सोमवार, 20 जुलाई 2009

फोकट में लालू हुए बदनाम



देशपाल सिंह पंवार
कहावत है कि बद से बदनाम बुरा। लालू-राबड़ी के राज से यह आम धारणा हर दिलो दिमाग पर छा गई थी कि बिहार में रहना भी मुश्किल है,जीना भी मुशकिल है तथा चलना तो और भी मुश्किल। खासकर रेल यात्रा के मामले में यह राज्य बेहद बदनाम हो चुका था। वह समय गुजरे ज्यादा दिन नहीं हुए हैं जब यहां से गुजरने वाली रेलों में चलने वाले यात्रियों के चेहरों पर खौफ की लकीरें साफ दिखाई दिया करती थी। सही सलामत बिहार निकलने पर हर यात्री चैन की सांस लिया करता था। पर अब जब आंकड़ों के रूप में पांच साल की हकीकत सामने आई है तो साफ दिखता है कि इस राज्य से गुजरना असुरक्षित तो था पर उतना नहीं जितना इसे मीडिया ने बदनाम कर दिया था। इस राज्य से कहीं ज्यादा रेल में वारदातें महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में हुईं । सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मीडिया आंखें बंद करके चलता है? अगर हां तो उसे रोकना जरूरी है या नहीं? अगर नहीं तो फिर सुनी-सुनाई बातों को फैलाने वालों को क्या सजा मिले? चलती रेल में हत्या, डकैती, चोरी,जहरखुरानी और अन्य अपराधों के मामलों में महाराष्ट्र सबसे आगे रहा। महाराष्ट्र में 2004 में जहां चलती रेल में 1314 अपराध हुए वहीं पिछले साल यह बढ़कर 1795 तक पहुंच गए। मध्यप्रदेश में स्थिति लगातार सुधरती गई। 2004 में जो संख्या थी वह लगातर घटती चली गई। जहां तक बिहार का सवाल है तो वहां इन पांच साल में डकैती की घटनाएं यकीनन सबसे ज्यादा रहीं पर अब वहां से गुजरना ज्यादा असुरक्षित नहीं माना जाना चाहिए। 2004 में यहां रेल में कुल 1184 अपराध हुए जो साल दर साल घटते जा रहे हैं और पिछले साल यह संख्या घटकर 880 रह गई। हैरत की बात यही है कि नक्सलप्रभावित राज्यों उड़ीसा और छत्तीसगढ़ में स्थिति थोड़ी बेहतर है। शायद यहां की जनता का शांतिप्रिय होना ही इसका प्रमुख कारण है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकारी आंकड़े पूरी तरह सच का आईना नहीं होते। अनगिनत मामले ऐसे होते हैं जो दर्ज ही नहीं होते। या तो रेल पुलिस उन्हें दर्ज नहीं करती या लुटा-पिटा यात्री और लुटने तथा फजीहत के डर से ज्यादा हल्ला नहीं करता या रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता। फिर भी आंकडों के रूप में जो तस्वीर सामने आई है वह खुश होने की नहीं है। अपराध चाहे बिहार में हों या महाराष्ट्र में रेल में सुरक्षित सफर करना हमेशा किला जीतना रहा है। यह चाहे कोई भी रूट क्यों ना हो? हर रेल मंत्री के लिए यह बड़ी चुनौती रहा है। ममता को भी इसका एहसास है। इसी वजह से उन्होंने रेल बजट में यात्रियों की सुरक्षा पर विशेष ध्यान देने की बात कही थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि हर रोज इधर से उधर करोड़ों यात्रियों को ले जाने वाली रेलों में वे किस तरह अपराध पर अंकुश लगा पाएंगी? सब जानते हैं कि रेलों में ज्यादातर अपराध के लिए रेल पुलिस ही जिम्मेदार होती है। क्या उसके सहारे यात्रियों की सुरक्षा की जा सकती है? रही सही कमी दागी और करप्ट रेलकर्मी पूरी करते रहते हैं। आरक्षण के नाम पर रोजाना लाखों यात्रियों की जेब रेलों में खुलेआम काटी जाती है क्या यह अपराध की श्रेणी में नहीं आता? डकैती और लूटपाट या हत्या जैसे मामलों के लिए राज्यों का सहयोग रेल मंत्रालय को लेना ही होगा। लालू के कारण अब तक यही होता आया है कि हर राज्य सारा दोष रेल पुलिस पर डालता आ रहा था, अब लालू तो हैं नहीं फिर ऐसे में रेल सफर को ममतामयी और यादगार बनाने के वास्ते ममता को ढेरों पापड़ बेलने ही होंगे। अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर लालू समर्थकों की संख्या को बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता।

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