देशपाल सिंह पंवार
दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक सिस्टम का आज एक और सबसे बड़ा दिन है। जनादेश से परदा उठेगा। नतीजे सबको पता हैं पर निगाहें लगी हुई हैं। नेताओं की भी, जनता की भी,पड़ौसी देशों की भी और बाकी दुनिया की भी,तेज गरमी,नेताओं के झगड़े, नक्सलवाद और अपराधियों के रगड़े के बीच डेढ़ माह तक जूझते हुए जिस तरह आयोग और फोर्स ने चुनाव संपन्न कराए, वह काबिले तारीफ है। तारीफ के सबसे कम हकदार बस दो हैं- एक नेता और दूसरी जनता। नेताओं के नकारेपन से वोटर बूथ से विमुख और इससे विखंडित जनादेश (तय) की बात ढेरों को यह संतोष दे सकती है कि वो जो सोचते थे वही हुआ। लेकिन क्या यही होना चाहिए था? दस हजार करोड़ और इससे दस गुणा ज्यादा श्रम शक्ति की देश को चोट के बाद वोट का यही खोट सामने आना चाहिए था? यहां जनता का राज है। जनता ही जनार्दन है। वही तय करती है कि कौन बनेगा राजा और किसक ा बजेगा बाजा? यह भी माना जाता है कि जनता सब जानती है। कितना कोई नहीं बता पाता। ना जनता जता पाती। शायद वो भी सब नहीं जानती। ना जानना चाहती। या फिर जानकर अंजान बने रहना चाहती है। नतीजा जनता जनार्दन बस एक वाक्य नजर आता है, जिसके सहारे लोकतंत्र की बीन बज रही है। अगर जनता का राज है तो फिर ऐसा क्यों है? क्या जनता ऐसा ही राज चाहती है? क्या जनता फटेहाल ही रहना चाहती है? अगर सब जानती है तो फिर वो अच्छों को क्यों नहीं जिताती? पूर्ण बहुमत किसी को क्यों नहीं देती? अपराधियों का सफाया क्यों नहीं करती? दल-बदलुओं को सबक क्यों नहीं सिखाती? राजनीति से करप्ट चेहरों को बाहर क्यों नहीं करती? हकीकत यही है कि वो बस एक वोटर है। इस चाल में शामिल है। वोट दिया काम खत्म। उसके वोट से संख्या बनती है। जिनको आज चुनेगी पीएम बनाना अब उनका जिम्मा। वो जिस तरीके से चुनेंगे यह दिखने लगा है। गठजोड़ की राजनीति और राजनीति के गठ जोड़ जिस तरह चुनाव से पहले खुलते और नतीजों के दौरान बनते हैं वह हैरतअंगेज है। जिन्हें कोस-कोसकर दल वोट की गुहार लगाते हैं। संख्या बल जुटाने के वास्ते उन्हीं के हाथों में हाथ डालकर अब यह जताने लगे हैं कि हम एक हैं, हम करेंगे राज। हमें दो ताज। गाज गिरेगी जनता पर। वो जिसे हितैषी मानती है और जिसके खिलाफ वोट देती है, उनकी अचानक दोस्ती धीरे से जोर का झटका दे जाती है। वो देखती चली जाती है। ये क्या हुआ बोलती चली जाती है। क्यों हुआ सोचती रह जाती है। नतीजे आज कुछ •भी हों यहां नेताओं की मदमस्त चाल है। जनता हलाल है। लोकतंत्र बेहाल है। देश लाल है। फिर ये कैसा जनता का राज? जहां राजा (जनता) कंगाल और नेता मालामाल। फन से भी ,मन से भी -धन से भी -गन से भी और जन से •भी, जनता के पास ना तो धन ना ही गन। है तो सिर्फ कंगाल तन। जब तक उसमें जान है- नेताओं का मस्त जहान है। तो आज देखिए और आज के नतीजों के बाद फिर जल्दी ही देखिएगा इस ना खत्म होने वाली फिल्म को-जहां हर पल, हर सीन में एक साथ कहीं खुशी-कहीं तमाम गम है। इसके बावजूद नेता और जनता हमकदम है। है ना हैरत की बात।
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