गुरुवार, 18 जून 2009

बढ़ता डर

देशपाल सिंह पंवार
टीम इंडिया का 20-20 विश्वकप ताज खतरे मे है। वेस्टइंडीज से हारने के कारण नहीं बल्कि जिस तरह टीम (?) हारी और खेल रही है उससे तो अब सेमीफाइनल में जाने के भी लाले पड़ गए हैं। एक और हार उसका बोरिया बिस्तर बांधने के लिए काफी है। यानि अब टीम को अगर सेमीफाइनल में पहुंचना है तो बाकी दोनों मैच जीतने होंगे। टीम जीतेगी ही यह दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। वैसे •भी क्रिकेट अनिश्चितताओं का खेल है। यह थ्योरी इस लघु संस्करण में और सख्ती से लागू होती है। यानि कब-कौन, कैसे पल में मैच का नक्शा बदल दे, जीत जाए-कोई नहीं कह सकता। एक खिलाड़ी मैच छीन लेता है। वेस्टइंडीज के ब्रावो ने यही कर दिखाया। टीम इंडिया के लिए अब तक ऐसा एक खिलाड़ी इस टूर्नामेंट में कोई नहीं बन पाया। एक गलती मैच हरवा देती है-हमारी टीम अब तक हर मैच में गलती दर गलती करती जा रही है। वो लकी है कि अब तक टिकी हुई है। पर कब तक यह लाख टके का सवाल है। अगर यही चाल-ढाल और हाल रहा तो इंडियन टीम किसी भी समय हलाल हो सकती है। आज भी और 16 जून को •भी ,इसमें कोई दो राय नहीं कि जिस ग्रुप में हम है वो बेहद मजबूत है। चारों ही टीमें बेहतरीन हैं। खासकर टीम इंडिया और दक्षिण अफ्रीका को तो हर विशेषज्ञ भी खिताब का दावेदार मान रहा है। ऐसे में यह आस सबको थी कि वेस्टइंडीज और इंग्लैंड को हराकर धोनी की टीम सेमीफाइनल में प्रवेश कर लेगी । ऐसे में दक्षिण अफ्रीका से अगर हार भी गया तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पर कहावत है कि सोचा हुआ सारा हुबहू नहीं होता। धोनी की टीम वेस्टइंडीज से क्या पिटी, इंडियन जनता के सारे सपने भी बिखर गए और साथ ही आगे जाने के सारे गणित और समीकरण भी गड़बड़ा गए। अब उसे दोनों मैच जीतने होंगे। आज इंग्लैंड को भी हराना होगा और 16 को दक्षिण अफ्रीका को भी,सब जानते •ाी हैं और मानते •ाी हैं कि दक्षिण अफ्रीका कागज और मैदान दोनों जगह हर क्षेत्र में हमसे मजबूत है। ऐसे में यह मैच इस टूर्नामेंट का सबसे बड़ा मैच साबित हो सकता है। पर इससे पहले उसे इंग्लैंड से पार पानी होगी। अंग्रेज टीम कमजोर है पर इतनी •ाी कमजोर नहीं कि हलवे की तरह पेट में चली जाएगी। पीटरसन या बोपारा जैसा एक •ाी खिलाड़ी अगर चल गया तो धोनी की टीम के गले में कांटे की तरह फंस जाएगी। आज जो •ाी हारेगा वो टूर्नामेंट से बाहर हो जाएगा। सवाल यही है कि क्या अपने दर्शकों के सामने अंग्रेज टीम का मिशन यहीं खत्म हो जाएगा या विश्व चैंपियन टीम इंडिया की पोल यहीं खुल जाएगी? इंडियन दर्शक पूजा कर रहे हैं। दुआ कर रहे हैं कि टीम किसी तरह जीत जाए। आस कर रहे हैं कि उनके सपने ना टूटें पर यह विश्वास कहीं न कहीं हिला और डिगा हुआ नजर आता है। टीम पूजा से नहीं जीत सकती उसे मैदान पर अपने जौहर दिखाने होंगे। सवाल यही पैदा हो रहा है कि धोनी की टीम का यह हाल क्यों है? सब जानते हैं कि किसी •ाी क्षेत्र में कोई •ाी बेहतर नतीजा पाने के लिए कई कारक होते हैं। अगर वो सौ फीसदी अपने-अपने रोल को अदा कर रहे हैं तो फिर जीत तय है। टीम की जीत के लिए महत्वपूर्ण होती है-एकजुटता, कर गुजरने का जुनून, लक्ष्य पर अर्जुन