मंगलवार, 12 मई 2009

मेरा देश महान











देशपाल सिंह पंवार
हिंदुस्तान को सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश कहा जाता है। यह भी कहा जाता है कि यहां जनता का राज है। जनता जनार्दन है। वही तय करती है कि कौन बनेगा राजा और किसकबजेगा बाजा? यह भी माना जाता है कि जनता सब जानती है। कितना यह कोई नहीं बता पाता। ना जनता जता पाती। शायद वो भी सब नहीं जानती। ना जानना चाहती। या फिर जानकर अंजान बने रहना चाहती है। नतीजा यह बस एक वाक्य नजर आता है, जिसके सहारे लोकतंत्र की बीन बज रही है। अगर जनता का राज है तो फिर वो ऐसा क्यों है? क्या जनता ऐसा ही राज चाहती है? क्या जनता इसी हाल में रहना चाहती है? अगर जनता सब जानती है तो फिर वो पूर्ण बहुमत किसी को क्यों नहीं देती? राजनीति से अपराधियों का सफाया क्यों नहीं करती? दल-बदलुओं को सबक क्यों नहीं सिखाती? राजनीति से करप्ट चेहरों को बाहर का रास्ता क्यों नहीं दिखाती? हकीकत यही है कि वो बस एक वोटर है। वोट दिया काम खत्म। वो किसी की सरकार बना सकती है पर कौन बनेगा पीएम यह तय करना उसके हाथ में नहीं। वो जिनको चुनकर भे जती है यह जिम्मा उनका। वो जिस तरीके से चुनते हैं यह किसी से नहीं छिपा है। ना जनता से ना लोकतंत्र की आत्मा से। गठजोड़ की राजनीति और राजनीति के गठ जोड़ जिस तरह चुनाव से पहले बनते और खुलते हैं वह हैरतअंगेज है। चुनाव में जिन्हें कोस-कोसकर दल वोट की गुहार लगाते हैं। अगले पल संख्या बल जुटाने के वास्ते उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर यह जताते हैं-हम एक हैं, हम करेंगे राज। हमें दो ताज। गाज गिरती है जनता पर। वो जिसे अपना शुभ चिंतक दल या नेता मानती है और जिसके खिलाफ अपना वोट देती है, उनकी अचानक दोस्ती धीरे से जोर का झटका दे जाती है। वो देखती चली जाती है। ये क्या हुआ बोलती चली जाती है। क्यों हुआ सोचती रह जाती है। नेताओं की मदमस्त चाल है। इस चाल ढाल से जनता हलाल है, जनता के हाल से लोकतंत्र लाल है। लोकतंत्र के हाल से देश बेहाल है। ये कैसा लोकतंत्र है- जहां जनता कंगाल और नेता मालामाल। फन से भी - मन से भी -धन से भी -गन से भी और जन से भी,जनता के पास ना तो धन है और ना ही गन-है तो सिर्फ कंगाल तन। जब तक उसमें जान है तो नेताओं का मस्त जहान है। देखते रहिए इस ना खत्म होने वाली फिल्म को-जहां हर पल, हर सीन में एक साथ कहीं खुशी-कहीं गम है। इसके बावजूद नेता और जनता हमकदम है। है ना मेरा देश महान।

