गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

हुड्डा का जमता गोड्डा


देशपाल सिंह पंवार
जिस सूबे में हर जन स्याणा हो। जाना-पहचाना हो। गरीबी से अनजाना हो। दूध-दही का खाना हो। खड़ी बोली में गाना-बजाना हो, देश में ऐसा राज्य सिर्फ हरियाणा ही हो सकता है। सबसे जुदा स्टाइल और अजब-गजब अंदाज। बोलना,खाना ,रहना, चलना और करना सब अलहदा। ये रईसी और अलमस्त अंदाज ही बताता है कि कुछ तो बात है इसमें। इसकी माटी में। आर्यसमाज के वाहक इस प्रदेश को हमेशा हर मामले में सबसे आगे गिना जाता है। राजनीति में भी,आन-बान और शान पर हरदम जान देने को तैयार कौम। खरी-खरी बोलना पसंद पर सुनना नापसंद। ऐसे राज्य का बंदा होना जितने गौरव की बात है उससे ज्यादा गर्व की बात है इस राज्य का मुखिया होना। वह भी उस हालत में जबकि आप किसी लाल के खानदान से ना जुड़े हों। लाल यानि हरियाणा के तीन लाल-देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल , यह गीत इस सूबे के साथ-साथ देश और दुनिया की फिजां में तीन दशक तक गूंजता रहा। उनकी आवाज की गूंज चाहे गुम हो गई हो पर उनके नाम की गूंज आज भी राजनीति के मैदान में साफ-साफ सुनाई देती है। एक समय इन तीन लालों के नामों के सहारे ढेरों की नैया इस सूबे में पार होती गई। इनके बिना ढेरों की मझधार में डूबती चली गई। एक का जाना-दूसरे का आना, तीसरे का सत्ता पाना यही इस राज्य की अरसे तक रीत रही। उनके वारिस या खानदानी आज भी राजनीति में हैं पर उन जैसी बात कहां? वह युग जब चरम पर था तब इस शख्स ने राजनीति का ककहरा सीखा । राजनीति की इससे बड़ी कोई पाठशाला दूसरी हो भी नहीं सकती थी। उसने ताऊ देवीलाल की जिद, बंसीलाल की सोच और भजनलाल की लोच को अपनी आंखों से देखा। जो सही था उसे सहेजा। जो खराब था उसे धीरे से जोर का झटका देकर इस अंदाज में पटका कि उसे खटका भी ना लगे। सूबे की कड़वी पर सच्ची बात कहने की रीत के ठीक विपरीत हर समय अपने व्यवहार से प्रीत दिखाई। राजनीति में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कांग्रेस को जीत की राह दिखाई। वो एक घाघ राजनेता आज भी नजर नहीं आते पर इसमें कोई दो राय नहीं कि खेल के शौकीन इस शख्स को अच्छी तरह पता है कि असली खिलाड़ी वही होता है जो हाकी के मैदान की डी में स्टिक हाथ में लेकर हमेशा मुस्तैद खड़ा नजर आए। जैसे ही गेंद सामने हो और कोई साथी उसकी ओर झपटे उससे पहले गेंद गोल में दाग दो। 2005 में उन्होंने ऐसा ही मा्स्टर गोल दागा था जिसका यकीन किसी को नहीं था और जिसकी गूंज ढेरों साथियों के दिलो दिमाग पर आज तक गूंज रही है। वो शख्स अच्छी तरह जानता है कि इस प्रदेश की जनता का मूड किस तरह, किन बातों पर और कब जल्दी खराब होता है? ऐसा कोई मौका वो आने नहीं देता। अपने सरल व्यवहार और आसानी से उपलब्ध रहने की कला या आदत के चलते विरोधी तक उसके गुणगान करते नजर आते हैं। यह बात दीगर है कि विरोध के नाम पर विरोध करना उनकी मजबूरी होता है। उसके राज में विकास के कामों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं पर इस बात पर कोई सवाल खड़ा नहीं हो सकता कि वो चाहे गन्ना ना दे पर गुड़ हमेशा हाथ में लेकर चलता है। चार बार सांसद होने के बावजूद वो कभी केंद्र की राजनीति का हीरो नहीं बन पाया पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज यह उसी के नाम या काम का इनाम है कि इस राज्य में कांग्रेस की कम और उसके नाम की सरकार ज्यादा दिखाई देती है। वो आज इस मुकाम पर है जहां उसके नाम के बिना इस राज्य की राजनीति की कोई बात नहीं हो सकती। किसी भी राजनेता के लिए इससे बड़ा इनाम और तमगा दूसरा क्या हो सकता है? वो जन्मजात राजनेता भी नहीं है। वो एक अर्थशास्त्री भी नहीं है। वो एक ब्यूरोक्रेट भी नहीं है। उसमें जाटों की जिद भी नहीं है। वो दिल से भी नहीं चलता है। वो खरी-खोटी भी कम सुनाता है। फिर भी ऐसे राज्य में जहां पत्रकारिता भी आसान नहीं और राजनीति भी ,वहां राजनीति की पारी में शतक ठोंकना और अपनी टीम को जिताना इस शख्स को अब खूब आता है। इस बार का पोल बताएगा कि हमेशा परिवर्तन का ढोल पीटने वाले इस प्रदेश को उसके राजकाज में झोल नजर आता है या मोल?
बीएस हुड्डा
0-रोहतक जिले का सांघी गांव-15 सितंबर,1947 को चौधरी रणबीर सिंह के यहां जन्म। 15 अक्टूबर 1976 को आशा देवी से विवाह। पत्नी शिक्षिका। एक बेटा,एक बेटी। बेटा दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी सांसद। शिक्षा हरियाणा में। पंजाब और दिल्ली विवि से बीए तथा एलएलबी की पढ़ाई। खेती पुश्तैनी पेशा। नामी वकील रहे। वकालत से राजनीति में प्रवेश। किलोई क्षेत्र। 72-77 तक ब्लाक कांग्रेस के अध्यक्ष। 80-82 तक हरियाणा यूथ कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष। 82-83 में अध्यक्ष। 83-87 तक पंचायत समिति रोहतक के चेयरमैन। 84-87 तक पंचायत परिषद हरियाणा के चेयरमैन। 91 में रोहतक से सांसद बनें। 92 से अब तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य। 94 से अब तक कांग्रेस संसदीय बोर्ड में। 94-96 में हरियाणा संसदीय गु्रप के संयोजक।96 में फिर सांसद निर्वाचित। 96-97 में संसद की एग्रीकल्चर कमेटी में। 97-02 तक हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष। 98 में फिर सांसद निर्वाचित। कई कमेटियों के सदस्य। किलोई सीट से 2000 में विधायक। 02-04 तक विपक्ष के नेता। 04 में फिर सांसद निर्वाचित। पांच मार्च को हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ग्रामीण क्षेत्रों में समाजसेवा में ज्यादा रूचि। पढ़ने और खेलने के शौकीन। हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया, यूएई,सोवियत संघ, पाकिस्तान, अमेरिका, चीन और नेपाल आदि देशों की यात्रा। हरियाणा की राजनीति के सबसे बड़े और लोकप्रिय चेहरों में से एक। मुख्यमंत्री के रूप में बेहद सफल। सूबे में विकास के ढेरों काम। आम आदमी की सरकार तक पहुंच। विनम्र पर दमदारी से अपनी बात कहने की आदत। सूबे में कांग्रेस को अपने कंधों पर ढोने का माद्दा। सादा जीवन-उच्च विचार की परंपरा के वाहक। चुनाव में निर्णायक नेताओं में से एक।

कडवी जुबान




देशपाल सिंह पंवार
किस्मत के खेल निराले- वो भी उसी खानदान का चिराग है जिसके बिना देश की राजनीति की दास्तान पूरी नहीं हो सकती। इसी खानदान के दूसरे चिराग को युवराज कहा जाता है। अगला प्रधानमंत्री माना जाता है। नरम और दूरदर्शी सोच का युवा नेता पुकारा जाता है। दूसरी ओर इस युवक की गरम मिजाजी चर्चा में रहती है। बयानबाजी हंगामा कराती रहती है। चाल माहौल को लाल बनाती रहती है। जो दिल में वही जुबान पर। वो राजनेताओं के कहने पर कुछ बोल सकता है लेकिन अपनी तरफ से राजनीति नहीं कर सकता। जिस उम्र में पढ़ाई-लिखाई या शादी-विवाह की बात होती है उस उम्र में वो अपने जहरीले बोल से दुनिया में सर्वाधिक चर्चा में है। वो चाहे अब तक सांसद ना बना हो पर तमाम तजुर्बेकार सांसदों से ज्यादा लोकप्रिय है। कट्टर हिंदू उस पर जान छिड़कते हैं। कट्टर मुसलमान उसकी जान जाने की दुआ करते हैं। वो कहीं नायक है तो कहीं खलनायक। वो देश प्रेम की बात करता है लेकिन ढेरों लोगों की नजर में उसकी बात देश को तोड़ने वाली है। वो हिंदुओं की एकजुटता की बात करता है लेकिन साथ ही ये भूल जाता है कि ये सर्व धर्म की नीति पर चलने वाला देश है। ऐसा नहीं है कि उसकी जुबान चुनाव के दौरान ही कड़वी होती है। बचपन में जब मां ने दादी का घर छोड़ा तो इस बच्चे ने अपनी मां को दोषी ठहराया। जब वो युवावस्था में पहुंचा तो अपने कजिन और अपनी ताई सोनिया गांधी पर जमकर तीर चलाए। उसे भी सोनिया विदेशी नजर आती थी। उसने न नरेंद्र मोदी को बख्शा और न ही महात्मा गांधी को। देश का नक्शा पलटने की कोई सोच या योजना चाहे उसके पास नहीं थी लेकिन देश का बेड़ा गर्क कैसे और कौन लोग करते रहे इस पर वो घंटों बोल सकता था या बोल सकता है। लोकतंत्र में उसकी यही बातें जहर मानी जाती हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि वो संजय गांधी का बेटा है। वो संजय गांधी जिसमें एक समय देश की तकदीर बदलने वाले आगामी चेहरे की झलक लोगों को दिखती थी। वो भी जुबान के कड़वे थे। उनकी भी चाल तेज थी वो जो चाहते थे करने का माद्दा रखते थे। बचपन में पिता की मौत और लगातार महत्वाकांक्षी मां के साए में पलने वाले युवक की जुबान में मिठास कैसे हो सकता है? हां हर जुल्म-ज्यादती का बदला लेने की आग जरूर होती है। यही इस युवा नेता की चाल-ढाल और हाल से नजर भी आता है। कितनी अजीब विडम्बना है कि गांधी खानदान का चिराग दुश्मन के कैंप में जलता नजर आता है। इसका मलाल सोनिया गांधी या राहुल गांधी को चाहे कितना भी हो लेकिन न तो इस युवा नेता को है और न ही मेनका गांधी को। मां को तो शायद इसी दिन का इंतजार था जब उसका बेटा उसकी सारी इच्छाएं और प्रतिज्ञाएं पूरी करेगा। अब वो समय सामने है। चाहे आप उसे कोसें या प्यार करें पर आज वो सबसे बड़ा हिंदुवादी चेहरा है। उसे चाहे लोग युवराज ना कहें पर युवराज का खेल खराब करने का माद्दा उसमें है। रासुका में जेल जाने का तजुर्बा उसे और मजबूत करेगा। इस चेहरे की बदौलत वो लंबी पारी खेलेगा यह तय है। बीजेपी खुश है उसके पास वे कंधे हैं जिन पर रखकर वो 10 जनपथ पर तीर चला सकती है। देखना है इस बार क्या नतीजे रहते हैं? उसके पिता ने दुनिया को मारूति दी वो क्या देता है यह सबसे बड़ा सवाल है?
वरुण फिरोज गांधी
0-13 मार्च 1980 को नई दिल्ली में जन्म। पिता संजय गांधी, माता मेनका गांधी। तीन माह की उम्र में पिता की विमान हादसे में मौत। 4 साल की उम्र में दादी श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या। मां मेनका गांधी शुरू से ही महत्वाकांक्षी। कांग्रेस का लगातार विरोध। दादी का घर छोड़ने के मां के फैसले का विरोध। मां का पशु-पक्षियों से ज्यादा लगाव। इनके लिए काम करने वाली सशक्त महिला। आंध्र प्रदेश के रिषि वैली स्कूल में पढ़ाई। लंदन विवि से डिग्री। शुरुआत से राजनीतिक माहौल। 99 अगस्त में राजनीतिक कैरियर की शुरुआत। पिल्लिभित्त में मां के लिए चुनाव प्रचार की बागडोर ,ओजस्वी भास्न्न इसी दौरान एक किताब लिखी। मेनका गांधी और प्रमोद महाजन के कहने पर 2004 में विधिवत रूप से बीजेपी ज्वाइन। सोनिया गांधी इस फैसले से दुखी। फिर भी सफलता की बधाई दी। बीजेपी ने 04 में स्टार प्रचारक की तरह उन्हें इस्तेमाल किया। लगातार कांग्रेस और सोनिया गांधी पर तीखे प्रहार। इसी साल बीजेपी कार्यसमिति में शामिल। शिवराज सिंह चौहान की खाली विदिशा सीट से 06 में चुनाव लड़ने की पेशकश। फिर मिर्जापुर से उपचुनाव लड़ने की पेशकश। दोनों बार इंकार। इस बार पांच बार पीलीभीत से सांसद रहीं मेनका ने बेटे के लिए सीट छोड़ी। खुद आंवला से चुनाव मैदान में। बीजेपी का फिर स्टार प्रचारक। 6 मार्च 09 को रैली में अल्पसंख्यकों के लिए जहर उगला। माहौल तनावपूर्ण होने से मायावती ने रासुका थोपी। जेल में डाला गया। मामला और गरमाया। बीजेपी ने मुद्दा बनाया। हर दल ने माया को गरियाया। सुप्रीम कोर्ट में फिर कड़वा बयान न देने का हलफनामा। दो हफ्ते के लिए रिहा। परचा भरा ,सारी दुनिया की नजर इस सीट पर। अब बीजेपी का सबसे आकर्षक हिंदुवादी चेहरा। पूरी पार्टी पीछे।

असली राजकुमार


देशपाल सिंह पंवार
जीवन-मरण सब ईश्वर के हाथ है लेकिन ज्यादातर के दिल में हमेशा ये मलाल जरूर रहता है कि वे फलां खानदान में पैदा क्यों नहीं हुए? यह राजनेता ऐसे ही गांधी खानदान में पैदा हुआ, जहां हर नाम देश की राजनीति में स्थापित था। ऐसे खानदान का चिराग होना जितना अच्छा दिखता है उससे ज्यादा वो बलिदान भी लेता है। बचपन सोने की चम्मच से खाते बीता पर बाकी जीवन बस रोने और पुरानी यादों को संजोने में ही गुजरता गया। दस साल की उम्र से पहले दादी की सत्ता छिन गई। चाचा की मौत हो गई। फिर दादी सत्ता में आई तो प्रधानमंत्री निवास में ही उनकी हत्या हो गई। पिता प्रधानमंत्री बने तो उनकी जान को खतरा बढ़ता चला गया। दूसरे लड़कों की तरह वो ना कहीं घूम सकता था और ना ही किसी को अपना दोस्त बना सकता था। इतिहास में दर्ज युवराजों की तरह वो अपनी रियाया के बीच जश्न मनाने भी नहीं जा सकता था। मूंछें ढंग से निकली भी नहीं थी कि लिट्टे ने इस युवराज से वो छीन लिया जिसकी कमी किसी के लिए कभी कोई दौलत पूरी नहीं कर पाती। पिता का साया सिर पर नहीं था। चारों तरफ के ताने और साजिशों की बढ़ती फेहरिस्त इस युवक से कितना कुछ छीन कर ले गई इसका एहसास सिर्फ उसे ही हो सकता है जिस पर बीतती है। फिर भी विरासत में मिला खानदान का नाम उसे रोने नहीं देता था। दादी का हौसला उसे टूटने नहीं देता था। पिता की सोच उसे डिगने नहीं देती थी। मां का धैर्य उसे आस बंधाता था कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा। यही हुआ भी ,आज वो युवा वर्ग का चहेता राजनेता है। अपनों के लिए युवराज है। विरोधी चाहे खानदान के नाम की वजह से उसे कोसते हों पर सबको उससे आस है। वो गरीबों और कमजोर तबके के पास है। उसके पास संयम है। सोच है। कुछ कर गुजरने की चाह है। सामने राह है। वो चाश्नी में शब्दों को डुबोकर नहीं बोलता। वो खरी-खरी और सच बात कहने में कोई लाग लपेट नहीं करता। वो सदन में भी राजनेताओं की तरह नहीं बोलता। वो केवल मुंह खोलने के लिए एनर्जी वेस्ट नहीं करता। उसकी आवाज एक आम आदमी की आवाज का एहसास कराती है। सुरक्षा के तामझाम उसे जनता के बीच जाने से चाहे रोकते हों लेकिन उसके पैर हमेशा वहीं पर जाकर ठहरते हैं जहां असली जिंदगी बसती है। शायद जीवन के खालीपन को दूर करने की यह एक कोशिश है। वो राजनीति के चक्रव्यूह की लड़ाई लड़ रहा है। जहां उसे सोचना भी है। बोलना भी है। करना भी है। सारे द्वार ध्वस्त भी करने हैं और पार्टी तथा देश की उम्मीदों पर खरा भी उतरना है। चुनावी नतीजें कुछ भी हों पर यह तय है कि बूढ़ी हो चुकी कांग्रेस के पास वो सुरीला साज है। जिस दिन वो पूरे लय से बजेगा उस दिन इस युवराज के सिर पर ताज भी होगा और युवा फौज को नाज भी,उसके दर्द को देखते हुए हो सकता है वही जनता का असली राज हो। फिलहाल उसकी चाल और ढाल से इस दल के पुराने सारे दिग्गज अपनी उम्र नजरअंदाज कर उसे खुश करने में जुटे रहते हैं। देखना यही है कि जनता क्या फैसला सुनाती है?
राहुल गांधी

