
देशपाल सिंह पंवार
वक्त की लाठी सख्त होती है। रंक हो या राजा पड़ती ही पड़ती है। उसके वार की मार भी गहरी ही होती है। जिस शख्स जार्ज फर्नांडीस की आवाज पर मजदूर तबका काम रोक देता था। मरने-मारने पर उतारू हो जाता था वो शख्स आज अपने ही घर में बेगाना है। पार्टी ने ठुकरा दिया है। बूढ़ा कहकर बिसरा दिया है। जो जीवन भर टिकट बांटता रहा। नेता पैदा करता रहा। वो शख्स एक अदद टिकट के लिए आखिर तक छटपटाता रहा। पर उसे उसी दल से टिकट नसीब नहीं हुआ जिसे उसने बनाया था। वैसे तो राजनीति में रहम या शर्मो-लिहाज की कोई जगह नहीं बची लेकिन हैरत की बात यही है कि यह सारी पीड़ा उन हाथों और उन चेहरों से मिली जिन्हें राजनीति में खड़ा करने वाले खुद जार्ज थे। उपेक्षा का घाव पुराना है लेकिन उस पर नमक ताजा है। दर्द जार्ज के चेहरे से साफ झलक रहा है। नीतीश के राज में आने के तुरंत बाद बेरूखी की पीड़ा झेलने वाला यह शेर यू तो बूढ़ा हो गया हो लेकिन खुद शिकार करने की आदत और ऐंठ आज भी वही है। तमाम विपरीत हालात के बावजूद जार्ज उस मांद में शिकार करने के लिए गरजे हैं जहां उन्हें पैदल करने वालों का राज है,और बरसों से अदावत पालने वालों का गढ़। जार्ज बेटिकट हैं पर उसी मुजफ्फरपुर की धरती से निर्दलीय फिर चुनाव लडेंगे जिसने उन्हें आपातकाल के बाद जेल से जिता दिया था। लाख टके का सवाल यही है कि जीवन भर हर कदम पर लड़ने वाले सर्वाधिक विवादास्पद राजनेता जार्ज अपने जीवन की इस आखिरी लड़ाई को कैसे लड़ेंगे और कैसे जीतेंगे? काया साथ नहीं दे रही है। हवा खिलाफ है। हां हौसला जरूर दिख रहा है। कमजोर ही सही। नतीजा चाहे जो पर जार्ज की जिद रंग में भंग जरूर डालेगी। मौजूदा तस्वीर से जितना फायदा जार्ज कैंप को नहीं होगा उससे ज्यादा नुकसान नीतीश कैंप का जरूर होगा और शायद अपनी आखिरी लड़ाई में जार्ज का यही मकसद है और यही चाह है। अहं की चोट पर यही मरहम वे लगाना चाहते हैं। लालू-पासवान एकता से पहले ही नीतीश बैकफुट पर है। तीन साल से नाराज चल रहे नेता लालू कैंप की ओर भाग रहे हैं। बीजेपी से ज्यादा पट नहीं रही है। ऐसे में जिस स्थिति में जार्ज हैं, हमदर्दी जताने वालों की संख्या नीतीश के लिए सिरदर्द साबित होगी यह तय है। कारण वहां नीतीश राज का काम ही दांव पर है। जार्ज की प्रतिष्ठा नहीं। जार्ज का इतिहास जितना दिलचस्प है उससे ज्यादा विवादास्पद है। 3 जून 1930 को मंगलूर में जन्में जार्ज को पिता पादरी बनाने चाहते थे। पर होनी को कुछ और ही मंजूर था। एक ही लीक पर चलने की उनकी आदत सन् 50 में भी वही थी तो आज तक वही है। शुरू से जिस पहनावे कुर्ता-पायजामा को अपनाया आज तक उसी पर कायम हैं। जरा सी बात पर तुनकने की आदत आज तक है। किसी भी बात पर झिटकने का ढर्रा आज तक है। यानि ठान लिया तो सब कुर्बान। जवानी में मुंबई को ठिकाना बनाया, मजदूरों ने अपनाया और 1967 में उस समय चर्चित हुए जब सयुंक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर