
देशपाल सिंह पंवार
जिस सूबे में हर जन स्याणा हो। जाना-पहचाना हो। गरीबी से अनजाना हो। दूध-दही का खाना हो। खड़ी बोली में गाना-बजाना हो, देश में ऐसा राज्य सिर्फ हरियाणा ही हो सकता है। सबसे जुदा स्टाइल और अजब-गजब अंदाज। बोलना,खाना ,रहना, चलना और करना सब अलहदा। ये रईसी और अलमस्त अंदाज ही बताता है कि कुछ तो बात है इसमें। इसकी माटी में। आर्यसमाज के वाहक इस प्रदेश को हमेशा हर मामले में सबसे आगे गिना जाता है। राजनीति में भी,आन-बान और शान पर हरदम जान देने को तैयार कौम। खरी-खरी बोलना पसंद पर सुनना नापसंद। ऐसे राज्य का बंदा होना जितने गौरव की बात है उससे ज्यादा गर्व की बात है इस राज्य का मुखिया होना। वह भी उस हालत में जबकि आप किसी लाल के खानदान से ना जुड़े हों। लाल यानि हरियाणा के तीन लाल-देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल , यह गीत इस सूबे के साथ-साथ देश और दुनिया की फिजां में तीन दशक तक गूंजता रहा। उनकी आवाज की गूंज चाहे गुम हो गई हो पर उनके नाम की गूंज आज भी राजनीति के मैदान में साफ-साफ सुनाई देती है। एक समय इन तीन लालों के नामों के सहारे ढेरों की नैया इस सूबे में पार होती गई। इनके बिना ढेरों की मझधार में डूबती चली गई। एक का जाना-दूसरे का आना, तीसरे का सत्ता पाना यही इस राज्य की अरसे तक रीत रही। उनके वारिस या खानदानी आज भी राजनीति में हैं पर उन जैसी बात कहां? वह युग जब चरम पर था तब इस शख्स ने राजनीति का ककहरा सीखा । राजनीति की इससे बड़ी कोई पाठशाला दूसरी हो भी नहीं सकती थी। उसने ताऊ देवीलाल की जिद, बंसीलाल की सोच और भजनलाल की लोच को अपनी आंखों से देखा। जो सही था उसे सहेजा। जो खराब था उसे धीरे से जोर का झटका देकर इस अंदाज में पटका कि उसे खटका भी ना लगे। सूबे की कड़वी पर सच्ची बात कहने की रीत के ठीक विपरीत हर समय अपने व्यवहार से प्रीत दिखाई। राजनीति में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कांग्रेस को जीत की राह दिखाई। वो एक घाघ राजनेता आज भी नजर नहीं आते पर इसमें कोई दो राय नहीं कि खेल के शौकीन इस शख्स को अच्छी तरह पता है कि असली खिलाड़ी वही होता है जो हाकी के मैदान की डी में स्टिक हाथ में लेकर हमेशा मुस्तैद खड़ा नजर आए। जैसे ही गेंद सामने हो और कोई साथी उसकी ओर झपटे उससे पहले गेंद गोल में दाग दो। 2005 में उन्होंने ऐसा ही मा्स्टर गोल दागा था जिसका यकीन किसी को नहीं था और जिसकी गूंज ढेरों साथियों के दिलो दिमाग पर आज तक गूंज रही है। वो शख्स अच्छी तरह जानता है कि इस प्रदेश की जनता का मूड किस तरह, किन बातों पर और कब जल्दी खराब होता है? ऐसा कोई मौका वो आने नहीं देता। अपने सरल व्यवहार और आसानी से उपलब्ध रहने की कला या आदत के चलते विरोधी तक उसके गुणगान करते नजर आते हैं। यह बात दीगर है कि विरोध के नाम पर विरोध करना उनकी मजबूरी होता है। उसके राज में विकास के कामों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं पर इस बात पर कोई सवाल खड़ा नहीं हो सकता कि वो चाहे गन्ना ना दे पर गुड़ हमेशा हाथ में लेकर चलता है। चार बार सांसद होने के बावजूद वो कभी केंद्र की राजनीति का हीरो नहीं बन पाया पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज यह उसी के नाम या काम का इनाम है कि इस राज्य में कांग्रेस की कम और उसके नाम की सरकार ज्यादा दिखाई देती है। वो आज इस मुकाम पर है जहां उसके नाम के बिना इस राज्य की राजनीति की कोई बात नहीं हो सकती। किसी भी राजनेता के लिए इससे बड़ा इनाम और तमगा दूसरा क्या हो सकता है? वो जन्मजात राजनेता भी नहीं है। वो एक अर्थशास्त्री भी नहीं है। वो एक ब्यूरोक्रेट भी नहीं है। उसमें जाटों की जिद भी नहीं है। वो दिल से भी नहीं चलता है। वो खरी-खोटी भी कम सुनाता है। फिर भी ऐसे राज्य में जहां पत्रकारिता भी आसान नहीं और राजनीति भी ,वहां राजनीति की पारी में शतक ठोंकना और अपनी टीम को जिताना इस शख्स को अब खूब आता है। इस बार का पोल बताएगा कि हमेशा परिवर्तन का ढोल पीटने वाले इस प्रदेश को उसके राजकाज में झोल नजर आता है या मोल?
