सोमवार, 29 जून 2009

समलैंगिकता-घनघोर अनैतिकता



देशपाल सिंह पंवार
दूसरी पारी में मनमोहन सरकार कुछ ज्यादा ही जल्दी में है। देश का हर मर्ज सौ दिन में खत्म करना चाहती है। ऐसा कर पाएगी इसके आसार तो बिल्कुल नहीं हैं हां हड़बड़ी में की जा रही घोषणाओं से नई गड़बड़ियां और मर्ज अलग से पैदा होने लगे हैं। यानि गए थे हरिभजन को और ओटन लगे कपास। शिक्षा के मुद्दे पर देश पहले से ही गरम था रही-सही कसर समलैंगिकता को कानूनी अमली जामा पहनाने की मंशा ने पूरी कर दी है। मनमोहन सरकार उस धारा 377 को खत्म करना चाहती है जिसे चंद साल पहले तक कोई नहीं जानता था। वकील तक नहीं। कोई जानता था तो इस पर बात करना नहीं चाहता था। कारण-इस पर सोचना और बोलना गंदा माना जाता था। यह भी हकीकत है कि ऐसे रिश्तों की वकालत करने वाले चाहे परदे के पीछे से कितना भी बोलते रहे हों और जायज ठहराने की कोशिश में लगे रहे हों लेकिन वे भी अपनी पहचान छिपाने पर ज्यादा जोर देते थे। अचानक सरकार को पता नहीं क्या सूझी कि वो इस धारा को खत्म करने की सोचने भी लगी और बोलने भी लगी। नतीजा घर तक में पहचान छिपाने वालों ने रविवार को दिल्ली की सड़कों को पाट दिया। ऐतिहासिक कल्चर के इस देश में ऐसा नंगा नाच ना तो कदापि किसी ने सुना और ना ही देखा। ना जाने इस कलयुग में और क्या -क्या देखना बाकी है? इसमें कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र में सबको आजादी है, पर इस आजादी का यह मतलब नहीं कि जिसकी जो मनमर्जी हो वो करने लगे। सेक्स से जुड़ीं हर बातें परदे के पीछे ही बेहतर रहती हैं लेकिन समलैंगिकता को परदे के पीछे तक जायज नहीं ठहराया जा सकता। लाख टके का सवाल यही है कि जिस देश में मंदी, गरीबी, बेरोजगारी, करप्शन, आतंकवाद, नक्सलवाद, अशिक्षा और दो वक्त की रोटी के जुगाड़ जैसे हजारों मुद्दे जनता तथा देश को निगलते जा रहे हों वहां की सरकार को क्या करना चाहिए? इन मुद्दों के खिलाफ जंग लड़नी चाहिए या नैतिक मूल्यों के पतन की राह खोलनी चाहिए? जिस सर्वशक्तिमान ने इस संसार की रचना की है, उसने आदमी और औरत को इन रिश्तों के लिए बनाया है,क्या उसकी बनाई रीत को बिगाड़ने का ठेका अब सरकार ने ले लिया है? आदमी का आदमी से रिश्ता और औरत का औरत से रिश्ता आखिर इससे घटिया सोच और क्या हो सकती है? वैसे भी इतिहास इस बात का गवाह है कि प्रकृति समेत उसकी जिस भी धारा को मोड़ने की इंसान ने कोशिश की उसका खामियाजा उठाना पड़ा। वह चाहे पानी का मसला हो या पर्यावरण का। सारे संकट और थपेड़े झेलने के बाद भी क्या हमारी आंख नहीं खुली? जिस पश्चिमी कल्चर की राह पर ये पीढ़ी जाना चाहती है क्या उन देशों के हश्र दिखाई नहीं देते? खैर वे देश जहां जाना चाहें जाएँ पर कम से कम हिंदुस्तान जैसे देश में इस तरह के रिश्तों के लिए ना तो कोई जगह थी, ना है और ना ही होनी चाहिए। हमारा देश आज तक सारी दुनिया को संस्कार-परिवार तथा प्यार का पहाड़ा पढ़ाता आया है क्या अब हमें उससे सीखने को यही एक घिनौना रास्ता मिला था। एक अरब से ज्यादा की आबादी में अगर उंगलियों पर गिने जाने लायक चेहरे इस गलत पर राह पर चले गए हैं तो उनके स्व हितों के लिए पूरे देश के सामाजिक ढांचे को कुर्बान नहीं किया जा सकता। इस तबके की अगर मति मारी गई थी तो सरकार को तो कम से कम दिमाग से काम लेना चाहिए था। आखिर वो क्यों इस तबके की सोच की तरह व्यवहार कर रही है? यह बात किसी के गले नहीं उतरने वाली। किसी भी धर्म के-किसी भी समाज के और किसी भी स्वस्थ मानसिकता के व्यक्ति के। सरकार की इस सोच पर अगर इतना विवाद खड़ा हो गया है तो सोचिए फैसला करने के बाद क्या होगा? फिलहाल हर धर्म के विद्वान भी खफा हैं और साथ ही हर धर्म को मानने वाली ज्यादातर आबादी भी, इन सिरफिरी अतृप्त, कुंठित मानसिकताओं वालों को छोड़कर। यह संवेदनशील मसले से ज्यादा पतनशील रास्ता है, अगर यह वैधानिक हुआ तो फिर घर, परिवार, समाज, राज्य और देश का क्या होगा ये फैसला लेने वालों को सोचना ही होगा। इससे ज्यादा दुखद और क्या होगा कि ऐसी सोच को खत्म करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए पर सरकार इसे बढ़ावा देने पर तुली है। लोकतंत्र में विचारों की आजादी का ये मतलब तो नहीं था कि इश्मत चुगाई की कहानी लिहाफ के अंदर से सड़कों पर खुले आम पढ़ी-देखी और बोली जाने लगे? उस समय अंग्रेज हुकूमत ने अगर इस पर मुकदमा ठोंक दिया था तो फिर मनमोहन सरकार साथ में खड़ी क्यों नजर आती है? क्या ऐसे में यह मान लिया जाए कि अंग्रेजों को इंडियन समाज की ज्यादा चिंता थी? हो सकता है कि ऐसे बिगड़ी मानसिकता के चेहरे कदापि ना सुधरें पर कम से कम मनमोहन सरकार तो अपनी सोच सुधार सकती है। उसकी जिम्मेदारी देश को बेहतर चलाने की है। उसे देश को ऐसे रास्ते पर नहीं ले जाना चाहिए जो सिर्फ बर्बादी का है। ऐसा हुआ तो क्या इसे छक्कों की सरकार पुकारना गलत होगा?

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