
देशपाल सिंह पंवार
वो जमाना गुजरे ज्यादा वक्त नहीं हुआ है जब क्रिकेटर रिक्शा से चलते थे। धाबों में खाते थे। फिर •भी मन से क्रिकेट खेलते थे। इसे नफासत का खेल कहा जाता था। चलाने वाले •भी मान-मर्यादा का ख्याल रखते थे और खेलने वाले भी, अंपायर की उंगली उठने से पहले क्रीज छोड़ने का चलन था। टेस्ट क्रिकेट का बोलबाला था और उसे ही इस खेल की आत्मा या जान कहा जाता था, माना जाता था। टेस्ट क्रिकेटर होना किस्मत की बात हुआ करती थी। अगर सफल हो गए तो यकीनन जन्म दिन से लेकर हर रन और हर विकेट की गाथा नींद से ज्यादा क्रिकेट के दीवानों को जुबानी याद रहती थी। किसी तरह यह दौर 80 के दशक तक चला। पानी के बुलबुले की तरह कैरी पैकर का दौर आया। ज्यादा फर्क नहीं पड़ा पर शारजाह में अब्दुल रहमान बुखातिर ने जिस तरह पैट्रो डालर इस खेल में झोंके और इस खेल को चलाने तथा खेलने वालों को डालर की चकाचौंध में डुबोया, धीरे-धीरे ये खेल नफासत से कहीं ज्यादा कमाई की चाहत का शो बनकर रह गया। मन और तन पर धन हावी हो गया। अब एक सीजन में अदना सा क्रिकेटर इतना कमा लेता है जितना पहले 20 साल में नहीं कमा पाता था। पर जनता के दिलों पर राज उसकी कमाई होती थी। अब जेब की कमाई ज्यादा मूल्यवान हो गई है। कंपनियों को एक लगाओ-सौ पाओ का रास्ता मिला, बोर्ड चलाने वालों,मैच दिखाने वालों को तिजौरी चमकाने का जरिया मिला,खिलाड़ियों को राजकुमारों की तरह रहने और बर्ताव करने की पिच मिली-ठगा गया तो सिर्फ दर्शक और टेस्ट क्रिकेट। बाजार की आंधी ने इतनी खूबसूरती से दर्शकों को मोहा कि उन्हीं के पैसे के बल पर सबकी जय हो रही है। वो देख रहा है क्रिकेट के नाम पर तमाशा। इस दौर के सुधरने की अब कोई भी नहीं है। क्रिकेट की आत्मा टेस्ट क्रिकेट को पहले वन डे फिर डे नाइट और अब 20-20 ने ऐसा कुचल दिया है कि अब इसकी सिसकियां किसी को नजर नहीं आतीं। ना इस पर रोने वाले नजर आते और ना ही इसकी बात करने वाले। पूरे साल सांस लेने और कुछ सोचने की दर्शकों को फुरसत ही नहीं लेने दी जाती। एक चैंपियंनशिप खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। हर साल खरबों का धंधा। बाजार में जमने, बाजार से कमाने और बाजार को चलाने के लिए आज क्रिकेट से बढ़िया कोई जरिया कंपनियों को नजर नहीं आता। इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि जो बिकता है वो चलता है-फटाफट क्रिकेट पर आजकल हर बंदा मरता है की थीम का सूचकांक हर दिन बढ़ता ही जा रहा है। 20-20 विश्वकप से इसमें और इजाफा होगा। 17 दिन-27 मैच और महज 1080 ओवर का मेला। 216 देशों में सीधा प्रसारण। मात्र तीन टेस्ट के ओवरों से •भी कम का खेल पर कमाई इससे हजार गुणा ज्यादा। ऐसे में कोई क्यों ऐसी राह पर ना चले? किसी के दिल जलते हैं तो जलें। फिलहाल सबके दिलों दिमाग पर यही छाया हुआ है कि कौन जीतेगा? क्या हिंदुस्तान अपने खिताब की रक्षा कर पाएगा? या फिर हालैंड की तरह और उलटफेर होंगे? नामधारी टीमें धूल चाटती नजर आएंगी? 