0-19 जून,1970 को नई दिल्ली में गांधी परिवार में जन्म। सर्वाधिक प्रतिष्ठित और शक्तिशाली परिवार। दिल्ली के माडर्न स्कूल में पढ़ाई। 81-83 में दून स्कूल का छात्र। सुरक्षा कारणों से बाद में घर में पढ़ाई। सेंट स्टीफन्स कालेज में प्रवेश विवादास्पद। पिस्टल शूटर बेस पर एडमिशन। एक साल बाद ही कालेज छोड़ा। चाचा संजय गांधी की हवाई दुर्घटना में मौत। 14 साल की उम्र में दादी श्रीमती इंदिरा गांधी की हत्या। 21 साल की उम्र में पिता राजीव गांधी की लिट्टे द्वारा हत्या। 94 में फ्लोरिडा के रोलिंस कालेज से बीए। राऊल विन्सी विवि से आगे की पढ़ाई। स्पेनिश लड़की विरोनिका गर्ल फ्रैंड। राजनीति के कारण रिश्ता टूटा। 2004 के आम चुनाव के दौरान एमफिल की डिग्री ट्रिनीटी कालेज कैंब्रिज से पाने का दावा। मानिटर ग्रुप लंदन के लिए रणनीतिक सलाहकार के रूप में काम करने का तजुर्बा। 03 में राजनीति में आने की अटकलें। मां के साथ चुनावी रैलियों में जाने की शुरूआत। मार्च 2004 में राजनीति में आने का ऐलान। अमेठी से चुनाव लड़ा। सोनिया गांधी रायबरेली से लड़ीं। कांग्रेस मात्र 10 सीट जीती। राहुल गांधी एक लाख से अधिक वोटों से विजयी। बहन प्रियंका के हाथों में चुनाव की बागडोर। 06 में हैदराबाद में पार्टी सम्मेलन में बड़ा ओहदा देने पर जोर। 06 में सोनिया 4 लाख से अधिक मतों से रायबरेली से जीतीं। 07 में राहुल की कप्तानी में कांग्रेस ने यूपी का चुनाव लड़ा। पार्टी को मात्र 22 सीटें मिली। इसी साल सितंबर में राहुल पार्टी के महासचिव नियुक्त। यूथ कांग्रेस और छात्र यूनियन का जिम्मा। कांग्रेस में युवा पीढ़ी की शुरूआत। यूपी समेत बाकी राज्यों का लगातार दौरा। बड़े नेताओं ने प्रधानमंत्री बनाने की मुहिम चलाई। इस बार फिर मैदान में। वही मुहिम। मनमोहन सिंह पर ही दांव। देर सबेर पीएम बनने के प्रमुख दावेदार। कई विवादित बयानों पर बवाल।साफगोई से बात कहने की खूबी। युवा वर्ग इनका दीवाना। गरीबों के प्रति हमदर्दी।

अम्मा की शान निराली



देशपाल सिंह पंवार
बचपन की ओर पहला कदम भी नहीं रखा था कि पिता का साया हमेशा के लिए सिर से उठ गया। जवानी की ओर कदम भी नहीं रखा था कि पढ़ाई-लिखाई में होशियार होने के बावजूद कालेज से नाता टूट गया। राजनीति में ढंग से पहला कदम बढ़ाया नहीं था कि राजनीतिक गुरू और दिल के बेहद करीबी एमजीआर हमेशा के लिए छोड़कर चले गए। पार्टी में ग्रिप की ओर पहला कदम भी नहीं बढ़ाया था कि एमजीआर की विधवा के साथ ठन गई। संसदीय माहौल की तरफ पहला कदम ढंग से रखा नहीं था कि अनेक अनचाहे दुश्मन खड़े हो गए। विधानसभा में विपक्ष की नेता के रूप में पहला कदम रखा ही था कि द्रमुक नेताओं के तानों से ऑंखें भर आई। तौहीन इतनी दिल को छू गई कि फिर सदन में नेता के रूप में ही वापस आई। देश की राजनीति में रमने की ओर कदम बढ़ाया था तो अटल सरकार गिराने का टींकरा सिर फूट गया। सीएम के रूप में पारी की ओर कदम बढ़ाया ही था कि बेईमानी के अनगिनत आरोप दामन पर लगने लगे। साड़ियां, सोना-चांदी, हीरे-जवाहारात और चप्पल-जूतियों के शौक मीडिया में जोक बनने लगे। मंत्री भी पीछे नहीं रहे। सबने दोनों हाथों से दौलत कमाई। राज्य में जल्दी ही फिर ऐसे हालात बने कि परपंरागत दुश्मन करूणानिधि फिर सत्ता में आ गए। उन्होंने गद्दी पर बैठते ही सारी फाइलों को खंगालना शुरू कर दिया। नतीजा दर्जनों मामले चारों ओर मंडराने लगे। तमिलनाडु की राजनीति दो ही दलों के इर्द-गिर्द घूमती है। एक से जनता बोर तो फिर दूसरे दल का जोर। फिर दूसरी बार सत्ता की ओर कदम बढ़ाया तो पांच साल के प्रहार ने व्यवहार बदल कर रख दिया। संत हो या संपादक, नेता हो या कलाकार सबको जेल की हवा खिलाई। वे सबकी अम्मा कहलाने लगी थीं पर उनके तेवर और कामकाज से न कल अम्मा का रूप झलकता था और न ही आज। वे एकता कपूर के सीरियल की किरदार अम्मा जैसी बार-बार नजर आतीं रहीं। ऐसी अम्मा जो गलतियों पर किसी भी हद तक सजा देने से ना हिचकिचाए। ऐसी अम्मा जो अपने राजपाट को बचाने या बनाने के लिए किसी भी हद तक पद और पावर का इस्तेमाल करने में न हिचकिचाए। ऐसी अम्मा जिसका बचपन चाहे गरीबी में बीता हो पर जवानी और उसके बाद का दौर जिसका शानो शौकत में बिताया। ग्लैमर से लेकर धन दौलत तक ऊपर वाले ने खूब उन्हें दिया। हां इस पर किसी को बोलने या लिखने का अधिकार अम्मा ने किसी को नहीं दिया। बचपन और जवानी में डांस की माहिर अम्मा अब सबको अपने आगे-पीछे खूब नचाती है। खासकर विरोधी द्रमुक नेताओं को या फिर उन्हें जो उनके सहारे अपनी नैया पार करने की सोचते हैं। उनका सपना देश की अम्मा बनने का है। इसके लिए वे नए-नए गठजोड़ करने में पीछे नहीं हटतीं। बशर्ते हाथ मिलाने की बजाय दूसरा हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर उन्हें अम्मा कहे। अम्मा चालाक राजनेता से ज्यादा एक जिद्दी राजनेता मानी जाती हैं। इस बार वे इस स्थिति में आ सकती हैं कि अगली सरकार में उनकी तूती बोले। अगर ऐसा हुआ तो यकीनन अम्मा का असली रूप तब देखने को मिलेगा। अम्मा से ज्यादा एक महारानी का रूप-जिसे ना सुनना पसंद नहीं।
जयललिता जयराम

0-24 फरवरी,1948 को मैसूर में जन्म। दो साल की उम्र में पिता का निधन। परिवार बेहद गरीब। बैंगलूर के बिशप स्कूल से हाईस्कूल। मां संध्या के साथ फिर मद्रास शिफ्ट। मां तमिल फिल्मों की अदाकारा। केंद्र सरकार की ओर से उच्च शिक्षा के लिए स्कालरशिप। मां की सलाह पर फिल्मों में प्रवेश। 61 में वीवी गिरि के बेटे की अंग्रेजी फिल्म एपिस्टल से शुरूआत। तमिल फिल्मों की सुपरस्टार। 72 में फिल्म इज्जत में धर्मेंद्र की हीरोइन। 1981 में अन्नाद्रमुक ज्वाइन। राजनीति की शुरूआत। 88 में उच्चसदन में । एमजी रामचंद्रन से बेहद नजदीकी रिश्ते। एजीआर की मौत के बाद पार्टी में अलग-थलग। खलनायिका की छवि। 89 में विधानसभा चुनाव जीतीं। विरोधी दल की पहली महिला नेता। द्रमुक पर सदन में तौहीन के आरोप। राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस से गठजोड़। अन्नाद्रमुक पर काबिज। चुनाव में फतह। 91 में पहली चुनी हुई महिला मुख्यमंत्री। सर्वाधिक विवादास्पद नेताओं में से एक। 92 में महिला आईएएस चंद्रलेखा पर सरेआम चेन्नई की सड़क पर तेजाब फैंका गया। जयललिता के इशारे पर कांड। 95 में एक वकील पर कातिलाना हमला। दर्जनों करप्शन के मामले। 96 में द्रमुक के हाथों हार। ज्यादातर मंत्रियो की हार। केंद्र में अटल की सरकार गिराने के लिए जिम्मेदार। 2001 में फिर सत्ता में। तांसी मामले में पांच साल की सजा। सीएम बनने पर बवाल। गद्दी छोड़नी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट से सबूत के बिना राहत। 03 में शिक्षकों की हड़ताल। 1,70 हजार शिक्षक बर्खास्त। 04 में फिर बहाल। स्वामी जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार कराया। एम करूणानिधि, मुरासोली मारन और टीआर बालू को गिरफ्तार कराया। हिंदू अखबार के संपादक को 15 दिन तक जेल में रखा। जिद्दी महिला। 2006 में फिर सत्ता से बाहर। विपक्षी नेता पद पर बवाल। पार्टी पर शिकंजा कमजोर। किसी तरह फिर जया उस गद्दी पर। ज्योतिष पर विश्वास। कई विवि की ओर से डीलिट की विवादास्पद उपाधि। देश पर राज करने का सपना। द्रमुक की घनघोर विरोधी।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

पासवान-जंग घमासान



देशपाल सिंह पंवार
अपने क्षेत्र का सर्वाधिक पढ़ा-लिखा दलित युवक होने का रिकार्ड़ नाम है। 23 साल की उम्र में विधायक बनने का रिकार्ड़ नाम है। देश में सर्वाधिक मतों से जीतने वाले सांसद का विश्व रिकॉर्ड नाम है। 89 से लगातार सांसद रहने का बिहारी रिकार्ड़ नाम है। पांच प्रधानमंत्रियों की कप्तानी में केंद्रीय मंत्री की पारी खेलने का रिकार्ड़ नाम है। 96 से 98 के बीच प्रधानमंत्री न होने के बावजूद संसद में सत्ता पक्ष का नेता होने का रिकार्ड़ नाम है। बिहार में लालू को गद्दी से दूर धकेलने का रिकार्ड़ नाम है। जितने मंत्रालय इस शख्स ने चलाए सबमें छाप छोड़ने का रिकार्ड नाम है। ढेरों को शिखर तक पहुंचाने का रिकार्ड नाम है। दलितों के लिए ढेरों काम करने का रिकार्ड़ नाम है। राजनीति में स्थापित और बड़ा नाम है। पर इतना कुछ होने के बावजूद कहीं न कहीं कुछ न कुछ कमी जरूर है जिसकी वजह से दलितों के सर्वमान्य और सबसे बड़े नेता का खिताब अकेले उनके सिर बंधा नजर नहीं आता। मायावती एक कदम पीछे और कभी दो कदम आगे खड़ी नजर आती है। वे दिल्ली की राजनीति पर जरूर छाये रहे लेकिन अपने राज्य बिहार में कभी सरकार बनाने की स्थिति में नहीं रहे। जिस जगह वे थे या हैं उससे कहीं ज्यादा के हकदार थे। शायद यह कहावत ही इसका मूल कारण हो कि वे हैं बिहारी पर राजनीति दिल्ली की करते हैं। लालू हो या नीतीश या फिर मायावती इन नेताओं ने कभी अपनी जड़ों को नहीं छोड़ा। अगर वे कभी सीएम की रेस में होते तो यकीनन उस गद्दी भी होते और आज की तारीख में कहीं ज्यादा मजबूत भी ,एक कारण यह भी हो सकता है कि इस शख्स के बाद या साथ कोई भी ऐसा नेता नहीं रहा जो बिहार में पार्टी को चला सके या कुछ बोझ हल्का कर सके? जिस-जिस पर विश्वास किया वे फायदा उठाकर साथ छोड़ते गए। या यह भी बड़ा कारण हो सकता है कि करीबी सलाहकारों की वजह से राजनीति की बिसात पर वे विरोधियों की चाल नहीं समझ पाए और सही समय पर सही चाल नहीं चल पाए। बिहार में अगड़े बीजेपी के साथ हैं। कुर्मी और बूमिहार जदयू के साथ हैं। मुस्लिम और यादव व अन्य पिछड़े लालू की जय-जयकार करते हैं। ऐसे में इस नेता का अल्पसंख्यक और लालू प्रेम बिहार की राजनीति की खेती में कभी दो मुट्ठी अनाज पैदा कर पाएगा इस पर संदेह है। इतिहास गवाह है कि जो-जो लालू के साथ रहा, खत्म होता गया। लालू को उनके साथ से फायदा है, लालू के साथ से इस शख्स को नहीं। 04 का आमचुनाव और 05 का राज्य का चुनाव इसका प्रमाण है। पहली बार लालू मजबूत रहे और दूसरे हाफ से ज्यादा लोजपा कभी बिहार में ताकतवर नहीं रही। उन्हें यह मानना होगा कि हर सत्तारूढ़ दल ने बिहारियों को छला। ऐसे में हर जात का बिहारी उनमें अपना नेता खोजता है पर वे हर बार कुछ खास जात की बात में जुट जाते हैं। नतीजा.....। अकेले अपने दम पर अगर वे पारी खेलते जाते तो यकीनन जमीन से आसमान-बस पासवान का नारा कामयाब नजर आता। लहरों से जो जीतता आया हो वो शतरंज का जानकार आखिर राजनीति की बिसात पर कैसे चूक कर सकता है? नतीजे बताएंगे कि क्या खोया और क्या पाया? लेकिन अब इससे कहीं ज्यादा जरूरी है कि बिहार में अगले साल के चुनाव में क्या पाना है? इसमें इस दलितों में सबसे बड़े कद के नेता को जुट जाना है। यही समय की मांग है।
रामविलास पासवान

0-खगड़िया जिले का कोसी नदी पार गांव शाहारबानी- 5 जुलाई,1946 को दलित परिवार में जन्म। पिता स्वर्गीय जमुन पासवान, माता-सियादेवी। कोसी कालेज और पटना विवि से एम ए और बीएल की शिक्षा। उस क्षेत्र से सर्वाधिक पढ़ा-लिखा युवक। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के टिकट पर 1969 में विधायक निर्वाचित। 70 में एसएसपी के संयुक्त सचिव। जयप्रकाश नारायण के अनुयाई और राजनारायण ,कर्पूरी ठाकुर व सत्येंद्रनारायण सिन्हा के नजदीक। 74 में लोकदल के महासचिव। आपातकाल का सारा पीरियड जेल में बीता। जनता पार्टी के टिकट पर 77 में हाजीपुर से जीत का विश्व रिकार्ड । गिन्नीज बुक में । फिर यहीं से 80 में संसद में । 83 में दलित सेना का गठन। 89 में फिर संसद में। वीपी सिंह सरकार में श्रम मंत्री। तब से अब तक सांसद। 96 से 98 तक रेलमंत्री। निचले सदन में सत्तापक्ष के नेता। दोनों पी ऍम एच डी देवेगौड़ा और आई के गुजराल उच्च सदन के सदस्य थे। इसके बाद अटल सरकार में 2001 तक दूरसंचार मंत्री। फिर 02 तक कोयला मंत्री। जदयू से नाता तोड़कर 2000 में लोजपा गठित। गुजरात दंगों पर अटल का साथ छोड़ा। 04 में लालू के साथ मिलकर आम चुनाव लड़ा। लालू फायदे में। पासवान स्टील और उवर्रक मंत्री। यूपीए का हिस्सा। 05 में अलग रहकर कांग्रेस संग बिहार में चुनाव लड़ा। 29 विधायक पार्टी के जीते। विखंडित जनादेश। लालू को समर्थन से इंकार। पार्टी विधायकों को नीतीश ने तोड़ा। फिर चुनाव। सदन में पहले से आधी ताकत। बिहार में राजग सरकार। वीपी सिंह,देवेगौड़ा, गुजराल, अटलबिहारी और मनमोहन सिंह समेत पांच प्रधानमंत्रियों के साथ मंत्री। दर्जनों कमेटियों के सदस्य और चेयरमैन। बिहार के सबसे बड़े दलित नेता। मुसलमानों में पैठ बनाने की कोशिश। योग के जानकार। शतरंज से प्यार। पत्नी रीना पासवान। तीन बेटियां, बेटा चिराग हिंदी फिल्मों का हीरो। लालू से फिर दोस्ती। कांग्रेस ने मुंह फेरा।

ममता-नाम से ठीक विपरीत



देशपाल सिंह पंवार
वो बचपन से ही ऐसी है-गलत बात पर हाथ छोड़ने वाली। नाम के ठीक विपरीत। वो गरीबों पर अत्याचार सहन नहीं कर सकती। वो कदापि ये नहीं देख सकती कि कोई उसे औरत समझकर हल्के में ले। जिसने ऐसी गलती की मार खाई। जमकर मार खाई-अकेले मे भी और जमघट में भी,उसे कोई नहीं भूल सकता। वे भी जिन्होंने बचपन से जवानी तक उसके हाथ से मार खाई। वे भी जो संसद के गलियारों तक में उसके हाथों पिटे। वे भी जिनके कालर उसके हाथ में थे और जुबान से गालियों की बौछार बह रही थी। वे भी जिनके साथ उसने राजनीति की। सोम दा जिन्हें हराकर वे सांसद बनीं। राव भी जिनके कैबिनेट में वो मंत्री थी लेकिन कोलकाता में सरकार के खिलाफ वे रैली निकाल रही थी। सोनिया भी -जिन्हें टका सा जवाब देकर वे अलग पार्टी बनाकर खड़ी हो गई थी। पासवान भी जिन्हें संसद में ही उन्होंने खरी-खोटी सुनाई थी। वाजपेयी भी जिन्हें राम-राम कहकर वे कांग्रेस से मिल गई थीं। उन्हें बंगाल सरकार खासकर बुद्धदेव तो कभी नहीं भूल सकते। जिनकी बार-बार हजार बार उसने नंदीग्राम और वहां से दुनिया में किरकिरी कराई। उसे वो भी नहीं भूल सकते जो उसकी राजनीति की वजह से पुलिस से मार खाते रहे। उसे नंदीग्राम और सिंगूर से जुड़े वो परिवार कभी नहीं भूल सकते जिनके परिजन आंदोलन की चपेट में चढ़ गए। अल्लाह को प्यारे हो गए। चाहे एक बार ऐसा कुछ हो कि सब भूल जाएँ पर एक शख्स ऐसा है जो किसी भी सूरत में नहीं भूल सकता और वो है टाटा। चाहे सारा देश नैनो का दीवाना हो। हर कोई उसे देखना और उसकी सवारी करना चाहता हो पर बंगाल की इस शेरनी का अगर बस चले तो उसे अरब सागर में डुबो दे। उसके नाम को सारी दुनिया जानती है। सब यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि आज के राजनेताओं की तरह मुंह में राम-बगल में छुरी लेकर वो नहीं चलती। आज के राजनेताओं की भूख नहीं मिटती और उसे भूख नहीं लगती। राजनीति के सहारे उसने दौलत नहीं कमाई। उसकी कमाई यही है कि वो गरीबों की जंग लड़ती है। मुंहफट और जिद्दी स्वभावः उसकी कमजोरी नहीं बल्कि ताकत है। यह उस जनता की भी ताकत है जो उसके पीछे खड़ी है। इतिहास गवाह है कि बंगाल में लाल सलाम की ज्यादती का कोई मुकाबला नहीं कर पाया। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस भी नहीं। ढेरों बंगाली कांग्रेसी नेता दिल्ली में जैसे बोलते दिखते हैं कोलकाता में उतरते ही लाल सलाम को सलामी ठोंकते नजर आते हैं। इसके ठीक विपरीत वो दिल्ली में भले ही शांत रहती हों पर बंगाल की धरती पर उसकी दहाड़ लाल सलाम की बोलती बंद कर देती है। जिस दिन उसके हाथ में देश की कमान होगी यकीनन उस दिन जनता का असली राज होगा। गरीब की आवाज का मोल होगा। पर क्या कभी ऐसा होगा-फिलहाल तो इस चुनाव पर सब कुछ टिका है?

