मंगलवार, 5 मई 2009

नेपाल की बिगड़ी चाल



देशपाल सिंह पंवार
डर तो उसी दिन सताने लगा था जिस दिन नेपाल में माओवादी सरकार सत्ता में आई थी। हथियारों के बल पर जनता को डराने, धमकाने, लूटने और मारने वालों ने लोकतंत्र के नाम पर जब और जिस अंदाज में गद्दी हथियाई थी, उसी समय अंदाजा था कि ये जनमत (?) जल्दी ही गुल खिलाएगा। सरकार के मुखिया पुष्प कमल दहल प्रचंड की जिद से नेपाल फिर लाल है। बेढंगी चाल है। लोकतंत्र हलाल है। अब तक जनता, सेना और पुलिस का खून बहाने वाले माओवादियों को प्रचंड फौज में देखना चाहते थे। उनका ये दबाव और फैसला सेनाप्रमुख आर कटवाल को नहीं सुहाया था। सेना प्रमुख का सही कदम प्रचंड को नहीं सुहाया था। अरसे से चल रही टकराहट का अंदाज जनता को नहीं सुहाया था। प्रचंड ने सोमवार को जब कटवाल को बर्खास्त कर अपने चहेते जनरल कुल बहादुर खड़के को कमान सौंपने का फरमान सुनाया तो यह फैसला न कटवाल को सुहाया न सहयोगी दलों को सुहाया और न ही सेना के सर्वोच्च मुखिया राष्ट्रपति को सुहाया। न कटवाल झुकने को तैयार, न प्रचंड फैसला वापस लेने को तैयार, न सहयोगी उन्हें समर्थन देने को तैयार और न ही राष्ट्रपति प्रचंड के तुगलकी फरमान पर साइन करने को तैयार। नतीजा-देश में असाधारण संवैधानिक संकट। प्रचंड ने इस्तीफा दे दिया है लेकिन इसे सीधे-सीधे माओवादियों की धमकी माना जा रहा है। नेपाल पर माओवादियों की बंदूकें फिर तन गई हैं। खून-खराबे की स्थिति बन गई है। वैसे भी कड़वा सच यही है कि जिन हाथों को खून बहाने की आदत हो वे हाथ सबको साथ लेकर नहीं चल सकते, सबके साथ नहीं चल सकते। प्रचंड इसी स्थिति में हैं। काठमांडू में हिंदुस्तान विरोधी फिजां फिर गरमाने लगी है। दिल्ली में इसकी तपिश बढ़ने लगी है। नेपाल के हर घटनाक्रम का सीधा असर या तो वहां की जनता पर पड़ता है या फिर हिंदुस्तान पर। हमारी चिंता वाजिब है। वह न केवल हमारा पड़ोसी देश है बल्कि सामरिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों के बीच विशेष संबंध सारी दुनिया के लिए मिसाल हैं। ये रिश्ते अरसे से चीन की आंख में खटक रहे हैं और पहले ही दिन से प्रचंड की। जैसे ही माओवादी सरकार सत्ता में आई तो वहां हिंदुस्तान के खिलाफ जहर उगलने का दौर चल पड़ा। सरकार नेपाल में ऐसा माहौल बनाना चाहती है जिससे नेपालियों के मन में हिंदुस्तान के प्रति नफरत पैदा हो जाए और विशेष संबंधों की नीति से छुटकारा पाने का मौका मिल जाए। यही प्रचंड की मंशा है और उसके आका चीन की। यह भी हकीकत है कि हिंदुस्तान विरोध के नाम पर ही माओवादी संगठन की वहां नींव पड़ी। माओवादी हमेशा यही कहते आए हैं कि नेपाल की गरीबी का मुख्य कारण कोई है तो सिर्फ हिंदुस्तान। वो हिंदुस्तान को नेपाल की हर समस्या का दोषी ठहराते हैं। प्रचंड ने भी गद्दी पर बैठते वक्त सुगौली समझौते की आड़ लेकर कहा था कि नेपाल आज •भी इस उपनिवेशवाद के अधीन है। हम हिंदुस्तान की दादागिरी को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे जबकि सच्चाई यह है कि ब्रिटिश काल में 1816 में वह समझौता हुआ था जिसमें आंशिक उपनिवेशवाद की नींव पड़ी थी पर जैसे ही हिंदुस्तान आजाद हुआ तो नेहरू सरकार ने इसे निरस्त कर दिया था। पर प्रचंड एक तरफ दिल्ली को आंख दिखाते गए और दूसरी तरफ चीन से रिश्ते बढ़ाते गए। इस स्थिति मेंअगर नेपाल चीन की गिरफ्त में आ जाता है तो दिल्ली की नींद और हराम