गुरुवार, 18 जून 2009

ईरान में घमासान

देशपाल सिंह पंवार
शायद ही कदापि ईरान में राष्ट्रपति चुनाव इस तरह चर्चा में रहे हों। महमूद अहमदीनेजाद दूसरी बार राष्ट्रपति चुने गए हैं। यानि ईरान में फिर कट्टरपंथी राज है। खुमैनी की परंपरा फिर दो कदम आगे बढ़ गई है। उदारवादी व्यवस्था यानि खुले में सांस लेने की ईरानी जनता की ख्वाहिश फिर दम तोड़ गई है। अपनी इस जीत को महमूद अहमदीनेजाद आगे के सपनों को निहार रही जनता की आस का फल बता रहे हैं। वो कह रहे हैं कि सारे अधूरे मिशन पूरे किए जाएंगे। जो वादे किए गए थे वो सब पूरे होंगे। उनके ये बढ़े हुए हौसले जितने लोगों और देशों को अच्छे लग रहे हैं उससे दस गुणा ज्यादा जनता और देशों को अनिष्ट की आशंका से डरा रहे हैं। सबको लग रहा है कि अब महमूद कहीं ज्यादा निरंकुश शासक के रूप में काम करेंगे। ऐसे सब लोग उम्मीद लगा रहे थे कि उदारवादी नेता मीर हुसैन मूसावी बाजी मार लेंगे और इस क्षेत्र में भी ऐसे ही लोगों का राज होगा पर बड़े अंतर से उनकी हार ने न केवल अमरीका और उनके चहेते देशों को झटका दिया है बल्कि कट्टरपंथी मुस्लिम देशों को और ताकत भी दे दी है। परमाणु मसले पर किसी भी देश की ना सुनने वाले अहमदीनेजाद अब और ज्यादा कड़वे फैसले लेने से नहीं हिचकेंगे चाहे वो अपनी जनता और दुश्मन देश अमरीका को पसंद ना आएं। बराक ओबामा ने जो हाथ बढ़ाया था और जिस तरह मूसावी का साथ दिया था उनकी हार से मुस्लिम देशों में अपनी पैठ बढ़ाने की उनकी चाह को गहरा झटका लगा है। चंद देशों को अगर छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मुस्लिमदेश अमरीका को फूटी आंखों नहीं देखना चाहते इस नतीजे ने यह भी दिखा दिया है कि ईरान की धरती पर कट्टरपंथ को पसंद करने वाले लोग ज्यादा हैं। दरअसल जिस तरह हर मुस्लिम देश में हिंसा और अराजकता का माहौल है, उस दौर में ईरान मजबूती से झ्रखड़ा रहा। दर-दर की ठोकरें खाने से बेहतर अपने हकों की कुर्बानी देना ईरानी जनता ने ज्यादा सही माना। अगर ये देश सही राह पर होते तो शायद ईरान की जनता पर इसका असर होता। मूसावी यह बात और अपनी हार मानने को तैयार नहीं। उनका आरोप है कि जमकर धांधली हुई। मूसावी की ओर से विरोध के आह्वान पर समर्थक सड़कों पर उतर आए। यही कारण है कि तेहरान समेत देश के कई हिस्सों में तनाव फैला हुआ है। इसे तो नियंत्रण में कर लिया जाएगा पर इस जीत के बाद इस देश की बेलगाम सोच पर कैसे नियत्रंण हो पाएगा। यह देखने वाली बात होगी। महमूद ने पिछले कार्यकाल में ना तो किसी देश की बात सुनी और ना ही अमरीका जैसे देशों को घास डाली। धमकी देने की तो किसी की हिम्मत ही नहीं हुई। उल्टे ईरान इस स्थिति में था कि वो दूसरों के झगड़ों में मुखिया का रोल प्ले करे। इस बार के काल में ईरान इस राह पर ज्यादा छाती चौड़ी करके निकल सकता है। अब यह बात अमरीका को पसंद कैसे आ सकती है?

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