
देशपाल सिंह पंवार
या तो सरकार चलाने वालों का कदापि खेती से कोई वास्ता नहीं रहा,या फिर उनकी नजर में खेती, किसान और मजदूर का कोई वजूद नहीं। हो सकता है सत्ता में आने के बाद वो ये •भी भूल गई हो कि इस देश की 80 फीसदी आबादी खेती पर जिंदा है। हो सकता है उसे ये भी मालूम नहीं हो कि पेट्रोल और डीजल अगर महंगा होता है तो गरीब का निवाला घटता है। अगर उसका वास्ता होता,उसे पता होता तो तेल के दाम कम से कम इस समय तो नहीं बढ़ाती। इतने तो नहीं बढ़ाती। जिस देश के किसान को पहले ही मानसून की देरी ने तोड़ डाला हो। खेत सूखे पड़े हों। पिछला कर्जा चुका ना पा रहा हो।अगली फसल बो नहीं पा रहा हो। रोज आकाश को ताकते-ताकते थक गया हो। उसकी पुकार को क्या मिली-मार? जिस देश की जनता मंदी की मार झेल रही हो, मजदूर दो वक्त की रोटी की जद्दोजहद में पिस रहा हो उसे इस तरह के तोहफे(?) इस अंदाज में देने वाली सरकार को क्या जन हितैषी सरकार कहा जा सकता है? क्या यही जनता का राज है? सत्ता का ये चरित्र और चेहरा तो ऐसा ना मानने के लिए विवश कर रहा है। महीने भर से कहानी बनाई जा रही थी। कहा जा रहा था कि इंटरनेशनल मार्केट में तेल के दाम बढ़ रहे हैं। कंपनियों का घाटा बढ़ रहा है। उन्हें ही दाम तय करने की छूट मिलेगी- यानि तेल महंगा होगा। महंगा तो जून के पहले हफ्ते में ही हो जाता शुक्र मनाइए मानसून दगा दे गया। उसकी देरी और हल्ले के डर से 15-20 दिन निकल गए। जैसे ही दो बूंद पड़ी, सरकार महीनों से सोची राह पर चल पड़ी। ये भी नहीं सोचा और देखा कि अब तक देश के आधे से ज्यादा हिस्से में दो बूंद भी नहीं पड़ी। पर उसे क्या? वो जहां बैठकर जिनके फायदे के फैसले करती है वहां बारिश पिकनिक का एहसास कराती है। अजीब विडंबना है जिसके सहारे राजनेता गद्दी पर जाते हैं सबसे पहले उसे ही औकात दिखाते हैं। मनमोहन सरकार भी इसी राह पर है। उसे तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे की बैलेंस शीट नजर आ रही है लेकिन सूखे खेत,जनता के प्यासे होंठ, सूखे पेट,करोड़ों बेरोजगारों की लाइन दिखाई नहीं देती। रसोई गैस और मिट्टी के तेल पर सरकार ने रहमोकरम दिखाया और दाम ना बढ़ाने की बात को गर्व से बताया। क्या सरकार ने ये जानने की कोशिश की है कि कितने गरीबों को मिट्टी का तेल बिना ब्लैक नसीब हो पाता है? रसोई गैस का सबसे ज्यादा उपयोग करने वाली कौम कौन सी है? सरकार ने दाम बढ़ाने का ये समय जानबूझकर चुना है। वो जानती थी कि संसद में हंगामा होगा। हंगामे के बाद थोड़ा बहुत दाम घटा दिया जाएगा। इस बार भी ऐसा ही होगा। तेल कंपनियां भी खुश-सरकार भी खुश-विपक्ष भी खुश। बाकी जनता....। वो पेट नहीं खजाना पाटने के लिए है। पिसने के लिए है। लोकतंत्र में यही है धनतंत्र की चाल।
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