
देशपाल सिंह पंवार
धूमिल ने लिखा था-एक आदमी रोटी बेलता है। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है जो ना रोटी बेलता है,ना रोटी खाता है वो सिर्फ रोटी से खेलता है। मैं पूछता हूं वो तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है। ये सिर्फ शब्द नहीं हैं। सत्ता के उस चेहरे का आईना थे और हैं जो बाहर से सुंदर और अंदर से बदसूरत नजर आता था और आज भी आता है। एक बार झांकने के बाद ना तो किसी में देखने की इच्छा बचेगी ना ही हिम्मत। अभी ज्यादा अरसा नहीं बीता है जब राहुल गांधी हर गली,हर शहर और हर जगह यही कह रहे थे कि मैं तस्वीर बदलना चाहता हूं, मेरा साथ दो। जनता ने विश्वास भी किया। हाथ का साथ भी दिया पर अफसोस तस्वीर बदलने के आसार नहीं दिख रहे हैं। माना की जमीन पर बदलाव में वक्त लगता है,सरकार को मिलना भी चाहिए लेकिन यहां तो सवाल इंसान के आचार और विचार की खराबी का है। वादे के मुताबिक उसे बदलने में वक्त क्यों लगे और क्यों सरकार को चाहिए? क्या ऐसे मामलों में भी चुप्पी सही है? सत्ता के नशे में चूर एक केंद्रीय मंत्री जज को धमकाता है। एक कांग्रेसी सांसद बैंक मैनेजर को मारता है। एक पुलिस अफसर महिला की इज्जत उतारता है। एक बाबू हर सही काम के लिए गरीब से रिश्वत खाता है। ये तो वो मामले हैं जो सामने हैं इसके अलावा ना जाने कितने ऐसे और इससे भी घटिया कुकर्म कश्मीर से कन्याकुमारी तक हर घड़ी हो रहे होंगे। उनमें डरे-दबे-कुचले लोग हर घड़ी असहाय होने का रोग झेल रहे होंगे। आखिर ऐसा क्यों होता है? कौन हैं इनके लिए जिम्मेदार? कौन देगा इनका जवाब? कौन करेगा इसे ठीक? आखिर सत्ता का चेहरा और चरित्र क्यों नहीं बदलता? सरकार की आखिर यह कौन सी मजबूरी है कि वह ऐसे किसी मामले में सरकारी मुलाजिम पर तो निलंबन की गाज गिरा देती है लेकिन जैसे ही माननीय जनप्रतिनिधियों की बारी आती है उसकी आंखें बंद नजर आती हैं और मुंह से बोल नहीं निकलता। खासकर तब जब कोई अपना सामने हो तो फिर सारे मामलों में विरोधियों का खेल नजर आने लगता है। अगर देश में एक समान कानून है और जनप्रतिनिधियों के लिए अलग से आचार संहिता है तो उसका पालन क्यों नहीं होता? सरकार उस पर कार्रवाई क्यों नहीं करती? राहुल गांधी जैसे युवा और प्रगतिशील विचारों के शख्स के हाथों में अगर अघोषित रूप से कांग्रेस की बागडोर है तो फिर हर कांग्रेसी को आखिरी हद का एहसास क्यों नहीं कराया जाता? कड़ी कार्रवाई का संदेश क्यों नहीं जाता? मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री के रहते किसी दागी चेहरे के बचाव में नहीं उसके खिलाफ कार्रवाई का सरकार का चेहरा जनता के सामने दिखना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता है तो यह हुकूमत भी हाथी के दांत की तरह कहलाएगी। अरसे बाद जनता में जो विश्वास जगा है वो अगर इस बार डिगा या टूटा तो यह कांग्रेस के लिए भी खतरनाक होगा, राजनीति के लिए भी और इस देश के लिए भी.
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