
देशपाल सिंह पंवार
किसी भी सरकार की दशा क्या रहेगी ये तो उसके कर्म और वक्त तय करता है लेकिन दिशा क्या होगी यह राष्ट्रपति के पहले संबोधन से तय हो जाता है। उसमें जिन बातों का उल्लेख होता है,विपक्षी दल,विशेषज्ञ और मीडिया उसी से सरकार की राह को ताकने और तौलने की कोशिश करते हैं। जहां तक जनता का सवाल है तो वो संबोधन से ज्यादा धरातल पर हो रहे विकास से तौलती है कि सरकार की राह सही है या गलत। यूं तो इस संबोधन की परंपरा उतनी ही पुरानी है जितना लोकतंत्र लेकिन इस बार इसे कई मायनों में इतना ही लीक से हटकर माना जा सकता है जितनी 15 वीं लोकसभा ।इस में महिलाओं का वर्चस्व है। राष्ट्रपति पद पर महिला है। लोस स्पीकर भी महिला है। सत्ताधारी दल की सुपर पर्सन भी महिला है तो ऐसे में सरकार अगर महिला हित की तमाम योजनाओं को लाना चाहती है तो इसमें कुछ हैरत की बात नहीं। जिन वादों और इरादों की झलक दी गई है वे काफी पहले ही हो जाने चाहिए थे। सौ दिन के सरकार के एजेंडे के तहत महिला आरक्षण बिल का मसला भी है। राष्ट्रपति ने इसे पास कराने की सरकार की सोच बताई है। राज्यों में भी 33 फीसदी महिला आरक्षण के लिए संविधान में संशोधन की बात की है। सवाल यही पैदा होता है कि सरकार करेगी कैसे? निचले सदन में चाहे जरूरी बहुमत हो लेकिन उच्च सदन में उसकी हालत पतली है। ऐसे में लालू प्रसाद, मुलायम सिंह और वामदल सरकार की इस मंशा को पूरा होने देंगे इस पर संदेह है। इस मसले पर आम राय बनने के आसार भी कम हैं। उच्चसदन में बहुमत तक इस मसले पर कुछ होगा मुश्किल लगता है। पंचायती और शहरी निकायों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण बिहार और छत्तीसगढ़ जैसे कई राज्य पहले ही दे चुके हैं इस पर सरकार को कोई दिक्कत नहीं आनी चाहिए। संबोधन में जिन और इरादों को बताया गया है उसमें गंगा समेत सब नदियों की सफाई, सूचना की सार्वजनिक नीति, पिछड़ा क्षेत्र अनुदान निधि, स्वैच्छिक तकनीकी कोर, सामाजिक लेखा परीक्षा प्रमुख रूप से शामिल हैं। ये ऐसे इरादे हैं जो पूरा होने के बाद ही अपना असर दिखाएंगे वरना फाइल ही मोटी करेंगे। हां तीन साल में पंचायत स्तर पर इलैक्ट्रानिक शासन व्यवस्था को अगर सरकार ने लागू कर दिया तो यह फैसला क्रांति का वाहक हो सकता है। सरकार शिक्षा पर भी चिंतित तो नजर आती है पर देखना यही है कि यशपाल समिति की सिफारिशों पर कब उच्चतर शिक्षा परिषद का गठन होगा और कब नीतियां लागू होंगी? लोकहित नीतियों के ऐलान और उन पर अमल से कहीं ज्यादा इस देश में शिक्षा पर काम करने की जरुरत है। हर शख्स शिक्षित होगा तो देश जल्दी तरक्की करेगा। संबोधन में आंतरिक सुरक्षा नीति, विदेश नीति, बेरोजगारी और आर्थिक मंदी के मुद्दों पर ज्यादा जोर न देना कई संशय खड़े करता है। लंच की इच्छा रखने वाले शख्स का पेट नींबू पानी से नहीं पट सकता सरकार को आखिर कब यह सामान्य सी बात समझ में आएगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि संबोधन में वो जोश नहीं जगाता जो जनादेश से झलका था।
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