देशपाल सिंह पंवार
फिलहाल सारा देश उम्मीद के सहारे चल रहा है। बाजार आर्थिक मंदी जल्द दूर होने की उम्मीद कर रहा है। युवा वर्ग रोजगार की उम्मीद कर रहा है। जिनके पास रोजगार है वे ज्यादा सुविधाओं की उम्मीद लगाए बैठे हैं। जनता रोटी-कपड़ा और मकान की उम्मीद कर रही है। मजदूर अच्छी दिहाड़ी की उम्मीद कर रहा है। हर वर्ग,हर शख्स, हर घर, हर गांव, हर कस्बा, हर शहर, हर राज्य हर समय कुछ न कुछ उम्मीद कर रहा है। सारी उम्मीदें घूम फिरकर जिस गलियारे में गूंजती है वो है केंद्र सरकार का। देश की सत्ता का। जब सब उम्मीद कर रहे हैं तो फिर केंद्र सरकार ही पीछे क्यों रहे? प्रधानमंत्री भी उम्मीद कर रहे हैं कि इस वित्तीय साल में तमाम झंझावत के बावजूद देश सात फीसदी की विकास दर को हासिल करेगा। आर्थिक मंदी का उसपर असर हो रहा है लेकिन इतनी विकास दर हासिल करने में हम कामयाब होंगे। संसद के संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने आधारभू त ढांचा और सार्वजनिक क्षेत्रों के लिए अधिक संसाधनों का वादा किया। सात फीसदी की विकास दर कैसे रहेगी यह तो वे नहीं बता पाए लेकिन अगर इसके आस पास रही तो इसका तर्क उन्होंने खोज लिया है। आर्थिक मंदी की एक ऐसी छत्र छाया सरकार के पास है जिसका नाम लेकर वैतरणी पार की जा सकती है। प्रधानमंत्री ने इसके संकेत भी दिए। कहा-मैं आपसे वादा तो नहीं करता कि आर्थिक मंदी का हम पर असर नहीं पड़ेगा लेकिन हम 8-9 फीसदी की बढ़ोत्तरी दर हासिल करने में सक्षम होंगे। दुनिया की विकास दर चाहे गिर जाए पर हम सात फीसदी को हासिल करके रहेंगे। सवाल यही पैदा होता है कि क्या सरकार जनता की सारी उम्मीदों को पूरा कर पाएगी? क्या सरकार की ये उम्मीद पूरी हो पाएगी? जिस देश की आर्थिक विकास दर नौ को छू चुकी हो क्या वो सात फीसदी की दर से वे सारे सपने पूरे कर पाएगा जो जनता ने इस सरकार को चुनते समय देखे थे? इस बार वामदलों या अन्य अड़ियल सहयोगियों का दबाव भी सरकार के ऊपर नहीं है। ऐसे में अगर आर्थिक सुधारों की गाड़ी सरपट नहीं दौड़ पायी तो फिर किसका दोष? आर्थिक मंदी का असर उन देशों पर ज्यादा है जो खाने-पीने और दूसरी मूल जरूरतों के लिए दूसरों पर डिपेंड रहते हैं लेकिन हमारे साथ तो ऐसा नहीं है। यहां कोई ऐसा उत्पाद नहीं है जो यहां पैदा ना होता हो। जरूरत इसी बात की है कि सरकारी स्तर पर करप्शन खत्म हो। 100 पैसे में से 90 पैसे धरातल पर खर्च करने का समय है। डकारने का नहीं। बाजार में मुद्रा आए। साथ ही नई एग्रीकल्चर नीति बनाई जाए। अगर खेती की जमीन पर इमारतें खड़ी हो जाएंगी तो फिर उत्पादन कहां से होगा? सरकार को इस बारे में सोचना होगा। साथ ही साथ मनमोहन सिंह को ये भी दिखाना होगा कि बिना दबाव की सरकार ज्यादा बेहतर राज कर सकती है और ज्यादा बेहतर सुविधाएं जनता को मुहैया कर सकती है। जनता की उम्मीद पर खरा उतरने से ही सरकार की उम्मीद भी पूरी होगी।
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