ममता बनर्जी

0 कोलकाता में 5 जनवरी 1955 को जन्म। बसंती देवी कालेज से स्नातक। जोगेश चौधरी ला कालेज से एलएलबी। अमरीका से पीएचडी। 1970 में कांग्रेस में प्रवेश। तेज तर्रार तेवर और युवा होने की वजह से जल्दी ही पहचान। 84 में जादवपुर सीट से सांसद निर्वाचित। सोमनाथ दा को पराजित। युवक कांग्रेस की महासचिव। 89 में पराजित। 91 में कोलकाता दक्षिण सीट से फिर सांसद। 96,98, 99 और 2004 में फिर इसी सीट से निर्वाचित। 91 में राव सरकार में पहली बार केंद्रीय मंत्री। मानव संसाधन, खेल व महिला व बालकल्याण की राज्य मंत्री। सरकार की नीतियों के खिलाफ खेल मंत्री के रूप में कोलकाता में विरोध रैली। 93 में पद छिन गए। 96 में कांग्रेस पर वामदलों के सामने घुटने टेकने का आरोप। पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत बढ़ाने का संसद में विरोध। अमर सिंह के कालर पर हाथ डाला। 97 में रेलमंत्री रामविलास पासवान पर पश्चिम बंगाल की उपेक्षा पर काला शाल संसद में फैंका। इस्तीफा देने का एलान। संतोष मोहन देव की वजह से मामला निबटा। 97 में तृणमूल कांग्रेस गठित। बंगाल में वाम सरकार का विरोध। महिला आरक्षण बिल का विरोध करने पर 11 दिसंबर 98 को सपा सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कालर पकड़कर संसद की लाबी में घसीटा। 99 में अटल सरकार में रेल मंत्री । 2000 में पहली बार रेलबजट पेश । बंगाल के लिए कई योजनाएं। टूरिज्म की ओर रेलवे को मोड़ा। इंडियन रेलवे कैटरिंग और टूरिज्म कारपोरेशन लिमिटेड बनाने का प्रस्ताव। नेपाल और बांग्लादेश तक चलने वाली ट्राँस एशियन रेलवे चलाने का एलान। 19 नई ट्रेन चलाने का फैसला। 2001 में बीजेपी से खटपट। एनडीए से नाता तोड़ा। 2001 में बंगाल चुनाव में कांग्रेस से गठजोड़। 2004 में फिर एनडीए सरकार में कोयला मंत्री के रूप में वापसी। दल की अकेली सांसद। 06 में फिर संसद से इस्तीफा देने का एलान। बंगाल सरकार की औद्योगिक नीति का खुला विरोध। विधानसभा में जमकर तोड़फोड़। नंदीगा्रम में औद्योगिक हब बनाने पर हिंसा। जमीन अमीरों को देने का खुला विरोध। लगातार हिंसा। सिंगुर में हिंसा। टाटा के नैनो प्लांट पर ताला। स्टेट छोड़कर जाना पड़ा। इस बार फिर सबकी नजर ममता पर।

करात देते या खाते मात


देशपाल सिंह पंवार
यूं तो लाल झंडा संघर्ष का ही प्रतीक है। ज्यादातर कामरेड जीवन में तपकर ही ऊपर तक पहुंचे। यह शख्स भी इसी धारा से बहकर इस शिखर तक पहुंचा है। रंगून में जन्मा। बचपन से ही सारे दुख झेले। जीवन के इन्हीं थपेड़ों ने लड़ाकू बना दिया। हां पढ़ाकू ज्यादा था। स्कोलरशिप के सहारे ब्रिटेन तक पढ़ाई की पर सोच से कम्युनिस्ट था बस बनना बाकी था। ऐसा ही एक प्रोफेसर क्या मिला वही राह पकड़ ली। 70 में जेएनयू कैंपस में डेरा जमते ही पक्का कामरेड बन गया। विवि में कम्युनिस्ट रंग जमाने लगा। ऐसे ही छात्र साथी मिलने लगे। जीवन साथी तक इसी रंग से जिंदगी में आ गई फिर क्या था देश-दुनिया में जहां शोषण की बात होती तो यह शख्स पार्टी लाइन का बिगुल बजाने लगा। एक से एक कामरेड माकपा में थे। लगता नहीं था कि बहुत जल्दी ये जवान कामरेड ऊपर की ओर बढ़ने लगेगा लेकिन सिद्धांतों की कीमत पर समझौता न करने और हर समय आंदोलन में कूदने और उसे सफल बनाने की खूबी की वजह से जल्दी ही रास्ते खुलने लगे। पुरानी पीढ़ी के बीच नजर आने वाले कुछ जवान चेहरों में से एक वह था। सांसद बन गया। 57 साल की उम्र में माकपा का महासचिव बना। लाल सलाम का सबसे ताकतवर चेहरा। पार्टी लाइन बदलने की ओर। हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु और सोमनाथ दा जैसों के बीच इस शीर्ष पर पहुंचने से खुद कामरेड भी हैरत में थे। लेकिन यही सच था। चाहे ढेरों कामरेड इसे लामबंदी का नतीजा मानते रहे हों पर यह सच है कि यह चेहरा जल्दी ही सबको अच्छा लगने लगा था। यह भी सच है कि लामबंदी की कमाई इस कामरेड ने बहुत खाई है। हमेशा सत्ता विरोध की राजनीति करने वालों को सत्ता के नजदीक ले जाने और इसकी कीमत वसूलने वालों में सीताराम येचूरी के अलावा इस कामरेड को भी अग्रणी माना जाता है। यूपीए सरकार को समर्थन बाहर से और कीमत अंदर से। हैरत की बात यह भी है कि जनहित से जुड़े मुद्दों के लिए लड़ना पार्टी की भी पहचान है और इस शख्स की भी लेकिन यूपीए सरकार फैसले करती गई और लाल सलाम के ये खासोआम सिर्फ बयानबाजी या धमकियों में ही उलझे रहे। कर्मचारियों के खिलाफ, जनहित के खिलाफ कठोर फैसलों पर केवल इन कामरेड़ों की तरफ से बस बयानबाजी ही जनता और इस विचारधारा को नसीब हो पाई। परमाणु करार पर कठोर फैसला जरूर किया लेकिन सत्ता की चाश्नी का नशा ऐसा है कि छूट नहीं रहा है। देश को अपने हिसाब से हांकने की सोच के चलते लगातार गठजोड़ या जुगाड़ में लगे रहते हैं। कांग्रेस और बीजेपी को सबक सिखाने के लिए तीसरा मोरचा बना रहे हैंं। सबके घर दस्तक देते घूम रहे हैं। पर इस पढ़े-लिखे कामरेड को क्या राजनीति की ये एबीसीडी समझ में नहीं आती कि इस देश में बीजेपी व कांग्रेस के बिना फिलहाल केंद्र में कोई सरकार बनने के आसार नहीं हैं। एक का साथ या एक के साथ के बिना कैसे केंद्र में सरकार बनेगी अगर इस कामरेड को यह पता है तो सब जानना चाहते हैं कि कैसे? इस कोशिश का मकसद यही माना जा रहा है कि केंद्र में उनकी सरकार चाहे ना आए पर उनके इशारे पर चले जरूर। सोमनाथ दा जैसे दिग्गज की बलि लेने वाले इस कामरेड के लिए यह चुनाव जीवन-मरण का सवाल है। फिलहाल कोई कामरेड चाहे सामने न बोलता हो पर अगर इस बार पिटे तो सोमनाथ इश्यू फिर गरमा सकता है। सोमनाथ मान सकते हैं। घर बैठ सकते हैं पर उनके समर्थकों के सामने ऐसी कोई मजबूरी नहीं। अनुशासन की धार कुंद पड़ सकता है । यह ये कामरेड भी जानता है जो सबको चला रहा है। उनका चेहरा संघर्ष का प्रतीक कम और चिंतक का ज्यादा नजर आता है। वास्तव में वे इस समय चिंता में है। दर-दर धक्के खा रहे हैं। देखना है कि सत्ता का स्वाद मिलता है या गुलशन बरबाद होता है।

प्रकाश करात
0-7 फरवरी,1948 को रंगून (बर्मा) में जन्म। पिता ब्रिटिश रेलवे के कर्मचारी। मूलत केरल के इल्लाप्पूलै में जड़ें। स्कूली शिक्षा के दौरान ही पिता की मौत। कष्टमय जीवन। बहन कमला और माता राधा के साथ मद्रास में डेरा। बहन का भी निधन। मां जीवन बीमा निगम की एजेंट। मद्रास क्रिश्चियन कालेज से शिक्षा। स्नातक शिक्षा में गोल्ड मेडल। स्कोलरशिप। एडिनबर्ग विवि में राजनीतिक शास्त्र की स्नातकोत्तर की पढ़ाई। प्रो विक्टर कीरनन की संगत। मार्क्सवादी सोच धीरे-धीरे विकसित। आंदोलन का हिस्सा। विवि से बर्खास्त। अच्छे व्यवहार के कारण फिर से विवि में। 1970 में देश वापसी। जेएनयू में । माकपा की एस एफ आई के विवि में जन्मदाता। जमकर छात्र राजनीति। 1974 में पहले छात्र यूनियन अध्यक्ष। 79 तक इस पद पर। माकपाई वृंदा करात से 75 में शादी। दोनों माकपा के कार्यकर्ता। पार्टी के लिए जीवन भर बच्चा पैदा न करने का फैसला। आपातकाल में भूमिगत दो बार गिरफ्तार। 8 दिन जेल में। माकपा के दिग्गज ए के गोपालन के साथी के रूप में कार्य करने लगे। 85 में माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य। 92 में पोलित ब्यूरो में। माकपाई मुखपत्र दी मार्कसिस्ट के संपादकीय बोर्ड में। 2005 में हरिकिशन सिंह सुरजीत के स्थान पर माकपा के जनरल सेक्रे टरी। पार्टी कैडर का सर्वाधिक पावरफुल पद। यंग जनरेशन के हाथ में पार्टी। ज्योति बसु, सुरजीत युग का अंत। सीताराम येचूरी के साथ अच्छा जोड़ा। पत्नी तक आगे बढ़तीं गईं। लेफ्टवर्ल्ड के एमडी। 72, 99 और 2003 में तीन किताबें लिखीं। 2004 में यूपीए सरकार का गठन। बाहर से वामदलों का समर्थन। लगातार सरकार पर दबाव। मुंह में लड्डू और हाथ से आंदोलन की बात। 2008 में अमरीका से परमाणु करार पर सरकार से समर्थन वापस। सोमनाथ दा सरकार के साथ। पार्टी से बाहर निकाला। तीसरा मोरचा बनाने में जुटे। इस बार संसदीय चुनाव में प्रतिष्ठा दांव पर।

बदल गए नेताजी



देशपाल सिंह पंवार
उन्हें सब नेताजी कहते हैं। पार्टी वाले भी और विरोधी दल वाले भी ,शिक्षक थे। पढ़ाई से ज्यादा राजनीति में रम गए। समाजवादी बन गए। लोहिया जी की सेवा करते-करते चौधरी चरण सिंह के कथित दत्तक पुत्र कहलाने लगे। खुद को वारिस जताने लगे। चरण सिंह बिस्तर पकड़ गए। अजित सिंह अमरीका से लौट आए तो नेताजी मुंह बनाकर घर में बैठ गए। यूपी में सरकार बनाने की बारी आई । वीपी सिंह चले थे अजित को गद्दी सौंपने पर उनके दूत लखनऊ तक पहुंचते-पहुंचते नेताजी के हो गए। अजित देखते रह गए -नेताजी मुख्यमंत्री बन गए- जाट बिदक गए। गद्दी पर बैठते ही तन गए। जिनके रहमोकरम पर थे उनसे ही ठन गए। तब तक नेताजी वास्तव में नेताजी बन गए थे। समझ गए थे कि दलित मायावती के साथ हैं। अगड़े हिंदू बीजेपी के साथ हैं। जाट अजित के साथ हैं और अन्य पिछड़े कांग्रेस के साथ। नेताजी अल्पसंख्यकों के हो गए और अल्पसंख्यक उनके। इसी थ्योरी की नेताजी ने अब तक फसल काटी। तीन बार सीएम बने। दूसरी बार के राजपाट में पत्रकारों के चहेते बने। खजाने का मुंह खोला। जिसने जितना मुंह खोला। उतना धन अंदर। बस गुणगान करते चलो। लखनऊ या दिल्ली का एक से एक दिग्गज पत्रकार बहती गंगा में हाथ धोता रहा। सबके चेहरे नंगे हैं। हां यह बात दीगर है कि सब चंगे हैं। मामला अब तक नहीं निपटा है। हाथी की मालकिन पर गेस्ट हाउस में हमला करवाया। नतीजा राजनीति उम्मीद का खेल है की थ्योरी को यहां से पिटकर वापस लौटना पड़ता है। नेताजी ने अफसरशाही तक को साइकिल पर बैठाया। जो नहीं बैठा उसे गद्दी से गिराया। ऐसे में उन्हें हाथी की सवारी की बारी मिलने लगी। अफसरशाही आज इस प्रदेश में साफ-साफ इन दो दलों की फौज की तरह नजर आती है। सबके दामन पर दाग लग चुके हैं पर दूसरे की कमीज पर कीचड़ उछालने का खेल जारी है। इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछली सदी तक नेताजी कर्म से भी समाजवादी थे और धर्म से भी, 21 वीं सदी आई-अमर का सहारा मिला। ऐसा गुल खिला कि नेताओं के संग से ज्यादा फिल्मी दुनिया में मन रमने लगा। सुपर स्टार से लेकर जयाप्रदा तक सब पर नेताजी का हाथ और सब हरदम उनके साथ। चारों ओर ग्लैमर। सरस्वती के सेवक पर मां लक्ष्मी ने खूब प्यार लुटाया। हां अब ढेरों मामले जरूर परेशान करते रहते हैं। इसके लिए नेताजी दांव खेलते रहते हैं। नेताजी की एक और खासियत है-वे कल,आज और कल की राह पर चलते हैं। कल जिससे दोस्ती,आज दुश्मनी, कल फिर दोस्ती। अजित, कल्याण, कांग्रेस, लालू, पासवान आदि से कभी पंगा तो कभी मन चंगा। बस माया को छोड़कर। वो मोह माया में नहीं पड़ते। यह बात दीगर है कि उनके चारों तरफ इसी का राज है। इस बार लालू, पासवान, कल्याण की तिकड़ी कल्याण कराएगी या उनकी राजनीति की ऐंठ मुलायम पड़ेगी यह देखने की बात होगी। वैसे वे आसानी से हार मानने वाले नहीं हैं। एक बात नेताजी की बहुत अच्छी है वे जिसका साथ देते हैं हमेशा देते हैं खूब देते हैं।
मुलायम सिंह यादव
0-22 नवंबर ,1939 को सैफई( इटावा ) में अहीर किसान परिवार में जन्म। मैनपुरी में इंटर तक की पढ़ाई। आगरा विवि से एम और बीटी। अखिलेश यादव और प्रतीक यादव दो पुत्र। शिक्षक से राजनीति में। समाजवादी चेहरा। राममनोहर लोहिया के शिष्य और चौधरी चरण सिंह के अनुयायी। 1977 में पहली बार राज्य मंत्री। 80 में लोकदल के यूपी अध्यक्ष। 82 में उच्चसदन में विपक्ष के नेता। 89 में बीजेपी के सहयोग से पहली बार मुख्यमंत्री। अजित सिंह की हार। अयोध्या मसले पर बीजेपी से टकराव। आडवाणी की रथयात्रा का विरोध। यूपी में न घुसने देने का एलान। समर्थन वापस। 90 में वीपी सरकार के पतन के बाद चंद्रशेखर के साथ। कांग्रेस के समर्थन से राज जारी। 91 में केंद्र सरकार गिरी। मुलायम से कांग्रेस ने पल्ला झाड़ा। मध्यावधि चुनाव। कल्याण सत्ता में। दिसंबर में विवादित ढांचा धराशाई। देश में हिंसा। अक्टूबर 92 में समाजवादी पार्टी( सोशलिस्ट पार्टी) गठित। 93 में बसपा के साथ राज्य में चुनाव लड़ा। बसपा, कांग्रेस और जनता दल के समर्थन से दूसरी बार सीएम। मुजफ्फरनगर में 94 में उत्तराखंडियों पर फायरिंग। 95 में समर्थन वापस। सरकार का पतन। मैनपुरी से 96 में संसद में। सयुंक्त मोर्चा सरकार में रक्षा मंत्री। लालू की वजह से पीएम नहीं बन पाए। 98 में देवेगौड़ा सरकार का पतन। फिर चुनाव। सांसद। मायावती से छत्तीस का आंकड़ा। बीजेपी -बसपा नजदीक। फिर झगड़ा। बसपा को तोड़ा। अमर सिंह का साथ। निर्दलीयों के समर्थन से तीसरी बार 2003 में सीएम। इसी गद्दी पर रहते मैनपुरी से फिर सांसद। सपा ने सबसे ज्यादा 42 सीटें जीतीं। यूपीए को समर्थन। 07 में हाथी ने साइकिल को तोड़ डाला। लगातार विवादों में। सरकारी खजाने को लुटाने के आरोप। सैफई में स्टेडियम से लेकर कालेज तक। 7 स्टार होटलों से ज्यादा सुविधाएं। अरबों रूपये की संपत्ति खड़ी करने का आरोप। सीबीआई केस। सुप्रीम कोर्ट में मामला। ढेरों समाजवादी चेहरे पार्टी से अलग। अल्पसंख्यकों में गहरी पकड़। 2008 में मनमोहन सरकार को बचाया। कल्याण से हाथ मिलाने के बाद गड़बड़। अब लालू-पासवान संग मोरचा बनाया। प्रतिष्ठा दांव पर।

