मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

पत्रकार शर्मसार


देशपाल सिंह पंवार
धरातल पर जब कुछ पहली बार होता है तो वह यादगार भी होता है और शर्मसार भी, अच्छा है तो यह गूंज हमेशा सुनने को मन बेचैन रहता है। बुरा होता है तो उसकी गूंज जेहन को हमेशा परेशान रखती है। हिन्दुस्तान के इतिहास में पहली बार एक ऐसी घटना हुई जिससे बुरा कम से कम भारतीय पत्रकारिता के लिए तो कभी नहीं हुआ। एक पत्रकार के नाते ऐसी ही मानसिकता के पत्रकार शर्मिंदा भले ही ना हों पर मेरे जैसे ढेरों पत्रकार जरूर शर्म से पानी-पानी हैं। जहां मंगलवार को दुनिया विश्व स्वास्थय दिवस मना रही थी, बीमारों की बढ़ती आबादी पर रोकथाम और बीमारियों को मिटाने की चिंता में डूबी हुई थी,वहीं हम अपनी घटिया सोच, घटिया हरकत से पत्रकारिता को शर्मसार भी कर रहे थे और साथ ही देश की सेहत पर वार भी, दिल्ली में देश के होम मिनिस्टर पर जूता फैंका जाता है। ये घटिया हरकत करता है एक पत्रकार। हो सकता है केंद्र में बैठी सरकारें सीबीआई का गलत इस्तेमाल करती हों। हो सकता है जरनैल सिंह (जैरी) 84 के दंगों की फाइल को इस तरह बंद होने से दुखी हो। जगदीश टाइटलर, सज्जन कुमार जैसों को सजा न मिलने से भावुक हों ,यह भी माना जा सकता है कि कौम के साथ अन्याय से उसका सीना छलनी हो। यह भी माना जा सकता है कि जज्बात पर उसका काबू न रहा हो। साथ ही यह भी हो सकता है जैरी आईने में खुद को इराकी पत्रकार जैदी की तरह नायक दिखने की चाह रखता हो और पी चिदंबरम को जार्ज बुश की तरह खलनायक की श्रेणी में दिखाने की। लेकिन यह कौन सा तरीका है -दर्द दूर करने का, एतराज जताने का,कौम की फिक्र दर्शाने का, नायक बनने और दूसरे को खलनायक बनाने का, देश को फिर अलगाव की राह पर धकेलने का? आखिर जरनैल सिंह को ये अधिकार किसने दिया कि वह सारी पत्रकार बिरादरी की नाक कटवाए? पत्रकारिता पर कालिख पोतने का काम करे? पत्रकारिता की थीम की बीम को ही हिला डाले? लोकतांत्रिक देश में एक आम आदमी अगर अपने गुस्से का इजहार इस तरह करे तो उसे भी जायज नहीं ठहराया जा सकता, फिर एक पत्रकार द्वारा ऐसी करनी किसी भी सूरत में सही कैसे मानी जा सकती है? यह जूता किसी होम मिनिस्टर पर नहीं पड़ा है। हकीकत यही है कि यह जूता उस सारी पत्रकार बिरादरी पर पड़ा है जिसके एक बड़े धड़े ने इस जन कल्याण के मिशन को पहले ही काजल की कोठरी में बदल दिया है। यह जूता उस भारतीय पत्रकारिता के चेहरे पर पड़ा है जो पहले ही अफसरों, माफियाओं ,नेताओं, मंत्रियों, दलालों,हत्यारों के घर की बांदी बने तमाम पत्रकारों की करनी की पीड़ा से बदरंग है। अब सवाल यह भी उठ खड़ा है कि क्या कलम की जगह जूते ने ले ली है? अगर ऐसा है तो पत्रकारों को इस बात के लिए अब तैयार रहना चाहिए कि बरसों से उनकी करनी से त्रस्त जनता के अनगिनत जूते इस बिरादरी पर पड़ने ही वाले हैं। अगर कलम की ही राह पर चलना है तो सारी पत्रकार बिरादरी के मुखियाओं के सामने लाख टके का सवाल यही है कि वह हर गली,हर नुक्कड़,हर गांव,हर कस्बे,हर शहर तक कुकुरमुत्ते की तरह फैली और ताने-बाने को लीलती इस बेल