार अछूत तथा अज्ञानी। आप इतिहास उठाकर देख लीजिए, 20-25 साल पहले जो गोल था, वही आज •भी है। बाद में पैर छूकर चाहे कोई नया बंदा चाहे इस गोल में चला गया हो लेकिन कम से कम ज्ञान के सहारे तो नहीं घुस पाया या बुलाया गया। हां इस कौम में शामिल जिस ज्ञानी की जब आंख खुली वो किनारा जरूर कर गया। तुम मुझे पंत कहो और मैं तुम्हें निराला-यूं ही चलती रहेगी हमारी धर्मशाला की थीम पर चलने वाली ये खास बिरादरी खुद को पत्रकारिता की बीम समझती है,खुश होती है और सच के नाम पर, जनहित की पत्रकारिता के नाम पर, पत्रकारिता के मूल्यों के नाम पर दूसरों की बलि लेने की कोशिश में जुटी रहती है। पुदीने के झाड़ पर चढ़ानें में जुटी रहती है। इनके दौर में भी यही होता था-खबर मत बनाओ पर तारीफ के कसीदे पढ़ते जाओ तो कोई टोकने वाला नहीं , रोकने वाला नहीं, बोलने और छूने वाला नहीं। ऐसे कोई एक नहीं कई गोल हैं। उनके अपने खोल हैं, ये सब अनमोल हैं, बजवाते घूम रहे ढोल हैं। इनके यहां ज्ञान जीरो-जात हीरो, सच जीरो-झूठ हीरो, यहां सिर्फ रीढ़ विहीन पत्रकारों की ही जरूरत है। इससे बड़ा मजाक और क्या होगा कि ऐसी फौज पैदा करने वाले ही क्रांति की उम्मीद कर रहे हैं? क्रांति के वाहक बनने की कोशिश कर रहे हैं। गोल के मोल की बदौलत नाम साथ में है। कलम हाथ में है जो चाहे लिख दो। शब्दों के मायाजाल को ही ये लोग असली पत्रकारिता मानते हैं। हकीकत यही है कि ऐसे सारे लोग माइंड सेट के शिकार हैं। पत्रकारिता को दो हिस्सोंं में खुद बांट रहे हैं और नई कौम को 30 साल पुराने रास्ते पर चलने को कह रहे हैं। आखिर युवा कौम से बूढ़ों की तरह चलने की अपेक्षा क्यों? खुद गले तक फुल हैं और जिनके पेट में दो रोटी किसी तरह जा रही है उनसे आस लगा रहे हैं कि वे पीछे-पीछे आएं, इनकी अलख जगाएं, घर वालों के हाथों में कटोरा पकड़ाएं और पत्रकारिता के इनके स्वहित मिशन को परवान चढ़ाएं। ईमानदारी की बात करना अच्छी बात है। उस पर चलना और भी अच्छी बात है। पर साथ ही समाज में हो रहे बदलाव को ना मानना कहां का ज्ञान है? हम सही-हमारा दौर सही-नई पत्रकारिता खराब-पुरानी पत्रकारिता सही। क्या ये मान लिया जाए कि आज देश में पत्रकारिता होती ही नहीं? इनके जमाने के साथ ही वो खत्म हो गई? एक शहर,एक अखबार के बाहर •भी दुनिया है। उसे जानने,समझने की जरूरत है। जो नहीं बदलते उन्हें समय बदल देता है। राजनीति के मैदान से ऐसे तमाम चेहरे इस बार गायब हो गए हैं शायद एक दिन पत्रकारिता को •भी चैन मिले। फिलहाल तो ये सब रेगिस्तान में खड़े हैं। आंखों में धूल है। ठौर की तलाश है। हल्ला करने पर शायद कोई ठौर मिल जाए। मंशा यही होगी। एक और बात-यह कहां का तुक है कि एक करप्ट आईएएस से एक धंधा करने वाले अखबार मालिक की तुलना की जा रही है। आईएएस ने अगर करप्शन किया है तो वह व्यक्तिगत है। घूस का धन सिर्फ उसके काम आएगा। अखबार मालिक अगर अपने अखबार का स्पेस बेचकर पैसा कमा रहा है तो उसका कुछ हिस्सा स्याही से लेकर दवाई तक में काम जरूर आएगा। विस्तार में काम जरूर आएगा। रोजगार पैदा करने में काम जरूर आएगा। जिस •भी अखबार मालिक की बात की जा रही है जाहिर सी बात है वहां से 5-7 हजार लोग जरूर अपना घर चला रहे होंगे। इस घराने ने धंधा करने और धंधों को बचाने व चलाने के वास्ते ही अखबार खोला होगा। अगर वो पैसा कमा रहे हैं तो इसमें गलत क्या है? अगर पैसा नहीं होगा तो पत्रकार कहां से होंगे? वैसे भी पत्रकारिता का मूल मंत्र जनहित है। इस बात से शायद ये कथित आत्ममुग्ध मठाधीश भी इनकार ना करें। अगर बात छिड़ ही गई है तो अखबार मालिक का नाम खोलने से पहले अब इस पर बहस हो जानी चाहिए कि चुनाव के दौरान नेताओं के दौरों की खबरों और उनकी तस्वीरों में क्या जनहित है? चुनाव के दौरान समाज में जहर घोलती उनकी कड़वी वाणी में क्या जनहित है? दूसरों की कमीज पर कीचड़ उछालने वाले नेताओं की घटिया सोच में क्या जनहित है? दूसरों की नाक काटने वाले नेताओं के बयान छापने में क्या जनहित है? अगर इसे ये जनहित मानते हैं तो फिर हम भी गलत हैं और वो अखबार सबसे बड़ा गुनाहगाह। जो चाहे सजा दो-जो चाहे फतवा सुनाओ। अगर ये जनहित नहीं है तो फिर लाख टके का सवाल यही है कि क्यों इन नेताओं को फ्री स्थान अखबार में दिया जाए? ऐसे नेताओं से इसकी कीमत अखबारों को वसूलनी ही चाहिए। ना जनता की गरज है ना अखबार की, गरज नेताओं की है। जिस दिन केवल मीडिया के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने का दौर खत्म हो जाएगा उस दिन राजनीति की आधी गंदगी अपने आप ही खत्म हो जाएगी। अगर प्रत्याशी काबिल है,असली जनसेवक है तो वो अपनी काबलियत से जीतें। मीडिया की हुंकार से नहीं। पीड़ा करप्ट और कमजोर नेताओं की-पेट में दर्द पत्रकारिता के मठाधीशों को। आखिर क्यों? संपादकों