
देशपाल सिंह पंवार
राजनीति में जितने अपने दम पर उम्दा पारी खेलते हैं उससे कहीं ज्यादा परिवार की बनाई विकेट पर बल्लेबाजी करते नजर आते हैं। इसके बावजूद अजीब सी विडंबना है कि बिना किसी बड़े नाम के सहारे अपनी मेहनत से उबड़-खाबड़ विकेट पर खेलने वाले नेता शतक ठोंक जाते हैं, लंबी पारी खेलते हैं, और जिन्हें खैरात में बाप या खानदान की विरासत मिलती है वो उसे डुबोते चले जाते हैं। 2-4 रन बनाकर भी इस तरह शो करते हैं जैसे उन्होंने मैदान मार लिया हो। जैसे वही सबसे बड़े नेता हों। जैसे वही जनता की नब्ज को पहचानते हों। जैसे वही देश या देश की राजनीति को चलाते हों। किसी का भी उदाहरण देख लीजिए -राजनीति में किसी औलाद ने बाप की सौंपी इमारत में कदापि एक और ईंट का इजाफा नहीं किया। यह नेता भी ऐसी ही औलादों में से एक है। इसके पिता यूं तो राष्ट्रीय नेता थे और सारे हिंदी बाहुल्य राज्यों में उनका नाम भी था और सम्मान भी पर फिर भी उस दौर के ज्यादातर विरोधी जाटनेता कहकर उनका कद छोटा करने की असफल कोशिश करते रहते थे। जिस दौर में इस बीमार बाप ने अपने इस काबिल (?) बेटे को अपनी सल्तनत सौंपी थी तब घर उजड़ा हुआ नहीं था। जाना-पहचाना दल था। हमदर्दी की लहर भी संग थी लेकिन समय बीतता गया ना वो पार्टी रही, ना वो बाप के हुक्म के ताबेदार रहे, ना वो लहर रही और ना वो बात रही। कारण बाप-बेटे की सोच व करनी में जबरदस्त अंतर। पिता मूल्यों की राजनीति करते थे-बेटा गद्दी की राजनीति करता है। पिता सिद्धांत पर चलते थे-बेटा अवसरवाद की राह पर। पिता के लिए जनता सबसे बड़ी दौलत रही-बेटे के लिए दौलत के आगे जनता गौण रही। पिता की ईमानदारी की मिसाल दी जाती हैं-बेटे की चाल-ढ़ाल पर चटखारे लिए जाते हैं। पिता ने अपने दम पर राजपाट खड़ा किया, ढेरों को नेता बनाया, कुनबा मजबूत बनाया- बेटे ने राजपाट लुटाया,अपनों को भी गैर बनाया, ढेरों को बाहर का रास्ता दिखाया। पिता ने कभी सिर्फ जाटों की राजनीति नहीं की-बेटा कभी जाटलैंड से बाहर नहीं निकल पाया। पिता को वोट के साथ नोट भी मिलते थे -बेटे को वोट के लिए धक्के खाने पड़ रहे हैं। बाप के कारनामें गिनाने पड़ रहे हैं। पिता पीएम की गद्दी तक पहुंचे-बेटा सीएम की सीट तक को तरसता रहा? इसमें कोई दो राय नहीं कि पिता का नाम बड़ा होने के फायदे •भी हैं और नुकसान भी, लोग बेटे में बाप की छवि तलाशने लगते हैं। अगर वो नजर नहीं आती तो तरह-तरह की बातें करने लगते हैं। निराश होने लगते हैं और अंत में पाला बदलने लगते हैं। चौधरी चरण सिंह के इस बेटे से सबको आस थी। पर एक बात उसकी समझ से परे रही -जनता को कंप्यूटर और राजनीति को इंजीनियरिंग की पढ़ाई की तरह नहीं चलाया जा सकता। उस धंधे के उपकरणों में इमोशन नहीं होते और यहां इमोशन बिना राजनीति नहीं होती, इमोशन बिना जनता पीछे नहीं चलती। इतिहास गवाह है कि पिता की सोच के ठीक विपरीत बेटे ने कोई ऐसा दल नहीं छोड़ा जिससे हाथ ना मिलाया हो। डील ना की हो। राजनीति में