सोमवार, 20 जुलाई 2009

नाटक के खुले फाटक-कसाब ने कबूला गुनाह

देशपाल सिंह पंवार
निर्दोष जनता का खून बहाते जिसे सारी दुनिया ने देखा हो,जो मौके से पकड़ा गया हो वह आतंकवादी 8 माह तक झूठ दर झूठ बोलता गया। अपना हाथ होने से इंकार करता चला गया। उसके आका भी उसे अपना मानने से इंकार करते चले गए। पड़ौस ने साजिश पर परदा डालने की हर कोशिश कर डाली पर कहावत है कि सच को दबाया नहीं जा सकता। वैसे इसे अमरीकी दबाव का नतीजा कहिए या गुनाह के बोझ का असर-अब जाकर उस आतंकवादी अजमल कसाब ने अपना मुंह भी खोला, कड़वा सच भी उगला, रची गई साजिश की एक-एक कड़ी को भी खोला और यह भी माना कि मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में वो भी शामिल था। उसने मुंबई में स्पेशल कोर्ट के सामने सोमवार को साफ कहा कि वह कराची से 26 नवंबर की रात को मुंबई वोट से अपने नौ साथियों के साथ पहुंचा था। कराची में विदाई देने के वास्ते लश्कर के कई आतंकी पहुंचे थे। उसने साफ किया कि जकीउर्रहमान लखवी ने पूरी साजिश रची। उसने यह भी माना कि कामा अस्पताल और छत्रपति शिवाजी टर्मिनल पर उसने फायरिंग की लेकिन वह यह झूठ बोलने से बाज नहीं आया कि उसकी गोली से कोई नहीं मरा। उसने अदालत से सजा मांगी और गुहार लगाई कि जो फैसला करना है वो हो तथा ये मुकदमा बंद हो। कसाब ने जिस तरह अचानक अपना गुनाह कबूला उसे लेकर कोर्ट में वकील भी हैरत में थे। लेकिन इसमें हैरत की कोई बात नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि उसका आका देश पाकिस्तान मान चुका है कि कसाब वहां का नागरिक है। रही-सही आस तब टूट गई जब फेडरल जांच एजेंसी ने अपनी दूसरी चार्जशीट भी दायर कर दी जिसमें साफ-साफ कहा गया है कि सारी साजिश लश्कर के मुखिया लखवी ने रची। इससे कसाब के बचने की सारी गुंजाइश ही खत्म हो गई थी। लेकिन असल कहानी कुछ और ही है। रविवार को दिल्ली में जिस तरह अमरीका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन ने साफ किया कि मुंबई पर हमला करने वालों को सजा जरूर मिलेगी उससे भी कसाब और उसके आकाओं के लिए सारे रास्ते बंद हो गए थे। सब जानते हैं कि पाकिस्तान अपना एक भी कदम अमरीका से पूछे बिना नहीं उठाता। आतंकवादियों और कट्टर तालिबानियों के मामले में जिस तरह अमरीका पाकिस्तान और अफगानिस्तान में मुंह की खा रहा है उससे किसी भी पाकिस्तानी को यह आस नहीं रह गई थी कि तमाम चालबाजियों के लिए विख्यात अमरीका इस मसले पर पाकिस्तान को शह देगा। इसे हैरत की बात कहिए या अमरीका प्लान का हिस्सा की सारा खुलासा तब हुआ है जब हिलेरी हिंदुस्तान का दौरा कर रही हैं। ऐन इसी वक्त सारा तयशुदा नाटक खेला गया। अब विपक्ष के इस आरोप में भी दम नजर आने लगा है कि मिस्र में पाक के प्रधानमंत्री से मनमोहन सिंह की मुलाकात में जिस तरह आतंकवाद का मसला दूर रहा उसके पीछे पूरी तरह अमरीका का ही दबाव था। वहां मनमोहन सिंह की खामोशी और यहां कसाब का कबूलना एक ही कड़ी का हिस्सा नजर आ रहा है। इसे हिंदुस्तान बड़ी कामयाबी मान सकता है लेकिन एक आतंकी से 8 माह तक गुनाह कबूल वाने में विफलता को अनदेखा नहीं किया जा सकता। हकीकत में यह अमरीका की कामयाबी है। हिलेरी की कामयाबी है। अब इस खुलासे के बाद देखना यही है कि पाकिस्तान लखवी जैसे आतंकवादियों को क्या सजा देता है? कसाब जैसों का क्या होता है? हो सकता है फिर अमरीका कोई दांव खेले और हिंदुस्तान की उसमें मौन सहमति हो।

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