गुरुवार, 16 अप्रैल 2009

सब्जी में आलू-नाम में कालू-राजनीति में लालू : बेजोड़


देशपाल सिंह पंवार
उसकी शक्ल हंसाती है। अक्ल चिढ़ाती है। दंगल कराती है। शगल बनाती है। बगल रिझाती है। नकल कमाती है। उसका खाना, पीना, उठना,बैठना,चलना, पहनना,बोलना, जूझना,घूरना, ताड़ना,मांगना, हड़काना, करना, लड़ना सब खबर है। हर दम हाल-चालजानने को जनता बेसब्र है। उसपर हर दम मीडिया की नजर है। उसकी हर खबर सबसे बड़ी खबर है। वो फेम है। सबसे बड़ा ब्रैंड नेम है। उसका नाम बिकता है। असली भी और नकली भी, नकल राजनीति में है। खिलौनों में है। रेल में है। खेल में है। इल्म में है। फिल्म में है। चाल में है। ढाल में है। टीवी में है। बीवी में है। खैनी में है। सत्तू में है। कुल्हड़ में है। बिस्कुट में है। तिल्कुट में है। सैलून में है। बैलून में है। चाकलेट में है। पेय पदार्थों की क्रेट में है। कास्मेटिक पैक में है। क्रीम में है। पाउडर में है। ड्रेस में है। सेंस में है। मेन्स में है। वोमेन्स में है। ओल्ड में है। गोल्ड में है। यंग में है। जंग में है। रंग में है। भंग में है। लफड़े में है। कपड़े में है। लाठी में है। बाटी में है। उसे बेचकर-कोसकर अमीर बनने वाले नकलचियों, धंधेबाजों को नहीं कोई शेम है। वो पक्का बिहारी है। उसका गंवई अंदाज सब पर भारी है। उसकी सोच न्यारी है। उसके प्रबंधन पर सारी दुनिया वारी है। वो सबको दौड़ाता है। सब उसे बुलाते हैं। पढ़े-लिखे उसे सुनते है। गुनते है। वो पटरी से उतरी रेल की मेल को सुपर फास्ट की तरह दौड़ाता है। गरीब रथ चलाता है। टैक्स नहीं लगाता है। पर अविश्सनीय मुनाफा दर्शाता है। पांच साल में सारे रिकार्ड तोड़ जाता है। वो दिल्ली में करम का धनी है पर बिहार में किस्मत का। रेल में पास-बिहार में फेल। जातिवाद,अपहरण उद्योग, खून खराबा, निजी सेनाओं व नक्सलियों की समानांतर सरकार, अपराधियों की राजनीति, दागियों की सरकार व दल में बेशुमार, हर फाइल में घपले-घोटाले,लूट-खसोट, चौपट धंधे, रोते बंदे, इरादे गंदे, जनता हलाल-नातेदार, रिश्तेदार कंगाल से मालामाल और विकास की जगह विनाश का जंगलराज इसी तरज पर 15 साल लालू राज का बेसुरा साज बजा। हेमा के गाल की तरह सड़कें तो नहीं बनीं हां लोग सड़कें ढंूढनें में लंगड़े-लूले जरूर होते गए। कश्मीर के आतंकवाद से ज्यादा वहां 15 साल में खून बहा। वो मीडिया को कोसता गया। विरोधियों को दुत्कारता गया। उसका घमंड सबको नीचा दिखाता गया। बिहार का नाम बदनाम हुआ। बिहारी बदनाम हुआ। पर उसका सिक्का चलता रहा। वो किसी के काबू में नहीं रहा पर सबको काबू में करता गया। बिहार में ना सही तो दिल्ली और देश में सही। सब जानते हैं-वो राजनीति में अविश्वसनीय है। हर दम चाल चलता है। जो हाथ मिलाता है उसे ही हलाल कर जाता है। फिर भी वो कमाल कर जाता है। पर इस बार हर दिमाग में यही सवाल है कि आखिर रेल की तरह बिहार को ड्राइव करने की बजाय उसने ड्राई क्यों बनाया? यही सवाल इस बार चुनाव में उसका पीछा कर रहा है। यही नीचा दिखा रहा है। क्या होगा समय बताने वाला है? लेकिन फिलहाल तो यही कहना पड़ेगा कि सब्जी में आलू और राजनीति में लालू का कोई जोड़ नहीं।

लालू प्रसाद यादव
0-11 जून 1947 को गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में गरीब परिवार में जन्म। पिता-कुंदन राय, माता-मरचिया देवी। राबड़ी से 1 जून 1973 को शादी। दो बेटे, सात बेटियां। आपातकाल के दौरान परिवार नियोजन की ज्यादती के विरोध में परिवार इतना बढ़ाया। नीतीश व सुशील मोदी संग पटना विवि छात्र यूनियन चुनाव से राजनीति की शुरूआत। फुटबाल के शानदार खिलाड़ी। 70 में जयप्रकाश नारायण व कर्पूरी ठाकुर से प्रभावती ,77 में सत्येंद्र नारायण सिन्हा ने जनता पार्टी की ओर से संसद का टिकट दिया। सबसे कम उम्र के सांसद। 80-89 तक दो बार विधायक। विपक्षी दल के नेता। 90-95 तक परिषद में। कांग्रेस की जगन्नाथ सरकार का पतन। 90 में शरद यादव की जिद ने सीएम बनवाया। आडवाणी का रथ रोका। गिरफ्तार। 97 तक खुद सीएम रहे। 95 में विधायक। 96 में 950 करोड़ के चारा घोटाले में फंसे। दर्जनों अन्य नेता और अनगिनत अफसरों, कर्मचारियों पर फंदा। 30 जुलाई 97 में 134 दिन तक गिरफ्तार। स्टेट गेस्ट हाऊस से सुप्रीम कोर्ट ने बेऊर जेल में ठेला। इससे पहले इस्तीफा। पत्नी राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बनाया। जनता दल तोड़कर राष्ट्रीय जनता दल बनाया। सबसे लंबे समय तक किसी पार्टी का अकेला मुखिया। 98 में फिर सांसद। 90-05 तक राजद का बिहार में जंगल राज। जातिगत राजनीति। पिछड़ों और मुसलमानों की राजनीति। विकास चौपट। अपराध चरम पर। समानांतर सरकार। अपहरण उद्योग की दहशत। कई दर्जन क्षेत्रीय सेनाओं का वर्चस्व। नक्सली आधिपत्य कायम। रोजाना खूनखराबा। सारे उद्योग धंधे चौपट। सब कंपनियों, डाक्टरों व पैसे वालों का बिहार से पलायन। जनता में त्राहिमाम। सूबे का नाम बदनाम। 2005 में राजग सरकार। नीतीश युग की शुरूआत। चारा घोटाले में पांच बार गिरफ्तार। आय से अधिक संपत्ति का भी केस। इसमें भी गिरफ्तार। सारे नातेदारों और रिश्तेदारों को गद्दियों पर बैठाया। जमीनों को हथियाया। 2004 में लालू समेत 26 राजद नेता सांसद बने। यूपीए सरकार में रेलमंत्री। रेलवे की कायापलट। गाय की तरह दूहा। घाटे की रेल माया से लबालब। इस बार दो जगह से चुनाव मैदान में। कांग्रेस को ठैंगा दिखाया। पासवान और मुलायम से दोस्ती।

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

खलनायक भी नायक भी


देशपाल सिंह पंवार
राजनीति के मैदान में वो खलनायक भी है और नायक भी, उसके जितने दोस्त हैं उससे ज्यादा दुश्मन। अंदर तक घुसती उसकी आंखों से ढेरों को डर लगता है। वो ढेरों की आंखों में खटकता है। फिर भी वो ढेरों आंखों में बसता है। जितने दिल उससे नफरत करते हैं उससे ज्यादा के दिल में वो बसता है। जितने उसकी शक्ल से चिढ़ते हैं -उससे ज्यादा एक झलक को तरसते हैं। जितने लोग हिटलर कहते हैं उससे ज्यादा मसीहा मानते हैं। जितने चेहरे राज्य से पलायन करना चाहते हैं उससे ज्यादा बसने को लालायित रहते हैं। उसके नाम पर कट्टरवादी हिंदु चेहरे का आवरण है लेकिन उसने अपने राज्य पर तरक्की का आवरण ओढ़ा दिया है। विरोधी तानाशाह बोलते हैं, मानते हैं, ठहराते हैं और जलते हैं पर दूसरी ओर उसके कुशल प्रशासन पर ताली भी बजाते हैं, सम्मानित भी करते हैं और उसकी मिसाल भी देते हैं। शायद उस जैसा बनना भी चाहते हैं। उस पर जब भी बोल के वार होते हैं तो पलटवार की दहाड़ से सबकी बोलती बंद हो जाती है। उसे हटाने, दौड़ाने और मिटाने की अंदर-बाहर से जितनी कोशिशें होती गर्इं उतना ही उसका खूंटा मजबूत होता गया और वो विरोधियों के खूंटे उखाड़ता गया। उसे जिसने भी राज करने का पहाड़ा पढ़ाने की कोशिश की वो खुद उसकी क्लास में पाठ पढ़ते नजर आए। या राजनीति से विदा हो गए। उसे दल में जिस-जिसने भी आंख दिखाने की कोशिश की वे सब पैदल होते गए। राजनीति की आंख से ओझल होते गए। पार्टी में जो धड़ा इस नेता को किनारे लगाने की कोशिश में जुटा वो खुद किनारे बहता चला गया और वो खुद आज बीच मझधार में पार्टी की नैया का खिवैय्या है। उसे मुख्यमंत्री के लायक ना मानने वाले बोल अब असली प्रधानमंत्री का ढोल पीटने लगे हैं। उसकी हां के बिना उस राज्य में पत्ता भी नहीं हिलता। उसकी हां के बिना न तो किसी को राजधानी का टिकट मिलता न दिल्ली का। उसकी चाह के बिना जीत की राह नहीं खुलती। उसके साथ के बिना ढेरों नेताओं की नैया वैतरणी पार नहीं करती। उसकी चाल तेज है। उसका मिजाज गरम है। उसकी जुबान कड़वी है। उसे ना कहना आता है पर ना सुनना पसंद नहीं। उसकी इच्छा ही हुक्म और हुक्म की तुरंत तामील। उसे कैद रखने वाली कोई जेल भी नहीं बनी, पर जन-जन उसके पीछे है, वो जननेता है। यही उसकी ताकत है। उसे जलजले से खंडहर गुजरात, कलह से जर्जर संगठन और जमीन चाटती अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी लेकिन बेमिसाल लीडरशिप, दूरगामी सोच,मजबूत इच्छा शक्ति, शासन-प्रशासन पर मजबूत पकड़ से आज ये सूबा देश में सबसे आगे है। टाटा-बिरला-अंबानी जैसा हर उद्योगपति वहां या तो है या धंधा करना चाहता है। राग अलापने वाले चाहे जितना भी दंगे का रोना रोते रहें पर फिलहाल इस शख्सियत का राजनीति में मोल है। काम अनमोल है।
नरेंद्र दामोदर दास मोदी

0-17 सितंबर 1950 को गुजरात के मेहसाना जिले के वाडनगर में एक मध्यमवर्गीय परिवार में जन्म। यहीं पर स्कूली शिक्षा। गुजरात विवि से राजनीति शास्त्र में मास्टर डिग्री। एबीवीपी में शामिल। नव निर्माण आंदोलन का हिस्सा। बतौर परिषद प्रतिनिधि बीजेपी में। संघ के स्वयंसेवक बने। आपातकाल में छिपे रहे। 87 में बीजेपी में शामिल। संघ और बीजेपी में समन्वय का काम। मुख्य रणनीतिकार की छवि के बाद 88 में गुजरात इकाई के महासचिव। 88-95 के बीच पार्टी के दो बड़ी योजनाओं का सफल क्रियान्वयन। एल के आडवाणी की सोमनाथ से अयोध्या रथ यात्रा और कन्याकुमारी से कश्मीर तक का मार्च। फलस्वरूप राष्ट्रीय सचिव नियुक्त। पांच राज्यों का जिम्मा। 95 में पार्टी गुजरात में दो तिहाई बुहमत से सत्ता में। तब से बीजेपी का राज। 98 में महासचिव मनोनीत। आडवाणी के चहेते। अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री पद हासिल। जलजले से तबाही, खस्ता हाल आर्थिक स्थिति और जर-जर संगठन के बीच लीडरशिप की परीक्षा। पूरी तरह सफल। 10 फीसदी की विकास दर हासिल। पिछले साल यह 11।5 पर सबसे ज्यादा। जनहित की तमाम योजनाएं लागू। फरवरी 2002 में गोधरा कांड के बाद राज्यव्यापी दंगा। सरकार पर कत्लेआम कराने का आरोप। सरकारी नजरिए से 1044 लोगों की हत्या। गुजरात के दामन पर काला दाग। देश-विदेश में अटल सरकार पर वार। लोजपा ने साथ छोड़ा। द्रमुक और टीडीपी की धमकी। बीजेपी ने मोदी से इस्तीफा मांगा। सदन विखंडित करने की सिफारिश। फिर से चुनाव। पार्टी 182 में से 127 सीटों पर जीती। फिर सीएम बने। दो बार वीसा देने से अमरीका का इंकार। 2007 में फिर चुनाव। फिर विरोधियों के प्रहार। सोनिया ने मौत का सौदागर कहा। बीजेपी को फिर बहुमत। लगातार तीसरी बार मोदी सीएम। सबसे ज्यादा दिन राज करने का रिकार्डÞ। मुंबई कांड के बाद फिर निशाने पर। महिला मंत्री दंगे में लिप्त। जेल में। लगातार सबसे बेहतर गर्वनेंस वाला राज्य। सर्वोत्तम सीएम का अवार्ड। ब्रिटिश सांसदों की नजर में गुजरात दुनिया को लीड करेगा। उद्योगपतियों के लिए सूबा स्वर्ग बना। टाटा की नैनो को महज दो दिन में मंजूरी समेत जमीन। एक रिकार्ड। अब सबसे धनवान सूबा।

