बुधवार, 15 अप्रैल 2009

माया की निराली माया



देशपाल सिंह पंवार
नाम में बहुत कुछ रखा है-अगर आप मानते हैं तो ठीक, नहीं तो मान जाइए। कम से कम राजनीति की इस हस्ती का जैसा नाम-वैसा काम देखकर तो शक की गुंजाइश नहीं बचती। जिसके पिता-माता के नाम के साथ परभू - राम जुड़ा हो,जिसका खुद का नाम संसार की सबसे बड़ी ताकत और सबकी जरूरत की देवी पर रखा गया हो उसे कदम बढ़ाने से कौन रोक सकता था? चाहे उसका राजनीति से कोई लेना-देना नहीं था लेकिन बचपन से एलएलबी की पढ़ाई तक जितना किताबी ज्ञान उसने ग्रहण किया उससे ज्यादा शोषण के शिकार दलितों के चेहरों की पीड़ा से हासिल किया। वो पीड़ा जो अपनों ने भी झेली, उसने भी तब तक झेली, जब तक हाथ में पावर नहीं आई। पावर जो राजाओं के घरों की बांदी हुआ करती थी,पावर जो रईसों के तलुवे चाटा करती थी, पावर जो परिवारवाद की राह पर चलते रहे राजनेताओं की औलादों को तोहफे में बंटती रही। पर यहां ना तो वो खैरात में मिली और ना ही राजनीति की परचून की दुकान से खरीदी गई। उसने दलितों को अपनी पावर बनाया, पावर का मतलब समझाया। नतीजा-आज वो खुद पावर हाउस है। हर कदम पर हार-तीखे वार झेलते रहने के बावजूद पलटवार का गुण बेड़ा पार करता गया। उससे पहले न तो समाज के ठेकेदार दलितों को समाज में बराबर का हक दिला पाए। न हिंदुस्तान सरकार की आरक्षण की खुराक दलितों के हक की सेहत को सुधार पाई और न ही दूसरा कोई दलित नेता उनकी आवाज बनकर गूंज सका। दलित के भी बोल का मोल है इसी शख्सियत ने राजनीति और समाज में यह गोल दागना भी सीखा और सिखाया भी नतीजा आज हर दल के लिए दलित अनमोल हैं। उनके हक की जंग अब समाज के हर तबके के रंग-ढंग में बदल चुकी हैं। भागो नहीं-दुनिया को बदलो की थीम पर उन्होंने राजनीति की ऐसी बीम रखी जिसे हिलाने में आजकल सारी ताकतों के घुटने कमजोर पड़ने लगे हैं। बाजू जवाब देने लगे हैं। यह स्थिति तो तब है जब हर तरफ से वार पर वार हैं। दामन पर बैईमानी के कीचड़ उछल रहे हैं। महारानियों की तरह जन्मदिन मनाने के आरोप लग रहे हैं। संतरी से मंत्री और जनता से नेता तक से उगाई के किस्से उछल रहे हैं। कानून में फांसने के रास्ते निकाल रहे हैं। पर उसे नो प्रोबल्म। हां पीड़ा की कड़वाहट या किसी चोट का गुस्सा उनकी चाल से भी झलकता है और बोल से भी, वोट बैंक लगातार बढ़ता जा रहा है,वोटर का उस पर विश्वास है। यही इस शख्सियत की कामयाबी है और यही विरोधियों का सबसे बड़ा डर है। आज राजनीति में उस जैसा कोई नहीं। या तो ज्यादातर परिवारवाद की कमाई खा रहे हैं या फिर संगठन की। उसने खुद कुंआ खोदा,पानी निकाला,पानी पी भी रही हैं और दूसरों को पिला भी रही हैं। दिल्ली की गद्दी के लिए सब मनाने में लगे हैं। वो जिधर-राजपाट उधर। यूपी हुई हमारी-अब दिल्ली की बारी के नारे का मतलब शायद वो समझ नहीं रहे हैं। इतिहास गवाह है-न तो वो अपनी कमाई पर किसी को हाथ रखने देतीं और न ही कभी घाटे का कोई सौदा करतीं। 2007-08 में उसने 27 करोड़ आयकर अदा किया। मुकेश अंबानी से भी ज्यादा। देश की राजनीति का अनोखा रिकार्ड़। सचमुच माया की माया ही निराली है। जिस पर हाथ-उसकी लाली। चुनाव में क्या होगा देखते रहिए?
