रविवार, 22 मार्च 2009

लालू का दांव

देशपाल सिंह पंवार
बिहार में लालू-पासवान एकता से घमासान है। जिस तरह दोनों ने 40 में से 37 सीटें बांटी, यूपीए तार-तार नजर आ रहा है। महज तीन सीटों की औकात समझने से कांग्रेसी बेजार नजर आ रहे हैं। घर में अलग विलाप है। राकांपा का रोना अलग से। कहने को झारखंड में कांग्रेस ने शिबू सोरेन से दोस्ती कर झटका दिया है लेकिन यह खुशफहमी से ज्यादा कुछ नहीं। हकीकत यही है कि पासवान चाहे घाटे में रहें पर लालू की सेहत पर असर नहीं पड़ने वाला। लालू को जानने और समझने वाले इस बात को मानते हैं कि वे घाटे का सौदा नहीं करते। जिस तरह से उन्होंने राजनीति की बिसात पर गोटी चली है वह फिलहाल ट्रेलर मात्र है,नतीजों के समय फिल्म सामने आएगी और सबको यह एहसास होगा कि आखिर यह दांव क्यों खेला गया और इस दोस्ती व दुश्मनी के पीछे का कड़वा सच क्या था? कांग्रेसियों का रोना,साधु यादव का रौद्र रूप,राजद नेताओं का कांग्रेस में शामिल होना लालू विरोधियों को फील गुड करा सकता है लेकिन यह एक अकाट्य चाल है जिसकी जद में कांग्रेस तो है ही लोजपा भी है। एक से दूरी बनाकर फायदा और दूसरे से दोस्ती के सहारे। वार दोनों को झेलने होंगे। अगर राजनीति ने करवट नहीं ली तो फिलहाल लालू की चांदी है। यूं तो हर राजनेता प्रधानमंत्री बनने की सोचता है। ख्वाब पालता है,देखता है और इसी राह की चाह में जीता है। लालू इससे अलहदा नहीं है लेकिन दूसरों से अलग जरूर हैं। ज्यादातर बिहारी नेता राज्य में चुनाव लड़ते हैं और दिल्ली की राजनीति करते हैं। नीतीश हों या पासवान या फिर तमाम बीजेपी और कांग्रेसी नेता बिहार में फसल पैदा करते रहे। जनता के लिए राजनीति नहीं। उन्हें केंद्र सरकार ज्यादा पसंद आती रही। तय था कि अगर नीतीश सीएम नहीं बन पाते तो केंद्र में ही नजर आते। मौका मिलने पर पासवान सीएम बनने तक को तैयार नहीं हुए। शाहनवाज हुसैन,रविशंकर प्रसाद, शत्रुघ्नसिन्हा, राजीव प्रताप के पैर बिहार में नहीं टिकते। कांग्रेसी शकील अहमद हों या फिर मीरा कुमार केंद्र से बाहर पैर नहीं रखते। पार्टी की वहां दुर्गति है लेकिन कैसे सुधरे शायद ही कोई बैठक ली हो, सुझाव दिए हों। सबकी कमजोरी और खूबी का एहसास वहां सबको है। जनता को ज्यादा। राजद नेताओं को पहली बार केंद्र की राजनीति का चस्का लगा है हां आदत नहीं पड़ी है। बिना लालू पड़ेगी नहीं। वैसे देश की राजनीति लालू चलाना चाहते हैं लेकिन बिहार की कीमत पर नहीं। हकीकत यही है कि देश का ताज चाहे नसीब ना हो लेकिन बिहार के राज पर उन्हें ज्यादा नाज होगा। वैसे जमीन छोड़ने के कांग्रेसी हश्र से वे वाकिफ हैं। खुद के जमे रहने और दूसरों को उखाड़ फैंकने की राजनीति करते रहते हैं। चाहे इसका शिकार उनके अपने ही क्यों ना हो? सब जानते है कि जिसने बिहार में लालू से दोस्ती की वह कोमा में चला गया तथा लालू पहलवान होते गए । कम्युनिस्ट हों या कांग्रेस या फिर लोजपा सबके हश्र सामने हैं। जो छोड़कर चले गए वे आज पारी खेल रहे हैं जो साथ हैं वे बारी की बाट जोह रहे हैं। जहां तक पासवान से दोस्ती का सवाल है तो पासवान के संग होने या ना होने का फर्क लालू 2004 के आम चुनाव और 2005 के विधानसभा चुनाव में देख चुके हैं। 