माया की निराली माया



देशपाल सिंह पंवार
नाम में बहुत कुछ रखा है-अगर आप मानते हैं तो ठीक, नहीं तो मान जाइए। कम से कम राजनीति की इस हस्ती का जैसा नाम-वैसा काम देखकर तो शक की गुंजाइश नहीं बचती। जिसके पिता-माता के नाम के साथ परभू - राम जुड़ा हो,जिसका खुद का नाम संसार की सबसे बड़ी ताकत और सबकी जरूरत की देवी पर रखा गया हो उसे कदम बढ़ाने से कौन रोक सकता था? चाहे उसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन बचपन से एलएलबी की पढ़ाई तक जितना किताबी ज्ञान उसने ग्रहण किया उससे ज्यादा शोषण के शिकार दलितों के चेहरों की पीड़ा से हासिल किया। वो पीड़ा जो अपनों ने भी झेली, उसने भी तब तक झेली, जब तक हाथ में पावर नहीं आई। पावर जो राजाओं के घरों की बांदी हुआ करती थी,पावर जो रईसों के तलुवे चाटा करती थी, पावर जो परिवारवाद की राह पर चलते रहे राजनेताओं की औलादों को तोहफे में बंटती रही। पर यहां ना तो वो खैरात में मिली और ना ही राजनीति की परचून की दुकान से खरीदी गई। उसने दलितों को अपनी पावर बनाया, पावर का मतलब समझाया। नतीजा-आज वो खुद पावर हाउस है। हर कदम पर हार-तीखे वार झेलते रहने के बावजूद पलटवार का गुण बेड़ा पार करता गया। उससे पहले न तो समाज के ठेकेदार दलितों को समाज में बराबर का हक दिला पाए। न हिंदुस्तान सरकार की आरक्षण की खुराक दलितों के हक की सेहत को सुधार पाई और न ही दूसरा कोई दलित नेता उनकी आवाज बनकर गूंज सका। दलित के भी बोल का मोल है इसी शख्सियत ने राजनीति और समाज में यह गोल दागना भी सीखा और सिखाया भी नतीजा आज हर दल के लिए दलित अनमोल हैं। उनके हक की जंग अब समाज के हर तबके के रंग-ढंग में बदल चुकी हैं। भागो नहीं-दुनिया को बदलो की थीम पर उन्होंने राजनीति की ऐसी बीम रखी जिसे हिलाने में आजकल सारी ताकतों के घुटने कमजोर पड़ने लगे हैं। बाजू जवाब देने लगे हैं। यह स्थिति तो तब है जब हर तरफ से वार पर वार हैं। दामन पर बैईमानी के कीचड़ उछल रहे हैं। महारानियों की तरह जन्मदिन मनाने के आरोप लग रहे हैं। संतरी से मंत्री और जनता से नेता तक से उगाई के किस्से उछल रहे हैं। कानून में फांसने के रास्ते निकाल रहे हैं। पर उसे नो प्रोबल्म। हां पीड़ा की कड़वाहट या किसी चोट का गुस्सा उनकी चाल से भी झलकता है और बोल से भी, वोट बैंक लगातार बढ़ता जा रहा है,वोटर का उस पर विश्वास है। यही इस शख्सियत की कामयाबी है और यही विरोधियों का सबसे बड़ा डर है। आज राजनीति में उस जैसा कोई नहीं। या तो ज्यादातर परिवारवाद की कमाई खा रहे हैं या फिर संगठन की। उसने खुद कुंआ खोदा,पानी निकाला,पानी पी भी रही हैं और दूसरों को पिला भी रही हैं। दिल्ली की गद्दी के लिए सब मनाने में लगे हैं। वो जिधर-राजपाट उधर। यूपी हुई हमारी-अब दिल्ली की बारी के नारे का मतलब शायद वो समझ नहीं रहे हैं। इतिहास गवाह है-न तो वो अपनी कमाई पर किसी को हाथ रखने देतीं और न ही कभी घाटे का कोई सौदा करतीं। 2007-08 में उसने 27 करोड़ आयकर अदा किया। मुकेश अंबानी से भी ज्यादा। देश की राजनीति का अनोखा रिकार्ड़। सचमुच माया की माया ही निराली है। जिस पर हाथ-उसकी लाली। चुनाव में क्या होगा देखते रहिए?
मायावती चंदावती देवी
0-15 जनवरी,1956 को दिल्ली में जन्म। पिता परभू दास दूरसंचार के कर्मचारी। माता रामरती। मूलत बादलपुर गांव (गाजियाबाद जिला) निवासी। बीए, बीएड, एलएलबी की शिक्षा कालिंदी कालेज दिल्ली और मेरठ विश्वविद्यालय से। 0-प्रोफेशन-राजनीति, समाज सेवा और वकालत। 77-84 तक दिल्ली प्रशासन के कई स्कूलों में अध्यापन। कांशीराम से जुडाव ,डीएस-4 ज्वाइन। 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी गठित। दलितों और बौद्धों के उत्थान का संकल्प। अध्यापन छोड़ मायावती पूरी तरह राजनीति में। 0-84 में कैराना (मुजफ्फरनगर) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा-हार। 85 में बिजनौर और 89 में हरिद्वार से फिर लोकसभा चुनाव मैदान में। नतीजा-हार। मसूद अहमद जैसे नेताओं के साथ काम। 89 में पार्टी को 9 फीसदी वोट मिले। इसके बाद दूसरे तबके पर ध्यान। इसी साल पहली बार बिजनौर सीट से संसद में प्रवेश। 91 में कांशीराम की उत्तराधिकारी घोषित। 95 में उच्च सदन में। हरौरा और बिल्सी सीटों से विधानसभा में।0-93 में मुलायम सरकार को समर्थन। रिश्ते खराब। 2 जून 95 को लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड। 3 जून को बीजेपी के समर्थन से पहली बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर। सपा नेताओं के खिलाफ 150 से ज्यादा मुकदमें। अब तक छत्तीस का आंकड़ा। 18 अक्टूबर को पतन। 97 में बीजेपी से अनोखी डील। 6 माह बसपा, 6 माह बीजेपी का सीएम होना तय। पहली खुद सीएम। बीजेपी का नंबर आते ही समर्थन वापस। तीसरी बार 2002 में सीएम। एक साल से ज्यादा अवधि तक गद्दी पर। 98 और 99 में अकबरपुर (कानपुर) से लोकसभा में। 04 में फिर उच्च सदन में। 0-2007 में हाथी नहीं-गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है का नारा। स्वर्णों को टिकट। हर वर्ग का समर्थन। गठजोड़ के दौर में पूर्ण बहुमत की सरकार। बीजेपी और सपा को करारा झटका। यूपी की 23 वीं, 24 वीं, 30 वीं और 32 वीं मुख्यमंत्री।0-लगातार विवादों में। कांशीराम को घर वालों से दूर करने का आरोप। 18 हजार से ज्यादा पुलिस जवानों को निकाला। दर्जनों पुलिस, प्रशासनिक अफसर निलंबित। अमिताब बच्चन के खिलाफ बाराबंकी भूमि केस। अम्बेडकर पार्क और परिवर्तन चौक पर अरबों खर्च। ताज कोरिडोर घोटाले में करप्शन और आय से अधिक संपत्ति के सीबीआई के पास केस। पार्टी फंड और जन्म दिन के नाम पर धन बटोरने के आरोप। इंजीनियर एम के गुप्ता की हत्या से बवाल। वरुण गांधी पर रासुका से फिर विवादित। 0-कांग्रेस, सपा, बीजेपी से बराबर की दूरी। अपने दम पर चुनाव मैदान में। तीसरे मोरचे को भी झटका। बार-बार पार्टी टूटने की परंपरा। राजस्थान में पूरा विधायक दल कांग्रेस में। तमाम देशों की यात्रा। कई किताबें प्रकाशित।

सोमवार, 13 अप्रैल 2009

जीते तो सबके नाथ ..



देशपाल सिंह पंवार
ये शख्स न राजे-रजवाड़ों में पैदा हुआ और न ही बाप-दादा की राजनीतिक विरासत में। दूसरे ढेरों नेताओं की तरह न नसीब की कमाई खाई, न विचारधारा डगमगाई और न ही दल बदल की धारा में लुटिया डुबाई। दिल में राष्ट्रप्रेम की दुहाई और कर्म की अगुवाई के सिवा किसी और चीज में न जान लगाई और न ही ऐशो आराम के लिए गुहार लगाई। धर्म के जज्बे और कर्म की इकलौती राह ने वो सब कुछ दिया जिसकी चाह हर नेता जरूर पाले रखता है। एक अंजाने से गांव के अंजाने से परिवार में पैदा इस शख्स को आज सारी दुनिया जानती है और इस नाम की वजह से उस गांव को पहचानती है। जैसा आज दिख रहा है, ऐसा बचपन भी नहीं था और जवानी भी, पर हां पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। मां-बाप की चाह थी, बेटा पढ़ेगा तो अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, कुछ खाने-कमाने लायक हो जाएगा। बेटे की चाह पढ़ने की भी थी, कुछ बनने की भी थी और इससे ज्यादा अपने गांव, अपने समाज, अपने राज्य और अपने देश के लिए कुछ करने की भी थी। जिस उम्र में रईसों की औलाद पैसा लुटाना सीख जाती हैं उस 13 साल की उम्र में वो गांव की गलियों में संस्कारों की बात करने लगा था। संघ की शाखाओं में जाने लगा था हिंदुत्व की बात सीखने भी लगा था और थोड़ी बहुत करने भी लगा था। फिजिक्स के पढ़ाकू और हिंदुत्व के लड़ाकू की यह बैमेल सोच सबको हैरत में डालती थी पर इस नौजवान की सीखने की ललक और लीडरशिप क्षमता के सब कायल थे। दूसरे के कंधों पर पैर रखकर आगे बढ़ने या एक ही छलांग में सारी जमीन नापने की बजाय एक-एक कदम आगे बढ़ने की सही राह को चुना। आम आदमी से जुड़ाव होता गया,कारवां बढ़ता गया। राजनीति के परिवारवाद को अगर छोड़ दें तो कहीं 26 साल की उम्र में किसी को विधायक बनते देखा है। जातिवाद की राजनीति और दिग्गजों की मौजूदगी के बावजूद अपनी जगह बनाई। उस स्थिति में जब अंदर और बाहर बर्दाश्त करने वालों की संख्या बेहद कम थी। यूपी बीजेपी में एक से एक महारथी थे। ढेरों इन बरगदों की छाया में ही सूखते चले गए लेकिन कर्म के धनी इस शख्स ने शुरू से ही अपना कद ऐसा बनाया कि मिटाने की कोशिश करने वाले खुद किनारे लगते गए। यह भी सच है कि यूपी को छोड़ अगर किसी दूसरे राज्य से वो होते तो इस मुकाम तक पहुंचने के लिए इतनी जद्दोजहद न करनी पड़ती। पर ये क्या कम है कि जिस गद्दी पर चौधरी चरण सिंह जैसे नेता रहे हों वहां तक वे पहुंचे। ये क्या कम है कि उन्हें तमाम महारथियों के बीच उस गद्दी पर बैठाया गया जिस पर एल के आडवाणी थे। ये क्या कम है कि वे उस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने जो सबसे पुराने दल को टक्कर भी दे रहा है, ताज भी छीन रहा है,जिसके बिना आज हिंदुस्तान की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसके सहारे और जिसे कोसकर ढेरों क्षेत्रीय दल अपनी दुकान चला रहे हैं। पर हां इस कद को देखते हुए उनकी कप्तानी में लड़ी गई जंग के नतीजे जरूर अब तक कमतर हैं। उनके सामने अंदर और बाहर से ढेरों चुनौतियां हैं। जिन बड़ों के बीच रहते हुए वे बड़े बनें उनकी अपेक्षा पूरी करना आसान नहीं। जो उनकी तरह बड़ा बनना चाहते हैं उन पर लगाम कसना आसान नहीं। बिखरते कुनबे को मजबूत करना आसान नहीं। इस बार की चुनावी जंग में ढेरों सेनाओं से मुकाबला आसान नहीं। फतह आसान नहीं। ऊपर से अटल बिहारी वाजपेयी जैसे करिश्माई नेता का साथ नहीं। ऐसे में जीवन की इस सबसे बड़ी परीक्षा में अगर वो पास हुए तो देश की राजनीति के साथ-साथ बीजेपी के भी असली नाथ कहलाएंगे। यही उनकी तमन्ना है पर सब वोटर की इच्छा पर है। वक्त की इच्छा पर है। नसीब की मर्जी पर है। भले ही यह शख्स नसीब को ना मानता हो।
राजनाथ सिंह

0-वाराणसी: चंदौली जिला, चकिया तहसील का एक छोटा सा भ्भोरा गांव-10 जुलाई 1951 को एक साधारण किसान परिवार में जन्म। पिता रामबदन सिंह, माता-गुजराती देवी। गोरखपुर विवि से प्रथम श्रेणी में फिजिक्स में एमएससी। लेखन, राजनीति और समाज सेवा में रूचि। के बी पोस्ट्ग्रेजुएट कालेज मिर्जापुर में 1971 में फिजिक्स के लेक्चरर। यूपी में बेरोजगारी का निदान किताब लिखी।0-संघ,राष्ट्रीय सेवक समिति,जनसंघ, बीजेपी, विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल,एबीवीपी, राष्ट्रीय सिख संगत, मजदूर संघ,हिंदु मुनानी, हिंदु स्वयं सेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, किसान संघ, वाराणसी कल्याण आश्रम से जुड़ाव, शिवसेना,रामराज्य परिषद।0-विचारधारा-हिंदु राष्ट्र, हिंदुत्व, अखंड हिंदुस्तान, समान नागरिक अधिकार, राम मंदिर निर्माण का संकल्प। लगातार एक ही गोल पर आगे बढ़ते रहने का जज्बा। 0-13 साल की उम्र से संघ की ओर आकर्षित। 69-71 तक एबीवीपी गोरखपुर के संगठन सचिव। 74 में जनसंघ के मिर्जापुर इकाई के सचिव। 75 में जनसंघ के जिलाध्यक्ष। जयप्रकाश नारायण के अनुयाई। जेपी आंदोलन के जिला संयोजक नियुक्त। आंदोलन के कारण 75 में गिरफ्तार। मिर्जापुर व नैनी जेल में रखा गया। 0-मात्र 26 साल की उम्र में 77 में मिर्जापुर सीट से जीतकर एसेम्बली में। बेमिसाल लीडरशिप की क्षमता। 83 में बीजेपी के प्रदेश सचिव। 84 में यूथ विंग के प्रदेश अध्यक्ष, 88 में राष्ट्रीय अध्यक्ष। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और विधानपरिषद के लिए निर्वाचित। 90 में बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष। 0-91 में उत्तर प्रदेश में पहली बार बीजेपी सत्ता में। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री और राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री। कोर्स की किताबों में इतिहास का पुनर्लेखन, वैदिक गणित का समावेश। 94 से 2001 तक दो बार दिल्ली उच्च सदन में। उच्चसदन में पार्टी के मुख्य सचेतक। कई संसदीय समितियों के लगातार सदस्य। 97 में उत्तर प्रदेश पार्टी अध्यक्ष 0-99 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में परिवहन मंत्री। फिर एग्रिकल्चर मिनिस्टर। लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को निकालने की जिम्मेदारी। सफल।0-28 अक्टूबर 2000 से 8 मार्च 2002 तक् उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री। रामप्रकाश गुप्ता की जगह गद्दी पर। 01 में एसेम्बली उपचुनाव जीते।0-आजीवन संघ के बेहद नजदीक रहे। 2005 में जिन्ना प्रकरण पर एल के आडवाणी का पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा। राजनाथ सिंह अध्यक्ष मनोनीत। 06 में फिर निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष निर्वाचित। पांच राज्यों में पार्टी का खराब प्रदर्शन। निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन। 07 में यूपी में दल का निराशाजनक प्रदर्शन। 08 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, जम्मू आदि में शानदार प्रदर्शन। राजस्थान में हल्के से अंतर से पराजय।0-पार्टी को सबसे आगे ले जाने की तमन्ना। इस बार एनडीए की वापसी के लिए प्रयासरत। गाजियाबाद सीट से संसदीय चुनाव मैदान में।