जैसी नजर, लगन, हौसला, शानदार कप्तानी और परिस्थितियों का तुरंत फायदा उठाने का फैसला साथ ही एटीट्यूड। पर कड़वा सच यही है कि इस बार धोनी ब्रिगेड मैदान पर टीम की तरह नजर ही नहीं आती। मैदान पर खिलाड़ी तो 11 दिखते हैं पर एक वो टीम नहीं जिसके लिए धोनी ब्रिगेड जानी जाती थी। व्यक्तिगत चेहरे दिख रहे थे। विकेट गिरने पर वो घेरा नजर नहीं आता जो सौरव गांगुली के समय की देन और टीम इंडिया की सबसे बड़ी उत्साह पैदा करने वाली रणनीति बन गया था। इस टूर्नामेंट में वेस्टइंडीज से पहले तक हम किसी मजबूत टीम के खिलाफ नहीं लड़े थे। उन मैचों में टीम ने तमाम गलतियां कीं। वेस्टइंडीज के खिलाफ तो सारे ही रिकार्ड़ तोड़ दिए। विकेट पर ना रन बना पाए और ना ही मैदान पर रोक पाए। ब्रावो या सिमंस या फिर चंद्रपाल ने जहां चाहे-वहां से चौक्के उड़ाए। मैदान में क्षेत्ररक्षक नजर ही नहीं आ रहे थे। हमने मान लिया था कि गेल आउट तो टीम फतह। जब तक गेल क्रीज पर थे। मैदान में धोनी की अच्छी कप्तानी नजर आ रही थी। मैच की रणनीति नजर आ रही थी लेकिन उनके आउट होते ही पता नहीं टीम को क्या हुआ कि सारे के सारे बेदम,बेबस नजर आए। महज चार ओवरों में मैच का नक्शा ही पलट गया। इस तरह की घटिया कप्तानी, घटिया गेंदबाजी, घटिया बल्लेबाजी और घटिया क्षेत्ररक्षण के सहारे कोई टीम खिताब जीत सकती है? मैदान पर खिलाड़ियों की बाडी लेंग्वेज ऐसी लग रही थी जैसे वे मजबूरी में खेल रहे हैं। उन्हें बस मैच पूरा करना है। नतीजा सबके सामने है। आंखों पर चढ़े चश्मों का कलर शायद इतना गहरा हो गया है कि टीम को अपनी खामियां नजर नहीं आ रही हैं। वे खेलने जाते हैं या फैशन करने। एक तो हमारी गेंदबाजी की कमजोरी जगजाहिर है उपर से धोनी इस तरह हर ओवर के बाद गेंदबाज बदल रहे थे जैसे पहले ही तय हो चुका हो कि अगर सबको ओवर नहीं मिलेगा तो वो अगले मैच की कप्तानी से हटा दिए जाएंगे। सरदार मेडन ओवर फैंकते हैं। अगले में हटा दिए जाते हैं। तेज गेंदबाज एक ओवर में लय पाता है। अगला कब मिलेगा बाट जोहता रहता है। धोनी ने प्रेस कांफ्रेस में जो ये बात कही है कि वे बदल गए हैं तो वह सच ही है। वो धोनी नजर ही नहीं आ रहा है जिसकी वजह से आज वो इस मुकाम पर है। ना उसकी कप्तानी बेहतर दिख रही है, ना उसकी बल्लेबाजी बेहतर दिख रही है और ना ही उसकी वाणी संयमित है। इस टूर्नामेंट में टीम इंडिया पूरी तरह बिखरी हुई है यह मानना होगा। सहवाग प्रकरण ने भी काफी नुकसान पहुंचाया है। असंतोष की खबरों ने कहीं न कहीं टीम का माहौल खराब किया है। अगर वो चोटिल थे और उन्होंने यह बात छुपाई तो फिर बोर्ड़ उन्हें टीम होटल में क्यों रखे हुए है? सहवाग जैसे खिलाड़ियों को अपनी जिम्मेदारी का एहसास रहना ही चाहिए। वह तो भला हो युवराज का वो सही समय पर फार्म में हैं वरना लीग मैच में ही हमारा बोरिया बिस्तर बंध गया होता। जिस टीम में जज्बा ही नहीं दिखाई दे रहा हो उससे खिताब बचाने की उम्मीद महज पांच फीसदी है। इसके बावजूद अगर वो जीत गई । खिताब फिर ले आई तो इस यह करिश्मा भी होगा और क्रिकेट की अनिश्चितता की थ्योरी का एक और प्रमाण। खुदा करे वो जीत आएं। हर इंडियन यही चाहता है। (14।6.09)

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