के हक पर डाका पड़ रहा है कहीं इसलिए तो नहीं। इससे इंकार नहीं किया जा सकता कि ये चलन पुरानी पत्रकारिता के दौर में सौ फीसदी था। नई पत्रकारिता में अब वहां है जहां खबर का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। संपादक ने बुलाया-रिपोर्टर को आदेश सुनाया-फलां नेता का ध्यान रखो। पत्रकार की क्या हिम्मत, जो मना कर जाए। अब इसमें किसे, कितना मिलता था या मिलता है, लेने वाले जानें। अब यह हिस्सा सीधे मालिक या अखबार के कोष में जा रहा है तो फिर हमें तकलीफ क्यों हो रही है? क्या ये मठाधीश बता सकते हैं कि इस देश में आजकल ऐसा कौन सा अखबार या संपादक है, जिसका नाम किसी दल, नेता,अफसर या सरकार के साथ ना जुड़ा हो। अगर ये सही है तो फिर चुनाव में सीधे पैसा लेकर खबर छापना गलत कैसे? शुक्र मनाइए इससे कुछ पत्रकार तो करप्ट होने से बच जाएंगे। यह तो पत्रकारिता का ही फायदा है। वैसे भी रामायण या धार्मिक ग्रंथ बेस कौन सा अखबार चल रहा है और कितने दिन चलाया जा सकता है? हो सकता है दूसरों को पढ़ाने वाले ये ज्ञानी पत्रकार चला सकते हों? इसमें कोई दो राय नहीं कि पत्रकारिता बस मन से की जा सकती है लेकिन अखबार या मीडिया का कोई •भी साधन धन से ही चलता है और धन विज्ञापन से आता है। विज्ञापन या तो सरकार देती है या बाजार। ऐसे में खबर आखिर किसके दबाव में होगी? मन पर तनी धन की गन का मुंह कौन फेर सकता है? या तो राजा की औलाद, या परिवार के प्रति गैर जिम्मेदार लोग। एक और आदर्श स्थिति हो सकती है -इन मठाधीशों में से कोई एक अपना अखबार या चैनल खोले, इस राह पर चलने वाले पत्रकारों के लिए रोजगार के द्वार खोले,कोरे कागजों को काला करते समय लिखे गए शब्दों की तर्ज पर हुबहू जनहित के बोल बोले, मुंशी प्रेमचंद के दौर की पत्रकारिता के पथ पर गाड़ी लेकर डोले तो पत्रकारिता •भी बच सकती है। इनकी चाह भी पूरी हो सकती है। मेरे जैसे निपट अनाड़ी पत्रकार को •भी असली राह की थाह मिल सकती है। काश ऐसा हो। हुआ तो बस दो वक्त की रोटी और रोजाना दो ज्ञान की बातों के मेहनताने में मैं इन मठाधीशों के नीचे ट्रेनी के रूप में 16 घंटे काम जरूर करना चाहूंगा। मैं •भी 24 साल से इस धंधे (मान जाओ) में हूं। उस राह पर चलने, सच बोलने और लिखने की सजा झेल चुका हूं। आगे कितनी झेलूंगा पता नहीं। इस दौर से ना जानें कितने गुजर चुके हैं और रोजाना गुजर रहे हैं। तमाम पत्रकारों पर लक्ष्मी बरसती देख चुका हूं। ये आज आदरणीय हैं। सरस्वती के पुजारियों को दो वक्त की रोटी के लिए जद्दोजहद करते देख चुका हूं। ये सब गुनाहगार हैं। इस अखबार मालिक का नाम खोलने से पहले इन लक्ष्मी पुत्र पत्रकारों की संपत्ति का ब्यौरा भी जनता को जरूर देना चाहिए ताकि यह सबको पता चले कि आखिर खेल-खेल में खेल कैसे हुआ? किस तरह पत्रकारिता का मिशन बेमेल हुआ? इस अखबार मालिक का नाम खोलने से पहले यह •भी जरूर बताया जाना चाहिए कि सरस्वती के पुजारी आज इस हालत में क्यों हैं? क्यों कभी इन मठाधीशों ने आवाज नहीं उठाई? अगर सच का यही रास्ता है तो फिर इस पर वे क्यों जाएं? ये रहनुमा पहले चलकर दिखाएं तो बात बनें। कड़वा सच यह •भी है कि काले हाथों को अखबार की फ्रैंचाइजी देने वाले नैतिकता का पहाड़ा पढ़ा रहे हैं? नाम खोलने से पहले यह •भी लिखा जाना चाहिए कि आखिर क्यों ऐसा किया गया? सलाह देना आसान है। रोजगार देना मुश्किल। क्यों किसी की रोजी-रोटी पर लात मारने की कोशिश करने वालों को मसीहा बनाने की कोशिश हो। इनके घरों में इतना बंदोबस्त पहले से है कि शायद ही जबरन उपवास की नौबत आई हो पर ऐसे खुशनसीब सब नहीं। जब भी हमें लिखना तो उनके घर के चूल्हे का ध्यान जरूर कर लेना चाहिए। उनमें आग जरूर रहे। पता है ना-मेहनतकशों को रोटी की भूख ज्यादा लगती है। उनका उपवास कुपोषण की ओर ले जाता है। बताओ- जिस बिरादरी का हर आदमी दूसरे की टांग खींचने और नाक काटने में जुटा हो वो मिशन की बात करती है, वो नैतिकता की बात करती है, दूसरों के घरों पर पत्थर फैंकती है तो इस पर हंसना चाहिए या रोना? मैं खुद को अज्ञानी मानता हूं। पत्रकारिता के बारे में सिर्फ इतना ही समझता हूं कि किसी तरह रोटी, कपड़ा,मकान, शिक्षा, दीक्षा,रोजगार, पानी, हवा, पर्यावरण, सेहत, इज्जत आदि मुद्दे मेन रहें। एक पत्रकार के नाते भी और एक संपादक के नाते •भी,इस तरह से कलम चलाई जाए कि उनका मोल देने और लेने वालों को उनकी सरल बोली में समझ में आ जाए। समाज के हर क्षेत्र के आदर्श चेहरों का सम्मान हो। वो मीडिया में स्थान पाएं ताकि सबकी चाह की ये राह बने। जरूरत सकारात्मक पत्रकारिता की है। ज्ञान बढ़ाने की है। ज्ञान बघारने की नहीं। भूखा तन घपलों-घोटालों की खबरों से नहीं भरता। ये बात पत्रकारों की समझ में आ जानी चाहिए। खासकर उनकी जिनके खाली हैं।