नसीब से ज्यादा ज्ञान के धनी



देशपाल सिंह पंवार
वो जितने नसीब के धनी हैं उससे ज्यादा ज्ञान के-कर्म के-सरल व्यवहार के। हकीकत में उन्हें राजनेता कम और विचारक तथा विद्वान ज्यादा कहा जा सकता है। जवानी आने से पहले ही बंटवारे का दर्द, शरणार्थी होने का मर्म झेलने वाले इस शख्स के चेहरे से आम आदमी की बेबसी झलकती है। पर नसीब ऐसा-सबको जलन हो। बिना संसदीय चुनाव जीते प्रधानमंत्री की उस कुर्सी तक चुपचाप पहुंच गए जिसके लिए दूसरे 30-40 साल से पिस रहे हैं। चुनाव लड़ रहे हैं। जूतियां रगड़ रहे हैं। सबसे झगड़ रहे हैं पर अफसोस-नंबर नहीं लग पाया। राजनीति में उन जैसे नसीब वाला दूसरा हो सकता है पर ज्ञान में कोई दूसरा चेहरा आसपास नहीं ठहरता। जो लोग यह कहते हैं कि हिंदुस्तान में ज्ञान की कोई कदर नहीं होती यह चेहरा उनकी बोलती बंद करने के लिए काफी है। 1990 तक आर्थिक मामलों का यह ज्ञानी पैसे-धेले से जुड़े सारे पदों की हैसियत बढ़ा चुका था। हां राजनीति का न तो कोई ज्ञान था और न ही कोई लेना-देना और न ही ये आड़े आया। आर्थिक मामलों का ज्ञान सब पर असरदार रहा। 91 में धमाकेदार शुरूआत- वित्त मंत्री बन गए। आर्थिक सुधार के नाम पर देश को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर लेकर गए। कड़े फैसले करते गए। लोग कोसते गए। एक मौन-सौ को हराता है कि कहावत सच होती गई। कम बोलने और 24 घंटे ईमानदारी से काम करने की आदत ने दुश्मनों की चाहत चार साल पूरी नहीं होने दी। चुनावी साल था। ढेरों अपनों को इनकी चाल से मलाल था। खजाने से हटवाया पर कद ऐसा था कि विदेश मंत्री बनाना पड़ा। एक साल तक रहे। 91 में जहां उनका ज्ञान काम आया था तो 2004 में उनका सरल व्यवहार, निर्विवाद और सर्वमान्य चेहरा। किसी को यकीन नहीं था कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे। उन्हें खुद यकीन नहीं था। जिस सरकार को उन्होंने चलाया उसमें एक दर्जन से ज्यादा ऐसे थे जो दावेदार थे। इतना ही नहीं यूपीए का हर नेता उनसे ज्यादा राजनीति का जानकार था। शायद जैसा कर्म-वैसा फल। हां राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे वित्त मंत्री थे। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे विदेश मंत्री बने। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे 1999 में पहली बार संसद का चुनाव दक्षिणी दिल्ली से लड़े और हारे। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे प्रधानमंत्री बने। पर हां इतने विश्वास से अब यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें राजनीति नहीं आती। उनके आर्थिक जानकार कद पर राजनीति का यह पद हावी हो चला है। जो शख्स वार से घबराया ना हो, दूसरे पर वार किया ना हो उस शख्स को राजनीति ने इतना जरूर सिखा दिया है कि काजल की इस कोठरी में खुद को बचाने के लिए जरूरी है दूसरों पर कालिख पोतना। हां यह जरूर दिखता है कि इसके लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है। कमजोर प्रधानमंत्री और 10 जनपथ से राज चलने के वार झेलते-झेलते उन्होंने पांच साल गुजार दिए हैं। अगर आजकल के राजनेताओं की तरह होते तो अब तक दूसरी राह पर खड़े नजर आते लेकिन न वे आरोपों से घबराए और न ही झांसे में आए। राज कैसा bhi चलाया हो पर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिस पद पर रहते हर किसी के दामन पर छींटे पड़े हों वहां अब तक यह चेहरा बेदाग है। यही कारण है कि जिस दल में ढेरों दिग्गज हैं वहां अगली बार bhi यह गद्दी इस शख्स के लिए बुक कर दी गई है। इसी ताकत के बाद उन्होंने मुंह खोला तो सबको आश्चर्य हुआ। बिल्कुल यही अंदाज था -शरीफ की शराफत की ज्यादा लानत ठीक नहीं। नतीजा कुछ bhi हो इस बार के चुनाव में राजनीति की धारा अलग बहती नजर तो आ रही है। पहली बार दोनों बड़े दलों के प्रधानमंत्री तय हैं। एक तरफ राजनीति का धुरंधर है तो दूसरी ओर एक सामान्य से आम आदमी का चेहरा। इस शख्स और ऐसे चेहरों के लिए यही बहुत बड़ी बात है। जीतने और जिताने की स्थिति में वे चाहे हों या नहीं पर आज की राजनीति के दौर में ऐसे चेहरों के सहारे चुनाव लड़ना एक अच्छा संकेत जरूर है खासकर राजनीति के लिए। मनमोहन सिंह0-26 सितंबर 1932, पंजाब का गाह गांव और कोहली सिख परिवार में जन्म(इस समय पाकिस्तान के चकवाल जिले का हिस्सा)। देश बंटवारे पर अमृतसर पलायन। 0-1958 में गुरुशरण कौर से शादी। तीन बेटियां। 0-अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिए पंजाब विवि में स्टडी। कैंब्रिज विवि से एम ए। आक्सफोर्ड़ विवि से 1962 में डी फिल। 64 में पहली किताब लिखी।0- 66 से 67 तक अंकटाड सचिवालय में कार्यरत। 70 में दिल्ली विवि में पढ़ाया। 71 में वाणिज्य मंत्रालय में सलाहकार। 72 में वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार। 0-वित्त मंत्रालय के सचिव, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विवि अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहे। 82 से 85 तक रिजर्व बैंक गवर्नर। 85-87 योजना आयोग के उपाध्यक्ष। 0-91-96 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री। आर्थिक संकट का दौर। अर्थव्यवस्था का निर्णायक मोड़। सुधार के तहत पूंजीवादी व्यवस्था का समावेश।0-लाइसेंस राज खत्म। विदेशी पूंजी निवेश की सारी बाधाएं खत्म। पब्लिक सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए ओपन। आर्थिक विकास दर 3 से 9 फीसदी तक पहुंची। 0-95 में उच्च सदन में। 96 में सरकार की हार। फिर 2001 और 07 में उच्च सदन में। 98-04 उच्च सदन में विपक्षी नेता। 99 में संसदीय चुनाव दक्षिणी दिल्ली से लड़े-हारे।0-2004 में यूपीए की सरकार। सोनिया ने सरल व्यक्तित्व और विद्वान होने की वजह से प्रधानमंत्री चुना। आर्थिक सुधार के पुराने रास्ते पर। पाक से दोस्ती की पहल।0-कश्मीर में आतकंवाद में कमी। 06 में चीन से दोस्ती। चार दशक बाद नैथुला दर्रा खुला। चीन से सबसे ज्यादा व्यापारिक रिश्ते। करजई से दोस्ती। विशेष मदद। 0- जापान,ईरान, फ्रांस, जर्मनी, से रिश्ते बेहतर। रूस के धुर विरोधी इस्राइल तक से दोस्ती। 07 में चिदंबरम संग सबसे अधिक 9 फीसदी की आर्थिक विकास दर।0- बैंकिंग और वित्त सेक्टर में सुधार। अमरीका से परमाणु करार पर अविश्वास प्रस्ताव। वाम ने नाता तोड़ा। सपा का साथ। सरकार बची। मंदी की मार। नवंबर में मुंबई पर हमला। पाटिल की विदाई। चिदंबरम होम मिनिस्टर। पाक से रिश्ते खराब। 0-10 जनपथ के साए में। सबसे कमजोर प्रधानमंत्री का आरोप। असम के वोटर नहीं पर उच्चसदन में। 90 और अब 09 में बाईपास सर्जरी। 0- 87 में नागरिक पुरस्कार,दर्जनों विशिष्ट पुरस्कार और सम्मान। कई मानद उपाधियां।

रविवार, 12 अप्रैल 2009

संयोग और दुर्योग संग-संग


देशपाल सिंह पंवार
वो दुनिया की तीसरी और हिंदुस्तान की सबसे ताकतवर महिला हैं। संसार की 100 सबसे मजबूत शख्सियतों में से एक हैं। गांधी खानदान की हैं। इंदिरा गांधी जैसी मजबूत हौसलों की महिला की बहू हैं। देश में कंप्यूटर क्रांति के जनक व पूर्व प्रधानमंत्री राजीव की पत्नी और राहुल की मां है। इतना ही नहीं सबसे पुरानी उस पार्टी की कमान हाथ में है जिसे किसी जमाने में सरदार पटेल जैसी हस्तियां चलाया करती थीं। आज की तारीख में इस दल में एक से दस नंबर तक कोई दूसरा नहीं है। वो सत्तारूढ़ यूपीए (?) की चेयरपर्सन भी हैं। ऐसा शख्स जो चाहे वो कर सकता है। सब मानते हैं और कहते हैं कि देश पर राज 10 जनपथ से चल रहा है। लेकिन इसके बावजूद इसे रणनीति कहें, मजबूरी कहें, नाम के संग जुड़ा अपशकुन कहें, या फिर ग्रहों का फेर- नसीब का खेला वे उस ताज से कल भी दूर थी,आज भी हैं और शायद कल भी रहेंगी जिसे पाने की ख्वाहिश हर नेता में होती है। जिसे इस राह की आखिरी चाह माना जाता है। यानि प्रधानमंत्री पद। पांच साल पहले ये झोली में था-पर सिर पर न सज सका। वह बलिदान था या मजबूरी-चाहे जो कहें। हां यह हकीकत है कि शिखर पर बैठे ढेरों चेहरों के साथ कुछ संयोग व दुर्योग साथ-साथ चलते हैं। जिसकी चाह नहीं होती वह मिलता जाता है और जिसकी चाह होती है वो दूर चला जाता है। यह सुपर लेडी भी उनमें से एक है। नसीब तथा समय की धारा इटली के एक छोटे गांव से बहाकर उस तख्तो ताज तक ले आई जहां तक आने की न कोई चाह थी और न कोशिश। पर आना पड़ा। हिंदुस्तान नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। राजनीति में नहीं आना चाहती थीं-आना पड़ा। अध्यक्ष पद नहीं चाहती थीं-झेलना पड़ा। प्रधानमंत्री पद की ख्वाहिश नहीं थी- मिलते-मिलते रह गया। हां जो चाहा था वो हो न सका। गृहणी की जिंदगी गुजारना, पति को राजनीति से दूर रखना,बच्चों को दुखों से बचाए रखना,अपनों-परायों के वार से आशियाने को बचाने की ख्वाहिश पूरी ना हो सकी। पूरी तरह हिंदुस्तान की होने पर भी विदेशी कहे जाने का मर्म पूरी तरह मिट न सका। इसमें शक नहीं कि जीवन ने इतने थपेड़े अगर किसी को भी दिए होते तो शायद वो शख्स बिखर चुका होता। पर वे जीवट की महिला हैं। इसमें अब विरोधियों को भी संदेह नहीं रहना चाहिए। इसी जीवट की फिर अग्निपरीक्षा है। जंग का मैदान सज चुका है। हर कोई प्रधानमंत्री बनने के सपने देख रहा है। राजनीति के महारथी सामने हैं। ऐसी जंग में वो उस फौज को लेकर मोरचे पर हैं जिसके सारे सिपहसलार बूढ़े हो चुके हैं,अपने छोड़कर जा चुके हैं। उन्हें लड़ना भी है और अपनी फौज में जीत का जज्बा पैदा करना भी है। चाहे कल उनका कांग्रेस के बिना गुजारा हो जाता पर आज जिस मुकाम पर हैं वहां से न उनका कांग्रेस के बिना कोई अस्तित्व है और कांग्रेस का तो आजादी के बाद कभी गांधी परिवार के बिना कोई वजूद रहा ही नहीं। इस बार के नतीजे एक नई दास्तां जरूर लिखेंगे यह तय है। ये भी तय है कि सोनिया प्रधानमंत्री तभी बन सकती हैं जब पार्टी को बहुमत मिले। इस बार मनमोहन को जबान दी जा चुकी है। अगली बार तक राहुल तैयार हो जाएंगे। जाहिर सी बात है कि सोनिया किसी ऐसी आपात स्थिति में ही यह पद ले सकती हैं जैसी उनके पार्टी अध्यक्ष बनने के दौरान थी । या जिनकी वजह से वो राजनीति में आईं।

सोनिया गांधी

0-इटली का एक छोटा सा गांव लुसियाना- रोमन कैथोलिक परिवार में 9 दिसंबर 1946 को जन्म। पिता बिल्डर और फौजी। 1983 में निधन। मां और दो बहनें ओरबासानो निवासी। यहीं पर सोनिया की कैथोलिक स्कूल में पढ़ाई।0-1964 में कैंब्रिज के एक स्कूल में पढ़ाई के लिए इंग्लैंड में। वेटर का काम किया।रेस्टोरेंट में राजीव गांधी से इसी साल मुलाकात। 1968 में दोनों की शादी।0-1970 में राहुल,1972 में प्रियंका का जन्म। राजनीति से दूरी। राजीव पायलट-सोनिया पर घर का जिम्मा। 23 जून 1980 को संजय की मौत। मां इंदिरा गांधी का दबाव-1982 में राजीव का राजनीति में प्रवेश। सोनिया का बस परिवार पर ध्यान।0-1983 में हिंदुस्तान की नागरिकता। 1984 में श्रीमती इंदिरा गाधी की हत्या। राजीव पीएम। पहली बार पब्लिक लाइफ। राज्यों में पति संग दौरों पर। अमेठी सीट पर राजीव के सामने मेनका। सोनिया प्रचार में शामिल। जीत। राजीव पीएम। पांच साल तक राज। 0-बोफोर्स का जिन्न बाहर। इटली के उद्योगपति और सोनिया के कथित परिचित क्वात्रोची घेरे में। राजीव-सोनिया की छवि पर दाग। आम चुनाव में लिट्टे द्वारा राजीव की हत्या। पार्टी अध्यक्ष बनने से सोनिया का इंकार। राजनीति से दूर। राव नए पीएम।0- पार्टी पतन की ओर। 1996 में सत्ता से बाहर। माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट, ममता बनर्जी, मूपनार, चिदंबरम और जयंती द्वारा खुलेआम सीताराम केसरी के खिलाफ विद्रोह। 1997 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता। 62 दिन बाद अध्यक्ष।0-1997 में बेल्लारी और अमेठी से सांसदी चुनाव। दोनों सीटों से जीत। बेल्लारी में सुषमा स्वराज की करारी हार। 1999 में विपक्ष की नेता। विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर शरद पवार की बगावत। पार्टी छोड़ी। 2003 में वाजपेयी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव।0-2004 में राजग का इंडिया शाइनिंग नारा ध्वस्त। कांग्रेस सबसे बड़ा दल। यूपीए के बैनर तले 15 दलों का आगमन। वामदलों का बाहर से समर्थन। 16 मई को यूपीए की निर्विवाद नेता। प्रधानमंत्री बनना तय। सुषमा स्वराज ने विदेशी मूल का मसला फिर उठाया। सिर मुंडाने और आजीवन जमीन पर सोने की धमकी। हंगामा। 18 मई को पद ठुकराने और मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाने का एलान। फेवर में लहर। 0-कप्तानी में आंध्र प्रदेश, हरियाणा और आसाम में सत्ता में वापसी। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और गुजरात जैसे राज्यों में पार्टी की हार। अब तक यूपीए की चेयरपर्सन।0-2004 में बेटा राहुल अमेठी से सांसद। प्रियंका का राजनीति में आने से इंकार।0-फायदे के पद पर रहने का आरोप। सांसदी छोड़ी। रायबरेली से फिर चार लाख से ज्यादा वोटों से जीत। ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और सूचना के अधिकार का हक।0- कांग्रेस की आजादी के बाद पहली और अब तक की पांचवी विदेशी पार्टी अध्यक्ष। राजीव पर दो किताबें-राजीव और राजीव की दुनिया। नेहरू-इंदिरा पत्रों का संपादन।

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

जीते तो इतिहास लिखोगे-हारे तो इतिहास बनोगे



देशपाल सिंह पंवार

कम से कम आप तो नहीं भूले होंगे। ना तो ज्यादा अरसा हुआ है और ना ही भूलने वाली बात है। आप ही को आगे करके बीजेपी ने हिंदुत्व की राह पकड़ी थी। आप ही के रथ के पीछे बाकी सबने राजनीति की नई धारा का अलख जगाया था। मूलत हाथ और हंसिया के इस देश की राजनीति के कीचड़ में कमल खिलाया था। मुगलों के जमाने से आकर्षण का केंद्र रहा दिल्ली का ताज कब्जाया था। एक बार नहीं, बार-बार, तीन बार। 13 दिन,13 माह और पांच साल। हर बार आप पावर में मजबूत तो होते गए पर उस ताज तक नहीं पहुंच पाए जिसके आप हकदार थे। यह आप भी मानते होंगे और आपकी फौज भी,आप सरकार में नंबर दो तक तो पहुंचे पर ताज की रेस में एक से दस नंबर तक की पायदान पर आपके रथ के इकलौते सारथी विद्यमान थे। बार-बार सरकार के लिए दूसरों की दरकार थी। उनके बिना सत्ता दुश्वार थी। चाहे आपकी उनसे कोई नहीं तकरार थी पर वह फौज आपके पीछे खड़े होने को नहीं तैयार थी। फिर आपके संस्कार भी आड़े आ रहे थे। बड़े भाई के रहते आप गद्दी पर कैसे बैठ सकते थे? जाहिर सी बात है कि समझौता सिर्फ और सिर्फ आपको करना पड़ा। ऐसे में गठजोड़ की राजनीति और संस्कार की बंदिशों का मर्म आपसे बेहतर कौन समझ सकता है? ताज जब एक कदम दूर रहता था तो आप दो कदम दूर खड़े दिखते थे। क्या इस बार यह कहानी फिर दोहरायी जाएगी? शायद यही है किस्मत का खेल और राजनीति की विडंबना। आप बीजेपी और एनडीए के राहुल द्रविड़ तो रहे, दीवार का रोल तो अदा करते रहे पर वो श्रेय और ताज आपके हिस्से में नहीं आया जो बहुत पहले आपकी झोली और आपके सिर पर होना चाहिए था। क्रिकेट में राहुल के समय सचिन बाजी मार ले जाते थे और राजनीति में आपके अग्रज अटल बिहारी वाजपेयी। पर इसमें आपका क्या दोष? आपने कर्म किया। फल देना किस्मत और जनता के हाथ में था और है। वैसे भी ये राजे-रजवाड़ों का दौर तो है नहीं। जहां राजा के बेटे के सिर पर ताज की परंपरा दोहराई जानी हो। अब लोकतंत्र का वो दौर भी नहीं रहा जहां एक ही परिवार के नाम सत्ता का पट्टा लिखा जाता रहा हो। आप फिर ऐसी जंग के मैदान में हैं, समय का चक्र और बहता वक्त जिसके सारे कायदे-कानून बदल चुका है। अब वो मैदान नहीं है जहां आप योद्धा की तरह लड़ते थे और जीतते थे। इस बार आप घोषित सेनापति हैं। समय अनुकूल नहीं है। कुनबा बिखर चुका है। घर में बर्तन खड़कते रहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी का सिर्फ नाम आपके साथ है। पहले की तरह अब न हिंदुत्व का मुद्दा रहा। न राम के नाम की जनता में वो गूंज रही। दुनिया की खस्ता हालत मंहगाई के मुद्दे को लील गई है। आतंकवाद की बेल को पाकिस्तान की करनी चट कर गई है। हां एक मुद्दा जरूर है जो उसी से जुड़ा है जो इस बार चुनाव में निर्णायक रोल अदा करेगा यानि रोजगार यानि अंधेरी गलियों में सिसकती युवा जिंदगानियां। जिस पर यह वर्ग विश्वास करेगा उसे पास करेगा। ऐसे माहौल में आप अकेले नहीं हैं। देश में हर कोई प्रधानमंत्री बनने के सपने पाले हुए है। पर इतना जरूर है कि इस रणक्षेत्र में हर कदम पर आपकी अग्निपरीक्षा होगी। कारण आपका यह आखिरी वार है। जीते तो इतिहास लिखेंगे, हारे तो इतिहास बनेंगे।