पर लगाम के बारे में न केवल सोचे बल्कि उसकी कटाई-छंटाई भी करे। जरूरत इस बात की भी है कि खुद को खुदा समझने की बजाय जमीनी हकीकत से पत्रकार अब जुड़ने की कोशिश करें। लुट-पिट और मिट चुकी जनहित की पत्रकारिता की राह पर जाने का संकल्प लें। वक्त की नजाकत यही कह रही है कि जैरी के बहाने पत्रकारिता के बैरी उन मठाधीश पत्रकारों से भी निजात पाने का समय आ गया है जिन्होंने पत्रकारिता की आन-बान-शान का सारा मान बेच खाया है, जो नेताओं व अफसरों के दलालों और दलों के कार्यकर्ताओं की तरह काम करते नजर आते हैं। पत्रकारिता और खबरों को नीलाम करते नजर आते हैं। जिनकी करनी और कथनी में दोगुलेपन की कीमत सारी पत्रकार बिरादरी को भरनी पड़ रही है। पर कड़वा सच यही है कि करेगा कौन? हर प्रोफेशन के नियम-कायदे-कानून होते हैं। पत्रकारिता के भी थे और हैं। देश को आजादी दिलाने में तो पत्रकारिता कामयाब हो गई लेकिन बेलगाम सोच और माया की ख्वाहिश से रीढ़ में लोच से पत्रकारिता मोच खा गई है। वह चंद बड़े नामों से गुलामी की जंजीरों में जकड़ गई है। गुलामी नेताओं की, माफियाओं की, अफसरों की, धंधेबाजों की, दलालों की, हत्यारों की, बेईमानों की, धंधा बढ़ाने वाले मालिकों की, महल खड़ा करने वाले ढेरों संपादकों की, ढेरों करप्ट पत्रकारों की। ऐसे में पत्रकारिता कहां हैं और खबर की क्या औकात है तथा ईमानदार पत्रकारों की क्या हैसियत है इसका अंदाजा दूर से बैठकर जितना लगाया जा सकता है उससे कहीं खौफनाक और शर्मनाक हालात से पत्रकारिता और पत्रकार गुजर रहे हैं। मुंशी प्रेमचंद और पराडकर जी की राह पर चलने की चाह अब आह में बदल चुकी है। सरकार अगर हाथ डालती है तो आजादी पर कुठाराघात का रोना रोया जाता है। इंडिया गेट से लेकर गांधी जी की समाधि तक पर धरने दिए जाते हैं। बड़े-बड़े कथित नाम खबरों और तस्वीरों में और बड़े बनाए जाते हैं। चारों तरफ भूचाल आ जाता है। लगता है चौथा खम्भा उखाड़ा जा रहा है लेकिन क्या कभी किसी कथित बड़े पत्रकार ने इस हालात पर दो बोल बोले हैं कि अनेक बिरादरी भाई नेताओं,गुंडों और दलालों के घर की बांदी क्यों नजर आते हैं? क्यों धन के लालच में विज्ञापन खबरों की तरह छपने लगे हैं? एक ही पेज एक ही सीट के तीन प्रत्याशियों को जिता दिया जाता है? पैसा लेकर खबरें छाप दी जाती हैं, रोक दी जाती हैं, मोड़ दी जाती हैं। झूठ को सच और सच को झूठ की तरह रख दिया जाता है। जनता के पास कोई चारा नहीं है। चंद अखबार और पढ़ने की पुरानी आदत। हम ये नहीं कहते कि सरकार का अंकुश हो लेकिन जिस फोर्थ पोल का मोल खत्म हो चुका है, ढोल फट चुका है,गोल दग चुका है, ऐसे में इस तरह का खोल ओढ़ने के क्या मायने? अब मान लेना चाहिए कि अब इस प्रोफेशन की भी चाल और चरित्र राजनीति, पुलिस और अन्य बदनाम प्रोफेशन जैसा हो गया है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाय यह मंथन का समय है। पर सवाल यही है कि करेगा कौन?