मंगलवार, 9 जून 2009

सबको आस

देशपाल सिंह पंवार
फिलहाल सारा देश उम्मीद के सहारे चल रहा है। बाजार आर्थिक मंदी जल्द दूर होने की उम्मीद कर रहा है। युवा वर्ग रोजगार की उम्मीद कर रहा है। जिनके पास रोजगार है वे ज्यादा सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जनता रोटी-कपड़ा और मकान की उम्मीद कर रही है। मजदूर अच्छी दिहाड़ी की उम्मीद कर रहा है। हर वर्ग,हर शख्स, हर घर, हर गांव, हर कस्बा, हर शहर, हर राज्य हर समय कुछ न कुछ उम्मीद कर रहा है। सारी उम्मीदें घूम फिरकर जिस गलियारे में गूंजती है वो है केंद्र सरकार का। देश की सत्ता का। जब सब उम्मीद कर रहे हैं तो फिर केंद्र सरकार ही पीछे क्यों रहे? प्रधानमंत्री भी उम्मीद कर रहे हैं कि इस वित्तीय साल में तमाम झंझावत के बावजूद देश सात फीसदी की विकास दर को हासिल करेगा। आर्थिक मंदी का उसपर असर हो रहा है लेकिन इतनी विकास दर हासिल करने में हम कामयाब होंगे। संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने आधारभू त ढांचा और सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए अधिक संसाधनों का वादा किया। सात फीसदी की विकास दर कैसे रहेगी यह तो वे नहीं बता पाए लेकिन अगर इसके आस पास रही तो इसका तर्क उन्होंने खोज लिया है। आर्थिक मंदी की एक ऐसी छत्र छाया सरकार के पास है जिसका नाम लेकर वैतरणी पार की जा सकती है। प्रधानमंत्री ने इसके संकेत भी दिए। कहा-मैं आपसे वादा तो नहीं करता कि आर्थिक मंदी का हम पर असर नहीं पड़ेगा लेकिन हम 8-9 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर हासिल करने में सक्षम होंगे। दुनिया की विकास दर चाहे गिर जाए पर हम सात फीसदी को हासिल करके रहेंगे। सवाल यही पैदा होता है कि क्या सरकार जनता की सारी उम्मीदों को पूरा कर पाएगी? क्या सरकार की ये उम्मीद पूरी हो पाएगी? जिस देश की आर्थिक विकास दर नौ को छू चुकी हो क्या वो सात फीसदी की दर से वे सारे सपने पूरे कर पाएगा जो जनता ने इस सरकार को चुनते समय देखे थे? इस बार वामदलों या अन्य अड़ियल सहयोगियों का दबाव भी सरकार के ऊपर नहीं है। ऐसे में अगर आर्थिक सुधारों की गाड़ी सरपट नहीं दौड़ पायी तो फिर किसका दोष? आर्थिक मंदी का असर उन देशों पर ज्यादा है जो खाने-पीने और दूसरी मूल जरूरतों के लिए दूसरों पर डिपेंड रहते हैं लेकिन हमारे साथ तो ऐसा नहीं है। यहां कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जो यहां पैदा ना होता हो। जरूरत इसी बात की है कि सरकारी स्तर पर करप्शन खत्म हो। 100 पैसे में से 90 पैसे धरातल पर खर्च करने का समय है। डकारने का नहीं। बाजार में मुद्रा आए। साथ ही नई एग्रीकल्चर नीति बनाई जाए। अगर खेती की जमीन पर इमारतें खड़ी हो जाएंगी तो फिर उत्पादन कहां से होगा? सरकार को इस बारे में सोचना होगा। साथ ही साथ मनमोहन सिंह को ये भी दिखाना होगा कि बिना दबाव की सरकार ज्यादा बेहतर राज कर सकती है और ज्यादा बेहतर सुविधाएं जनता को मुहैया कर सकती है। जनता की उम्मीद पर खरा उतरने से ही सरकार की उम्मीद भी पूरी होगी।