लालचंद किशनचंद आडवाणी

0- 8 नवंबर,1927 को कराची में जन्म। हैदराबाद (सिंध) में स्कूली पढ़ाई। मुंबई के गवर्नमेंट ला कालेज से डिग्री। 0-1942 में संघ में शामिल। पांच साल बाद कराची संघ के प्रमुख। देश विभजन के बाद दंगों के दौरान राजस्थान के मेवात में संघ की ओर से दायित्व।0-जनता पार्टी की मोरारजी देसाई सरकार में 24 मार्च 1977 को सूचना मंत्री। दो साल तक रहे। बाद में वी सी शुक्ल इस पद पर आए।0-जनसंघ के प्रमुख नेता ।1980 में चौधरी चरण सिंह सरकार के पतन के बाद बीजेपी का निर्माण। पार्टी के बड़े नेताओं में से एक। उच्च सदन के सदस्य। 0-1986 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। हिंदुत्व की ओर रूझान। कई राज्यों में दल की सरकारें। बोफोर्स में राजीव फंसे। वीपी सरकार को बीजेपी का समर्थन। 0-1990 में आडवाणी की कप्तानी में रामजन्म भूमि का मुद्दा उठाया गया। रथ यात्रा निकाली। विवादित ढांचा गिराया गया। पार्टी की लोकप्रियता चरम पर। 0-1992-96 पीवी नरसिम्हा राव के काल में विपक्ष के नेता। 96 में बीजेपी सबसे बड़ा दल। वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। होममिनिस्टर बने। 13 दिन में पतन। 0-98 में फिर राजग सरकार। वाजपेयी प्रधानमंत्री। 13 माह तक सरकार चली। आडवाणी होम मिनिस्टर। 0-देवगौडा और गुजराल आए और गए। चुनाव के बाद फिर वाजपेयी सरकार आई। आडवाणी उप प्रधानमंत्री बनाए गए। कंधार कांड, जैन हवाला कांड में घिरे।0-2004 में शाईनिंग इंडिया का नारा फ्लाप। विपक्षी नेता के रूप में बैठे। उमा भरती और मदनलाल खुराना जैसे नजदीकी पार्टी से चले गए।0-2005 में पाकिस्तान में जिन्ना संबंधी बयान से बवाल। संघ ने आड़े हाथों लिया। पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा। राजनाथ सिंह की ताजपोशी। 0-तीस साल लगातार अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पार्टी के सबसे बड़े नेता। अब घोषित भावी प्रधानमंत्री। हिंदुत्व समर्थक होने का आरोप। 0-2008 में अपनी जीवनी लिखी-माई कंट्री-माई लाइफ। गांधीनगर चुनाव क्षेत्र।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

पत्रकार शर्मसार


देशपाल सिंह पंवार
धरातल पर जब कुछ पहली बार होता है तो वह यादगार भी होता है और शर्मसार भी, अच्छा है तो यह गूंज हमेशा सुनने को मन बेचैन रहता है। बुरा होता है तो उसकी गूंज जेहन को हमेशा परेशान रखती है। हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार एक ऐसी घटना हुई जिससे बुरा कम से कम भारतीय पत्रकारिता के लिए तो कभी नहीं हुआ। एक पत्रकार के नाते ऐसी ही मानसिकता के पत्रकार शर्मिंदा भले ही ना हों पर मेरे जैसे ढेरों पत्रकार जरूर शर्म से पानी-पानी हैं। जहां मंगलवार को दुनिया विश्व स्वास्थय दिवस मना रही थी, बीमारों की बढ़ती आबादी पर रोकथाम और बीमारियों को मिटाने की चिंता में डूबी हुई थी,वहीं हम अपनी घटिया सोच, घटिया हरकत से पत्रकारिता को शर्मसार भी कर रहे थे और साथ ही देश की सेहत पर वार भी, दिल्ली में देश के होम मिनिस्टर पर जूता फैंका जाता है। ये घटिया हरकत करता है एक पत्रकार। हो सकता है केंद्र में बैठी सरकारें सीबीआई का गलत इस्तेमाल करती हों। हो सकता है जरनैल सिंह (जैरी) 84 के दंगों की फाइल को इस तरह बंद होने से दुखी हो। जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार जैसों को सजा न मिलने से भावुक हों ,यह भी माना जा सकता है कि कौम के साथ अन्याय से उसका सीना छलनी हो। यह भी माना जा सकता है कि जज्बात पर उसका काबू न रहा हो। साथ ही यह भी हो सकता है जैरी आईने में खुद को इराकी पत्रकार जैदी की तरह नायक दिखने की चाह रखता हो और पी चिदंबरम को जार्ज बुश की तरह खलनायक की श्रेणी में दिखाने की। लेकिन यह कौन सा तरीका है -दर्द दूर करने का, एतराज जताने का,कौम की फिक्र दर्शाने का, नायक बनने और दूसरे को खलनायक बनाने का, देश को फिर अलगाव की राह पर धकेलने का? आखिर जरनैल सिंह को ये अधिकार किसने दिया कि वह सारी पत्रकार बिरादरी की नाक कटवाए? पत्रकारिता पर कालिख पोतने का काम करे? पत्रकारिता की थीम की बीम को ही हिला डाले? लोकतांत्रिक देश में एक आम आदमी अगर अपने गुस्से का इजहार इस तरह करे तो उसे भी जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर एक पत्रकार द्वारा ऐसी करनी किसी भी सूरत में सही कैसे मानी जा सकती है? यह जूता किसी होम मिनिस्टर पर नहीं पड़ा है। हकीकत यही है कि यह जूता उस सारी पत्रकार बिरादरी पर पड़ा है जिसके एक बड़े धड़े ने इस जन कल्याण के मिशन को पहले ही काजल की कोठरी में बदल दिया है। यह जूता उस भारतीय पत्रकारिता के चेहरे पर पड़ा है जो पहले ही अफसरों, माफियाओं ,नेताओं, मंत्रियों, दलालों,हत्यारों के घर की बांदी बने तमाम पत्रकारों की करनी की पीड़ा से बदरंग है। अब सवाल यह भी उठ खड़ा है कि क्या कलम की जगह जूते ने ले ली है? अगर ऐसा है तो पत्रकारों को इस बात के लिए अब तैयार रहना चाहिए कि बरसों से उनकी करनी से त्रस्त जनता के अनगिनत जूते इस बिरादरी पर पड़ने ही वाले हैं। अगर कलम की ही राह पर चलना है तो सारी पत्रकार बिरादरी के मुखियाओं के सामने लाख टके का सवाल यही है कि वह हर गली,हर नुक्कड़,हर गांव,हर कस्बे,हर शहर तक कुकुरमुत्ते की तरह फैली और ताने-बाने को लीलती इस बेल पर लगाम के बारे में न केवल सोचे बल्कि उसकी कटाई-छंटाई भी करे। जरूरत इस बात की भी है कि खुद को खुदा समझने की बजाय जमीनी हकीकत से पत्रकार अब जुड़ने की कोशिश करें। लुट-पिट और मिट चुकी जनहित की पत्रकारिता की राह पर जाने का संकल्प लें। वक्त की नजाकत यही कह रही है कि जैरी के बहाने पत्रकारिता के बैरी उन मठाधीश पत्रकारों से भी निजात पाने का समय आ गया है जिन्होंने पत्रकारिता की आन-बान-शान का सारा मान बेच खाया है, जो नेताओं व अफसरों के दलालों और दलों के कार्यकर्ताओं की तरह काम करते नजर आते हैं। पत्रकारिता और खबरों को नीलाम करते नजर आते हैं। जिनकी करनी और कथनी में दोगुलेपन की कीमत सारी पत्रकार बिरादरी को भरनी पड़ रही है। पर कड़वा सच यही है कि करेगा कौन? हर प्रोफेशन के नियम-कायदे-कानून होते हैं। पत्रकारिता के भी थे और हैं। देश को आजादी दिलाने में तो पत्रकारिता कामयाब हो गई लेकिन बेलगाम सोच और माया की ख्वाहिश से रीढ़ में लोच से पत्रकारिता मोच खा गई है। वह चंद बड़े नामों से गुलामी की जंजीरों में जकड़ गई है। गुलामी नेताओं की, माफियाओं की, अफसरों की, धंधेबाजों की, दलालों की, हत्यारों की, बेईमानों की, धंधा बढ़ाने वाले मालिकों की, महल खड़ा करने वाले ढेरों संपादकों की, ढेरों करप्ट पत्रकारों की। ऐसे में पत्रकारिता कहां हैं और खबर की क्या औकात है तथा ईमानदार पत्रकारों की क्या हैसियत है इसका अंदाजा दूर से बैठकर जितना लगाया जा सकता है उससे कहीं खौफनाक और शर्मनाक हालात से पत्रकारिता और पत्रकार गुजर रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद और पराडकर जी की राह पर चलने की चाह अब आह में बदल चुकी है। सरकार अगर हाथ डालती है तो आजादी पर कुठाराघात का रोना रोया जाता है। इंडिया गेट से लेकर गांधी जी की समाधि तक पर धरने दिए जाते हैं। बड़े-बड़े कथित नाम खबरों और तस्वीरों में और बड़े बनाए जाते हैं। चारों तरफ भूचाल आ जाता है। लगता है चौथा खम्भा उखाड़ा जा रहा है लेकिन क्या कभी किसी कथित बड़े पत्रकार ने इस हालात पर दो बोल बोले हैं कि अनेक बिरादरी भाई नेताओं,गुंडों और दलालों के घर की बांदी क्यों नजर आते हैं? क्यों धन के लालच में विज्ञापन खबरों की तरह छपने लगे हैं? एक ही पेज एक ही सीट के तीन प्रत्याशियों को जिता दिया जाता है? पैसा लेकर खबरें छाप दी जाती हैं, रोक दी जाती हैं, मोड़ दी जाती हैं। झूठ को सच और सच को झूठ की तरह रख दिया जाता है। जनता के पास कोई चारा नहीं है। चंद अखबार और पढ़ने की पुरानी आदत। हम ये नहीं कहते कि सरकार का अंकुश हो लेकिन जिस फोर्थ पोल का मोल खत्म हो चुका है, ढोल फट चुका है,गोल दग चुका है, ऐसे में इस तरह का खोल ओढ़ने के क्या मायने? अब मान लेना चाहिए कि अब इस प्रोफेशन की भी चाल और चरित्र राजनीति, पुलिस और अन्य बदनाम प्रोफेशन जैसा हो गया है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय यह मंथन का समय है। पर सवाल यही है कि करेगा कौन?सरकार का अंकुश जायज नहीं है पर खुद कभी सुधरने या सुधारने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? लगातार पत्रकारिता की यह गंगोत्री संकरी और मैली होती जा रही है इस पर चिंतन क्यों नहीं होता? वैसे यह बहस का विषय हो सकता है कि इस पवित्र मिशन को खराब करने की शुरूआत कहां से हुई? घटिया नेताओं व बेईमान अफसरों की तरफ से या फिर निज हित में डूबे चंद अखबार मालिकों और उनकी शह पर महल खड़ा करने वाले बड़े पत्रकारों की तरफ से। या फिर दोनों ओर के फायदे से उपजी सोच की वजह से। जो भी हो आज देश में यह धारा बह निकली है। किसी भी राज्य का उदाहरण सामने रख लीजिए। कोई भी बता सकता है कि फलां अखबार और फलां पत्रकार किस राजनेता, किस अफसर और किस दल की रोटी खाते हैं? जिसकी सरकार आएगी,अफसरशाही की तर्ज पर उसकी अपनी पत्रकारों की टीम तुरंत सत्ता के गलियारों में रौब गांठती हुई नजर आएगी। अपने हितों के लिए रोजाना खबरों को उलटती-पलटती और रौंदती हुई। चुनावी दौर में उनकी और भी पौबारह रहती है। अपनों को जिताना और गैरों को हराना। हकीकत यही है कि आज देश में जनहित की पत्रकारिता हाशिए पर है। सही और सच्ची खबरों को पचाने का माद्दा सरकारों में या राजनेताओं में नहीं रह गया है। सही खबर छपी-छीछालेदर हुई-विज्ञापन बंद-पत्रकार की शामत। ऊपर तक का दबाव। ईमानदारी की राह पर चलने वाले पत्रकारों के हश्र के ढेरों उदाहरणों से भारतीय पत्रकारिता का घड़ा भरा पड़ा है और आए दिन उसमें एक-दो चेहरे टपकते रहते हैं। संपादक रूपी प्राणी या तो बेबस होता है या सबको बेबस रखता है। एक करप्ट राजनेता हो या अफसर या दो कौड़ी का माफिया मिनटों में खबरों और पत्रकारों की औकात बताकर चला जाता है। ऐसे में सही और सच्चा पत्रकार कहां ठौर पाए? कैसे उम्मीद की जाए कि इस देश में पत्रकारिता और पत्रकार पूरी तरह सही राह पर हैं? किससे आस लगाई जाए कि इस देश में फिर पत्रकारिता के असली मिशन का दौर लौटेगा? अभी हाल में एक बड़े अखबार की संपादिका महोदय ने कुछ सवाल क्षेत्रीय पत्रकारों पर खड़े किए। मठ बनाने व धंधा करने की बात कही। वास्तविकता क्या है ऐसे बड़े चेहरे बखूबी वाकिफ हैं लेकिन जनता भी वाकिफ है और पत्रकार बिरादरी भी,हां यह जरूर है कि ऐसे बड़े संपादक जो बोलते हैं, जो दिखाते हैं वह इसलिए ज्यादा वजनदार होता है क्योंकि वे वजनदार कुर्सी पर बैठे हैं? हां इस मुगालते में ऐसे बड़े चेहरों को नहीं रहना चाहिए कि वे दूध के धुले हैं। कौन नहीं जानता कि चार हिंदी बहुल राज्यों में कथित बढ़े अखबारों के ढेरों संपादकों ने किस तरह अखबार और पत्रकारिता की आड़ में करोड़ों रूपए की संपत्ति खड़ी कर ली? किस संपादक की वजह से एक महिला पत्रकार ने जहर खाकर जान दे दी? किस संपादक ने अपनी बेटी की शादी राजनेताओं की काली कमाई से कर डाली? कश्मीर से कन्याकुमारी तक नैतिकता की बात करने वाले बड़े पत्रकार किस तरह कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं यह सबको पता है। अगर किसी सरकारी एजेंसी से जांच हो जाए तो यकीन मानिए हमाम में ऐसे-ऐसे चेहरे नंगे नजर आएंगे जो राजनीतिक दलों से सांठगांठ कर वहां तक पहुंचे और वहां पहुंचते ही नैतिकता के आवरण को ओढ़कर जातिवाद,क्षेत्रवाद,दलवाद और भाई-भतीजावाद चलाने लगे। जब तक ऐसे चेहरे मैदान में कप्तानी कर रहे हैं तो कैसे हम यकीन करें कि पत्रकारिता सही राह पर है और इसके सिपाही नया जमाना लाएँगे?जरनैल सिंह भी इसी धारा में बहता हुआ एक चेहरा है। आए दिन की दिक्कतों को झेलने वाला पत्रकार। लेकिन इस बात पर किसी की कोई असहमति नहीं होनी चाहिए कि उसने जो किया वह गलत है। इराक और जैदी के हालात से सिखों और जरनैल की तुलना नहीं की जा सकती। वह एक घमंडी शासक पर फैंका गया जूता था। वहां कोई कायदा-कानून नहीं है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां कानून का राज है। एक पूरी बिरादरी किसी फैसले से मर्माहत हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह कानून को अपने हाथ में ले और देश को फिर 80 के दशक के हालात में ले जाकर खड़ा कर दे। वह भी उस स्थिति में जब अभी तक कोर्ट ने अपना फैसला नहीं सुनाया है। हरकत पर अफसोस तक न जताना और शिरोमणि अकाली दल की ओर से कायरता को बहादुरी बताना और दो लाख के इनाम का एलान करना और भी ज्यादा शर्मनाक है। क्या जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीन चिट से उपजे घाव पर मरहम की कीमत दो लाख है? किसी को जूता मारने से क्या दर्द कम हो जाएगा? भरत में सबको आजादी है लेकिन आजादी का मतलब यह नहीं है कि हम कलम की बजाय जूते हाथ में लेकर घूमते नजर आए। यह काम नेता करते आए हैं। जनता पत्रकार बिरादरी से आस लगाए बैठी है कि वो नेताओं की इस जूता कल्चर पर लगाम कसेगी अगर हम भी उसी राह पर जाएंगे तो फिर इस देश में लोकतंत्र के क्या मायने? हममें और मवाली टाइप के नेताओं में क्या अंतर?अगर किसी पत्रकार को जूता ही चलाने का शौक है तो पहले वो कलम छोड़े-फिर जूता हाथ में ले। या हराम की कमाई से जूते की दुकान खोले। जिसे चाहे-जिस नंबर का चाहे-जब चाहे उठाए और दाग डाले। जरनैल सिंह को अगर कौम का दर्द था तो वह कलम त्यागकर वहां जाते। ऐसी हरकत करते। कानून फिर अपना काम करता। जरनैल सिंह को कांग्रेस ने माफ कर दिया है। चिदंबरम ने माफ कर दिया है लेकिन पत्रकारिता कभी माफ नहीं करेगी। ऐसे पत्रकारों की इस प्रोफेशन में न कोई जगह थी न है और न ही होनी चाहिए। आज की इस शर्मसार हरकत से पत्रकार बिरादरी भी नेताओं की उसी लाइन में खड़ी हो गई है जिससे जनता का भरोसा डिग चुका है। आगे से हो सकता है कि पत्रकारों के जूते बाहर उतरवाए जाएं। कलम ले जाने पर बैन लग जाए। कपड़ों की सारी तलाशी होने लगे। नेताओं पर पत्रकारों के बीच में शीशे की दीवार खड़ी होने लगे। क्या ऐसी ही पत्रकारिता करना चाहते हैं हम? अगर ऐसा है तो फिर जनता को यह आस छोड़ देनी चाहिए कि यह चौथा पोल अपना सही रोल प्ले करेगा। अगर जरनैल सिंह के बहाने पत्रकारिता फिर से सही ट्रेक पर आ जाए तो हो सकता है इस पत्रकार को इतिहास बदलने वालों में शामिल कर लिया जाए। कुछ भी हो पत्रकारिता और ईमानदार पत्रकारों के चेहरों पर पड़ने वाले जूतों की गूंज ने जितना दर्द दिया है उससे कहीं ज्यादा इस जूते की पीड़ा दिल को सालती रहेगी, इसमें कोई शक नहीं। खुदा करे-कुछ बदलाव आए,आने वाली पीढ़ी को सही राह मिले। गांधी के देश में गांधीवादी चेहरे दिखें। जूता मारने वाले नहीं।

