बुधवार, 22 जुलाई 2009

शर्मनाक-मनमोहन सरकार ने कटवाई नाक



देशपाल सिंह पंवार
यूं तो कुछ भी तर्क दिए जा सकते हैं पर जो गलती अनजाने में हो वो भूल कहलाती है। जो अति आत्मविश्वास की वजह से हो वो लापरवाही कहलाती है। जो जानबूझकर की जाए वो दादागिरी कहलाती है। भूल को माफ किया जा सकता है। लापरवाही को सुधारा जा सकता है लेकिन दादागिरी को ना तो नजरअंदाज किया जा सकता, ना माफ किया जा सकता और ना ही उसे सुधारा जा सकता। ऐसी सोच का बस एक ही इलाज होता है-औकात का एहसास कराना। सबक सिखाना। जड़ से मिटाना ताकि फिर ऐसी नौबत ना आए। विदेशों में तो अमूमन हर साल हमारी इज्जत पर हाथ डाला जाता है पर अपनी ही धरती, देश की राजधानी के एयरपोर्ट पर जिस तरह अमरीकी एयरलाइंस ने हमारी इज्जत को उछाला वह दादागिरी से भी कहीं ज्यादा बड़ा दुस्साहस है। हमारी आन-बान और शान पर इससे ज्यादा गहरी चोट क्या हो सकती है कि ना केवल हिंदुस्तान बल्कि सारी दुनिया में सबसे सम्मानीय शख्स में से एक एपीजे कलाम को एक अदनी से एयरलाइंस के कर्मचारी हमारी ही धरती पर लाइन में खड़ा कर देते हैं। कपड़ों से लेकर पर्स तक की तलाशी ले डालते हैं। जूते तक उतरवा लेते हैं। इससे ज्यादा और शर्मनाक बात क्या हो सकती है कि मौके पर कोई चूं तक नहीं करता? कोई मुंह नहीं खोलता? इससे ज्यादा दुस्साहस और क्या हो सकता है कि वह एयरलाइंस ना तो मनमोहन सरकार के नोटिस का जवाब देने की जहमत उठाती और ना ही एक अरब से ज्यादा की आबादी की भावनाओं की परवाह करती। लाख टके का सवाल यही है कि क्या यह पूरे देश का अपमान नहीं था? अगर है और मनमोहन सरकार को इस शर्मनाक हरकत के बारे में पता था तो उसने एक्शन क्यों नहीं लिया? अगर सरकार के नोटिस का जवाब सात दिन में एयरलाइंस ने नहीं दिया था तो सरकार ने अगला कदम क्यों नहीं उठाया ? आखिर तीन महीने तक सरकार खामोश क्यों बैठी रही? अपमान के कड़वे घूंट पीने और हिंदुस्तानी जनता को पिलाने वाली सरकार की चुप्पी का राज क्या था? हंगामें के बाद ही उसकी आंख क्यों खुली? क्या ऐसे में यह नहीं माना जाना चाहिए कि हम अमरीका जैसे गोरे देशों के सामने नतमस्तक हो जाते हैं? जिस देश को तहजीब और आदर सत्कार का देश कहा जाता है अगर उस देश के सबसे ज्यादा इज्जतदार शख्स की इज्जत इस तरह से सरकार करती और कराती है तो फिर सबसे बड़ा सवाल यह भी उठता है कि क्या वास्तव में हम सबसे मजबूत लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं? क्या हमें ये घमंड करने का हक है कि सारी दुनिया को राह दिखाने की विरासत में मिली जमा पूंजी हमारे पास आज भी सुरक्षित है? सवाल यह भी है कि सोनिया गांधी या राहुल गांधी के साथ ऐसे ही व्यवहार के बाद मनमोहन सरकार क्या करती? इसी तरह तीन महीने खामोश रहती या फिर तीन मिनट में सही फैसला कर डालती? पूर्व राष्ट्रपति की शांत नेचर को सब जानते हैं। आज जब देश में हर क्षेत्र में आदर्श चेहरों का संकट है तो कलाम साहब से ही आशा की आस बंधती है। देश की धरती पर शायद ही कोई ऐसा हो जो उन्हें सम्मान ना देता हो। एयरपोर्ट पर जो कुछ हुआ पहली बात उसका मलाल उन्हें हुआ नहीं होगा, हुआ होगा तो उनके चेहरे से झलका नहीं होगा। ऐसी घटनाओं पर उनका मुंह खोलना और कुछ बोलना तो नामुमकिन है। हां जिस तरह उनके अपमान की यह बात बाहर आयी, मीडिया में उछली,संसद में गूंजी उससे हिंदुस्तानियों का समय और एनर्जी बर्बाद होने का रंज उन्हें जरूर