जाना हबीब तनवीर और ओमप्रकाश आदित्य का





देशपाल सिंह पंवार
कुदरत का नियम है-जो आया है, वो जाएगा। सबसे बड़ा शाश्वत सत्य मौत ही है। इसे कोई झुठला नहीं सकता। कुछ किस्मत की खाते हैं और कुछ कर्म की। अपनी पारी खेलकर सबको जाना होता है। अनगिनत लोगों के जाने का पता नहीं चलता लेकिन चंद चेहरे जिस तरह छोड़कर जाते हैं वो पल कष्टदायक तो होते हैं, आंखों को नम तो करते हैं पर साथ ही हमेशा के लिए अपनी अमिट छाप और अमिट याद दिलों में बसा जाते हैं। हबीब तनवीर एक ऐसे ही नाम हैं। जिनके इंतकाल से सारा देश उदास है। उनका जाना महज थियेटर जगत के लिए नहीं, महज छत्तीसगढ़ के लिए नहीं बल्कि सारे देश और समूचे रंगमंच जगत के लिए दुख की घड़ी है। थियेटर की दुनिया पर अमिट छाप छोड़ने वाले हबीब तनवीर तीन हफ्ते से सांस्कृतिक नगरी भो पाल में अस्पताल में भ र्ती थे जहां काल के क्रूर पंजों ने उन्हें हमसे छीन लिया पर वो जो देकर गए हैं उससे वे हमेशा दिलों में रहेंगे। एक सितंबर 1923 को रायपुर में जन्में हबीब शुरूआत में पत्रकार थे लेकिन बाद में उन्होंने रंगमंच की दुनिया को अपनाया। उन्होंने रंगमंच को लाहौर नहीं वेख्या, ओ जम्या नहीं और बाजार जैसे कालजयी नाटक तो दिए ही साथ ही अपने लेखन के जादू से आगरा बाजार और चरणदास चोर जैसे नाटक की रचना कर सारे जगत को अपना बना लिया। लेखक, निर्देशक, नाटककार,कलाकार के साथ-साथ जितने हुनर कालजयी चरित्रों में होने चाहिएं वे सब हबीब साहब में थे। उन्हें संगीत नाटक एकादमी, पद्यम श्री, पद्यम विभू षण जैसे सम्मान मिले पर जो सम्मान उनका जनता के दिलों में था उसके सामने हर अवार्ड फीका था। वे पांच दशकों तक जनता के दिलों पर राज करते रहे। 1972 से 78 तक संसद के उच्चसदन में रहे और सदन की गरिमा को बढ़ाया। हबीब साहब के कारनामों को चंद शब्दों में समेटना नामुमकिन है। वे जो लकीर खींचकर गए हैं, रंगमंच में वो हमेशा मील का पत्थर रहेगी। यह भी अजीब दुर्योग है कि जिस भो पाल में हबीब साहब ने अंतिम सांस ली उसी की सीमा में काव्य जगत की मशहूर हस्ती ओमप्रकाश आदित्य को कुदरत ने हमसे छीन लिया। विदिशा में बेतवा उत्सव से काव्यपाठ कर भो पाल आ रहे कवियों की गाड़ी सड़क हादसे का शिकार हो गई। ड्राईवर की नींद की झपकी ने हमसे ओमप्रकाश आदित्य, लाड़सिंह गुर्जर और नीरजपुरी की छीन लिया। जानी बैरागी और ओमव्यास घायल हैं। इन कवियों की मौत से स्तब्ध हैं। देश में कोई ऐसा काव्य मंच नहीं रहा जिसकी शान ओमप्रकाश आदित्य ने ना बढ़ाई हो। उनका अंदाज निराला था। उनके व्यंग निराले थे। वे देश के सबी कवियों में सबसे अलग और महत्वपूर्ण शख्सियत थे। मंच अब भी सजेंगे, पर आदित्य नहीं होंगे, उनकी कमी शिद्दत से हर कोई महसूस करेगा। 8 जून सोमवार का यह दिन हमेशा याद रहेगा, इसने हमसे मंच के नायक छीन लिए हैं। यादें रहेंगी उसे कोई दिन,कोई पल नहीं मिटा सकता।जहां तक हबीब तनवीर का सवाल है तो पांच दशक तक रंगमंच और जनता के दिलों पर राज करने वाले हबीब अहमद खान उर्फ हबीब तनवीर का जन्म एक सितंबर 1923 को छत्तीसगढ़ के रायपुर में हुआ था। ये हिंदी के प्रसिद्ध नाट्यकार,रंगमंच निदेशक, कवि और कलाकार थे। उन्होंने 1954 में आगरा बाजार तथा 1975 में चरनदास चोर जैसे नाटक लिखे। उन्होंने भो पाल में 1959 में नया थिएटर नाम की एक थिएटर कंपनी की स्थापना की। वर्ष 1982 में एडिनबर्ग अंतरराष्ट्रीय नाट्य उत्सव में उनके नाटक चरनदास चोर को फ्रिंग फर्स्ट अवार्ड मिला। इनके पिता का नाम हाफिज अहमद खान था जो पेशावर के थे। उन्होंने रायपुर के लाउरी म्यूनिसिपल हाई स्कूल से दसवीं की परीक्षा पास की और बाद में वर्ष 1944 में नागपुर के मोरिस कालेज से बीए पास किया। उसके बाद उन्होंने एमए करने के लिए एक वर्ष के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में पढ़ाई की। उन्होंने अपने जीवन के आरंभ में कविताएं लिखनी शुरू की। उन्होंने अपना नाम तनवीर रखा तथा उसके शीघ्र बाद में वे हबीब तनवीर के नाम से जाने जाने लगे। वर्ष 1954 में वे मुबंई गए तथा आल इंडिया रेडियो में बतौर प्रोडयूसर कार्य करने लगे। मुंबई में रहते हुए वे हिंदी फिल्मों के लिए गीत लिखने लगे तथा कुछ फिल्मों में अभी नय भी किए। उन्होंने प्रोग्रेसिव राइटर्स एसोसिएशन (पीडब्ल्यूए) ज्वाइन किया और एक अभी नेता के रूप में इंडियन पीपुल्स एसोसिएशन के आवश्यक अंग बन गए। बाद में जब ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज उठाने के कारण आईपीटए के प्रमुख सदस्य जेल चले गए तब उनको संगठन को चलाने के लिए कहा गया। वर्ष 1954 में वे दिल्ली गए और वहां कुसिया जैदा के हिन्दुस्तानी थिएटर में काम किया। उन्होंने बच्चों के थिएटर के लिए भी कार्य किया तथा अनेक नाटक लिखे। इसी दौरान उनकी मुलाकात सह निदेशक मोनिका मिश्रा से हुई और उन्होंने शादी कर ली। बाद में उसी वर्ष उन्होंने मिर्जा गालिब की पीढ़ी के बूढ़े उर्दू कवि नाजिर अकबराबादी के कृतियों पर आधारित अपना प्रथम नाटक आगरा बाजार लिखा। इस नाटक में उन्होंने स्थानीय निवासियों और दिल्ली के ओखला गांव के लोक कलाकारों का व्यवहार किया। उन्होंने इस नाटक को एक ऐसा रंग दिया जिसे इससे पहले थिएटर में पहले कदापि नहीं देखा गया था। यह एक ऐसा नाटक था जिसे रंगमंच पर खेलने की बजाय बाजार में खेला गया। अप्रशिक्षित रंगकर्मियों और लोक कलाकारों के साथ उनका यह फीलिंग बाद में उनके नाटकों में छत्तीसगढ़ के लोक कलाकारों को लेकर देखने को मिलता है। वर्ष 1955 में हबीब लंदन गए। उन्होंने रायल अकादमी आफ ड्रामैटिक आर्ट्स में प्रशिक्षण लिया तथा ब्रिस्टल ओल्ड विक थिएटर स्कूल में वर्ष 1956 में निदेशक का प्रशिक्षण लिया। अगले दो वर्षो तक वह यूरोप की यात्रा करते रहे तथा थिएटर संबंधी विभी न्न क्रिया कलापों का बड़ा ही बारीकी के साथ अध्ययन करते रहे। वर्ष 1956 में वह बर्लिन में आठ महीने रहे तथा इस दौरान उन्होंने बरटोल्ट ब्राट के अनेक नाटकों को देखा जिसका उनेक दिमाग पर गहरा असर पड़ा। संस्कृति से परे कहानियों तथा आदर्शो को व्यक्त करने के लिए उन्होंने अपने नाटकों में स्थानीय मुहावरों का प्रयोग किया। उनकी नाट्य शैली,प्रस्तुति तथा तकनीकी में सरलता देखी गई। इसके बावजूद उनके नाटक पापुलर हुए। वर्ष 1958 में हबीब लौटे और उन्होंने पूर्णकालिक निर्देशन का काम शुरू कर दिया। उन्होंने शुद्रक के संस्कृत नाटक मृचकट्टिका पर आधारित मिट्टी की गाड़ी प्रोडयूस की। यह छत्तीसगढ़ में उनका पहला महत्वपूर्ण प्रोडक्शन बना। लंदन से वापस लौटने के बाद वह छह लोक कलाकारों के साथ कार्य किए और यह उसी का नतीजा था। इसके बाद वह पीछे मुड़ कर नहीं देखे। वर्ष 1970से 1973 के दौरान उन्होंने थिएटर की एक बंदिश को तोड़ा। उन्होंने हिंदी बोलने वाले लोक कलाकारों की बजाए छत्तीसगढ़ी लोक कलाकारों को ज्यादा तरजीह दिया। बाद में उन्होंने छत्तीसगढ़ की एक गायन शैली पंडवानी पर प्रयोग करना शुरू किया। उनके नाटकों में क्षेत्रीयता की छाप देखने को मिली तथा लोक कलाकारों को व्यक्ति की आजादी मिली। उन्होंने 1972 में एक कामिक लोक कहानी पर आधारित छत्तीसगढ़ी नाच शैली पर गांव का नाम ससुर और मोर नाम दामाद नामक नाटक लिखा। इस नाटक में दिखाया गया कि एक बूढ़ा व्यक्ति एक जवान महिला के साथ प्यार कर बैठता है और वह महिला एक युवक के साथ bhaग जाती है। अपने जीवनकाल के दौरान हबीब ने रिचर्ड एटनबरो की फिल्म गांधी समेत नौ फिल्मों में काम किया। धार्मिक पाखंड पर आधारित उनके नाटक पोंगा पंडित को लेकर वर्ष 1990 में सबसे पहले विवाद शुरू हुआ। यद्यपि नाटक साठ के दशक से ही मंचित होता रहा, लेकिन बाबरी मस्जिद तोड़ने की घटना के बाद सामाजिक परिवेश में कटुता आ गई थी। हिन्दू कट्टरवादियों खासकर आरएसएस को उनका यह नाटक नागवार गुजरा और उसके समथर्को ने इसको लेकर हो-हल्ला किया। यहां तक की जहां नाटक मंचित हो रहा था वहां जाकर आरएसएस समथर्को ने प्रेक्षागृह खाली करवा दिया। इसके बावजूद वे अपने नाटक को देश में मंचित करते रहे। उनके छत्तीसगढ़ी लोक कलाकार ट्रूप ने वर्ष 1992 में असगर वजाहत के जिसने लाहौर नहीं देखा के साथ एक बार फिर तहलका मचा दिया। इसके बाद वर्ष1993 में उनका कामदेव का अपना बसंत ऋतु का सपना नाटक आया। वर्ष 2002 में नाटककार की भो पाल गैस ट्रेजडी पर आधारित का हिंदी रूपांतरण जहरीली हवा का उन्होंने निर्देशन किया। वर्ष 2005 में उनके जीवन पर एक वृतचित्र गांव का नाम थिएटर,मोर नाम हबीब बनायी गई। हबीब के जाने से छत्तीसगढ़ उदास है। सारा सारा रायपुर उदास है। सारा रंगमंच उदास है। उनकी यादें हमेशा हर दिल में रहेंगी। यह तय है।