तेलंगाना का गाना


देशपाल सिंह पंवार

वो केंद्रीय मंत्री रहा पर नाम ज्यादा जाना पहचाना कदापि नहीं रहा। नेता भी जाना -माना कभी नहीं रहा। आंध्र प्रदेश में तो उसे सब जानते हैं पर देश में उसकी जितनी चर्चा आज तक कुल मिलाकर नेतागिरी में हुई होगी उतनी पिछले दो दिन में वो बटोर चुका है। वो परसों टीडीपी के साथ था। कल तीसरे मोरचे के साथ था। आज राजग के साथ है। कल कहां होगा ये उसे तय नहीं करना-उन्हें तय करना है जो उसकी मांग पूरी करेंगे। जो सत्ता में आने पर मांग मानेगा उसके साथ वो होंगे। जरूर होंगे यह तय है। हां नेता हैं कोई बात दावे से नहीं कही जा सकती। उसकी एक ही मांग है अलग तेलंगाना राज्य। अलग राज्य से ज्यादा और उससे कम उसे कुछ नहीं चाहिए। दे सकते हो तो हां करो वरना दूसरा घर तलाशने में वो वक्त जाया नहीं करता। वो फैसले लेने में कभी वक्त नहीं लगाता। इस मसले पर वो आधा दर्जन बार मिनटों में बड़े फैसले कर चुका है। टीडीपी छोड़ चुका है। पार्टी बना चुका है। दो बार मंत्री पद छोड़ चुका है। डिप्टी स्पीकर पद छोड़ चुका है। दो बार सांसदी छोड़ चुका है। अपने चार सांसदों और 16 विधायकों से पद छुड़वा चुका है। वादा खिलाफी पर कांग्रेस से नाता तोड़ चुका है। चाहे किसी मसले पर कोई नेता अगर इतनी बार फैसले कर चुका हो, कुर्बानी दे चुका हो,तो उसे किसी का साथ छोड़ने या किसी के साथ जाने में भला क्या गुरेज हो सकता है? उसे है भी नहीं। उन नेताओं से वो लाख गुणा अच्छा जो जिनका गद्दी के अलावा कोई सिद्धांत नहीं, कोई मकसद नहीं। कम से कम उसका मकसद तो है। मकसद •भी ऐसा जो ना तो मिनटों में पूरा होगा और ना ही आसानी से। ये बात वो •भी जानता है। या कहा जाए इससे आगे की जानता है। वो उस पुरानी कहावत को बदल रहा है जिसमें ना नौ मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी की बात कही गई है। नौ मन तेल ना हो पर उसकी राधा तो नाच ही रही है। वो अलग तेलंगाना राज्य का नारा लगाता आ रहा है, जनता जिताती आ रही है, उसकी पार्टी मजबूत होती जा रही है। नहीं पूरा हुआ तो भी जीतेगा और अगर हो गया तो फिर पांचों उंगलियां घी में। जिस तेलंगाना की धरती को वो अलग राज्य में बदलना चाह रहा है वहां पर फिलहाल उसे टक्कर देने की स्थिति में कोई नहीं है। वो इतना कर चुका है कि जब तक ये नाम नारों में रहेगा उसका ताज रहेगा। जब ये कागजों में होगा तो उसका राज होगा। उसे पावर चाहिए,उसका साथ चाहने वालों को पावर चाहिए और उस जनता को अलग राज्य जिसे वो हर पग पर यही बताता और दिखाता आ रहा है कि वो अलग राज्य के लिए दर-दर ठोकर खा रहा है। यह विश्वास दिला रहा है कि एक दिन नया जमाना आएगा। कब ये ना उसको पता-ना उनको जिनके पास वो जितने दिन रहता है। जैसे ही सवाल पैदा होने लगते हैं वो फिर पुरानी कहानी दोहरा देता है। कहकर चल देता है या तो तेलंगाना दो वरना इस्तीफा थामो। इस बार राजग के साथ है। क्या राजग सत्ता में आकर तेलंगाना राज्य की ईंट रखेगा? इस पर उसका यही कहना है अगर वादा नहीं पूरा किया तो इन्हें •भी जय श्रीराम। यानि सिलसिला यूं ही चल सकता है। उसका इतिहास ही ऐसा है। वो ऐसे ही काम करता है। सोचिए जो शख्स गल्फ देशों में नौकरी पर मजदूरों को ठेलने का धंधा करता रहा हो, उनके पासपोर्ट आदि बनवाकर पैसे कमाने का काम करता हो वो शख्स अगर वहां अपनी दुनिया बसा सकता है तो फिर जहां वो पैदा हुआ वहां इस ख्वाब को पूरा करने की जंग क्यों ना लड़े? अटल सरकार में जब छत्तीसगढ़, झारखंड और उत्तराखंड जैसे राज्य बने तबसे जनता का उस पर काफी दबाव है। उसे जबाव देते-देते कई बार वो बेचैन हो जाता है। राजग में आकर वो यही समझा रहा है कि यही गठजोड़ छोटे राज्यों का हिमायती है। 55 साल का दुबला-पतला यह शख्स छोटे राज्य के नाम पर कितनी बड़ी राजनीति करता है समझ लीजिए। देखते रहिए और इंतजार करिए या तो इस्तीफे का या फिर नए दोस्त का। कलवाकुंतला चंद्रशेखर राव 0-17 फरवरी,1954 को आंध्र प्रदेश के चिंतामड्डका (मेढक) में जन्म। पत्नी शोभा और एक बेटा के रामाराव तथा बेटी कविता। उस्मानिया विवि हैदराबाद से एमए (लिटरेचर) की डिग्री। पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति की। बाद में गल्फ देशों में नौकरी दिलाने तथा पासपोर्ट बनवाने का धंधा किया। 85 में तेलुगु देशम से राजनीति की शुरूआत। 87-88 में आंध्र प्रदेश में विधायक बने। 92-93 में राज्यमंत्री बने। 97 में कैबिनेट मिनिस्टर। 99-01 तक विधानसभा के उपसभा पति। बाद में अलग तेलंगाना राज्य बनाने की मुहिम छेड़ी। पद और पार्टी से इस्तीफा। अपनी अलग पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति बनाई। 04 के आमचुनाव में करीमनगर से सांसद निर्वाचित। दल के पांच सांसद निर्वाचित। यूपीए का हिस्सा रहे। 04-06 तक मनमोहन सरकार में श्रम मंत्री। दिल्ली से ज्यादा आंध्र में रहे। तेलंगाना के मसले पर लगातार बोलते और आंदोलन करते रहे। तेलंगाना मसले पर सांसदी छोड़ी। फिर कांग्रेसी प्रत्याशी को दो लाख मतों से हराकर सांसद बने। फिर तीन अन्य पार्टी सांसदों और 16 विधायकों के साथ पद छोड़े। फिर निर्वाचित हुए। हां जीत महज 15000 वोटों तक सिमट आई। तमाम संसदीय कमेटियों के सदस्य रहे। पार्टी में बेटा रामाराव और रिश्तेदार हरीश राव प्रमुख सहयोगी। हमेशा विवादों में घिरे रहे। टीडीपी से हाथ •भी मिलाए पर तेलंगाना मसले पर फिर अलग। यूपीए से भी इसी मुद्दे पर अलग। तीसरे मोरचे के साथ गए। अब कांग्रेस के विरोधी। धोखा देने का आरोप। तीसरे मोरचे को झटककर राजग का साथ पकड़ा। मकसद सिर्फ तेलंगाना राज्य और उसके नाम पर सत्ता सुख।