
देशपाल सिंह पंवार
जनादेश था खींचतान के खिलाफ, गठजोड़ की घटिया राजनीति के खिलाफ, कुशासन के खिलाफ, लूटपाट की करप्ट राजनीति के खिलाफ, अहंकारी नेताओं की मनमानी के खिलाफ,परिवारवाद की बहती धारा के खिलाफ, थके हुए चेहरों के खिलाफ,राजनीति के अपराधीकरण के खिलाफ,देश को डुबोने की साजिश के खिलाफ,बढ़ती बेरोजगारी के खिलाफ,करप्शन के खिलाफ, दुराचार के खिलाफ, अत्याचार के खिलाफ-वोट डालते समय इसके अलावा •भी न जानें क्या-क्या सपनें वोटर ने संजोये होंगे। मनमोहन सिंह जैसे ईमानदार चेहरे से मंदी की मार से निपटने की आस भी लगाई होगी। देश को सही राह पर ले जाने की चाह और •भी ज्यादा जगाई होगी। युवा पीढ़ी ने राहुल गांधी के चेहरे से •भी यह आस जरूर लगाई होगी कि वह इस पीढ़ी और इस देश के दर्द को जरूर दूर करेंगे। 16 मई को नतीजों के दिन यह आस उन लोगों में भी जरूर जगी होगी जो गिरावट की पराकाष्ठा तक पहुंची राजनीति के कारण निराश होकर वोटिंग के दिन घर में बैठे रहे होंगे। सुशासन की आस सबको थी,अब भी है लेकिन उतनी नहीं जितनी 15 दिन पहले थी। कारण कानों को तो बदलाव की आवाज सुनाई दी पर आंखों को बदलाव का अंदाज दूर-दूर तक नजर नहीं आया। 322 सांसदों के समर्थन की सरकार में पदों को लेकर अल्पमत सरकार की तरह ही खींचतान चली। बच्चों की तरह जिद्द करते और रूठकर मुंह चढ़ाते नेता नजर आए। किसी तरह जो कुनबा जुड़ा,वो ना तो सोनिया गांधी का नजर आता, ना उसमें मनमोहन सिंह की छवि नजर आती और ना ही राहुल गांधी के सपनों को पूरा करने वाली फौज के इरादों की झलक मिलती। लाख टके का सवाल यही है कि जिस फौज में परिवारवाद का बोलबाला है, एक दर्जन के आसपास दागी चेहरों हों, तमाम मोरचों पर विफल राजनेताओं का जमघट हो, पद की सबसे ज्यादा दरकार हो,अनेक नेता करप्शन के दलदल में गले तक धंसे हुए हों क्या वो फौज क्रांति कर सकती है? क्या वो फौज सुशासन के जनता के सपनों को पूरा कर सकती है? क्या वो जनता की आस में पास हो सकती है? इससे बड़ा सवाल यह भी है कि जिस फौज के जवानों की औसत आयु 57 साल हो वो फौज 20-25 साल की युवा कौम का बेड़ा पार कैसे करेगी? इस बार महज ये सब सवाल नहीं हैं। छत में सांप बताकर इन सबसे छुटकारा •भी नहीं पाया जा सकता है। जनादेश के पीछे की गहराई को सरकार को समझना होगा और उसकी मंशा को पूरा भी करना होगा। अरसे बाद जनता ने यह दिखाया है कि शरीफ लोग भी राजनीति में आ सकते हैं,कर सकते हैं। उनकी सफलता इस धारा को तेज करेगी लेकिन अगर वे हारे तो यह उनकी नहीं, जनता की नहीं, राजनीति की भी नहीं बल्कि लोकतंत्र की हार होगी। आर्थिक नीति, विदेश नीति, रक्षा नीति,व्यापार नीति, शिक्षा नीति, स्वास्थ नीति, रोजगार नीति, सुरक्षा नीति, न्याय नीति जैसे तमाम मसलों के साथ-साथ सरकार को जनता की बेहतर राज-बेहतर काज-बेहतर आज की चाह की राह को •भी और बेहतर करना ही होगा। अगर श्रीमती सोनिया गांधी यह कहती हैं कि या तो काम करो या जगह खाली करो तो वो गलत नहीं कहतीं। वो जानती है कि इस बार का जनादेश करो या मरो के लिए है। इसी वजह से सरकार ने सौ दिन का एजेंडा घोषित कर दिया है। सारे मंत्री उसे पूरा करने में जुट •भी गए हैं। धड़ाधड़ मनमोहक ऐलान करने लगे हैं। जताने