रविवार, 7 जून 2009

क्रिकेट से खरबों का धंधा



देशपाल सिंह पंवार
वो जमाना गुजरे ज्यादा वक्त नहीं हुआ है जब क्रिकेटर रिक्शा से चलते थे। धाबों में खाते थे। फिर •भी मन से क्रिकेट खेलते थे। इसे नफासत का खेल कहा जाता था। चलाने वाले •भी मान-मर्यादा का ख्याल रखते थे और खेलने वाले भी, अंपायर की उंगली उठने से पहले क्रीज छोड़ने का चलन था। टेस्ट क्रिकेट का बोलबाला था और उसे ही इस खेल की आत्मा या जान कहा जाता था, माना जाता था। टेस्ट क्रिकेटर होना किस्मत की बात हुआ करती थी। अगर सफल हो गए तो यकीनन जन्म दिन से लेकर हर रन और हर विकेट की गाथा नींद से ज्यादा क्रिकेट के दीवानों को जुबानी याद रहती थी। किसी तरह यह दौर 80 के दशक तक चला। पानी के बुलबुले की तरह कैरी पैकर का दौर आया। ज्यादा फर्क नहीं पड़ा पर शारजाह में अब्दुल रहमान बुखातिर ने जिस तरह पैट्रो डालर इस खेल में झोंके और इस खेल को चलाने तथा खेलने वालों को डालर की चकाचौंध में डुबोया, धीरे-धीरे ये खेल नफासत से कहीं ज्यादा कमाई की चाहत का शो बनकर रह गया। मन और तन पर धन हावी हो गया। अब एक सीजन में अदना सा क्रिकेटर इतना कमा लेता है जितना पहले 20 साल में नहीं कमा पाता था। पर जनता के दिलों पर राज उसकी कमाई होती थी। अब जेब की कमाई ज्यादा मूल्यवान हो गई है। कंपनियों को एक लगाओ-सौ पाओ का रास्ता मिला, बोर्ड चलाने वालों,मैच दिखाने वालों को तिजौरी चमकाने का जरिया मिला,खिलाड़ियों को राजकुमारों की तरह रहने और बर्ताव करने की पिच मिली-ठगा गया तो सिर्फ दर्शक और टेस्ट क्रिकेट। बाजार की आंधी ने इतनी खूबसूरती से दर्शकों को मोहा कि उन्हीं के पैसे के बल पर सबकी जय हो रही है। वो देख रहा है क्रिकेट के नाम पर तमाशा। इस दौर के सुधरने की अब कोई भी नहीं है। क्रिकेट की आत्मा टेस्ट क्रिकेट को पहले वन डे फिर डे नाइट और अब 20-20 ने ऐसा कुचल दिया है कि अब इसकी सिसकियां किसी को नजर नहीं आतीं। ना इस पर रोने वाले नजर आते और ना ही इसकी बात करने वाले। पूरे साल सांस लेने और कुछ सोचने की दर्शकों को फुरसत ही नहीं लेने दी जाती। एक चैंपियंनशिप खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। हर साल खरबों का धंधा। बाजार में जमने, बाजार से कमाने और बाजार को चलाने के लिए आज क्रिकेट से बढ़िया कोई जरिया कंपनियों को नजर नहीं आता। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि जो बिकता है वो चलता है-फटाफट क्रिकेट पर आजकल हर बंदा मरता है की थीम का सूचकांक हर दिन बढ़ता ही जा रहा है। 20-20 विश्वकप से इसमें और इजाफा होगा। 17 दिन-27 मैच और महज 1080 ओवर का मेला। 216 देशों में सीधा प्रसारण। मात्र तीन टेस्ट के ओवरों से •भी कम का खेल पर कमाई इससे हजार गुणा ज्यादा। ऐसे में कोई क्यों ऐसी राह पर ना चले? किसी के दिल जलते हैं तो जलें। फिलहाल सबके दिलों दिमाग पर यही छाया हुआ है कि कौन जीतेगा? क्या हिंदुस्तान अपने खिताब की रक्षा कर पाएगा? या फिर हालैंड की तरह और उलटफेर होंगे? नामधारी टीमें धूल चाटती नजर आएंगी? 21 जून को लार्ड्स के मैदान में किसके सिर होगा ताज इसके बारे में चाहे कोई दावा फिलहाल ना किया जा सकता हो पर यह तय है कि जिस देश पर कंपनियों का राज होगा, कमाई से नाज होगा,उस देश का ही ऐसे मेले में सुरीला साज होगा। जहां तक इस 20-20 खेल की मूल अवधारणा का सवाल है तो इसमें फिटनेस का महत्वपूर्ण रोल है। साथ ही क्रिकेट के मूल मंत्र तुक्के का •भी बड़ा रोल है। उम्र के बंधन को कम से कम आईपीएल ने झुठलाने में मदद जरूर की है। अब यह नहीं कहा जा सकता कि केवल 30 से नीचे के ही क्रिकेटर इसमें सफल हो सकते हैं। दिमाग से ज्यादा जोश में खेलने की थीम भी काफी हद तक फ्लाप हो चुकी है। वही टीमें ज्यादा कारगर साबित होंगी जो हर ओवर में करो या मरो से ज्यादा 120 गेंदों को ध्यान में रखकर खेलेंगी। हर गेंद पर छक्के जड़ने की चाह ही जीत की असली राह नहीं है। इसमें बड़े नाम का भी ज्यादा महत्व नहीं है। क्रिकेट के जनक देश इंग्लैंड की अपनी ही धरती पर अंजान सी हालैंड की टीम के हाथों हार ने यह साबित भी कर दिया है। अगर अंग्रेज अपने खोल से बाहर रहकर खेलते तो हारने के दूर-दूर तक कोई चांस नहीं थे। क्रिस ब्राड से पूछा जाना चाहिए कि उसने हारने वाला रन ओवर थ्रो से क्यों दिया? अगर इंग्लैंड बराबर भी रहता तो बाद में पांच गेंदों के मुकाबले में जीत सकता था और टूर्नामेंट में कायम रह सकता था। अब वह आगे तभी जा सकता है जब वो पाकिस्तान को हराए और फिर हालैंड •भी पाक को हराए। इस विश्व कप में आगे और •भी उलटफेर हो सकते हैं। मौसम भी अपना रोल अदा करेगा और कई दिग्गजों से अंक छीन सकता है। ग्रुप में ए में हिंदुस्तान के साथ बांग्लादेश आगे जा सकता है बशर्ते आयरलैंड कोई कमाल ना कर जाए। ग्रुप बी में हालैंड और पाकिस्तान के चांस ज्यादा है। ग्रुप सी सबसे कठिन है। आस्ट्रेलिया, श्रीलंका और वेस्टइंडीज तीनों ही आगे जाने की हकदार हैं। वेस्टइंडीज ने आस्ट्रेलिया को रोंदकर अपने इरादे जता दिए हैं। अब दबाव में कंगारू टीम है। ग्रुप डी से न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका को ज्यादा खतरा नहीं है। स्काटलैंड से ज्यादा आस किसी को नहीं हैं। जो •भी टीम पहले दौर में एक मैच जीतेगी वह दूसरे दौर में अमूमन पहुंच जाएगी। कांटे की टक्कर दूसरे दौर से शुरू होगी। धोनी की टीम पाकिस्तान को हरा चुकी है। उससे उम्मीद हिंदुस्तानी दर्शकों को •भी है, बाजार को •भी है और विदेशी कंपनियों को भी, उनकी जय में ही सबकी जय है। फिलहाल तो क्रिकेट बेचने वालों की जय है। खेलने वालों की जय है। टीवी कंपनी की जय है। इस तमाशे से कमाई करने वाली कंपनियों की जय है। इस पर घर फूंककर तमाशा देखने वालों की भी जय है। देश की बेशकीमती श्रम शक्ति लुटाने वालों की •भी जय है। चाहे 20 के अंक को बुरे का सूचक मानने वाले ढेरों पर फिलहाल तो जय हो 20-20 की।