बीएस हुड्डा
0-रोहतक जिले का सांघी गांव-15 सितंबर,1947 को चौधरी रणबीर सिंह के यहां जन्म। 15 अक्टूबर 1976 को आशा देवी से विवाह। पत्नी शिक्षिका। एक बेटा,एक बेटी। बेटा दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी सांसद। शिक्षा हरियाणा में। पंजाब और दिल्ली विवि से बीए तथा एलएलबी की पढ़ाई। खेती पुश्तैनी पेशा। नामी वकील रहे। वकालत से राजनीति में प्रवेश। किलोई क्षेत्र। 72-77 तक ब्लाक कांग्रेस के अध्यक्ष। 80-82 तक हरियाणा यूथ कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष। 82-83 में अध्यक्ष। 83-87 तक पंचायत समिति रोहतक के चेयरमैन। 84-87 तक पंचायत परिषद हरियाणा के चेयरमैन। 91 में रोहतक से सांसद बनें। 92 से अब तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य। 94 से अब तक कांग्रेस संसदीय बोर्ड में। 94-96 में हरियाणा संसदीय गु्रप के संयोजक।96 में फिर सांसद निर्वाचित। 96-97 में संसद की एग्रीकल्चर कमेटी में। 97-02 तक हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष। 98 में फिर सांसद निर्वाचित। कई कमेटियों के सदस्य। किलोई सीट से 2000 में विधायक। 02-04 तक विपक्ष के नेता। 04 में फिर सांसद निर्वाचित। पांच मार्च को हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ग्रामीण क्षेत्रों में समाजसेवा में ज्यादा रूचि। पढ़ने और खेलने के शौकीन। हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया, यूएई,सोवियत संघ, पाकिस्तान, अमेरिका, चीन और नेपाल आदि देशों की यात्रा। हरियाणा की राजनीति के सबसे बड़े और लोकप्रिय चेहरों में से एक। मुख्यमंत्री के रूप में बेहद सफल। सूबे में विकास के ढेरों काम। आम आदमी की सरकार तक पहुंच। विनम्र पर दमदारी से अपनी बात कहने की आदत। सूबे में कांग्रेस को अपने कंधों पर ढोने का माद्दा। सादा जीवन-उच्च विचार की परंपरा के वाहक। चुनाव में निर्णायक नेताओं में से एक।
जिस सूबे में हर जन स्याणा हो। जाना-पहचाना हो। गरीबी से अनजाना हो। दूध-दही का खाना हो। खड़ी बोली में गाना-बजाना हो, देश में ऐसा राज्य सिर्फ हरियाणा ही हो सकता है। सबसे जुदा स्टाइल और अजब-गजब अंदाज। बोलना,खाना ,रहना, चलना और करना सब अलहदा। ये रईसी और अलमस्त अंदाज ही बताता है कि कुछ तो बात है इसमें। इसकी माटी में। आर्यसमाज के वाहक इस प्रदेश को हमेशा हर मामले में सबसे आगे गिना जाता है। राजनीति में भी,आन-बान और शान पर हरदम जान देने को तैयार कौम। खरी-खरी बोलना पसंद पर सुनना नापसंद। ऐसे राज्य का बंदा होना जितने गौरव की बात है उससे ज्यादा गर्व की बात है इस राज्य का मुखिया होना। वह भी उस हालत में जबकि आप किसी लाल के खानदान से ना जुड़े हों। लाल यानि हरियाणा के तीन लाल-देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल , यह गीत इस सूबे के साथ-साथ देश और दुनिया की फिजां में तीन दशक तक गूंजता रहा। उनकी आवाज की गूंज चाहे गुम हो गई हो पर उनके नाम की गूंज आज भी राजनीति के मैदान में साफ-साफ सुनाई देती है। एक समय इन तीन लालों के नामों के सहारे ढेरों की नैया इस सूबे में पार होती गई। इनके बिना ढेरों की मझधार में डूबती चली गई। एक का जाना-दूसरे का आना, तीसरे का सत्ता पाना यही इस राज्य की अरसे तक रीत रही। उनके वारिस या खानदानी आज भी राजनीति में हैं पर उन जैसी बात कहां? वह युग जब चरम पर था तब इस शख्स ने राजनीति का ककहरा सीखा । राजनीति की इससे बड़ी कोई पाठशाला दूसरी हो भी नहीं सकती थी। उसने ताऊ देवीलाल की जिद, बंसीलाल की सोच और भजनलाल की लोच को अपनी आंखों से देखा। जो सही था उसे सहेजा। जो खराब था उसे धीरे से जोर का झटका देकर इस अंदाज में पटका कि उसे खटका भी ना लगे। सूबे की कड़वी पर सच्ची बात कहने की रीत के ठीक विपरीत हर समय अपने व्यवहार से प्रीत दिखाई। राजनीति में धीरे-धीरे अपनी जगह बनाई। कांग्रेस को जीत की राह दिखाई। वो एक घाघ राजनेता आज भी नजर नहीं आते पर इसमें कोई दो राय नहीं कि खेल के शौकीन इस शख्स को अच्छी तरह पता है कि असली खिलाड़ी वही होता है जो हाकी के मैदान की डी में स्टिक हाथ में लेकर हमेशा मुस्तैद खड़ा नजर आए। जैसे ही गेंद सामने हो और कोई साथी उसकी ओर झपटे उससे पहले गेंद गोल में दाग दो। 