21 जून को लार्ड्स के मैदान में किसके सिर होगा ताज इसके बारे में चाहे कोई दावा फिलहाल ना किया जा सकता हो पर यह तय है कि जिस देश पर कंपनियों का राज होगा, कमाई से नाज होगा,उस देश का ही ऐसे मेले में सुरीला साज होगा। जहां तक इस 20-20 खेल की मूल अवधारणा का सवाल है तो इसमें फिटनेस का महत्वपूर्ण रोल है। साथ ही क्रिकेट के मूल मंत्र तुक्के का •भी बड़ा रोल है। उम्र के बंधन को कम से कम आईपीएल ने झुठलाने में मदद जरूर की है। अब यह नहीं कहा जा सकता कि केवल 30 से नीचे के ही क्रिकेटर इसमें सफल हो सकते हैं। दिमाग से ज्यादा जोश में खेलने की थीम भी काफी हद तक फ्लाप हो चुकी है। वही टीमें ज्यादा कारगर साबित होंगी जो हर ओवर में करो या मरो से ज्यादा 120 गेंदों को ध्यान में रखकर खेलेंगी। हर गेंद पर छक्के जड़ने की चाह ही जीत की असली राह नहीं है। इसमें बड़े नाम का भी ज्यादा महत्व नहीं है। क्रिकेट के जनक देश इंग्लैंड की अपनी ही धरती पर अंजान सी हालैंड की टीम के हाथों हार ने यह साबित भी कर दिया है। अगर अंग्रेज अपने खोल से बाहर रहकर खेलते तो हारने के दूर-दूर तक कोई चांस नहीं थे। क्रिस ब्राड से पूछा जाना चाहिए कि उसने हारने वाला रन ओवर थ्रो से क्यों दिया? अगर इंग्लैंड बराबर भी रहता तो बाद में पांच गेंदों के मुकाबले में जीत सकता था और टूर्नामेंट में कायम रह सकता था। अब वह आगे तभी जा सकता है जब वो पाकिस्तान को हराए और फिर हालैंड •भी पाक को हराए। इस विश्व कप में आगे और •भी उलटफेर हो सकते हैं। मौसम भी अपना रोल अदा करेगा और कई दिग्गजों से अंक छीन सकता है। ग्रुप में ए में हिंदुस्तान के साथ बांग्लादेश आगे जा सकता है बशर्ते आयरलैंड कोई कमाल ना कर जाए। ग्रुप बी में हालैंड और पाकिस्तान के चांस ज्यादा है। ग्रुप सी सबसे कठिन है। आस्ट्रेलिया, श्रीलंका और वेस्टइंडीज तीनों ही आगे जाने की हकदार हैं। वेस्टइंडीज ने आस्ट्रेलिया को रोंदकर अपने इरादे जता दिए हैं। अब दबाव में कंगारू टीम है। ग्रुप डी से न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका को ज्यादा खतरा नहीं है। स्काटलैंड से ज्यादा आस किसी को नहीं हैं। जो •भी टीम पहले दौर में एक मैच जीतेगी वह दूसरे दौर में अमूमन पहुंच जाएगी। कांटे की टक्कर दूसरे दौर से शुरू होगी। धोनी की टीम पाकिस्तान को हरा चुकी है। उससे उम्मीद हिंदुस्तानी दर्शकों को •भी है, बाजार को •भी है और विदेशी कंपनियों को भी, उनकी जय में ही सबकी जय है। फिलहाल तो क्रिकेट बेचने वालों की जय है। खेलने वालों की जय है। टीवी कंपनी की जय है। इस तमाशे से कमाई करने वाली कंपनियों की जय है। इस पर घर फूंककर तमाशा देखने वालों की भी जय है। देश की बेशकीमती श्रम शक्ति लुटाने वालों की •भी जय है। चाहे 20 के अंक को बुरे का सूचक मानने वाले ढेरों पर फिलहाल तो जय हो 20-20 की।
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