होगा। उन्होंने उसी समय दिल से निकाल दिया होगा। तब भी माफ कर दिया होगा, अब भी माफ कर देंगे और आगे भी अगर इसी तरह का कोई वाक्या होता है तो भी माफ कर देंगे। कारण ये गांधी का देश है और वे गांधी के अनुयाई है। देश के राजनेताओं और उनकी औलादों को इस महान शख्सियत से यह जरूर सीखना चाहिए कि व्यक्तित्व और व्यवहार कैसा होना चाहिए? खासकर उनको जो जरा-जरा सी बात पर आसमान सिर पर उठा लेते हैं। अफसरशाही को औकात दिखाने में जुट जाते हैं। खैर यह संस्कारों की बात है। हर कोई कलाम साहब नहीं हो सकता। कम से कम इस मामले में सरकार को भी ऐसा नहीं होना चाहिए। वैसे जिस समय जार्ज फर्नांडीज के साथ अमरीका में, सोमनाथ चटर्जी के साथ आस्ट्रेलिया में, प्रणव मुखर्जी के साथ मास्को में इस तरह की कोशिश हुई थी अगर उसी समय दिल्ली सरकार ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाती तो शायद ये नौबत नहीं आती। पर अब पानी सिर से ऊपर चला गया है। सांसदों की नाखुशी और सरकार के एक्शन के ऐलान के बावजूद जिस तरह एयरलाइंस ने जले पर नमक छिड़का और साफ कहा कि वे किसी को भी छूट नहीं देंगे उसके बाद कोई गुंजाइश नहीं बचती। हंगामें और रिपोर्ट दर्ज होने के बाद चाहे एयरलाइंस ने माफी मांग ली हो पर सरकार को इस एयरलाइंस की उड़ान तत्काल प्रभावः से रोक देनी चाहिए ताकि सब हिंदुस्तान की खामोशी को ताकत मानें कमजोरी नहीं। सबको यह एहसास कराना भी जरूरी है कि हिंदुस्तान में धंधा करना है तो दिल्ली के कायदे-कानून ही मानने होंगे अमरीका या बाकी गोरे देशों के नहीं। अगर सरकार ऐसा करती है तो यहां की जनता की आहत फीलिंग पर भी मरहम लगेगा। पर सबसे बड़ा सवाल फिर यही उभरता है कि क्या सरकार ऐसा चाहती है? क्या सरकार कर पाएगी? आसार कम हैं। उम्मीद कम है। कारण सामने एयरलाइंस उस देश की है जिसके सामने हम नतमस्तक नजर आते हैं।ताजा उदाहरण ले लीजिए-अमरीका के दबाव में हम पाकिस्तान के साथ बातचीत से आतंकवाद के मसले को हटाने पर राजी हो जाते हैं। बलूचिस्तान पर बात करने को तैयार हो जाते हैं। हिलेरी क्लिंटन आती हैं। हम पलक पांवड़े बिछा देते हैं। मुंबई कांड के मुख्य आरोपी अजमल कसाब गुनाह कबूल लेते हैं। हम अमरीका से हथियारों का ऐसा समझौता करते हैं जिसमें चित्त भी उसकी और पट भी उसकी। हम हथियार खरीदेंगे, धन भी देंगे पर वो यह देखने आएगा कि हम उन्हें कहां इस्तेमाल करेंगे? अगर कोई सरकार इस तरह किसी देश के सामने बिछी नजर आती हो तो फिर उसके लिए कलाम साहब या देश की तौहीन के मसले कितने मायने रखते हैं यह सोचनीय सवाल है? ऐसे में अब तो परमाणु करार पर भी सवाल उठने लगे हैं। जो वाजिब भी लगने लगे हैं। हथियारों के समझौते पर मानसून में संसद गरम है पर कलाम साहब की तौहीन पर अब एयरलाइंस भी नरम है और सरकार भी, माफी मांगने पर मामला खत्म। हम कटी नाक के हैं-दो चार दिन में जनता भी बिसरा जाएगी और सरकार भी, ऐसा तो होता रहता है कि हमारी सोच से आन-बान-शान की चाल में आई मोच देखने का समय ही किसके पास है? मेरा देश महान।

1 टिप्पणी:

  1. शर्म करनी चाहिये हमारी वर्तमान कांग्रेस सरकार को जो हमारे पुर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे.अब्दुल कलाम का अपमान करनें वाली अमेरिकन एयरलाइंस के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही नहीं कर सकी !

    सीताराम प्रजापति,तिहावली

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