गुरुवार, 4 जून 2009

घटा जोश



देशपाल सिंह पंवार
किसी भी सरकार की दशा क्या रहेगी ये तो उसके कर्म और वक्त तय करता है लेकिन दिशा क्या होगी यह राष्ट्रपति के पहले संबोधन से तय हो जाता है। उसमें जिन बातों का उल्लेख होता है,विपक्षी दल,विशेषज्ञ और मीडिया उसी से सरकार की राह को ताकने और तौलने की कोशिश करते हैं। जहां तक जनता का सवाल है तो वो संबोधन से ज्यादा धरातल पर हो रहे विकास से तौलती है कि सरकार की राह सही है या गलत। यूं तो इस संबोधन की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितना लोकतंत्र लेकिन इस बार इसे कई मायनों में इतना ही लीक से हटकर माना जा सकता है जितनी 15 वीं लोकसभा ।इस में महिलाओं का वर्चस्व है। राष्ट्रपति पद पर महिला है। लोस स्पीकर भी महिला है। सत्ताधारी दल की सुपर पर्सन भी महिला है तो ऐसे में सरकार अगर महिला हित की तमाम योजनाओं को लाना चाहती है तो इसमें कुछ हैरत की बात नहीं। जिन वादों और इरादों की झलक दी गई है वे काफी पहले ही हो जाने चाहिए थे। सौ दिन के सरकार के एजेंडे के तहत महिला आरक्षण बिल का मसला भी है। राष्ट्रपति ने इसे पास कराने की सरकार की सोच बताई है। राज्यों में भी 33 फीसदी महिला आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन की बात की है। सवाल यही पैदा होता है कि सरकार करेगी कैसे? निचले सदन में चाहे जरूरी बहुमत हो लेकिन उच्च सदन में उसकी हालत पतली है। ऐसे में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और वामदल सरकार की इस मंशा को पूरा होने देंगे इस पर संदेह है। इस मसले पर आम राय बनने के आसार भी कम हैं। उच्चसदन में बहुमत तक इस मसले पर कुछ होगा मुश्किल लगता है। पंचायती और शहरी निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्य पहले ही दे चुके हैं इस पर सरकार को कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। संबोधन में जिन और इरादों को बताया गया है उसमें गंगा समेत सब नदियों की सफाई, सूचना की सार्वजनिक नीति, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि, स्वैच्छिक तकनीकी कोर, सामाजिक लेखा परीक्षा प्रमुख रूप से शामिल हैं। ये ऐसे इरादे हैं जो पूरा होने के बाद ही अपना असर दिखाएंगे वरना फाइल ही मोटी करेंगे। हां तीन साल में पंचायत स्तर पर इलैक्ट्रानिक शासन व्यवस्था को अगर सरकार ने लागू कर दिया तो यह फैसला क्रांति का वाहक हो सकता है। सरकार शिक्षा पर भी चिंतित तो नजर आती है पर देखना यही है कि यशपाल समिति की सिफारिशों पर कब उच्चतर शिक्षा परिषद का गठन होगा और कब नीतियां लागू होंगी? लोकहित नीतियों के ऐलान और उन पर अमल से कहीं ज्यादा इस देश में शिक्षा पर काम करने की जरुरत है। हर शख्स शिक्षित होगा तो देश जल्दी तरक्की करेगा। संबोधन में आंतरिक सुरक्षा नीति, विदेश नीति, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के मुद्दों पर ज्यादा जोर न देना कई संशय खड़े करता है। लंच की इच्छा रखने वाले शख्स का पेट नींबू पानी से नहीं पट सकता सरकार को आखिर कब यह सामान्य सी बात समझ में आएगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि संबोधन में वो जोश नहीं जगाता जो जनादेश से झलका था।