2005 में उन्होंने ऐसा ही मा्स्टर गोल दागा था जिसका यकीन किसी को नहीं था और जिसकी गूंज ढेरों साथियों के दिलो दिमाग पर आज तक गूंज रही है। वो शख्स अच्छी तरह जानता है कि इस प्रदेश की जनता का मूड किस तरह, किन बातों पर और कब जल्दी खराब होता है? ऐसा कोई मौका वो आने नहीं देता। अपने सरल व्यवहार और आसानी से उपलब्ध रहने की कला या आदत के चलते विरोधी तक उसके गुणगान करते नजर आते हैं। यह बात दीगर है कि विरोध के नाम पर विरोध करना उनकी मजबूरी होता है। उसके राज में विकास के कामों पर सवाल खड़े किए जा सकते हैं पर इस बात पर कोई सवाल खड़ा नहीं हो सकता कि वो चाहे गन्ना ना दे पर गुड़ हमेशा हाथ में लेकर चलता है। चार बार सांसद होने के बावजूद वो कभी केंद्र की राजनीति का हीरो नहीं बन पाया पर इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज यह उसी के नाम या काम का इनाम है कि इस राज्य में कांग्रेस की कम और उसके नाम की सरकार ज्यादा दिखाई देती है। वो आज इस मुकाम पर है जहां उसके नाम के बिना इस राज्य की राजनीति की कोई बात नहीं हो सकती। किसी भी राजनेता के लिए इससे बड़ा इनाम और तमगा दूसरा क्या हो सकता है? वो जन्मजात राजनेता भी नहीं है। वो एक अर्थशास्त्री भी नहीं है। वो एक ब्यूरोक्रेट भी नहीं है। उसमें जाटों की जिद भी नहीं है। वो दिल से भी नहीं चलता है। वो खरी-खोटी भी कम सुनाता है। फिर भी ऐसे राज्य में जहां पत्रकारिता भी आसान नहीं और राजनीति भी ,वहां राजनीति की पारी में शतक ठोंकना और अपनी टीम को जिताना इस शख्स को अब खूब आता है। इस बार का पोल बताएगा कि हमेशा परिवर्तन का ढोल पीटने वाले इस प्रदेश को उसके राजकाज में झोल नजर आता है या मोल?
बीएस हुड्डा
0-रोहतक जिले का सांघी गांव-15 सितंबर,1947 को चौधरी रणबीर सिंह के यहां जन्म। 15 अक्टूबर 1976 को आशा देवी से विवाह। पत्नी शिक्षिका। एक बेटा,एक बेटी। बेटा दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी सांसद। शिक्षा हरियाणा में। पंजाब और दिल्ली विवि से बीए तथा एलएलबी की पढ़ाई। खेती पुश्तैनी पेशा। नामी वकील रहे। वकालत से राजनीति में प्रवेश। किलोई क्षेत्र। 72-77 तक ब्लाक कांग्रेस के अध्यक्ष। 80-82 तक हरियाणा यूथ कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष। 82-83 में अध्यक्ष। 83-87 तक पंचायत समिति रोहतक के चेयरमैन। 84-87 तक पंचायत परिषद हरियाणा के चेयरमैन। 91 में रोहतक से सांसद बनें। 92 से अब तक कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य। 94 से अब तक कांग्रेस संसदीय बोर्ड में। 94-96 में हरियाणा संसदीय गु्रप के संयोजक।96 में फिर सांसद निर्वाचित। 96-97 में संसद की एग्रीकल्चर कमेटी में। 97-02 तक हरियाणा कांग्रेस के अध्यक्ष। 98 में फिर सांसद निर्वाचित। कई कमेटियों के सदस्य। किलोई सीट से 2000 में विधायक। 02-04 तक विपक्ष के नेता। 04 में फिर सांसद निर्वाचित। पांच मार्च को हरियाणा के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। ग्रामीण क्षेत्रों में समाजसेवा में ज्यादा रूचि। पढ़ने और खेलने के शौकीन। हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया, यूएई,सोवियत संघ, पाकिस्तान, अमेरिका, चीन और नेपाल आदि देशों की यात्रा। हरियाणा की राजनीति के सबसे बड़े और लोकप्रिय चेहरों में से एक। मुख्यमंत्री के रूप में बेहद सफल। सूबे में विकास के ढेरों काम। आम आदमी की सरकार तक पहुंच। विनम्र पर दमदारी से अपनी बात कहने की आदत। सूबे में कांग्रेस को अपने कंधों पर ढोने का माद्दा। सादा जीवन-उच्च विचार की परंपरा के वाहक। चुनाव में निर्णायक नेताओं में से एक।