मायावती चंदावती देवी
0-15 जनवरी,1956 को दिल्ली में जन्म। पिता परभू दास दूरसंचार के कर्मचारी। माता रामरती। मूलत बादलपुर गांव (गाजियाबाद जिला) निवासी। बीए, बीएड, एलएलबी की शिक्षा कालिंदी कालेज दिल्ली और मेरठ विश्वविद्यालय से। 0-प्रोफेशन-राजनीति, समाज सेवा और वकालत। 77-84 तक दिल्ली प्रशासन के कई स्कूलों में अध्यापन। कांशीराम से जुडाव ,डीएस-4 ज्वाइन। 14 अप्रैल 1984 को बहुजन समाज पार्टी गठित। दलितों और बौद्धों के उत्थान का संकल्प। अध्यापन छोड़ मायावती पूरी तरह राजनीति में। 0-84 में कैराना (मुजफ्फरनगर) लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा-हार। 85 में बिजनौर और 89 में हरिद्वार से फिर लोकसभा चुनाव मैदान में। नतीजा-हार। मसूद अहमद जैसे नेताओं के साथ काम। 89 में पार्टी को 9 फीसदी वोट मिले। इसके बाद दूसरे तबके पर ध्यान। इसी साल पहली बार बिजनौर सीट से संसद में प्रवेश। 91 में कांशीराम की उत्तराधिकारी घोषित। 95 में उच्च सदन में। हरौरा और बिल्सी सीटों से विधानसभा में।0-93 में मुलायम सरकार को समर्थन। रिश्ते खराब। 2 जून 95 को लखनऊ स्टेट गेस्ट हाउस कांड। 3 जून को बीजेपी के समर्थन से पहली बार मुख्यमंत्री की गद्दी पर। सपा नेताओं के खिलाफ 150 से ज्यादा मुकदमें। अब तक छत्तीस का आंकड़ा। 18 अक्टूबर को पतन। 97 में बीजेपी से अनोखी डील। 6 माह बसपा, 6 माह बीजेपी का सीएम होना तय। पहली खुद सीएम। बीजेपी का नंबर आते ही समर्थन वापस। तीसरी बार 2002 में सीएम। एक साल से ज्यादा अवधि तक गद्दी पर। 98 और 99 में अकबरपुर (कानपुर) से लोकसभा में। 04 में फिर उच्च सदन में। 0-2007 में हाथी नहीं-गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु-महेश है का नारा। स्वर्णों को टिकट। हर वर्ग का समर्थन। गठजोड़ के दौर में पूर्ण बहुमत की सरकार। बीजेपी और सपा को करारा झटका। यूपी की 23 वीं, 24 वीं, 30 वीं और 32 वीं मुख्यमंत्री।0-लगातार विवादों में। कांशीराम को घर वालों से दूर करने का आरोप। 18 हजार से ज्यादा पुलिस जवानों को निकाला। दर्जनों पुलिस, प्रशासनिक अफसर निलंबित। अमिताब बच्चन के खिलाफ बाराबंकी भूमि केस। अम्बेडकर पार्क और परिवर्तन चौक पर अरबों खर्च। ताज कोरिडोर घोटाले में करप्शन और आय से अधिक संपत्ति के सीबीआई के पास केस। पार्टी फंड और जन्म दिन के नाम पर धन बटोरने के आरोप। इंजीनियर एम के गुप्ता की हत्या से बवाल। वरुण गांधी पर रासुका से फिर विवादित। 0-कांग्रेस, सपा, बीजेपी से बराबर की दूरी। अपने दम पर चुनाव मैदान में। तीसरे मोरचे को भी झटका। बार-बार पार्टी टूटने की परंपरा। राजस्थान में पूरा विधायक दल कांग्रेस में। तमाम देशों की यात्रा। कई किताबें प्रकाशित।

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