बदजुबान राजनेता


देशपाल सिंह पंवार
राज ठाकरे मराठियों के अलावा किसी को देखना पसंद नहीं करते। बाल ठाकरे हिंदू राष्ट्र के अलावा बात नहीं करते। वरुण गांधी आंख दिखाने वालों के हाथ-पैर काटने की बात करते हैं। कर्नाटक का अंजाना सा बीजेपी विधायक हिंदुत्व के खिलाफ बोलने वालों का सिर काटने की बात करता है। ढेरों नामचीन मस्लिम नेता ऐसे मामलों को सांप्रदायिकता की चाश्नी में डुबोकर अपनी नेतागिरी चमकाना चाहते हैं। मेनका गांधी मायावती को कातिल बताती हैं। मायावती पलटवार में मां के असली रोल की परिभाषा समझाती हैं। लालू प्रसाद सबकों पीछे छोड़ते हुए वरुण गांधी पर बुल्डोजर चलवाने की बात करते हैं। आखिर गांधी के इस देश में ये चल क्या रहा है? ये कौन सी राजनीति की धारा बह रही है? ये नेता क्यों इस देश का बेड़ा गर्क करने पर तुले हुए हैं? आज कोई भी शख्स पोल की ढोल के इन जहरीले बोल को सही नहीं ठहरा सकता। जो हो रहा है अगर वो सही नहीं है तो फिर अब समय आ गया है कि ऐसे फैलते जहर पर तुरंत कानून का भी कहरबरपे और जनता का भी,लालू की गिरफ्तारी एक सबक होगी लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। लाख टके का सवाल यही है कि अगर वरुण गांधी पर रासुका लग सकती है तो फिर लालू पर क्यों नहीं? इसी तरह दूसरे अन्य घटिया सोच वाले नेताओं पर क्यों नहीं? अगर चुनाव के दौरान इनकी मानसिकता ऐसी है तो सोचिए ये कैसा देश चलाते होंगे? जनहित की इनसे उम्मीद करना ही बेमानी है। हकीकत यही है कि ये जनसमर्थन के सहारे ही इस तरह के बेलगाम हो गए हैं। जनता की भावनाओं और विश्वास पर बुल्डोजर चला रहे हैं। अब समय आ गया है कि जनता •भी अपना असली फैसला सुनाए। अगर कानून के हाथ सीमा में बंधे हैं तो जनता के तो खुले हैं। अगर सजा की प्रक्रिया बरसों चलेगी तो जनता की कोर्ट तो सज चुकी है। अगर चुनाव आयोग विवश है तो जनता तो बेबस नहीं है। अगर ये सारे नेता गांधी के तीनों मूल मंत्र को भूलकर सारे तंत्र को चौपट करने पर आमादा हैं तो यही सही समय है जनता इन सबको कड़वे सच का एहसास कराए। इन्हें संसद की राह ना दिखाए। अगर ऐसा हुआ तो यह तय है कि फिर किसी की जहर उगलने की हिम्मत नहीं होगी। वही होगा असली लोकतंत्र-असली जनमत-असली गांधी का देश। वरना...

रविवार, 5 अप्रैल 2009

पवार की चाल

देशपाल सिंह पंवार
जिस क्षेत्र की नींव ही संभावना पर टिकी हो,सिद्धांत से ज्यादा संख्या का महत्व हो,गद्दी के लिए दल और दिल तोड़ना गौरवशाली परंपरा हो, दूसरों की तबाही पर जश्न होता हो,झूठ बोलना आदत हो, दूसरों के हक पर डाका डालना फितरत हो, गलत नीयत और नीति की रीत हो,गिरगिट की तरह रंग बदलना खूबी हो, घूस खाना जरूरी हो, घपलेबाज, धंधेबाज, बलात्कारी और बेईमान भी मंत्री बनते हों,धोखा देना जायज ठहराया जाता हो, सत्ता छीनना मास्टर स्ट्रोक माना जाता हो, सरकार गिराना सही वार ठहराया जाता हो उस क्षेत्र के दिग्गज जब विश्वास के खून की बात करते हैं तो इससे बड़ा झूठ और क्या हो सकता है,इससे बड़ा मजाक क्या हो सकता है? आखिर इन राजनेताओं को ये समझ में क्यों नहीं आता कि ये उनकी कथनी और करनी का ही फल है। वे कुछ भी कहें और करें तो सही-दूसरा वही कहे और करे तो गलत ये कौन सी रीत है? किस धुन पर बजता कौन सा गीत है? उदारवाद लोकतंत्र की जननी इस धरती का गहना रहा है लेकिन जबसे आर्थिक उदारवाद ने इस धरती पर पैर पसारे हैं इसका देश के ढांचे और जनता की सेहत पर चाहे जो असर पड़ा हो लेकिन कम से कम राजनीति में इसका दूसरा ही मतलब निकाल लिया गया। जो चाहे करो-नो प्रोब्लम। जनहित से स्वहित में डूबे नेताओं ने राजनीति की धारा को इतना मैला कर दिया है कि अब राजनीति और राजनेताओं से जनता का भरोसा ही डिग गया है। वो भरोसा जिसका न कोई विकल्प था, न है और न होगा। जिस पर सारी दुनिया, सारे राज्य, सारे समाज, सारे घर, सारे रिश्ते टिके हैं और चल रहे हैं। जहां ये नहीं वहां ठीक वही होता है जो आज राजनीति में हो रहा है। पहले राजनीति का मकसद जनसेवा था आज खुद की मनसेवा, धनसेवा और गनसेवा का जमाना है। किसी को किसी पर भरोसा नहीं। जुबान के मीठे-दिल के काले और करनी के जहरीले तमाम नेताओं के कारनामें रंगीले हैं। वे कल भी माननीय थे, आज भी माननीय कहलाते हैं और कल भी माननीय बनने के लिए हर हथकंडा अपना रहे हैं। दूसरे की टांग खींचना, कपड़े उतारना, चरित्र हनन करना,खदेड़ना, पछाड़ना, तबाह करना उनके बाएं हाथ का काम है, एक बोल का काम है। यूं तो राजनीति की अंतिम मंजिल ही प्रधानमंत्री बनना है,ऐसे में हर किसी की यह ख्वाहिश और कोशिश हो तो गलत ही क्या है? हां पहले नतीजों के बाद प्रधानमंत्री चुनने की परंपरा थी पर इस बार पहले ही प्रधानमंत्री बनने वालों की घुड़दौड़ शुरू हो गई है। रेस में संख्या इतनी है कि अगर हर साल दो को भी चांस दिया जाए तब भी पांच साल में यह संख्या नहीं घटेगी। उल्टे बनिया के सूद और बेल की तरह बढ़ती जाएगी। जहां कोई किसी को प्रधानमंत्री मानने या बनवाने को तैयार नहीं तो फिर ऐसे माहौल में शरद पवार का क्या कसूर? आखिर 38 साल की उम्र में जो शख्स महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बन गया हो, 1991 में हाथ में आई प्रधानमंत्री की गद्दी नरसिम्हा राव की ओर छिटक गई हो वो कब तक बाट जोहता रहे और क्यों जोहता रहे? इसके लिए कितने पापड़ पवार ने बेले, कितने गुरु व चेले ठेले यह मेहनत -मशक्कत और जोड़-तोड़ या तो पवार जानते हैं या फिर वे जो उनकी गुगली पर विकेट उखड़वाते रहे। कांग्रेस या कांग्रेसियों को तो यह ज्यादा पता होगा। नहीं पता तो फिर ऐसे राजनेता कांग्रेस में क्यों और पवार का इसमें क्या दोष? वे तो 18 साल से इस ताज के लिए साज बजाते आ रहे हैं। 2004 में भी उन्होंने यह राग अलापा था। आखिर इस मराठा शेर (?) से कितने सब्र की आस कांग्रेसी लगाए बैठे है यह समझ से परे है। इस बार आर या पार की लड़ाई लड़ रहे पवार अगर लगातार मनमोहन सिंह और यूपीए पर वार कर रहे हैं तो इसमें हैरत की बात क्या है? अगर अपने से कहीं कम तजुर्बेकार मनमोहन सिंह को वे यूपीए का भावी प्रधानमंत्री मानने को तैयार नहीं तो इसमें हैरत की बात क्या है? हां हैरत की बात यह है कि मंजिल हासिल करने के वास्ते वे एक साथ कई नाव पर बखूबी सवार हैं। राजनीति के पहले और फिलहाल अकेले सवार हैं। एक ही समय में वे यूपीए का हिस्सा हैं। एग्रीकल्चर मिनिस्टर हैं। मनमोहन पर वार कर रहे हैं। कांग्रेस से तकरार कर रहे हैं। उसी कांग्रेस से मिलकर महाराष्ट्र में चुनाव लड़ रहे हैं। बाल ठाकरे से तारीफ करवा रहे हैं। मनमोहन के अनुयायी लालू-मुलायम और पासवान के त्रिगुट को पटाए हुए हैं। वामपंथियों से पींगे बढ़ा रहे हैं। तीसरे मोरचे की रैली को फोन से संबोधित कर रहे हैं। भला मायावती उनसे दूर कैसे रह सकती हैं? वहां भी गोटी फिट कर चुके हैं। अगर और कोई मोरचा चुनाव के बाद उभरा तो उसे भी साधने का प्रयास होगा ही होगा। नदियों या निजी जीवन में भले ही दो नावों की सवारी घातक होती हो लेकिन राजनीति के मैदान में वे नई परिभाषा गढ़ चुके हैं। इतनी मशक्कत और दांवपेंच के बाद वे पीएम की गद्दी पर पहुंचेंगे या नहीं यह तो समय बताएगा लेकिन हां यह जरूर है कि राजनीति में एक नई परिपाटी उन्होंने जरूर डाल दी है। एक-दो जगह हाथ पैर मारने वाले नेताओं को अब इस मराठा शेर से सबक सीख लेना चाहिए। हो सकता है चुनावी नतीजों के बाद या अगले चुनाव तक इस नजीर के फकीर ढेरों वजीर राजनीति की इस धारा के मीर की ठसक में हों। इस पर किसी को हैरत नहीं होनी चाहिए। शरदचंद्र गोविंदराव पवार राजनीति का एक ऐसा नाम हैं जिनके चरित्र के कई विरोधाभाष रहे। जनता उन पर हमेशा विश्वास करती रही लेकिन राजनीति में वे अविश्वास की रेखा पार नहीं कर पाए। जिसके साथ चले उसकी ही गद्दी के पैर हिले। बारामती की तकदीर बदल दी लेकिन चीनी लाबी का बेताज बादशाह और ताकतवर राजनेता होने के बावजूद पीएम पद तकदीर में नहीं लिखवा पाए। 12 दिसंबर 1940 को बारामती में पैदा इस मराठे की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह महाराष्ट्र के हर गांव, हर कस्बे, हर शहर को अपने पैरों से नाप चुके हैं। शायद ही निचले स्तर का कोई भी ऐसा नेता हो जिसे शरद पवार नाम और शक्ल से न जानते हों। हवा और एसी कमरों में बैठकर राजनीति करने वाले नेताओं के लिए यह एक सबक है। हमेशा जमीन से जुड़ने का ही नतीजा है कि वे 50 साल से राजनीति के शिखर पर हैं। 1967 में ही वे बारामती से विधायक बन गए थे। अपनी जन्मभूमि को उन्होंने नई पहचान दी। खेती-किसानी के सहारे गुजारा करने वाला यह इलाका कल कारखानों से पटा पड़ा है। जहां ज्यादातर महाराष्ट्र हर साल सूखा झेलता है बारामती पवार की पावर से हमेशा पानी से सराबोर रहता है। गरम की बजाय शरद का एहसास देता है। याद करिए -1984 में जब इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उठी लहर में अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेता हार गए थे तब पवार भारी मतों से पहली बार लोकसभा चुनाव जीत गए थे। उस समय तक उन्हें महाराष्ट्र की ही राजनीती रास आती थी। संसद में आने पर भी वे वापस महाराष्ट्र लौट गए थे। वह शरद पवार ही थे जिन्होंने एक सब इंस्पेक्टर सुशील शिंदे को 1973 में राजनीति में उतरने की सलाह दी थी। शिंदे कहां तक पहुंचे यह सबको पता है। वे प्रतिभा के खोजी थे। अपनी महारथ और दूरगामी सोच से 1978 में महज 38 साल की उम्र में ही वे मुख्यमंत्री की गद्दी तक पहुंच गए थे हां जोड़-तोड़ से। कांग्रेस को उन्होंने तब पहली बार झटका दिया था, वह भी वसंतदादा पाटिल जैसे मंझे हुए मुख्यमंत्री के रहते कांग्रेस को तोड़ा और जनता पार्टी के समर्थन से इस गद्दी तक पहुंचे। इसके बाद 8 साल तक कांग्रेस से बाहर रहे। 1985 में उनकी कांग्रेस एस पार्टी दूसरे नंबर पर रही। इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने उनपर भरोसा जताया। 1987 में वापस कांग्रेसी बने। इसका इनाम भी मिला। शंकरराव चव्हाण की जगह मुख्यमंत्री बनाए गए। शिवसेना को काबू में लाने का एजेंडा लेकर महाराष्ट्र पहुंचे थे। बाल ठाकरे की तूती बोलती थी। छग्गन भुज्बाल दाएं हाथ थे। शिवसेना से पवार उन्हें इतना दूर ले गए कि ठाक रे का नूर भी हल्का पड़ता दिखाई देने लगा। 1990 में पवार के सहारे कांग्रेस फिर महाराष्ट्र में राज में आई। आम चुनाव के दौरान राजीव गांधी की हत्या हो गई। कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में आ गई। पीएम तलाशा जाने लगा। दावेदार थे-पीवी नरसिम्हा राव,अर्जुन सिंह और शरद पवार। लाटरी नरसिम्हा राव की खुली। पवार रक्षा मंत्री बने। केंद्र की राजनीति रास आने लगी तो राव को खतरा महसूस होने लगा। ऐसी स्थिति बनी कि उन्हें केंद्र से फिर महाराष्ट्र धकेल दिया गया। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे खराब दौर था। सुधाकर नाइक की जगह 6 मार्च 1993 को वे चौथी बार महाराष्ट्र के सीएम बने लेकिन ठीक 6 दिन बाद मुंबई धमाकों से पवार की नींद भी गई और असली पावर भी,रही-सही कसर बेशुमार घपले और घोटालों के आरोपों ने पूरी कर दी। नतीजा पार्टी 1995 में हार गई। पवार सत्ता से बाहर हुए। किसी तरह दिन कटते रहे। चीनी लाबी को वे संगठित करते गए। धीरे-धीरे केंद्र की राजनीति में रमते गए। 1999 में जब उन्हें लगा कि अगर कांग्रेस सत्ता में आई और पीएम बनने का उनका पत्ता फिर कटेगा तो उन्होंने नया दांव खेला। विदेशी को पीएम की सीट का हकदार बनाने के खिलाफ पार्टी में सोनिया गांधी के खिलाफ बिगुल बजा दिया। बात बिगड़ती गई। नतीजा तारिक अनवर और पीए संगमा जैसे साथियों के साथ मिलकर राष्ट्रवादी कांग्रेस बना डाली। न पवार को पावर मिली और न सोनिया को। अटल बिहारी की खिचड़ी सरकार पांच साल निकाल गई। 2004 आया। यूपीए बना। पर शरद पवार के अड़ियल रुख के कारण सोनिया गांधी पीएम बनते-बनते रह गयीं। हां बलिदान की एक मिसाल जरूर कायम कर गईं। पवार फिर हाथ मलते रह गए। प्रधानमंत्री बन गए मनमोहन सिंह। यूपीए सरकार में वे एग्रीकल्चर मिनिस्टर बने। 2005 में कांग्रेस के ही सहयोग से क्रिकेट बोर्ड की गद्दी हथियाई । बेटी सुप्रिया को संसद तक भिजवाया ,लगातार गद्दी के लिए जोड़-तोड़ करने और कांग्रेस को कई बार झटके देने के बावजूद अगर आज कांग्रेसी यह कह रहे हैं कि शरद पवार ने धोखा दिया है तो इसमें पवार का क्या कसूर? जिस शख्स को कभी राजनीति में भरोसेमंद न माना गया हो उस पर कांग्रेस अगर भरोसा तोड़ने का आरोप लगाती है तो हैरत कांग्रेसियों की नासमझी पर होनी चाहिए। यूपीए को झटका लगे या कांग्रेस को पटका-कम से कम अब पीएम की गद्दी आसानी से पवार हाथ से नहीं जाने देंगे यह तय है। भले ही तीसरा मोर्चा सत्ता में न आए लेकिन इतना जरूर है कि यूपीए की वापसी पर ताज मनमोहन के सिर पर पवार नहीं रखने देंगे। यह बात कांग्रेसियों की समझ में जितनी जल्दी आ जाए उतना ही यूपीए की सेहत के लिए बेहतर। अगर इसके बावजूद वे अपना राग अलाप रहे हैं तो खुद को तश्तरी में रखकर पवार पेश करने वालों में से नहीं। अब जो हालात हैं उनमें यही कुछ रास्ते बचे हैं- या तो यूपीए पवार को प्रधानमंत्री बनाएगा तो वे साथ देंगे। अगर नहीं तो फिर वे तीसरे मोरचे के साथ भी इसी शर्त पर खड़े होंगे बशर्ते बिना बीजेपी और कांग्रेस के वो सरकार बनाने की स्थिति तक पहुंच पाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो यकीन मानिए इस बार पवार बीजेपी से हाथ मिलाने से नहीं चूकेंगे। माध्यम बनेंगे बाल ठाकरे। सारी तस्वीर इसके उलट इसी सूरत में हो सकती है कि वे संसद की सीट हारें और उनकी पार्टी जीरो पर आउट हो-ये हो नहीं सकता कम से कम पवार के साथ फिलहाल तो नहीं।