
देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तान को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि यहां जनता का राज है। जनता जनार्दन है। वही तय करती है कि कौन बनेगा राजा और किसकबजेगा बाजा? यह भी माना जाता है कि जनता सब जानती है। कितना यह कोई नहीं बता पाता। ना जनता जता पाती। शायद वो भी सब नहीं जानती। ना जानना चाहती। या फिर जानकर अंजान बने रहना चाहती है। नतीजा यह बस एक वाक्य नजर आता है, जिसके सहारे लोकतंत्र की बीन बज रही है। अगर जनता का राज है तो फिर वो ऐसा क्यों है? क्या जनता ऐसा ही राज चाहती है? क्या जनता इसी हाल में रहना चाहती है? अगर जनता सब जानती है तो फिर वो पूर्ण बहुमत किसी को क्यों नहीं देती? राजनीति से अपराधियों का सफाया क्यों नहीं करती? दल-बदलुओं को सबक क्यों नहीं सिखाती? राजनीति से करप्ट चेहरों को बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाती? हकीकत यही है कि वो बस एक वोटर है। वोट दिया काम खत्म। वो किसी की सरकार बना सकती है पर कौन बनेगा पीएम यह तय करना उसके हाथ में नहीं। वो जिनको चुनकर भे जती है यह जिम्मा उनका। वो जिस तरीके से चुनते हैं यह किसी से नहीं छिपा है। ना जनता से ना लोकतंत्र की आत्मा से। गठजोड़ की राजनीति और राजनीति के गठ जोड़ जिस तरह चुनाव से पहले बनते और खुलते हैं वह हैरतअंगेज है। चुनाव में जिन्हें कोस-कोसकर दल वोट की गुहार लगाते हैं। अगले पल संख्या बल जुटाने के वास्ते उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर यह जताते हैं-हम एक हैं, हम करेंगे राज। हमें दो ताज। गाज गिरती है जनता पर। वो जिसे अपना शुभ चिंतक दल या नेता मानती है और जिसके खिलाफ अपना वोट देती है, उनकी अचानक दोस्ती धीरे से जोर का झटका दे जाती है। वो देखती चली जाती है। ये क्या हुआ बोलती चली जाती है। क्यों हुआ सोचती रह जाती है। नेताओं की मदमस्त चाल है। इस चाल ढाल से जनता हलाल है, जनता के हाल से लोकतंत्र लाल है। लोकतंत्र के हाल से देश बेहाल है। ये कैसा लोकतंत्र है- जहां जनता कंगाल और नेता मालामाल। फन से भी - मन से भी -धन से भी -गन से भी और जन से भी,जनता के पास ना तो धन है और ना ही गन-है तो सिर्फ कंगाल तन। जब तक उसमें जान है तो नेताओं का मस्त जहान है। देखते रहिए इस ना खत्म होने वाली फिल्म को-जहां हर पल, हर सीन में एक साथ कहीं खुशी-कहीं गम है। इसके बावजूद नेता और जनता हमकदम है। है ना मेरा देश महान।
हिंदुस्तान को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि यहां जनता का राज है। जनता जनार्दन है। वही तय करती है कि कौन बनेगा राजा और किसकबजेगा बाजा? यह भी माना जाता है कि जनता सब जानती है। कितना यह कोई नहीं बता पाता। ना जनता जता पाती। शायद वो भी सब नहीं जानती। ना जानना चाहती। या फिर जानकर अंजान बने रहना चाहती है। नतीजा यह बस एक वाक्य नजर आता है, जिसके सहारे लोकतंत्र की बीन बज रही है। अगर जनता का राज है तो फिर वो ऐसा क्यों है? क्या जनता ऐसा ही राज चाहती है? क्या जनता इसी हाल में रहना चाहती है? अगर जनता सब जानती है तो फिर वो पूर्ण बहुमत किसी को क्यों नहीं देती? राजनीति से अपराधियों का सफाया क्यों नहीं करती? दल-बदलुओं को सबक क्यों नहीं सिखाती? राजनीति से करप्ट चेहरों को बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाती? हकीकत यही है कि वो बस एक वोटर है। वोट दिया काम खत्म। वो किसी की सरकार बना सकती है पर कौन बनेगा पीएम यह तय करना उसके हाथ में नहीं। वो जिनको चुनकर भे जती है यह जिम्मा उनका। वो जिस तरीके से चुनते हैं यह किसी से नहीं छिपा है। ना जनता से ना लोकतंत्र की आत्मा से। गठजोड़ की राजनीति और राजनीति के गठ जोड़ जिस तरह चुनाव से पहले बनते और खुलते हैं वह हैरतअंगेज है। चुनाव में जिन्हें कोस-कोसकर दल वोट की गुहार लगाते हैं। अगले पल संख्या बल जुटाने के वास्ते उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर यह जताते हैं-हम एक हैं, हम करेंगे राज। हमें दो ताज। गाज गिरती है जनता पर। वो जिसे अपना शुभ चिंतक दल या नेता मानती है और जिसके खिलाफ अपना वोट देती है, उनकी अचानक दोस्ती धीरे से जोर का झटका दे जाती है। वो देखती चली जाती है। ये क्या हुआ बोलती चली जाती है। क्यों हुआ सोचती रह जाती है। नेताओं की मदमस्त चाल है। इस चाल ढाल से जनता हलाल है, जनता के हाल से लोकतंत्र लाल है। लोकतंत्र के हाल से देश बेहाल है। ये कैसा लोकतंत्र है- जहां जनता कंगाल और नेता मालामाल। फन से भी - मन से भी -धन से भी -गन से भी और जन से भी,जनता के पास ना तो धन है और ना ही गन-है तो सिर्फ कंगाल तन। जब तक उसमें जान है तो नेताओं का मस्त जहान है। देखते रहिए इस ना खत्म होने वाली फिल्म को-जहां हर पल, हर सीन में एक साथ कहीं खुशी-कहीं गम है। इसके बावजूद नेता और जनता हमकदम है। है ना मेरा देश महान।