लगे हैं कि वे सारी तस्वीर बदलकर रहेंगे। वे क्या और किस तरह नई तदबीर लिखेंगे यह तो समय बताएगा लेकिन मनमोहन सिंह के कुनबे की हालत को देखकर इनकी चाल-ढाल पर शंका जरूर पैदा होती है। मनमोहन सिंह की काबलियत पर शक नहीं किया जा सकता लेकिन जिस टीम की कप्तानी उन्हें मिली है उससे नतीजे सौ फीसदी आशानुरूप मिलेंगे यह दावे से नहीं कहा जा सकता। पुराने मुख्यमंत्रियों को ही ले लीजिए। अगर वीबीसिंह अपने राज्य में कांग्रेस को नहीं जिता सकते, पांच बार मुख्यमंत्री रहने के बावजूद हिमाचल का कल्याण नहीं कर सकते तो इस्पात मंत्रालय में क्या तीर मारेंगे? अगर विलासराव देशमुख मुंबई या देश की आन की रक्षा नहीं कर सकते तो फिर किस तरह हैवी उद्योग चलायेंगे? फारुक अब्दुल्ला जैसा नाम अक्षय उर्जा जैसे महकमे में क्या करेगा? एम के अड़गिरि को ना हिंदी आती और ना अंग्रेजी पर वे रसायन और उर्वरक चलायेंगे? श्रीप्रकाश जायसवाल 12 वीं पास हैं पर कोयला महकमा चला सकते हैं? दिनशा पटेल 10 वीं पास हैं पर लघु व मध्यम उद्योग महकमा चलाएंगे? ए साई प्रताप भी 12 वीं पास हैं, इस्पात महकमा चलाएंगे? मुकुल राय 12 वीं पास हैं जहाजरानी महकमा चलाएंगे? एस जगतरक्षकन दसवीं पास हैं, सूचना प्रसारण जैसा डिपार्टमेंट देखेंगे? अगर इस देश में 10 वीं और 12 वीं पास को चपरासी की नौकरी नहीं मिल सकती और वो किसी महकमे का बड़ा बाबू नहीं बन सकता तो आखिर इतने कम पढ़े-लिखे नेता किस तरह ये महकमे चला सकते हैं? सवाल यह भी है कि 80 के दशक से अब तक राजनीति में तमाम बार मुंह की खाने वाले चेहरे किस तरह जनता का कल्याण कर सकते हैं? सवाल यह भी पैदा होता है कि सरकारी नीति के तहत अगर कोई शख्स 58 या 60 साल की उम्र में फाइल का बोझ उठाने लायक नहीं रहता तो फिर वो इससे कहीं ज्यादा उम्र में किस तरह एक डिपार्टमेंट चला सकता है? क्या इस टीम के सहारे मनमोहन सिंह जनादेश की लाज रख पाएंगे? क्या ये टीम राहुल की सोच को क्रांति का अमलीजामा पहना सकती है? तमाम चुनौतियां सरकार के सामनें खड़ी हैं। अंदर और बाहर दोनों ओर से। उन पर सरकार को काफी काम करना है। यह तब हो सकता है जब सरकार सही काम •भी करे और सही दिशा में जाने का संदेश •भी जनता तक पहुंचाए। दूसरी पारी की ओपनिंग साझेदारी तो हिट विकेट हो चुकी है। अगली पर सबकी निगाह है। सरकार में शामिल सहयोगियों के अपने एजेंडे हैं। बाहर से समर्थन दे रहे दल और करप्शन के दलदल में डूबे उनके नेता भी सरकार से राहत की चाहत रखते हैं। मनमानी में विश्वास रखने वालों की आरती उतारने वाली किसी सरकार से सुशासन की आस बेमानी है। देखना है कि मनमोहन सरकार आगे कौन सी राह पर चलती है? नेहरू की, इंदिरा की, राजीव की, सोनिया की,राहुल की, मनमोहन की, गठजोड़ की विवशता की या फिर जनता की चाह की। राजधर्म के प्रति कर्म का पैमाना तय करेगा कि ये देश सही हाथों में है। सही राह पर है। अगर जनहित पर सरकार खरी नहीं उतरी तो सवाल यह भी पैदा होगा कि अगर ओबामा डेढ़ दर्जन मंत्रियों के साथ अमरीका को चला सकते हैं। दो दर्जन मंत्रियों से ब्रिटेन चल सकता है तो फिर 79 नेताओं पर खजाना लुटाने का क्या मतलब?
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