कदम रखते ही मुलायम से पंगा हुआ तो अरसे बाद उसके साथ मिलकर सरकार बनाई। कांग्रेस से जन्मजात पंगा रहा पर न केवल उसका साथ दिया बल्कि हाथ के निशान पर ही चुनाव तक लड़ा। बीजेपी ने उसे हराया तो उसके साथ केंद्र और यूपी की राजनीति की। मायावती के साथ ऐंठा रहा तो एक दिन यूपी में साथ बैठा मिला। कोई और दल बचा होता तो शायद वहां •भी जरूर दिखाई देता। इस बार आम चुनाव से पहले का सीन देख लीजिए। सीटों के समझौते की बात यूपीए से चल रही थी और वो एनडीए में बैठा नजर आया। हो सकता है चुनाव बाद वहां नजर आए जहां सरकार बन रही हो और उसकी 2-3 सीटों की जरूरत हो। कम से कम पिता ने तो कभी ऐसी राजनीति नहीं की यही कारण है कि उनका नाम अदब से लिया जाता है। जहां सत्ता-वहां बेटा ये सब तो जनता देख ही रही है।
चौधरी अजित सिंह
0-उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला और उसके गांव बदोला में 12 फरवरी,1949 को जन्म। पिता चौधरी चरण सिंह देश के चुनींदा राजनेताओं में से एक। प्रधानमंत्री रहे। मां गायत्री देवी भी एक बड़ा नाम। पत्नी राधिका देवी। एक बेटा जयंत जो राजनीति में है। दो बेटियां। लखनऊ विश्वविद्यालय, आई आई टी खड़गपुर से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। एग्रीकल्चर और आधुनिक तकनीक में खास रूचि थी। फिर अमरीका में नौकरी करने चला गया। अमरीकी कंप्यूटर इंडस्ट्री में 17 साल सेवा दी। 1985 के बाद उस समय स्वदेश लौटा जब चौधरी चरण सिंह बीमार पड़ गए। पिता की पार्टी लोकदल की कमान थामी। उत्तर प्रदेश से पहली बार 1986 में उच्च सदन में। मुलायम सिंह यादव से टकराव। नतीजा लोकदल में टूट। लोकदल अजित का 87 में जन्म। एक साल बाद डील के तहत इस पार्टी का जनता पार्टी में विलय। पार्टी अध्यक्ष की गद्दी। फिर जनता पार्टी से जनता दल का गठन। महासचिव बने। 89-90 में वीपी सिंह की सयुंक्त मोरचा सरकार में उद्योग मंत्री। पार्टी पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सिमटी रही। 89 और 91 में फिर बागपत सीट से सांसद बनें। 91 में नरसिंह राव सत्ता में आए। टर्म के आखिर में सरकार बचाने के लिए अजित सिंह राव के साथ खड़े हो गए। कांग्रेस में शामिल। 95-96 में खाद्य मंत्री बने। 96 में कांग्रेस के टिकट पर फिर बागपत से सांसद। कांग्रेस और सांसद पद से इस्तीफा। बीकेकेपी खड़ी की। उसी के टिकट पर उपचुनाव जीता। 98 में बीजेपी के सोमपाल शास्त्री से बागपत सीट पर करारी हार। चौधरी चरण सिंह समर्थकों को गहरा झटका। राष्ट्रीय लोकदल का गठन। 99 में हार का बदला चुकाया। 2001 में बीजेपी से हाथ मिलाया। अटल सरकार में एग्रीकल्चर मिनिस्टर बने। फिर 03 में बीजेपी व बसपा गठजोड़ में यूपी में शामिल। कुछ दिन बाद ही गठजोड़ टूटा। मुलायम यूपी में सत्ता में आए। उनके साथ ०7 तक रहे। इस बार आम चुनाव से पहले यूपीए में जाते-जाते एनडीए में आ गए। बागपत से फिर सोमपाल शास्त्री सामने।
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