शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

राम से अवाम तक का नाम


देशपाल सिंह पंवार
जो दल समय की नजाकत- जनता की चाहत भांप लेता है वो राहत में रहता है ,भले समय के हिसाब से कांग्रेस घोषणापत्र जारी करने में आगे रही लेकिन तैयारी और सोच मैं बीजेपी ने मीलों पीछे छोड़ दिया है। हर हाल में प्रधानमंत्री की गद्दी पर आडवाणी को देखने की हसरत घोषणापत्र से साफ झलकती है। दल ने बेहद नफासत से काम लिया है। हर उस पहलू को छुआ है जो जन आवाज है। तरक्की का साज है। जिस पर राज-काज अगर वास्तव में चले तो सबको नाज होगा। यही असली राम राज्य होगा। रोटी-कपड़ा-मकान से किसान-जवान तक,बेरोजगार से रोजगार तक,स्कूल-कालेज से नालेज तक,गरीब से अमीर तक, बेरोजगार से रोजगार तक, नौकरीपेशा से बिजनेसमैन तक,गांव से शहर तक, कर्ज से मर्ज,घरबार से दरबार तक कोई बिंदू ऐसा नहीं है जिसे शामिल न किया गया हो। ऐसे दौर में जहां घोषणापत्र क्रेज खो चुके हों, कांग्रेसी घोषणापत्र महज परंपरागत ढर्रे और औपचारिकता से उबर न पाया हो वहां बीजेपी ने जिस बारीकी से सारे मसलों पर हाथ रखा है,साफ लगता है कि पार्टी रणनीतिकारों ने बेहद मंथन किया है। भविष्य की सोच को कागजी अमलीजामा पहनाया है। जनता खासकर युवा वर्ग और नौकरीपेशा की नब्ज पर हाथ रखने की कोशिश की है। दल ने अपने सुपरहिट फार्मूले नहीं छोड़े हैं। जिस राम के सहारे सत्ता मिली थी उसे भी नहीं त्यागा है। हां सोच समझकर ऐसे वादे किए हैं जो अगर जनता में सही तरीके से चले गए तो विखंडित जनमत की आशंका के बीच अपना गुल खिला सकते हैं। रामनवमी के दिन -अवाम की बात कर असली रामराज्य की ओर वैचारिक रूप से तो कदम पार्टी ने बढ़ा ही दिए हैं। अब नतीजे साबित करेंगे कि दल की रणनीति खस्ता हाल वोटर को लाल करेगी या दल को हलाल। जो हो पर सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर घोषणापत्र अंतिम समय में ही क्यों सामने आते हैं? लगातार जनहित बिंदुओं का प्रचार-प्रसार क्यों नहीं होता? जनमत को मत बनाने और बेहतर को चुनने का समय तो मिलना ही बीजेपी सत्ता में आई तो छत्तीसगढ़ की तर्ज पर सब महागरीबों को 2 रूपए किलो गेंहू-चावल देगी। किसानों के सारे कर्जे माफ करेगी। चार फीसदी की दर पर कर्ज देगी। शहरी गरीबों और दिहाड़ी मजदूरों का कल्याण करेगी। हर गांव में बिजली और सड़क होगी। नौकरीपेशा को क्या चाहिए-आयकर में छूट। बीजेपी सीमा बढ़ाकर तीन लाख कर देगी। निजी उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। शिक्षा और रोजगार नीति बनेगी। छंटनी का दौर खत्म होगा। विदेशों में जमा काला धन लाने को कानून बनेगा। निवेशकों के हितों का कानून बनेगा। हर सिर पर छत हो-लोन सस्ता मिलेगा। पर्यटन उद्योग चमकेगा। बाहरी और आंतरिक सुरक्षा ऐसी होगी कि परिंदा भी पर नहीं मार पाएगा। सेना में समान पद-समान पैंशन योजना लागू होगी। इसके अलावा हर वो पहलू घोषणापत्र में है जो देश और जनहित में जरूरी है। इस एजेंडे पर चलकर कोई भी नया दल चमत्कार कर सकता है,रामराज्य ला सकता है बशर्ते सत्ता मिले। बीजेपी जानती है कि पहली बार वोट डालने वाले 10 करोड़ युवा तकदीर बदल सकते हैं। उन्हें वादों में खास तरजीह मिली है। देश की आबादी का 50 फीसदी युवा वर्ग है। मंदी से सब चौपट है। वह हताशा और निराशा की अंधेरी गलियों में है। वहां से निकालने का वादा दल ने किया है। सपने दिखाए हैं। यह टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकता है। रहा सवाल राम मंदिर का। जो पार्टी इस मुद्दे पर खड़ी हुई हो वो इसे कैसे छोड़ सकती है? ठीक रामनवमी के दिन जनहित की बात कर उसने एहसास किया भी है और कराने की कोशिश भी की है कि इस देश का कल्याण असली रामराज्य से ही होगा। यही बीजेपी के घोषणापत्र का सार है। हां राज में आने पर गठजोड़ की आड़ में राम मंदिर का मसला टल जाए तो इसमें उसका क्या दोष? हमेशा यही तो होता है। कोई कितना भी कोसे पर कम से कम बीजेपी के घोषणापत्र से तो असली रामराज्य की झलक मिलती ही है। बशर्ते जनता भरोसा करे और सत्ता में आने पर इन सारे वादों पर पार्टी अमल करे। घोषणा पत्र की थीम होती है-वादे और इरादे। चुनाव के समय जनकल्याण के वादे करो और जनमत मिलने के बाद उन्हें पूरा करो। 1952 से ही घोषणापत्र का चलन शुरू हो गया था। दल जताते थे कि वे इस राह पर सरकार चलायेंगे। घोषणापत्रों की महत्ता होती थी। जनता उससे तय करती थी कि किस दल की योजनाएं ज्यादा मुफीद है। बाकी काम नेताओं के कद अंजाम दे देते थे। समय ने पलटी मारी और गठजोड़ की राजनीति घोषणापत्रों की थीम को भी लील गई। एक दूजे को गरियाने वाले, विपरीत घोषणापत्र जारी करने वाले दल सत्ता के लिए जब एक मंच पर आने लगे तो घोषणा पत्रों को किनारे किया जाने लगा। क्या-क्या वादे किए थे वो सब भूलने लगे। तेजी से ये असर खोने लगे। कागजी पुलिंदा साबित होने लगे। फालतू की कवायद बनने लगे और महज परंपरा की औपचारिकता निभाई जाने लगी। आज आलम ये है कि हर दल घोषणापत्र जारी तो करता है लेकिन जनता तक उसकी पहुंच बिल्कुल उसी अंदाज में होती है जैसे विकास की राशि का एक छोटा सा हिस्सा किसी तरह भटकते हुए आखिरी मंजिल तक पहुंचता है। हां विश्लेषकों के लिए ये पोस्टमार्टम का पार्ट जरूर बनते हैं। अपने हिसाब से मिमांसा होती है। मतलब निकाले जाते हैं। राजनीतिक दल अपनी नीति को चुराने या उस तर्ज पर चलने का आरोप लगाते हैं। मतदान होते ही घोषणापत्र की फाइल बंद हो जाती है। किसने क्या वादा किया यह नेताओं या दलों को ही याद नहीं रहता फिर जनता का क्या कसूर? समय का तकाजा है कि राजनीति के हित के लिए, जनहित के लिए,देश हित के लिए घोषणापत्रों से सबका वास्ता होना ही चाहिए। अगर जनता घोषणापत्रों के आधार पर पार्टी के बारे में राय कायम करने लगेगी, वोट देने लगेगी और वादे पूरा न करने पर कान ऐंठने लगेगी तो यह तय है कि क्षेत्रीय छत्रपों की जकड़न में सिसक रही राजनीति का भी कल्याण होगा और गरीबी तथा बेरोजगारी की मार झेल रही जनता का भी, लगे हाथ घोषणापत्रों का भी मोल बढ़ जाएगा। इसमें लिखे जाने वाले बोल भी अर्थहीन की बजाय अर्थपूर्ण हो जाएंगे। देश का 14 हजार करोड़ दांव पर है। विखंडित जनादेश का भूत सामने है। मंदी का राक्षस फंदा कसता जा रहा है ऐसे में जरूरी है कि जनता यह देखे और तय करे कि किस दल की सोच कैसी है? वो कैसी सरकार देगी और किस तरह सरकार चलाएगी? भूतकाल से ज्यादा जरूरी है वर्तमान और वर्तमान से ज्यादा जरूरी है भविष्य -इसलिए पहले किसने क्या किया से जरूरी है भविष्य किसके हाथ में सुरक्षित है? इतिहास को न तो सिखाया जा सकता और न ही उसे फांसी पर लटकाया जा सकता। हां वर्तमान के काम से, सोच से भविष्य संवारा जा सकता है। अपना भी -इस देश का भी, तय जनता को करना है। वो जो चाहे फैसला करे - बस वो खंडित न हो। अगर ऐसा हुआ तो यह तय है कि इस देश का भविष्य जरूर खंडित हो जाएगा।

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