हो जाएगी। पड़ोसी देश बांग्लादेश हो या पाकिस्तान, श्रीलंका हो या चीन सबके साथ हमारे रिश्ते अच्छे नहीं हैं। ऐसे में नेपाल और सिरदर्द बढ़ा सकता है। हिंदुस्तान वहां ऐसी सरकार चाहता है जिससे नेपाल हिंदुस्तान के करीब रहे। प्रचंड के सत्ता में रहते इसके आसार न के बराबर हैं। प्रचंड इस बात को अच्छी तरह जानते हैं। इसी कारण वे माओवादियों को सेना में शामिल कराने की जिद के अलावा चीन से बड़े पैमाने पर हथियारों की खरीद करना चाहते थे। ताजा विवाद की जड़ यह हथियार समझौता भी है। कटवाल नियम व चीन के प्रति सख्त हैं। प्रचंड के पीछे माओवादी ताकत है और इसके चलते ही वे मनमानी पर उतारू हैं और इसी गरूर में उन्होेंने इस्तीफा दे डाला है। ऐसे मेंअगर उनकी बात नहीं मानी गई तो माओवादी फिर हिंसा का रास्ता अख्तियार करेंगे। इसका डर दिखाया जा रहा है। ऐसे माहौल में राजपाट चाहे कुछ दिन राष्ट्रपति चलाएं लेकिन देश में हिंसा के अंदेशे से इंकार नहीं किया जा सकता।वैसे हिंदुस्तान के प्रति खटास पहले भी पैदा हुई हैं। महत्वपूर्ण बदलाव 1955 में राजा महेंद्र के राज से शुरू हो गए थे। हिंदुस्तान के प्रयासों से उसे संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता मिल गई थी फिर भी राजा दिल्ली की पकड़ को ढीला करने में जुट गए। नेपाल चीन के लिए भी महत्वपूर्ण है। चीन ने राजा को पटाया और समझौता कर लिया। हिंदुस्तान को यह कदम नहीं सुहाया। राजा को लग रहा था कि दिल्ली राजशाही खत्म कराने की साजिश रच रहा है जबकि हिंदुस्तान चाहता था कि वहां लोकतांत्रिक ढांचा खड़ा हो। हिंदुस्तान के प्रयासों से ही 59 में बीपी कोईराला सरकार बनी जिसे राजा ने चंद महीनों में ही बर्खास्त कर दिया। इसके बाद 62 में जब हिंदुस्तान चीन के साथ जंग लड़ रहा था तो नेपाल उससे समझौता कर रहा था, जो दिल्ली विरोधी था। चीन ने कहा था कि जब भी नेपाल पर कोई आफत आएगी तो वो नेपाल के संग मिलकर जंग लड़ेगा। साफ-साफ इशारा हिंदुस्तान की ओर था। यह सिलसिला चलता गया। उनके बेटे वीरेंद्र सिंह ने दिल्ली और चीन से समतुल्य सिद्धांत की नींव रखी। 71 में गुटनिरपेक्ष सम्मेलन में नेपाल को शांति क्षेत्र घोषित कराने की बीन बजाई गई। चीन और पाकिस्तान ने इसका समर्थन किया लेकिन भरत ने विरोध। 88 में नेपाल ने चीन से बड़े पैमाने पर हथियार खरीदे। यह 59 और 65 में भारत से हुई उस संधि का साफ उल्लंघन था जिसमें भारत की मंजूरी जरूरी थी। ऐसा नहीं हुआ। रिश्ते बेहद खराब हुए। भरत ने जरूरी वस्तुओं के निर्यात पर पाबंदी लगा दी तो वहां हालात बेहद बिगड़ गए थे। फिर हिंदुस्तान को विश्वास दिलाया गया और स्थिति सामान्य हुई। 07 में राजशाही खत्म होने तक किसी तरह दोनों देशों के रिश्ते चलते रहे जो प्रचंड के सत्ता में आने के बाद किसी तरह घिसट रहे हैं। कटवाल को न हटाने के हिंदुस्तान के सुझाव को भी जानबूझकर ठुकराया गया। नेपाल में 80 फीसदी से ज्यादा जनता हिंदू हैं जो शांति चाहती है। माओवादी सरकार से वो ऊब चुकी है। इससे बेहतर वो राजशाही को ठहराने लगी है। 21 दिसंबर,1768 को यहां राजशाही स्थापित हुई थी जो 15 जनवरी 2007 तक रही। इस दौरान यह देश हिंदू राष्ट्र रहा। पूजा-पाठ का बोलबाला रहा। नेपाली, मैथिली, और अवधी समेत 100 से ज्यादा बोली के इस देश का भविष्य क्या होगा इस पर सबकी नजरें लगी हैं। खासकर हमारी।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें