देशपाल सिंह पंवार
जनता ने जिस जोश के साथ यूपीए या कहा जाए हाथ का साथ दिया था वो सारा जोश 10 दिन में ही ठंडा हो गया है। मंत्री पद के लिए ऐंठना, मलाईदार महकमों के लिए मुंह चढ़ाना और मनमोहन सिंह तथा सोनिया गांधी पर हर समय दबाव डालने का खेल धमाकेदार वापसी का सारा जायका बिगाड़ चुका है। हैरत तो इस बात की है कि इस खेल में तमाम कांग्रेसी भी शामिल हैं। ये वो नेता हैं जो दिन-रात गांधी परिवार के बलिदान की मिसाल देते हैं। सोनिया गांधी और राहुल गांधी की जय-जयकार करते हैं और सारी जीत का श्रेय भी उन्हें ही देते हैं लेकिन जब पद की बारी आती है तो वो भी गठजोड़ के दूसरे साथी दलों की कतार में खड़े नजर आते हैं। ये कांग्रेसी क्यों भूल जाते हैं कि सोनिया गांधी ने 2004 में प्रधानमंत्री की गद्दी को ठुकराने में 10 मिनट से ज्यादा नहीं लगाए थे। वे चाहती तो इस बार भी प्रधानमंत्री बन सकती थीं पर उन्हें पद से ज्यादा इस परिवार की गरिमा और देश की जनता का ख्याल है। हो सकता है ऐसे कांग्रेसियों की याददाश्त कमजोर हो। पांच साल पहले की बात उन्हें याद ना हो पर कम से कम राहुल गांधी की मंत्री ना बनने की बात को तो ज्यादा रात नहीं बीती हैं, क्या ये भी इन कांग्रेसियों को याद नहीं? इस मामले में तारीफ करनी होगी दिग्विजय सिंह की-मध्यप्रदेश में कांग्रेस की हार के बाद उन्होंने दस साल मंत्री पद ना लेने की जो कसम ख्रायी थी उस पर वो अडिग हैं। पर बाकी कांग्रेसियों को पद चाहिए, इसके लिए वे किसी भी सीमा तक जाने की हैंकड़ी तक दिखा रहे हैं। सत्ता की चाह के इस खेल ने मीडिया और विशेषज्ञों के उन दावों की पोल भी खोल दी है जिसमें कहा गया था कि इस जनादेश के बाद जोड़-तोड़ और गठजोड़ की राजनीति के दिन लद जाएंगे। 16 मई को नतीजों के बाद लगातार इस देश में गद्दी की जोड़-तोड़ की रोड पर ही राजकाज बहक रहा है। पदों पर इतनी फजीहत तो पांच साल पहले भी नहीं हुई थी। इस एपिसोड से इस बात का एहसास फिर होने लगा है कि दशकों का यह मर्ज देश की राजनीति से आसानी से नहीं जाने वाला। इसमें कोई दो राय नहीं कि नेतागिरी की आखिरी मंजिल ताज ही होता है लेकिन यह भी सच है कि वो सबको नहीं मिल सकता। जिस तरह की टीम बनी है उससे सीधे-सीधे यह जरूर लग रहा है कि मनमोहन सिंह को पसंद की टीम मिली है पर हकीकत यही है कि दबाव की राजनीति के माहिर खिलाड़ी कितना कप्तान को सपोर्ट करेंगे यह देखने वाली बात होगी? उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों को ज्यादा प्रतिनिधित्व ना मिलना भी आने वाले समय में सिरदर्द कर सकता है। दक्षिणी राज्यों का असर हिंदी राज्यों में कांग्रेस के लिएअच्छा संकेत नहीं माना जा सकता। मनमोहन सिंह की दूसरी पारी का आगाज तो ठीक नहीं हुआ है,देश हित में आगे का अंदाज बेहतर हो फिलहाल यही दुआ करना बेहतर रहेगा।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें