
देशपाल सिंह पंवार
ये शख्स न राजे-रजवाड़ों में पैदा हुआ और न ही बाप-दादा की राजनीतिक विरासत में। दूसरे ढेरों नेताओं की तरह न नसीब की कमाई खाई, न विचारधारा डगमगाई और न ही दल बदल की धारा में लुटिया डुबाई। दिल में राष्ट्रप्रेम की दुहाई और कर्म की अगुवाई के सिवा किसी और चीज में न जान लगाई और न ही ऐशो आराम के लिए गुहार लगाई। धर्म के जज्बे और कर्म की इकलौती राह ने वो सब कुछ दिया जिसकी चाह हर नेता जरूर पाले रखता है। एक अंजाने से गांव के अंजाने से परिवार में पैदा इस शख्स को आज सारी दुनिया जानती है और इस नाम की वजह से उस गांव को पहचानती है। जैसा आज दिख रहा है, ऐसा बचपन भी नहीं था और जवानी भी, पर हां पूत के पांव पालने में ही नजर आ जाते हैं। मां-बाप की चाह थी, बेटा पढ़ेगा तो अपने पैरों पर खड़ा हो जाएगा, कुछ खाने-कमाने लायक हो जाएगा। बेटे की चाह पढ़ने की भी थी, कुछ बनने की भी थी और इससे ज्यादा अपने गांव, अपने समाज, अपने राज्य और अपने देश के लिए कुछ करने की भी थी। जिस उम्र में रईसों की औलाद पैसा लुटाना सीख जाती हैं उस 13 साल की उम्र में वो गांव की गलियों में संस्कारों की बात करने लगा था। संघ की शाखाओं में जाने लगा था हिंदुत्व की बात सीखने भी लगा था और थोड़ी बहुत करने भी लगा था। फिजिक्स के पढ़ाकू और हिंदुत्व के लड़ाकू की यह बैमेल सोच सबको हैरत में डालती थी पर इस नौजवान की सीखने की ललक और लीडरशिप क्षमता के सब कायल थे। दूसरे के कंधों पर पैर रखकर आगे बढ़ने या एक ही छलांग में सारी जमीन नापने की बजाय एक-एक कदम आगे बढ़ने की सही राह को चुना। आम आदमी से जुड़ाव होता गया,कारवां बढ़ता गया। राजनीति के परिवारवाद को अगर छोड़ दें तो कहीं 26 साल की उम्र में किसी को विधायक बनते देखा है। जातिवाद की राजनीति और दिग्गजों की मौजूदगी के बावजूद अपनी जगह बनाई। उस स्थिति में जब अंदर और बाहर बर्दाश्त करने वालों की संख्या बेहद कम थी। यूपी बीजेपी में एक से एक महारथी थे। ढेरों इन बरगदों की छाया में ही सूखते चले गए लेकिन कर्म के धनी इस शख्स ने शुरू से ही अपना कद ऐसा बनाया कि मिटाने की कोशिश करने वाले खुद किनारे लगते गए। यह भी सच है कि यूपी को छोड़ अगर किसी दूसरे राज्य से वो होते तो इस मुकाम तक पहुंचने के लिए इतनी जद्दोजहद न करनी पड़ती। पर ये क्या कम है कि जिस गद्दी पर चौधरी चरण सिंह जैसे नेता रहे हों वहां तक वे पहुंचे। ये क्या कम है कि उन्हें तमाम महारथियों के बीच उस गद्दी पर बैठाया गया जिस पर एल के आडवाणी थे। ये क्या कम है कि वे उस दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने जो सबसे पुराने दल को टक्कर भी दे रहा है, ताज भी छीन रहा है,जिसके बिना आज हिंदुस्तान की राजनीति की कल्पना नहीं की जा सकती, जिसके सहारे और जिसे कोसकर ढेरों क्षेत्रीय दल अपनी दुकान चला रहे हैं। पर हां इस कद को देखते हुए उनकी कप्तानी में लड़ी गई जंग के नतीजे जरूर अब तक कमतर हैं। उनके सामने अंदर और बाहर से ढेरों चुनौतियां हैं। जिन बड़ों के बीच रहते हुए वे बड़े बनें उनकी अपेक्षा पूरी करना आसान नहीं। जो उनकी तरह बड़ा बनना चाहते हैं उन पर लगाम कसना आसान नहीं। बिखरते कुनबे को मजबूत करना आसान नहीं। इस बार की चुनावी जंग में ढेरों सेनाओं से मुकाबला आसान नहीं। फतह आसान नहीं। ऊपर से अटल बिहारी वाजपेयी जैसे करिश्माई नेता का साथ नहीं। ऐसे में जीवन की इस सबसे बड़ी परीक्षा में अगर वो पास हुए तो देश की राजनीति के साथ-साथ बीजेपी के भी असली नाथ कहलाएंगे। यही उनकी तमन्ना है पर सब वोटर की इच्छा पर है। वक्त की इच्छा पर है। नसीब की मर्जी पर है। भले ही यह शख्स नसीब को ना मानता हो।
राजनाथ सिंह
0-वाराणसी: चंदौली जिला, चकिया तहसील का एक छोटा सा भ्भोरा गांव-10 जुलाई 1951 को एक साधारण किसान परिवार में जन्म। पिता रामबदन सिंह, माता-गुजराती देवी। गोरखपुर विवि से प्रथम श्रेणी में फिजिक्स में एमएससी। लेखन, राजनीति और समाज सेवा में रूचि। के बी पोस्ट्ग्रेजुएट कालेज मिर्जापुर में 1971 में फिजिक्स के लेक्चरर। यूपी में बेरोजगारी का निदान किताब लिखी।0-संघ,राष्ट्रीय सेवक समिति,जनसंघ, बीजेपी, विश्व हिंदु परिषद, बजरंग दल,एबीवीपी, राष्ट्रीय सिख संगत, मजदूर संघ,हिंदु मुनानी, हिंदु स्वयं सेवक संघ, स्वदेशी जागरण मंच, दुर्गा वाहिनी, किसान संघ, वाराणसी कल्याण आश्रम से जुड़ाव, शिवसेना,रामराज्य परिषद।0-विचारधारा-हिंदु राष्ट्र, हिंदुत्व, अखंड हिंदुस्तान, समान नागरिक अधिकार, राम मंदिर निर्माण का संकल्प। लगातार एक ही गोल पर आगे बढ़ते रहने का जज्बा। 0-13 साल की उम्र से संघ की ओर आकर्षित। 69-71 तक एबीवीपी गोरखपुर के संगठन सचिव। 74 में जनसंघ के मिर्जापुर इकाई के सचिव। 75 में जनसंघ के जिलाध्यक्ष। जयप्रकाश नारायण के अनुयाई। जेपी आंदोलन के जिला संयोजक नियुक्त। आंदोलन के कारण 75 में गिरफ्तार। मिर्जापुर व नैनी जेल में रखा गया। 0-मात्र 26 साल की उम्र में 77 में मिर्जापुर सीट से जीतकर एसेम्बली में। बेमिसाल लीडरशिप की क्षमता। 83 में बीजेपी के प्रदेश सचिव। 84 में यूथ विंग के प्रदेश अध्यक्ष, 88 में राष्ट्रीय अध्यक्ष। बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और विधानपरिषद के लिए निर्वाचित। 90 में बीजेपी के प्रदेश उपाध्यक्ष। 0-91 में उत्तर प्रदेश में पहली बार बीजेपी सत्ता में। कल्याण सिंह मुख्यमंत्री और राजनाथ सिंह शिक्षा मंत्री। कोर्स की किताबों में इतिहास का पुनर्लेखन, वैदिक गणित का समावेश। 94 से 2001 तक दो बार दिल्ली उच्च सदन में। उच्चसदन में पार्टी के मुख्य सचेतक। कई संसदीय समितियों के लगातार सदस्य। 97 में उत्तर प्रदेश पार्टी अध्यक्ष 0-99 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में परिवहन मंत्री। फिर एग्रिकल्चर मिनिस्टर। लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को निकालने की जिम्मेदारी। सफल।0-28 अक्टूबर 2000 से 8 मार्च 2002 तक् उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री। रामप्रकाश गुप्ता की जगह गद्दी पर। 01 में एसेम्बली उपचुनाव जीते।0-आजीवन संघ के बेहद नजदीक रहे। 2005 में जिन्ना प्रकरण पर एल के आडवाणी का पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफा। राजनाथ सिंह अध्यक्ष मनोनीत। 06 में फिर निर्विरोध पार्टी अध्यक्ष निर्वाचित। पांच राज्यों में पार्टी का खराब प्रदर्शन। निकाय चुनाव में बेहतर प्रदर्शन। 07 में यूपी में दल का निराशाजनक प्रदर्शन। 08 में छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, जम्मू आदि में शानदार प्रदर्शन। राजस्थान में हल्के से अंतर से पराजय।0-पार्टी को सबसे आगे ले जाने की तमन्ना। इस बार एनडीए की वापसी के लिए प्रयासरत। गाजियाबाद सीट से संसदीय चुनाव मैदान में।
dps
जवाब देंहटाएंdeshpal singh
जवाब देंहटाएंvery good
जवाब देंहटाएंok i am coming back
जवाब देंहटाएंok ok
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