मंगलवार, 28 जुलाई 2009

सब परेशान

देशपाल सिंह पंवार
दिल्ली आजकल गरम है वो भी सावन में। ऊपर से बारिश नहीं हो रही है-जनता परेशान है। अपनों और परायों के तीरों की जमकर बारिश हो रही है-सत्ता परेशान है। मिस्र में अचानक जिस तरह प्रधानमंत्री ने पाक से बातचीत के लिए आतंकवाद की शर्त हटाई गई और साझा बयान में बलूचिस्तान को शामिल किया गया उससे सोनिया समेत सारी कांग्रेस हैरान और परेशान है। जाहिर सी बात है कि चौतरफा फजीहत से प्रधानमंत्री सबसे ज्यादा परेशान हैं। संसद से सड़क तक वारे के बाद इसका इलाज खोजना कांग्रेस और प्रधानमंत्री दोनों की ही मजबूरी थी तो शायद खोज भी लिया गया है। कहीं से कोई विवाद ना हो इसकी हिदायत दे दी गई है और बंदोबस्त कर लिए गए हैं। सोनिया की ओर से भी अप्रत्यक्ष तौर पर कहा जा रहा है कि कहीं कोई दूरी नहीं हैं। प्रधानमंत्री ने भी साफ किया है कि सब मीडिया की उपज है। कहीं कोई दूरी नहीं हैं। पर यह सवाल तो पैदा होता है कि जो दूरी दुश्मन देश के साथ बातचीत के दौरान दिखना चाहिए था वह यहां क्यों दिख रहा है? ऐसी नौबत ही क्यों आई? सांप के निकलने के बाद लकीर पीटने की जरूरत क्यों पड़ रही है? वैसे प्रधानमंत्री कह रहे हैं कि मिस्र में जो कुछ हुआ इसके जवाब उनके पास हैं। संसद में 29 जुलाई को सरकार माकूल जवाब देगी। ऐसा कहते वक्त मनमोहन सिंह विश्वास से सराबोर नजर आ रहे थे लेकिन 29 को संसद में यह विश्वास नैया पार लगाएगा इसका विश्वास कम से कम फिलहाल कांगे्रसियों के चेहरों से तो नजर नहीं आ रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि गलती छिपाने के लिए जब अदने से इंसान के पास तर्क हो सकते हैं तो फिर ये तो सरकार है। उसे तर्क खोजने में इतनी माथापच्ची नहीं करनी पड़ेगी जितनी अपनों को इन तर्को को समझाने में। अगर अपनों के हलक के नीचे ये तर्क नहीं उतरेंगे तो फिर विपक्ष तो इसी की कमाई खाता है। अब जिस मोड़ पर सरकार खड़ी है वहां कांग्रेसियों को इन्हें हलक के नीचे तो ले जाना भी होंगा और मुस्कराना भी होगा। चाहे मन तैयार ना हो, तन तैयार ना हो, पेट अपच हो जाए। अब चाहे जो जवाब संसद में दिए जाएं, समझाने की कोशिशें की जाएं पर इस बात से कैसे इंकार किया जा सकता है कि सरकार ने इस मसले पर देश व यहां की जनता की किरकिरी तो करा ही दी है। झुकना पाकिस्तान को चाहिए था, झुके हुए हम नजर आ रहे हैं। जिस विश्वास के साथ पाकिस्तान हम पर बलूचिस्तान को लेकर वार कर रहा है, यह तो दर्शाता ही है कि हमनें कहीं न कहीं चूक कर दी है। अमेरिका हमें दुश्मन के सामने झुकाने में सफल तो हो ही गया है। बार-बार धोखा खाने के बावजूद आखिर मनमोहन सरकार कब ये समझेगी कि अमेरिका की इज्जत पाकिस्तान में दांव पर लगी है ऐसे में वो कैसे हमारे लिए पाक को घाव दे सकता है। उसे पाक का ख्याल रखना ही है। अब सारे देश को 29 जुलाई का इंतजार है। पता तो है पर देखना भी है कि मिस्र में हम कितना खोकर आए हैं?

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