मीरा अब वीरा





देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तान की महानता के किस्सों से इतिहास अटा पड़ा है। हमारे लोकतंत्र की आन-बान और शान के प्रति सारी दुनिया आसक्त है। सब इस बात को जानते भी हैं और मानतऐ भी हैं कि लोकतंत्र हो तो हिंदुस्तान की तरह। इसी लोकतंत्र की इबारत में एक और सुनहरी पन्ना मंगलवार को उस समय जुड़ गया जब लोस अध्यक्ष की कुर्सी पर पहली बार कोई महिला और वो भी आसीन हुईं। मीरा कुमार एक ऐसा नाम जिन्हें हर कोई जानता है। राजनयिक से राजनेता बनीं मीरा कुमार का इस गद्दी पर बैठना हर हिंदुस्तानी के लिए गौरव की बात है। एक जमाने में सामाजिक विसंगतियों की जकड़न के लिए चर्चित इस देश ने एक नया इतिहास लिख डाला है। जिस तरह सदन में हर दल और हर नेता ने सारी हदों को तोड़कर एक सुर से उनका स्वागत और समर्थन किया है यह भी काबिले तारीफ है। इससे साफ जाहिर है कि राजनीति के क्षेत्र में भी अब नए अध्याय लिखे जाएंगे। मीरा कुमार की अध्यक्षता में भी संसद नए इतिहास कायम करेगी इसमें किसी को संदेह नहीं है। वो दिवगंत कांग्रेसी नेता जगजीवन राम की बेटी हैं। विदेश सेवा का उन्हें लंबा तजुर्बा रहा है। 85 से वे राजनीति में हैं। पांच बार सांसद चुनी जा चुकी हैं। उनकी स्वीकार्यता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वे बिहार की सासारामैं सीट से भी जीतती हैं और दिल्ली की करोलबाग सीट से भी । कई महकमों की मंत्री रह चुकी हैं। तमाम दौर देख चुकी हैं। सदन में तमाम दिग्गज नेताओं से सीख चुकी हैं। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि वे इस दायित्व को बखूबी निभा एंगी। सबको यही आस है। देखने वाली बात यही होगी कि वे किस तरह मुंह फट नेताओं को सदन में कंट्रोल करती हैं? फिलहाल तो उनके इस गद्दी पर बैठने से देश के सामाजिक ताने-बाने से वे सुर निकल रहे हैं जिन्हें सुनकर कदापि मन नहीं उबता। वैसे कुदरत का इंसाफ देखिए-देश का इतिहास हर दौर में नारी शक्ति के पन्नों को समेटता रहा है और लोकतंत्र में इसकी बयार और तेज बहने लगी है। इस समय देश की राष्ट्रपति महिला है। लोस की स्पीकर महिला है। देश के सबसे बड़े दल की मुखिया महिला है। देश के सबसे बड़े राज्य की मुख्यमंत्री महिला है। देश के सबसे बड़े गैर सरकारी बैंक की मुखिया महिला है। अगर सब गिनाने बैठा जाए तो पूरी किताब तैयार हो जाएगी। बाकी तमाम प्रतिष्ठित पदों पर भी महिलाओं का बैठना इस देश की गरिमा को भी दर्शाता है। सामाजिक ताने-बाने की मजबूती को भी दिखाता है। समाज में बराबरी के एहसास को भी बढ़ाता है। साथ ही चंद छोटी सोच के उन लोगों को भी चिढ़ाता है जो कहीं न कहीं महिलाओं के रोल, काबलियत और हक पर डाकामारी करने की घटिया नाकाम कोशिश करते रहते हैं। अब उस दिन का इंतजार है जब राजनीति में भी महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण का हक मिलेगा। ऐसा होगा यह तय है। हां कुछ ताकतें उसकी मियाद बढ़ा सकती हैं।

मंगलवार, 2 जून 2009

पहिए जाम

देशपाल सिंह पंवार
लंबी जद्दोजहद के बाद आखिरकार जनरल मोटर्स का दीवाला निकल ही गया। ग्लोबल कारपोरेट जगत में किसी कंपनी के दिवालिया होने की यह सबसे बड़ी घटना है। लेहमन ब्रदर्स और क्रिसलर कंपनी पहले ही मंदी की बलि चढ़ चुकी हैं। यूं तो सबको इसकी आशंका काफी समय से थी लेकिन जिस तरह अमरीका के वित्तीय संस्थान कंगाल होते जा रहे हैं, सौ साल पुरानी जनरल मोटर्स के पहिए जाम होने से अमरीका की हालत और पतली हो जाएगी, यह तय है। ना केवल अमरीका की बल्कि सारी दुनिया पर इसका असर पड़ना तय है। वैसे तो दावे किए जा रहे हैं कि हिंदुस्तान इससे अछूता रहेगा लेकिन हिंदुस्तान में निर्माणाधीन इंजन ट्रांसमिशन प्लांट के लिए कंपनी को धन जुटाने में दिक्कतें आने लगी हैं। कर्ज देने वाले असमंजस में है। कंपनी की लगातार बिक्री घटती जा रही है।कंपनी को हिंदुस्तान में 20 करोड़ डालर चाहिए लेकिन दिवालिया होने के बाद जो वित्तीय संस्थान आगे कदम बढ़ा रहे थे उन्होंने •भी पैर वापस खींच लिए हैं। इससे विदेशी पूंजी निवेश की मनमोहन की प्रक्रिया को भी धक्का लगने की आशंका पैदा हो गई है। इतना ही नहीं नई युवा पीढ़ी की आशाओं पर भी कुठाराघात हुअ है। जहां तक अमरीका का सवाल है तो क्रिसलर के बाद ओबामा के कार्यकाल का यह एक और काला दिन माना जा रहा है। जनरल मोटर्स और क्रिसलर के दिवालिया होने से तकरीबन ढाई लाख लोगों के बेरोजगार होने का खतरा तो मंडरा ही रहा है साथ ही ओबामा सरकार की नीतियों के प्रति भी अमरीकी जनता में अविश्वास पैदा होने का डर सताने लगा है। जब ओबामा ने अमरीका की बागडोर थामी थी तो सारी जनता और सारी दुनिया को यही आस थी कि वे अपने जादुई चरित्र की तरह कोई जादू की छड़ी जरूर घुमाएंगे और सारी दुनिया को मंदी के संकट से निकालने में कामयाब हो जाएंगे लेकिन ये हो नहीं सका। मंदी के जाने की आस लगाई सारी दुनिया को जनरल मोटर्स के दिवालियापन ने फिर डरा दिया है। बाजार में मांग घटने का खतरा फिर मंडराने लगा है। मांग घटेगी तो मंदी से आने वाले समय में निजात मिलने के आसार नहीं हैं। जनरल मोटर्स काफी समय से बेलआउट पैकेज की सांस के सहारे जिंदा थी। वह और धन चाह रही थी लेकिन ओबामा इस पर तैयार नहीं हुए। जैसे ही दबाव में दिवालिएपन के लिए कंपनी ने सोमवार को आवेदन किया तो शेयरों के दाम 32 फीसदी लुढ़क गए। जीएम को कर्ज देने वाले भी अरबों डालर की चपत लगवा बैठे। लक्ष्मीनारायण मित्तल समेत तमाम कर्जदाताओं की कुल रकम 172 अरब डालर से ज्यादा है जबकि कंपनी की कुल संपत्ति 82 अरब डालर है। ऐसे में इसकी देनदारी चुकता होने का सवाल ही पैदा नहीं होता। हां दिवालिया होने के बाद समझौते के तहत कंपनी में 60 फीसदी हिस्सेदारी अमरीका सरकार ने खरीद ली है। नतीजन जनरल मोटर्स अब गवर्नमेंट मोटर्स कहलाएगी। लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि कितने दिन? सरकार खुद इससे निकलना चाहती है। दूसरी कंपनियां इस खाली जगह को हथियाना चाहती हैं लेकिन साथ ही साथ मंदी से बंदी की ओर जाने का डर भी उन्हें सता रहा है। सौ दिन पुरानी इस कंपनी के बंद होने से बाजार अब कितने दिन में संवरेगा यह देखने वाली बात होगी।

