
देशपाल सिंह पंवार
वो जितने नसीब के धनी हैं उससे ज्यादा ज्ञान के-कर्म के-सरल व्यवहार के। हकीकत में उन्हें राजनेता कम और विचारक तथा विद्वान ज्यादा कहा जा सकता है। जवानी आने से पहले ही बंटवारे का दर्द, शरणार्थी होने का मर्म झेलने वाले इस शख्स के चेहरे से आम आदमी की बेबसी झलकती है। पर नसीब ऐसा-सबको जलन हो। बिना संसदीय चुनाव जीते प्रधानमंत्री की उस कुर्सी तक चुपचाप पहुंच गए जिसके लिए दूसरे 30-40 साल से पिस रहे हैं। चुनाव लड़ रहे हैं। जूतियां रगड़ रहे हैं। सबसे झगड़ रहे हैं पर अफसोस-नंबर नहीं लग पाया। राजनीति में उन जैसे नसीब वाला दूसरा हो सकता है पर ज्ञान में कोई दूसरा चेहरा आसपास नहीं ठहरता। जो लोग यह कहते हैं कि हिंदुस्तान में ज्ञान की कोई कदर नहीं होती यह चेहरा उनकी बोलती बंद करने के लिए काफी है। 1990 तक आर्थिक मामलों का यह ज्ञानी पैसे-धेले से जुड़े सारे पदों की हैसियत बढ़ा चुका था। हां राजनीति का न तो कोई ज्ञान था और न ही कोई लेना-देना और न ही ये आड़े आया। आर्थिक मामलों का ज्ञान सब पर असरदार रहा। 91 में धमाकेदार शुरूआत- वित्त मंत्री बन गए। आर्थिक सुधार के नाम पर देश को पूंजीवादी अर्थव्यवस्था की ओर लेकर गए। कड़े फैसले करते गए। लोग कोसते गए। एक मौन-सौ को हराता है कि कहावत सच होती गई। कम बोलने और 24 घंटे ईमानदारी से काम करने की आदत ने दुश्मनों की चाहत चार साल पूरी नहीं होने दी। चुनावी साल था। ढेरों अपनों को इनकी चाल से मलाल था। खजाने से हटवाया पर कद ऐसा था कि विदेश मंत्री बनाना पड़ा। एक साल तक रहे। 91 में जहां उनका ज्ञान काम आया था तो 2004 में उनका सरल व्यवहार, निर्विवाद और सर्वमान्य चेहरा। किसी को यकीन नहीं था कि वे प्रधानमंत्री बनेंगे। उन्हें खुद यकीन नहीं था। जिस सरकार को उन्होंने चलाया उसमें एक दर्जन से ज्यादा ऐसे थे जो दावेदार थे। इतना ही नहीं यूपीए का हर नेता उनसे ज्यादा राजनीति का जानकार था। शायद जैसा कर्म-वैसा फल। हां राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे वित्त मंत्री थे। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे विदेश मंत्री बने। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे 1999 में पहली बार संसद का चुनाव दक्षिणी दिल्ली से लड़े और हारे। राजनीति उन्हें तब bhi नहीं आती थी जब वे प्रधानमंत्री बने। पर हां इतने विश्वास से अब यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें राजनीति नहीं आती। उनके आर्थिक जानकार कद पर राजनीति का यह पद हावी हो चला है। जो शख्स वार से घबराया ना हो, दूसरे पर वार किया ना हो उस शख्स को राजनीति ने इतना जरूर सिखा दिया है कि काजल की इस कोठरी में खुद को बचाने के लिए जरूरी है दूसरों पर कालिख पोतना। हां यह जरूर दिखता है कि इसके लिए उन्हें काफी मेहनत करनी पड़ती है। कमजोर प्रधानमंत्री और 10 जनपथ से राज चलने के वार झेलते-झेलते उन्होंने पांच साल गुजार दिए हैं। अगर आजकल के राजनेताओं की तरह होते तो अब तक दूसरी राह पर खड़े नजर आते लेकिन न वे आरोपों से घबराए और न ही झांसे में आए। राज कैसा bhi चलाया हो पर इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि जिस पद पर रहते हर किसी के दामन पर छींटे