एस के पाटिल जैसे दिग्गज नेता से लड़ गए। सब पाटिल की जीत की आस लगा रहे थे लेकिन नतीजा ठीक उल्टा। पाटिल जीरो और जार्ज हीरो हो गए। मजदूरों का मसीहा देश की राजनीति में चमकने लगा था। समय गुजरता गया। आपातकाल में फरार रहे, भाई अंदर गया। लेकिन1976 में बड़ौदा डायनामाइट केस में जेल जाना पड़ा। आपातकाल हटा-कांग्रेस बुरी तरह हारी। जार्ज मुजफ्फरपुर से पहली बार चुनाव लड़े और जीते। मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री और जार्ज उद्योगमंत्री बने। लड़ने और भिड़ने की आदत से बाज नहीं आए। बैठते ही आईबीएम और कोका कोला जैसी कंपनियों को देश निकाला दे दिया। जनता सरकार में असहज महसूस करते रहे खासकर पुराने कांग्रेसी जगजीवन राम आदि के संग। बिगुल बजाने की पुरानी आदत के चलते अटल बिहारी वाजपेयी और एल के आडवाणी के संघ से रिश्तों पर वार किए। मोरारजी सरकार बिखर गई। हनुमान राजनारायण के सहारे चौधरी चरण सिंह कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री तो बन गए पर ज्यादा दिन सरकार नहीं चला पाए। 1984 में जार्ज ने मुजफ्फरपुर से नाता तोड़ा और बेंगलूर ने सी के जाफर शरीफ के सामने उनका दिल। फिर वीपी सिंह सरकार में रेलमंत्री रहे। कोंकण रेलवे परियोजना ने रेलवे काया ही पलट दी। 90 के दशक की राजनीति में जार्ज भी बदले। अटल और आडवाणी का विरोधी यह नेता उन्हीं के साथ खड़ा नजर आया। 13 दिन की सरकार को समर्थन दिया और 13 महीने की सरकार को बचाने के लिए जयललिता को मनाने की कोशिश भी की। 1999 में पहली गैर कांग्रेसी सरकार अगर पांच साल चली तो इसका सारा श्रेय वाजपेयी के अलावा जार्ज को ही जाता है जो तब राजग के संयोजक हैं। वे संकटमोचक बन गए। वाजपेयी की दोनों सरकारों में रक्षा मंत्री बने। कारगिल जंग और पोखरण विस्फोट उनके ही समय में हुआ। सियाचिन की पहाड़ी पर जाने वाले पहले रक्षा मंत्री रहे। बराक मिसाइल खरीद में फंसे। जया जेटली से नजदीकी रिश्तों के कारण विवादित रहे। चीन को नंबर एक का दुश्मन मानते रहे। सरकार विरोधी बर्मी आर्मी और लिट्टे को समर्थन देते रहे। तहलका के स्टिंग आपरेशन में भी फंसे। पद से हटने तक की नौबत आई। पर विवादों में फंसना और टिके रहना जार्ज का चरित्र रहा है। अटल के साथ जार्ज की जोड़ी सुपर हिट थी और यह सच है कि अगर अटल अब सीन में रहते तो शायद ही उनकी यह हालत होती। वैसे नीतीश के ताकतवर होते ही दरार पड़ गई थी। पार्टी नीतीश पर टिकी थी। शरद और जार्ज ही रोड़ा थे। शरद को अध्यक्ष की कुर्सी के मोह में फंसाया और जार्ज को वहां से डिगाया। साथ ही राजग संयोजक पद से उनकी विदाई कराई। उस समय जार्ज से ताज छिना,अब टिकट। तब भी वे दुखी थे आज उससे ज्यादा हैं। स्थिति विकट है। नतीजे निकट हैं पर जार्ज संग यह सलूक इस बात का सबक है कि अब राजनीति से भी समय रहते विदा हो जाना चाहिए वरना परायों के संग अपनों की भी उपेक्षा झेलनी होगी। क्या बाकी बूढ़े नेता जार्ज से सबक लेंगे?
