
देशपाल सिंह पंवार
घटिया नेता और घटिया नेतागिरी की वजह से घाटी की जननीति भी घाटी में पहुंच गई है। अरसे से कश्मीर को कब्जाने की पाकिस्तान साजिश रचता आ रहा है। उसकी धरती से पैदा होकर आतंकवादी लगातार खून बहाते आ रहे हैं। दो लाख से ज्यादा लोग अब तक जान गंवा चुके हैं। धरती का यह स्वर्ग नरक में बदल चुका है। जनता की ना जान सुरक्षित है और ना ही ईमान। किसी तरह सांसें चल रही हैं। खटती-मरती और सिसकती जिंदगानियों को बचाने की बजाय यहां के राजनेता आतंकवादियों से भी ज्यादा खतरनाक राह पर चल पड़े हैं। आतंकवादी सीने में गोली दागते हैं, नेता बेल्ट से नीचे वार कर जनता की आखिरी आस को निराशा में बदल रहे हैं। विरोधियों को नंगा करने की मुहिम चलाने वालों में उल्लास है। दूसरों के दामन को नंगा करने का अट्टाहास है-सारा तमाशा देखकर जनता उदास है। उसे समझ में नहीं आ रहा है कि वो कहां जाए? जिन्हें उसने चुना था वे इज्जत इस तरह उछालने में जुटे हैं जैसे फिल्मों में बदनाम गलियों के सीन दोहराये जाते हैं। पीडीपी की नेता महबूबा के इशारे पर जिस तरह मुजफ्फर बेग ने मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पर सैक्स रैकेट में शामिल होने का आरोप सदन में लगाया, वो घटिया नेतागिरी का ही परिचायक है। यह चाहे राजनीति के पैमाने पर सही उतरता हो पर नैतिकता के नाते इसे सही कैसे ठहराया जा सकता है? इस तरह की बातें नेताओं ने की और ऐसे सीन दोहराने की कोशिश की जिसमें लाज-शर्म को तो बेच ही खाया साथ ही जनता को भी लज्जाया। ऐसे में टीवी चैनलों के अश्लील कार्यक्रमों को गलत कैसे ठहराया जा सकता है? जब हमारे माननीय और आदरणीय ऐसी बाजारू बोली के रूप में गोली दागेंगे तो फिर हमारे संस्कारों की तो होली ही जलेगी। पीडीपी को ये कैसे मालूम कि सैक्स कांड में उमर अब्दुल्ला शामिल थे? क्या सीबीआई की ओर से ऐसे कागजात उसे मिले थे? जिस समय ये कांड हुआ था उस समय पीडीपी की सरकार थी, क्या उसने उमर का नाम इस सूची में जुड़वाया था? यह हो सकता है कि राजनीतिक रंजिश के चलते उसने उमर को इसमें घसीटने की साजिश की हो? गद्दी छिनने के बाद पीडीपी की बौखलाहट चरम पर है। हर हाल में वो उमर को हिलाना चाहती है। इसके लिए चाहे बेल्ट से नीचे जाना पड़े। सड़कों पर नंगई दिखानी पड़े। बहू-बेटियों की इज्जत उछालनी पड़े। मरती कौम को दांव पर लगाना पड़े। अगर इस पार्टी की नेता को लिहाज-शर्म होती तो अपने किसी साथी को उस काम के लिए नहीं उकसाती जो हमारे समाज में नैतिकता और मर्यादा की हद के पार होता है। आदमियों के लिए भी और औरत के लिए उससे भी ज्यादा। सीबीआई के इंकार के बाद भी अगर शक की कोई गुंजाइश थी तो देश का कानून है, उसके ऊपर छोड़ देना चाहिए। पर पीडीपी जिस राह पर है उससे नहीं लगता कि वो हिंदुस्तान के संविधान और कानून की इज्जत करती है। ऐसे नेताओं और पार्टियों को आखिर कब तक झेला जाएगा? क्या ये नेता आतंकवादियों से कम खतरनाक हैं? हद तो ये है कि नेशनल कांफ्रेस भी पीछे नहीं रही। उसने भी मुजफ्फर बेग पर चरित्र पतन के ऐसे गोले दागे हैं कि शर्मो हया संग सदन से सड़क तक बलात्कार होता दिखाई दे रहा है। वहां हर कमीज को दागदार बनाने