
देशपाल सिंह पंवार
इस देश पर पहला हक मुसलमानों का है-यह तकरीर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने हर चुनावी बोल में बोलते आ रहे हैं। दूसरी ओर दिल्ली में बीजेपी के प्रत्याशी बीएल शर्मा ने कहा कि यह देश हिंदुओं का है और इस पर पहला और आखिरी हक सिर्फ उन्हीं का है। बाकी को रहना है तो राम-राम जपना होगा। पहले को कोई नहीं रोकता,कोई नहीं टोकता और दूसरे पक्ष के नेता के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज हो जाती है। होनी भी चाहिए समाज में वैमनस्यता फैलाने की कोशिश पर रोक लगनी भी चाहिए। पर लाख टके का सवाल यही है कि मनमोहन सिंह जो कहें वो सही है? बीजेपी नेता जो कहें वो गलत है? क्या इन दोनों वाक्यों में समानता नहीं है? क्या एक ही तरह की ध्वनि इन दोनों वाक्यों से समाज में नहीं जाती है? क्या मनमोहन सिंह के वाक्य से समाज मजबूत होने का कहीं से भी संकेत मिलता है? अगर नहीं तो फिर इस देश के प्रधानमंत्री को बोलने से रोका क्यों नहीं जाता?उनके खिलाफ अपराध दर्ज क्यों नहीं किया जाता? इसमें कोई दो राय नहीं कि बीजेपी नेता का बयान गलत है, इस लोकतांत्रिक देश में सबको अपने धर्मो, अपने संस्कारों के साथ रहने की आजादी है और ऐसी संवैधानिक व्यवस्था तथा भाई चारे kइ अटूट मिसाल पर किसी भी चोट को हर हिंदुस्तानी गलत ही ठहराएगा। पर साथ ही साथ प्रधानमंत्री के भी बयान को कोई सही नहीं ठहरा सकता। उनके बयान से भी एक बड़े तबके को कष्ट पहुंचता है। एक कहे सही और दूसरा वही बात करे तो गलत की इस घिनौनी सोच से ही इस देश के लोकतांत्रिक ढांचे की चाल में मोच आ गई है। वैसे यह शर्म की बात है कि आजादी के 62 साल बाद तक हम इस बात का रोना रो रहे हैं कि यह देश हिंदुओं का है। यह देश मुसलमानों का है। यह देश फलां का है। आखिर यह कहने और ऐसा दिखने में हमारी जबान और सोच जबाव क्यों दे जाती है कि यह देश हम सबका है? वोट की चाह में देश को चोट देने का यह ढर्रा तुरंत बंद हो जाना चाहिए वरना 62 साल पुरानी दर्दनाक कहानी फिर दोहराई जाएगी। खासकर प्रधानमंत्री को अपने पद की गरिमा का ख्याल रखना ही चाहिए। पर इस चुनाव ने सारी गरिमाओं का खून कर दिया है। इधर ये बोल रहे हैं उधर मायावती जहर उगल रही हैं। अमर सिंह हो या संजय दत्त अगर वे कुछ कहते हैं तो उन पर मुकदमें ठोक दिए जाते हैं लेकिन जिस तरह मायावती ने मनमोहन,अटल बिहारी वाजपेयी और दूसरे नेताओं को लल्लू-पंजू और भी ना जाने किन-किन शब्दों से नंगा करने की कोशिश की क्या वो सही है? क्या उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज नहीं होनी चाहिए? क्या आयोग को उन्हें काबू में नहीं करना चाहिए? क्या उनके लिए अलग से कानून बना है? अगर ये नेता काबू में नहीं है तो फिर जनता ही कुछ करे यही सही समय है।
bahut sahi panwar sahab,shayad ab wo samay aa gaya hai jab ham sabhi deshwasiyon ko uthkar khada hone ki jaroorat hai in netaon ke khilaf jo ham deshwasiyon ko dharm,jati ke naam par bant kar apni rajneeti ki dukan chala rahe hain aur janta ki bhalai ki baten kar janta ko ulloo bana rahe hain
जवाब देंहटाएंसच तो यह है कि किसी भी राष्ट्र की अवधारणा समाज विशेष के लिए ही होती है अत: इसी तर्ज पर पाकिस्तान बना और तभी से उनके मन में एक कल्पना है कि पूरा भारत देश ही पाकिस्तान बन जाए। हद तो जब हो जाती है जब वोटो के लिए हम एक समुदाय विशेष को सारे हक देने लगते हैं और उन्हें अपना संख्या बढ़ाने का अवसर देते हैं। यही कारण है कि समय-समय पर हिन्दू नेता अपने दर्द से बिलख उठते हैं और उन्हें साम्प्रदायिक कहकर उनपर मुकदमे ठोक दिए जाते हैं। जब हमारा स्वरूप धर्मनिरपेक्ष है तब हम एक सम्प्रदाय की कैसे बात कर सकते हैं? यदि शासन तंत्र के माध्यम से ऐसी बाते आती हैं तब तो यह घोर आपत्तिजनक होना चाहिए।
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