पड़े हों वहां अब तक यह चेहरा बेदाग है। यही कारण है कि जिस दल में ढेरों दिग्गज हैं वहां अगली बार bhi यह गद्दी इस शख्स के लिए बुक कर दी गई है। इसी ताकत के बाद उन्होंने मुंह खोला तो सबको आश्चर्य हुआ। बिल्कुल यही अंदाज था -शरीफ की शराफत की ज्यादा लानत ठीक नहीं। नतीजा कुछ bhi हो इस बार के चुनाव में राजनीति की धारा अलग बहती नजर तो आ रही है। पहली बार दोनों बड़े दलों के प्रधानमंत्री तय हैं। एक तरफ राजनीति का धुरंधर है तो दूसरी ओर एक सामान्य से आम आदमी का चेहरा। इस शख्स और ऐसे चेहरों के लिए यही बहुत बड़ी बात है। जीतने और जिताने की स्थिति में वे चाहे हों या नहीं पर आज की राजनीति के दौर में ऐसे चेहरों के सहारे चुनाव लड़ना एक अच्छा संकेत जरूर है खासकर राजनीति के लिए। मनमोहन सिंह0-26 सितंबर 1932, पंजाब का गाह गांव और कोहली सिख परिवार में जन्म(इस समय पाकिस्तान के चकवाल जिले का हिस्सा)। देश बंटवारे पर अमृतसर पलायन। 0-1958 में गुरुशरण कौर से शादी। तीन बेटियां। 0-अर्थशास्त्र की पढ़ाई के लिए पंजाब विवि में स्टडी। कैंब्रिज विवि से एम ए। आक्सफोर्ड़ विवि से 1962 में डी फिल। 64 में पहली किताब लिखी।0- 66 से 67 तक अंकटाड सचिवालय में कार्यरत। 70 में दिल्ली विवि में पढ़ाया। 71 में वाणिज्य मंत्रालय में सलाहकार। 72 में वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार। 0-वित्त मंत्रालय के सचिव, प्रधानमंत्री के सलाहकार और विवि अनुदान आयोग के अध्यक्ष रहे। 82 से 85 तक रिजर्व बैंक गवर्नर। 85-87 योजना आयोग के उपाध्यक्ष। 0-91-96 में पीवी नरसिम्हा राव की सरकार में वित्त मंत्री। आर्थिक संकट का दौर। अर्थव्यवस्था का निर्णायक मोड़। सुधार के तहत पूंजीवादी व्यवस्था का समावेश।0-लाइसेंस राज खत्म। विदेशी पूंजी निवेश की सारी बाधाएं खत्म। पब्लिक सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए ओपन। आर्थिक विकास दर 3 से 9 फीसदी तक पहुंची। 0-95 में उच्च सदन में। 96 में सरकार की हार। फिर 2001 और 07 में उच्च सदन में। 98-04 उच्च सदन में विपक्षी नेता। 99 में संसदीय चुनाव दक्षिणी दिल्ली से लड़े-हारे।0-2004 में यूपीए की सरकार। सोनिया ने सरल व्यक्तित्व और विद्वान होने की वजह से प्रधानमंत्री चुना। आर्थिक सुधार के पुराने रास्ते पर। पाक से दोस्ती की पहल।0-कश्मीर में आतकंवाद में कमी। 06 में चीन से दोस्ती। चार दशक बाद नैथुला दर्रा खुला। चीन से सबसे ज्यादा व्यापारिक रिश्ते। करजई से दोस्ती। विशेष मदद। 0- जापान,ईरान, फ्रांस, जर्मनी, से रिश्ते बेहतर। रूस के धुर विरोधी इस्राइल तक से दोस्ती। 07 में चिदंबरम संग सबसे अधिक 9 फीसदी की आर्थिक विकास दर।0- बैंकिंग और वित्त सेक्टर में सुधार। अमरीका से परमाणु करार पर अविश्वास प्रस्ताव। वाम ने नाता तोड़ा। सपा का साथ। सरकार बची। मंदी की मार। नवंबर में मुंबई पर हमला। पाटिल की विदाई। चिदंबरम होम मिनिस्टर। पाक से रिश्ते खराब। 0-10 जनपथ के साए में। सबसे कमजोर प्रधानमंत्री का आरोप। असम के वोटर नहीं पर उच्चसदन में। 90 और अब 09 में बाईपास सर्जरी। 0- 87 में नागरिक पुरस्कार,दर्जनों विशिष्ट पुरस्कार और सम्मान। कई मानद उपाधियां।
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