22 सीटों पर जीत में पासवान महत्वपूर्ण फैक्टर थे। जिसके सहारे वे आज तक केंद्र की राजनीति में हैं। रेलमंत्री पद के कारण बिगड़ी बात पर 2005 के चुनाव में दोनों अलग राह पर थे, नतीजा सबको पता है। इसी वजह से लालू ने मनाने के हर जत्न किए। एक दर्जन सीटें तक दे डालीं। अब लोजपा की स्थिति जो रहे लेकिन तय है कि बंगले के साथ लालटेन की रोशनी की चमक धीमी नहीं रहेगी। वरना जिस नेता को रावड़ी देवी बरसों तक लंगडा सियार कहती रहीं और लालू आधा दर्जन सीटों के लायक नहीं मानते रहे उस पर अचानक इतनी मेहरबानी क्यों ? दोस्ती में गोलमाल है। उधर अपनी हैसियत का कांग्रेस को एहसास है और लालू को उससे ज्यादा। सोची समझी रणनीति के तहत उन्होंने कांग्रेस को झटका दिया ताकि वो अलग नजर आए। कांग्रेस जितनी ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ेगी फायदा लालू को ही होगा। साधु यादव, पप्पू यादव, रंजीता यादव जैसे जो नेता राजद का साथ छोड़ हाथ थाम रहे हैं वे सब लालू के खास हैं। हमेशा लालू के ही रहेंगे। हां गुस्से में सबको कांग्रेस अपना टिकट देगी और ज्यादातर लोजपा को ही टक्कर देते नजर आएंगे राजद को नहीं। इनको जिताने की कोशिश वे जरूर करेंगे। हार गए तो ठीक और जीत गए तो और ज्यादा ठीक। इससे लोजपा को होने वाला घाटा आने वाले दिनों में सामने आ जाएगा। यही है लालू का दांव। कांग्रेस और लोजपा दोनों चित्त। कैसी दोस्ती-कैसी दुश्मनी। इस स्थिति में लालू कुछ ऐसे नेताओं को खुश कर अलग से कर पाएंगे जो अब तक मुंह ताकते रह जाते थे। जहां तक साधु यादव का सवाल है उसका जाना एक चाल है। बिहार में लालू-राबड़ी राज पर ज्यादातर वार सुबाष यादव और साधु यादव की वजह से ही हुए। सत्ता से बाहर जाने का प्रमुख कारण यही माने गए। एक बाहुबली और दूसरा धनबली। छोटा साला पहले ही दरबार से बाहर हैं। अब साधु के जाने या ठेलने से विरोधी राजद नेता जितने खुश, जनता में उतना ही अच्छा संदेश। अब लालू का यह कांटा दूसरों को पीड़ा देगा। जो हो पिछड़ों के सहारे राजनीति के इस अगड़े के इर्द-गिर्द चाहे देश की राजनीति घूमती ना दिखाई देती हो लेकिन बिहार की राजनीति की धारा इस नेता की चौखट से बहती जरूर है। या तो आप समर्थक होंगे या फिर खिलाफ -लेकिन न्यूट्रल नहीं हो सकते। उनका नाम ही ना लें यह हो नहीं सकता। या तो समर्थन में जय-जयकार करेंगे या फिर विरोध में जहर उगलेंगे। जय से कम और जहर से ज्यादा फायदा लालू को होता आया है। दोस्ती-दुश्मनी के अपने मीन हैं। इस बार कोसने वाले तीन हैं। लालू की बजती बीन है। वाह क्या सीन है? (20।3.09)

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