सरकार का अंकुश जायज नहीं है पर खुद कभी सुधरने या सुधारने के प्रयास क्यों नहीं किए जाते? लगातार पत्रकारिता की यह गंगोत्री संकरी और मैली होती जा रही है इस पर चिंतन क्यों नहीं होता? वैसे यह बहस का विषय हो सकता है कि इस पवित्र मिशन को खराब करने की शुरूआत कहां से हुई? घटिया नेताओं व बेईमान अफसरों की तरफ से या फिर निज हित में डूबे चंद अखबार मालिकों और उनकी शह पर महल खड़ा करने वाले बड़े पत्रकारों की तरफ से। या फिर दोनों ओर के फायदे से उपजी सोच की वजह से। जो भी हो आज देश में यह धारा बह निकली है। किसी भी राज्य का उदाहरण सामने रख लीजिए। कोई भी बता सकता है कि फलां अखबार और फलां पत्रकार किस राजनेता, किस अफसर और किस दल की रोटी खाते हैं? जिसकी सरकार आएगी,अफसरशाही की तर्ज पर उसकी अपनी पत्रकारों की टीम तुरंत सत्ता के गलियारों में रौब गांठती हुई नजर आएगी। अपने हितों के लिए रोजाना खबरों को उलटती-पलटती और रौंदती हुई। चुनावी दौर में उनकी और भी पौबारह रहती है। अपनों को जिताना और गैरों को हराना। हकीकत यही है कि आज देश में जनहित की पत्रकारिता हाशिए पर है। सही और सच्ची खबरों को पचाने का माद्दा सरकारों में या राजनेताओं में नहीं रह गया है। सही खबर छपी-छीछालेदर हुई-विज्ञापन बंद-पत्रकार की शामत। ऊपर तक का दबाव। ईमानदारी की राह पर चलने वाले पत्रकारों के हश्र के ढेरों उदाहरणों से भारतीय पत्रकारिता का घड़ा भरा पड़ा है और आए दिन उसमें एक-दो चेहरे टपकते रहते हैं। संपादक रूपी प्राणी या तो बेबस होता है या सबको बेबस रखता है। एक करप्ट राजनेता हो या अफसर या दो कौड़ी का माफिया मिनटों में खबरों और पत्रकारों की औकात बताकर चला जाता है। ऐसे में सही और सच्चा पत्रकार कहां ठौर पाए? कैसे उम्मीद की जाए कि इस देश में पत्रकारिता और पत्रकार पूरी तरह सही राह पर हैं? किससे आस लगाई जाए कि इस देश में फिर पत्रकारिता के असली मिशन का दौर लौटेगा? अभी हाल में एक बड़े अखबार की संपादिका महोदय ने कुछ सवाल क्षेत्रीय पत्रकारों पर खड़े किए। मठ बनाने व धंधा करने की बात कही। वास्तविकता क्या है ऐसे बड़े चेहरे बखूबी वाकिफ हैं लेकिन जनता भी वाकिफ है और पत्रकार बिरादरी भी,हां यह जरूर है कि ऐसे बड़े संपादक जो बोलते हैं, जो दिखाते हैं वह इसलिए ज्यादा वजनदार होता है क्योंकि वे वजनदार कुर्सी पर बैठे हैं? हां इस मुगालते में ऐसे बड़े चेहरों को नहीं रहना चाहिए कि वे दूध के धुले हैं। कौन नहीं जानता कि चार हिंदी बहुल राज्यों में कथित बढ़े अखबारों के ढेरों संपादकों ने किस तरह अखबार और पत्रकारिता की आड़ में करोड़ों रूपए की संपत्ति खड़ी कर ली? किस संपादक की वजह से एक महिला पत्रकार ने जहर खाकर जान दे दी? किस संपादक ने अपनी बेटी की शादी राजनेताओं की काली कमाई से कर डाली? कश्मीर से कन्याकुमारी तक नैतिकता की बात करने वाले बड़े पत्रकार किस तरह कंबल ओढ़कर घी पी रहे हैं यह सबको पता है। अगर किसी सरकारी एजेंसी से जांच हो जाए तो यकीन मानिए हमाम में ऐसे-ऐसे चेहरे नंगे नजर आएंगे जो राजनीतिक दलों से सांठगांठ कर वहां तक पहुंचे और वहां पहुंचते ही नैतिकता के आवरण को ओढ़कर जातिवाद,क्षेत्रवाद,दलवाद और भाई-भतीजावाद चलाने लगे। जब तक ऐसे चेहरे मैदान में कप्तानी कर रहे हैं तो कैसे हम यकीन करें कि पत्रकारिता सही राह पर है और इसके सिपाही नया जमाना लाएँगे?जरनैल सिंह भी इसी धारा में बहता हुआ एक चेहरा है। आए दिन की दिक्कतों को झेलने वाला पत्रकार। लेकिन इस बात पर किसी की कोई असहमति नहीं होनी चाहिए कि उसने जो किया वह गलत है। इराक और जैदी के हालात से सिखों और जरनैल की तुलना नहीं की जा सकती। वह एक घमंडी शासक पर फैंका गया जूता था। वहां कोई कायदा-कानून नहीं है। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां कानून का राज है। एक पूरी बिरादरी किसी फैसले से मर्माहत हो सकती है लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह कानून को अपने हाथ में ले और देश को फिर 80 के दशक के हालात में ले जाकर खड़ा कर दे। वह भी उस स्थिति में जब अभी तक कोर्ट ने अपना फैसला नहीं सुनाया है। हरकत पर अफसोस तक न जताना और शिरोमणि अकाली दल की ओर से कायरता को बहादुरी बताना और दो लाख के इनाम का एलान करना और भी ज्यादा शर्मनाक है। क्या जगदीश टाइटलर को सीबीआई की क्लीन चिट से उपजे घाव पर मरहम की कीमत दो लाख है? किसी को जूता मारने से क्या दर्द कम हो जाएगा? भरत में सबको आजादी है लेकिन आजादी का मतलब यह नहीं है कि हम कलम की बजाय जूते हाथ में लेकर घूमते नजर आए। यह काम नेता करते आए हैं। जनता पत्रकार बिरादरी से आस लगाए बैठी है कि वो नेताओं की इस जूता कल्चर पर लगाम कसेगी अगर हम भी उसी राह पर जाएंगे तो फिर इस देश में लोकतंत्र के क्या मायने? हममें और मवाली टाइप के नेताओं में क्या अंतर?अगर किसी पत्रकार को जूता ही चलाने का शौक है तो पहले वो कलम छोड़े-फिर जूता हाथ में ले। या हराम की कमाई से जूते की दुकान खोले। जिसे चाहे-जिस नंबर का चाहे-जब चाहे उठाए और दाग डाले। जरनैल सिंह को अगर कौम का दर्द था तो वह कलम त्यागकर वहां जाते। ऐसी हरकत करते। कानून फिर अपना काम करता। जरनैल सिंह को कांग्रेस ने माफ कर दिया है। चिदंबरम ने माफ कर दिया है लेकिन पत्रकारिता कभी माफ नहीं करेगी। ऐसे पत्रकारों की इस प्रोफेशन में न कोई जगह थी न है और न ही होनी चाहिए। आज की इस शर्मसार हरकत से पत्रकार बिरादरी भी नेताओं की उसी लाइन में खड़ी हो गई है जिससे जनता का भरोसा डिग चुका है। आगे से हो सकता है कि पत्रकारों के जूते बाहर उतरवाए जाएं। कलम ले जाने पर बैन लग जाए। कपड़ों की सारी तलाशी होने लगे। नेताओं पर पत्रकारों के बीच में शीशे की दीवार खड़ी होने लगे। क्या ऐसी ही पत्रकारिता करना चाहते हैं हम? अगर ऐसा है तो फिर जनता को यह आस छोड़ देनी चाहिए कि यह चौथा पोल अपना सही रोल प्ले करेगा। अगर जरनैल सिंह के बहाने पत्रकारिता फिर से सही ट्रेक पर आ जाए तो हो सकता है इस पत्रकार को इतिहास बदलने वालों में शामिल कर लिया जाए। कुछ भी हो पत्रकारिता और ईमानदार पत्रकारों के चेहरों पर पड़ने वाले जूतों की गूंज ने जितना दर्द दिया है उससे कहीं ज्यादा इस जूते की पीड़ा दिल को सालती रहेगी, इसमें कोई शक नहीं। खुदा करे-कुछ बदलाव आए,आने वाली पीढ़ी को सही राह मिले। गांधी के देश में गांधीवादी चेहरे दिखें। जूता मारने वाले नहीं।

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