सोमवार, 1 जून 2009

रेल: खेल-खेल में खेल



देशपाल सिंह पंवार
लंबे अरसे से रेल बिहार की बपौती रही है। सरकार चाहे किसी की भी बनीं 20 साल से अमूमन ज्यादातर बिहारी नेता तो रेल मंत्रालय चलाते रहे और बिहार की जनता मनमाने ढंग से रेल हांकती रही, रोकती रही। रेल बजट भी बिहार पर मेहरबान रहा और दूसरे राज्यों को मिले हक का काफी हद तक फायदा भी बिहार को होता रहा। शायद ही देश का कोई हिस्सा ऐसा हो जो बिहार के प्रमुख शहरों या कस्बों से रेल के जरिए ना जुड़ा हो। इतना ही नहीं सारे बिहार में भी रेल का जाल फैला है-लालू, राबड़ी के गांव तक। बिहार में यह आवागमन का सबसे बेहतर विकल्प भी है। कारण लालू-राबड़ी राज में सड़कों का नामोंनिशान नहीं था। सड़क से आना-जाना मुश्किल होता था। इसलिए रेलवे से बेहतर कुछ नहीं था। लंबे अरसे से रेल से चलने की आदत पड़ चुकी थी। लगातार सुविधाएं और रेलें बढ़ती चली गई। किसी भी कारण से हो पर यह बिहार के हित में था। होना भी चाहिए। देश के हर राज्य में ये स्थिति होनी चाहिए। सब जगह रेल का जाल फैला होना चाहिए ताकि सड़कों पर बढ़ते दबाव को किसी हद तक कम किया जा सके। लेकिन अरसे से वीआईपी सुविधा उठाने की आदत के चलते यह मान लेना कि वे जहां चाहेंगे-रोकेंगे, जैसे चाहेंगे-चलाएंगे की सोच विकसित होना गलत है। बिहार का वो तबका जो कहीं न कहीं लालू से सीधे और अप्रत्यक्ष रुप से जुड़ा था वह यही सोच रखता है। इसका कारण यही है कि जिस तरह लालू राज में रेलें चलती रहीं उससे वो यह मान बैठे थे कि रेल उनकी संपत्ति है। रेलवे की थीम-रेल आपकी संपत्ति है को तो उन्होंने पूरी तरह अपना लिया लेकिन उसकी आगे की लाइन-इसकी सुरक्षा करें को पढ़ने और उस पर अमल करने की उन्होंने जरूरत महसूस नहीं की। जब चाहो-जहां चाहो रेल रोक लो, बिना टिकट यात्रा करो। कोई मुंह खोले तो उसकी पिटाई करो। इसकी आदत उन्हें पड़ गई। रोकने वाला या टोकने वाला या फिर बोलने वाला कोई था नहीं। यह ढर्रा लंबे अरसे से चला आ रहा था। लालू राज में तमाम बड़ी-बड़ी ट्रेनें बहुत छोटी-छोटी जगहों पर थमती रही। यहां से कोई आमदनी भी नहीं होती थी पर रेल अपनी है तो ठहरना तो उसे पड़ेगा ही। इसी दौर में ये 33 हाल्ट बनें जिनकी मियाद 28 मई को खत्म हो गई थी। जैसे ही इसकी जानकारी जनता को हुई तो उसका मूड खराब हो गया। नतीजा तीन ट्रेन राख-करोड़ों की संपत्ति स्वाहा। फैसला बदलने को रेल मंत्रालय मजबूर। कहने को तो रेलवे के ठहराव पर जनता का गुस्सा उबला पर कहीं न कहीं इसके पीछे दूसरे भी कारण हैं। पहला-लालू की जगह ममता का गद्दी पर बैठना,अनचाही दुश्मनी की दीवार का खड़ा होना। दूसरा-इसी से जुड़ा है, रेलवे पर अब बिहार का राज ना रहना और तीसरा-इस बात का एहसास कराना लालू के हटने के बावजूद बिहार का हक कोई नहीं छीन सकता। साथ ही एक तबके की यह संदेश देने की भी कोशिश है कि लालू के हटते ही बिहार के साथ अन्याय होने लगा है। आगे और कड़े फैसले ना हो, यह आगजनी दबाव की राजनीति का भी हिस्सा है। वरना जिन हाल्ट को लेकर रेलवे को करोड़ों रुपए की चोट पहुंचा दी गई वे पटना से महज चंद किमी की दूरी पर ही हैं। सब जानते हैं कि सांसदों की सिफारिश पर हाल्ट बनते हैं और आमदनी के हिसाब से उन्हें जारी रखा जाता है तो फिर इसमें रेल,रेलवे और ममता का क्या दोष? लाख टके का सवाल यही है कि अगर लालू सत्ता में होते और यही फैसला होता तो क्या ट्रेन जलती? साथ ही अगर इन 33 हाल्ट से रेलवे को कोई फायदा नहीं हो रहा था तो चंद लोगों के फायदे के लिए रेल को आखिर यहां रोका क्यों जाए? लेकिन पटना के पास जब तीन रेल जल रही थी तो दिल्ली में फैसला बदला जा रहा था। कारण-15 वीं संसद का पहला दिन था। नई रेलमंत्री कहीं से भी यह एहसास नहीं करानी चाहती थी कि वे बिहार के प्रति बायस हैं। पर जिस तरह से इस आगजनी के बाद तुरंत फैसला बदला गया उसके दूरगामी नतीजें जरूर होंगे। यह या इससे भी ज्यादा विकट स्थिति आगे भी आएगी। बंगाल से निकली ममता की ट्रेन को बिहार से ही गुजरना होगा। अगर उसे पटरी पर दौड़ना है तो बिहार का ख्याल रखना ही होगा। लालू चाहेंगे कि बार-बार ऐसी विकट स्थिति आए और जनता उनके राज को याद करे। जितनी ज्यादा हालत बिगड़ेगी उतना ही बिहार में लालू को फायदा होगा। ऐसे में ममता को काफी एहतियात से लालू की रेल को चलाना होगा। यह ट्रेलर है इससे बड़ी घटनाओं और वारदातों के लिए मनमोहन सरकार को भी एलर्ट रहना होगा। वैसे भी इस देश में अब कोई न कोई ऐसा सख्त कानून जरूर बन जाना चाहिए जिससे देश में किसी का भी फोकट का गुस्सा गरीब रेल पर ना उतरे। इससे बड़ी शर्मनाक स्थिति और क्या हो सकती है कि देश में जब जो चाहता है-20-30 लोगों को लेकर रेल रोक लेता है। रेलों में आग लगा देता है। ऐसे देश विरोधी लोगों से सख्ती से निपटा ही जाना चाहिए। ममता और मनमोहन की या तो समझ में आ गया होगा या जितनी जल्दी हो समझ लेना चाहिए कि लालू रेल मंत्री पद से हटें हैं, रेल बिहार की जनता के दिलोदिमाग से नहीं हटी है। इस बार ना तो कोई बिहार से मंत्री हैं। ना लालू-पासवान और नीतीश में से किसी की पार्टी केंद्र में शामिल है ऐसे में अगर रेल के मसले पर ये तीनों नेता एक हो गए तो मनमोहन सरकार को और विकट हालात झेलने पड़ सकते हैं। जिस दिन जनता के मन में यह पूरी तरह बैठ गया कि रेल उससे छीनी जा रही है उस दिन लालू को फायदा हो या नहीं पर हाथ का साथ सब छोड़ देंगे।