की होड़ लगी है। यानि सब नकटे मिलकर नाक काटने पर तुले हैं। उनके रंग-ढंग देखकर यह सवाल जरूर खड़ा होता है कि उनमें कोई नाक वाला बचा भी है या नहीं? ये कैसे राजनेता हैं? ये कैसी राजनीति कर रहे हैं? घाटी की राजनीति घाटी में दफन क्यों नजर आ रही है? क्या जनता को इन राजनेताओं को सबक नहीं सिखाना चाहिए? सवाल यह भी पैदा होता है कि वो कैसे सिखाए? उसे सिखाने लायक इन लोगों ने छोड़ा ही कहां है। दुश्मनों के इशारों पर नाचते ये कश्मीरी नेता घटिया राजनीति में मस्त हैं। कश्मीर त्रस्त है। जनता पस्त है। लाख टके का सवाल यही है कि वहां जो हो रहा है क्या वो सिर्फ और सिर्फ कश्मीर का मसला है? क्या इससे हिंदुस्तान का कोई ताल्लुक नहीं? क्या अक्ल के अंधे, जुबान के कड़वे और दिल के काले इन राजनेताओं पर लगाम नहीं कसी जानी चाहिए? क्या इन्हें ये एहसास नहीं कराना चाहिए कि वे पाकिस्तान में नहीं हिंदुस्तान में हैं। हिंदुस्तानी हैं। जहां तहजीब की परंपरा है। जहां मर्यादा सर्वोपरि है। अब समय आ गया है कि ऐसी घटिया सोच के राजनेताओं को इस बात का एहसास कराया जाए कि उनकी मनमानी अब नहीं चलने वाली। लोकतंत्र के साथ खिलवाड़ की उनकी तलवार नहीं चलने वाली। उन्हें हिंदुस्तान के संविधान की रीत से प्रीत करनी ही होगी। उनके ये बेसुरे गीत अब बंद हो जाने चाहिएं जिनसे डरकर कश्मीर की वादियों के पक्षी भी दूसरे ठिकाने तलाश चुके हैं। सवाल यही पैदा होता है कि क्या मनमोहन सरकार ऐसा कर पाएगी? क्या उसमें इतनी हिम्मत है कि वो इन सबको बुलाकर दो टूक कह सके? क्या हमारे यहां ऐसा कोई कानून है जो उन्हें हद बता सके? आसार कम है। वोट की राजनीति की चोट के खोट से राजनीति की धारा में ये गंदी बोट यूं ही कब तक चलेगी? क्या राजनीति करने वालों के लिए अब भी कायदे-कानून नहीं बनाए जाने चाहिएं? उमर 25 की-राजनीति करने का ये कौन पैमाना हुआ? अनपढ़, जाहिल, काहिल कब तक जनता को हांकेंगे? गुंडे-बदमाश, हत्यारे, लुटेरे,बलात्कारी कब तक लोकतंत्र का चीरहरण करेंगे? अगर इन पर कोई रोक नहीं लगी तो इससे भी ज्यादा होगा। लोकतंत्र यूं ही तार-तार होगा।
क्या किया जा सकता है. इसी राजनीती की नीवं नेहरु-गाँधी ने रखी थी. जिसका एक उदाहरण नेहरु का कश्मीर के लिए अतिरिक्त रियायतें दिया जाना था. इसके अलावा नेताजी के कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने पर गाँधी जी द्वारा विरोध करना, यह सब उसी राजनीती की इन्तहा है. इसे रोकने के लिए एक और क्रांति की जरूरत है. जिसका आना तय है. क्योंकि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है. यही हमारे बड़े बुजुर्ग कहते है. जय हिंद
जवाब देंहटाएंक्या किया जा सकता है. इसी राजनीती की नीवं नेहरु-गाँधी ने रखी थी. जिसका एक उदाहरण नेहरु का कश्मीर के लिए अतिरिक्त रियायतें दिया जाना था. इसके अलावा नेताजी के कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने पर गाँधी जी द्वारा विरोध करना, यह सब उसी राजनीती की इन्तहा है. इसे रोकने के लिए एक और क्रांति की जरूरत है. जिसका आना तय है. क्योंकि भगवान के घर देर है अंधेर नहीं है. यही हमारे बड़े बुजुर्ग कहते है. जय हिंद
जवाब देंहटाएं